फ़ारसी शब्दों के अध्ययन से सभ्यताओं के आपसी संबंध उजागर होते हैं

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फ़ारसी शब्दों के अध्ययन से सभ्यताओं के आपसी संबंध उजागर होते हैं

भारत की मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में ग्लोबल साउथ के सांस्कृतिक और साहित्यिक संबंधों पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ।

 सम्मेलन का विषय “नेटवर्क्स एंड एनटैंगलमेंट्स: एक्सप्लोरिंग सिविलाइज़ेशनल इंटरटेक्स्टुअलिटी इन द ग्लोबल साउथ” (नेटवर्क और आपसी संबंध: ग्लोबल साउथ में सभ्यताओं के पारस्परिक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संबंधों का अध्ययन) है।

यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के डॉ. अलेक्ज़ेंडर जब्बारी ने मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि फ़ारसी शब्दों के व्युत्पत्तिगत अध्ययन से विभिन्न भाषाओं और सभ्यताओं के बीच दिलचस्प संबंध सामने आते हैं। ये संबंध सदियों से चले आ रहे भाषाई आदान-प्रदान, सांस्कृतिक मेलजोल और बौद्धिक संवाद को दर्शाते हैं।

डॉ. अलेक्ज़ेंडर जब्बारी ने “प्रारंभिक आधुनिक भारत में फ़ारसी व्याकरण” विषय पर अपने पहले मुख्य व्याख्यान में कहा कि फ़ारसी शब्दों और उनकी व्युत्पत्ति के अध्ययन से फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी, अरबी, सिरिएक, कॉप्टिक और हिब्रू भाषाओं के बीच पारस्परिक साहित्यिक एवं भाषाई संबंधों का पता चलता है।

फ़ारसी शब्दों के अध्ययन से सभ्यताओं के आपसी संबंध उजागर होते हैं: डॉ. अलेक्ज़ेंडर जब्बारी

उन्होंने मुग़लकालीन भारत में फ़ारसी ज्ञान-विज्ञान और साहित्य की व्यापक भूमिका को रेखांकित करते हुए संस्कृत के साथ उसके बौद्धिक और साहित्यिक संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारत, उस्मानी साम्राज्य और चीन में फ़ारसी व्याकरण एवं भाषाविज्ञान की परंपराओं के विकास के साथ-साथ उर्दू और फ़ारसी के पारस्परिक संबंधों की भी समीक्षा की।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफ़ेसर सैयद ऐनुल हसन ने की। उन्होंने ब्रिटिश प्राच्यविद् सर विलियम जोन्स की सेवाओं का उल्लेख किया, जिन्होंने फ़ारसी और भारतीय साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था।

उन्होंने कहा कि यदि ‘मजमा-उल-बहरीन’ के लेखक दारा शिकोह आज जीवित होते, तो शायद वे दो नहीं, बल्कि कई समुद्रों के संगम पर अपनी रचना प्रस्तुत करते। उनका यह कथन सभ्यताओं की विविधता और उनके आपसी संबंधों के महत्व को उजागर करता है।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में रजिस्ट्रार प्रोफ़ेसर इश्तियाक़ अहमद ने स्वागत भाषण दिया, जबकि सम्मेलन के संयोजक प्रोफ़ेसर सैयद इम्तियाज़ हसनैन ने इसके उद्देश्यों और विषयों का परिचय कराया।

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी और सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज़ (CIIL), मैसूर के शैक्षणिक सहयोग से 2 से 4 नवंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।

इस अवसर पर नवंबर 2025 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “उर्दू, हिंदी, अरबी और फ़ारसी: भाषाई, साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान के संदर्भ में सांस्कृतिक सद्भाव” में प्रस्तुत शोधपत्रों के सारांश पर आधारित पुस्तक का भी विमोचन किया गया।

इसके अलावा डॉ. पैगी मोहन, डॉ. मुख़्तार अहमद, प्रोफ़ेसर पंचानन मोहंती और प्रोफ़ेसर संगीता बग्गा गुप्ता की पुस्तकों का भी विमोचन किया गया।

सम्मेलन की निदेशक प्रोफ़ेसर गुलफ़िशां हबीब ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया, जबकि संचालन की ज़िम्मेदारी सम्मेलन के सह-संयोजक प्रोफ़ेसर मोहम्मद अलसमी सिद्दीक़ी ने निभाई।

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