48 वर्षों से ईरान के सामने अमेरिका को मिल रही है शिकस्त

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48 वर्षों से ईरान के सामने अमेरिका को मिल रही है शिकस्त

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अली शिराज़ी ने कहा है कि अमेरिका पिछले 48 वर्षों से ईरान के खिलाफ लगातार साजिशें, राजनीतिक हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य कार्रवाइयां करता रहा है, लेकिन वह इस्लामी गणराज्य ईरान को पराजित करने में सफल नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि आज ईरानी जनता पहले से अधिक मजबूती के साथ इस्लामी व्यवस्था और नेतृत्व के समर्थन में खड़ी है।

,हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अली शिराज़ी ने कहा है कि अमेरिका पिछले 48 वर्षों से ईरान के खिलाफ लगातार साजिशें, राजनीतिक हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य कार्रवाइयां करता रहा है, लेकिन वह इस्लामी गणराज्य ईरान को पराजित करने में सफल नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि आज ईरानी जनता पहले से अधिक मजबूती के साथ इस्लामी व्यवस्था और नेतृत्व के समर्थन में खड़ी है।

अली शिराज़ी ने कहा कि विश्व साम्राज्यवाद केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें दुनिया की सभी अत्याचारी शक्तियां शामिल हैं। हालांकि, अमेरिका इन शक्तियों में सबसे आगे है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका की सहायता के बिना इजरायली शासन का अस्तित्व कायम रखना मुश्किल होता। उन्होंने कहा कि अमेरिका की वास्तविक नीतियों को समझने के लिए ईरान और दुनिया के विभिन्न देशों में उसके हस्तक्षेप और कथित विश्वासघातों का अध्ययन करना जरूरी है।

अली शिराज़ी ने 19 अगस्त 1953 के तख्तापलट को ईरानी जनता के खिलाफ अमेरिका की सबसे बड़ी साजिशों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने जनता द्वारा चुनी गई सरकार को गिराने में भूमिका निभाई और देश छोड़कर भाग चुके मोहम्मद रज़ा पहलवी को दोबारा सत्ता में पहुंचाया। उनके अनुसार, शाह की वापसी के बाद अमेरिका ने ईरान के तेल, खनिज संसाधनों, संपत्तियों और सेना पर अपना प्रभाव स्थापित किया।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल के सहयोग से सवाक गुप्त पुलिस संगठन को मजबूत किया गया, जिसके दौर में जनता को उत्पीड़न, यातना, जेल और निर्वासन का सामना करना पड़ा।

उन्होंने कहा कि इस्लामी क्रांति के बाद से अमेरिका ने ईरान को कमजोर करने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल किया। कुर्दिस्तान संघर्ष, आठ वर्षीय ईरान-इराक युद्ध, 1378, 1388, 1401 और 1404 के राजनीतिक संकटों तथा आर्थिक, राजनीतिक, सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक दबावों के जरिए इस्लामी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई, लेकिन ये सभी प्रयास विफल रहे।

उन्होंने कहा कि अमेरिका की नाकामी का सबसे बड़ा कारण जनता की सक्रिय भागीदारी, धर्म और क्रांति के प्रति उसका समर्थन तथा देश के नेतृत्व की दूरदर्शी नीति रही है। उन्होंने यह भी कहा कि वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की शहादत के बाद व्यवस्था समाप्त हो जाने की अमेरिकी सोच गलत साबित हुई, क्योंकि ईरान की सैन्य व्यवस्था इस तरह संगठित है कि कठिन परिस्थितियों में भी मुकाबला जारी रखने की क्षमता रखती है।

अली शिराज़ी ने कहा कि जिस व्यवस्था के पीछे जनता की ताकत हो, उसे कोई सैन्य शक्ति समाप्त नहीं कर सकती। उन्होंने अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी कार्रवाइयों का हवाला देते हुए कहा कि भारी तबाही और जनहानि के बावजूद अमेरिका वहां अपने उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सका।

उन्होंने दावा किया कि आज अमेरिका ने क्षेत्र में अपना प्रभाव और सैन्य ठिकानों की स्थिति कमजोर होते देखी है तथा ईरानी जनता अमेरिका की वास्तविक नीतियों को पहले से बेहतर समझने लगी है।

अंत में उन्होंने कहा कि ईरान ने शाह को सत्ता से हटाया, सद्दाम की सेना का मुकाबला किया और जनरल क़ासिम सुलेमानी के नेतृत्व में दाइश को पराजित करने में भूमिका निभाई। उन्होंने विश्वास जताया कि ईरानी जनता इसी एकता, साहस और दृढ़ संकल्प के साथ अमेरिका और इजरायल की नीतियों का मुकाबला करती रहेगी तथा देश की गरिमा और स्वतंत्रता का झंडा बुलंद रखेगी।

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