साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए जरूरी हैं

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साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए जरूरी हैं

हुज्जतुल इस्लाम यूसुफी ने साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष की जटिलताओं पर जोर देते हुए कहा कि तागूत की खुली और छिपी हुई रणनीतियों, विशेष रूप से फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन तथा हक के मोर्चे के साथ टकराव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना ज़रूरी है।

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन यूसुफी ने रविवार को टेलीविजन कार्यक्रम 'आफताब-ए-शरकी' में कहा कि साम्राज्यवाद का मुकाबला केवल सीधे तौर पर विरोध करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए युद्ध के मैदान, दुश्मन के साधनों और फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन जैसी रणनीतियों को भी समझना आवश्यक है। यह पहचानना भी ज़रूरी है कि तागूत कब खुले तौर पर हक के मोर्चे के सामने आता है और कब अप्रत्यक्ष तरीकों तथा दूसरे लोगों का इस्तेमाल करता है।

हुज्जतुल इस्लाम यूसुफी ने सूरह-ए-इसरा की आयत 4 और 5 का हवाला देते हुए बनी इसराईल के भ्रष्टाचार और अहंकार के विषय पर कहा कि पवित्र कुरआन इन आयतों में धरती पर बनी इसराईल के दो बार फसाद करने की खबर देता है। इन आयतों के अंतर्गत वर्णित रिवायतों से यह बात सामने आती है कि जब भी बनी इसराईल को शक्ति और सत्ता प्राप्त होती है, तो वे धरती पर फसाद फैलाते हैं।

उन्होंने इमाम जाफर सादिक अ.स. की एक रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि हजरत ईसा (अ.स.) के दौर में बनी इसराईल ईसाइयों के बीच अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल हो गए थे। इसी दौर में उन्होंने हजरत जकरिया अ.स. और हजरत याह्या (अ.स.) को शहीद कर दिया और हजरत ईसा (अ.स.) को भी शहीद करने की कोशिश की, लेकिन अल्लाह ने उन्हें आसमान पर उठा लिया।

धार्मिक विशेषज्ञ ने कहा कि बाद के दौर में भी बनी इसराईल के भ्रष्टाचार और अहंकार का उल्लेख रिवायतों में मिलता है। कुरआन की सूरह-ए-बय्यिना की आयत 6 में काफिर अहले किताब और मुशरिकों के लिए 'शर्रुल-बरिय्या' का शब्द इस्तेमाल किया गया है। एक रिवायत में पैगंबर-ए-इस्लाम स.अ. ने बनी उमय्या को यहूदी विचारधारा की निरंतरता से जुड़ा हुआ बताया है।

इस संबंध में उन्होंने नहजुल बलागा में जंग-ए-जमल के बाद मरवान बिन हकम के मामले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब मरवान बिन हकम को रिहा करने का फैसला हुआ, तो अमीरुल मोमिनीन हजरत अली (अ.स.) ने उसके संबंध में यहूदियों से जुड़ाव के अर्थ वाला एक कथन फरमाया। उनके अनुसार, हक के विरोध में सक्रिय धाराओं की जटिलताओं को समझने के लिए ऐसी रिवायतों और ऐतिहासिक घटनाओं का अध्ययन महत्वपूर्ण है।

हुज्जतुल इस्लाम यूसुफी ने अपने भाषण के दूसरे हिस्से में फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन की पहचान की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि कभी-कभी किसी कार्रवाई को देखने में ऐसा लगता है कि उसे अपने ही मोर्चे के किसी व्यक्ति ने अंजाम दिया है, जबकि उसका असली योजनाकार और संचालक कोई दूसरा पक्ष होता है।

उन्होंने इमाम हसन मुजतबा अ.स.पर हमले के मामले में अशअस बिन कैस की भूमिका से संबंधित कुछ ऐतिहासिक उल्लेखों का हवाला देते हुए कहा कि यह ऐसी रणनीति का उदाहरण है, जिसमें किसी कार्रवाई की जिम्मेदारी एक पक्ष पर दिखाई जाती है, जबकि उसका वास्तविक सूत्रधार पर्दे के पीछे रहता है।

उन्होंने बनी इसराईल के अहंकार के संबंध में कुरआन में इस्तेमाल किए गए शब्द 'बहुत बड़ा अहंकार और श्रेष्ठता का दावा का उल्लेख करते हुए कहा कि इमाम जाफर सादिक अ.स.की एक रिवायत में इस बड़े अहंकार का उदाहरण इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत को बताया गया है। रिवायत में आया है:

«هَذَا قَتْلُ الْحُسَیْنِ عَلَیْهِ السَّلَام»

यह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत है।

अंत में हुज्जतुल इस्लाम यूसुफी ने जोर देकर कहा कि साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष का सही विश्लेषण करने के लिए हक के विरोधी मोर्चों की खुली और छिपी हुई रणनीतियों तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष कोई साधारण या एकतरफा मामला नहीं है। इसके साधनों, तरीकों और ऐतिहासिक परिस्थितियों की जानकारी के बिना इस टकराव का सटीक विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

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