رضوی
लेबनान को उसके असली दुश्मन से बचाइए
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची ने आज लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, यदि लेबनान ईरान के लिए सौदेबाज़ी का कोई साधन होता, तो हम बहुत पहले ही किसी समझौते पर पहुँच चुके होते। उन्होंने जोसफ औन को संबोधित करते हुए कहा,लेबनान को उसके वास्तविक दुश्मन से बचाइए।
,ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची ने आज लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, यदि लेबनान ईरान के लिए सौदेबाज़ी का कोई साधन होता, तो हम बहुत पहले ही किसी समझौते पर पहुँच चुके होते। उन्होंने जोसफ औन को संबोधित करते हुए कहा,लेबनान को उसके वास्तविक दुश्मन से बचाइए।
शेख क़ब्लान का लेबनान के राष्ट्रपति को संदेश: ईरान ने बेरूत पर हमले को रोका था लेबनान के जाफरी मुफ़्ती शेख अहमद क़बलान ने देश के राष्ट्रपति जनरल जोसफ औन को एक संदेश भेजा, जिसमें उन्होंने उनके विभाजनकारी बयानों की कड़ी आलोचना की।
क़बलान ने कहा कि यदि औन इस प्रकार का रवैया जारी रखते हैं, तो वे अपनी राष्ट्रीय साख और प्रतिष्ठा खो देंगे। उन्होंने सलाह देते हुए कहा, हम आपको ऐसी स्थितियों और बयानों से बचने की सलाह देते हैं जो राष्ट्रपति पद की गरिमा के अनुरूप नहीं हैं।
उन्होंने लेबनानी जनता के प्रति तेहरान की समर्थनकारी नीतियों की सराहना करते हुए कहा, यह ईरान था जिसने इज़रायल को चेतावनी दी थी कि यदि वह राजधानी बेरूत को निशाना बनाएगा, तो ईरान युद्ध में शामिल हो जाएगा। वहीं बेरूत पर हमले के लिए इज़रायल को हरी झंडी दिखाने वाला ईरान नहीं, बल्कि अमेरिका का विदेश मंत्री था।
लेबनान के जाफरी मुफ़्ती ने यह भी कहा कि वर्ष 2000 में लेबनान की मुक्ति के लिए ईरान ने ऐतिहासिक समर्थन प्रदान किया था और आज भी वह इस प्रयास में लगा है कि अमेरिका और इज़रायल की योजनाएँ सफल न हो सकें।
कुवैती टीवी ऐंकर को ईरान के प्रति सहानुभूति के आरोप में तीन वर्ष की जेल
कुवैत की न्यायपालिका ने कुवैत के सरकारी टेलीविज़न की प्रस्तोता ज़ैनब दश्ती के विरुद्ध जारी किए गए निर्णय की पुष्टि कर दी है।
कुवैती मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि कुवैत की न्यायिक व्यवस्था ने सरकारी टेलीविज़न की प्रस्तोता ज़ैनब दशती के खिलाफ दिए गए फैसले को बरकरार रखा है। इस निर्णय के तहत उन्हें देश में फूट और अशांति फैलाने तथा राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचाने के आरोप में तीन वर्ष के कारवास की सज़ा सुनाई गई है।
यह फैसला उस अभियान और आलोचना के बाद सामने आया, जिसका उन्हें हाल के समय में सामना करना पड़ा था। यह विवाद उनके द्वारा युद्ध से संबंधित कुछ विचारों और टिप्पणियों के कारण उत्पन्न हुआ, जिन्हें उन्होंने अपने व्यक्तिगत सोशल मीडिया खातों के माध्यम से प्रकाशित किया था।
कुछ लोगों ने इन बयानों और रुख़ को ईरान के प्रति सहानूभूति या समर्थन का संकेत माना, जिसके परिणामस्वरूप उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गई और अंततः उक्त सज़ा सुनाई गई।
ईरान के खिलाफ आक्रामकता आस्वीकार व अनुचित थीः पोप
पोप लियो ने ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल की आक्रामकता के बारे में कहा कि यह युद्ध अनुचित था।
कैथोलिक दुनिया के नेता पोप लियो चौदहवे ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी और इज़राइली सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते हुए स्पष्ट किया कि इस संघर्ष को ‘न्यायसंगत युद्ध’ नहीं माना जा सकता है।
रोम से मैड्रिड की यात्रा के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए, पोप ने कहा कि न्यायसंगत युद्ध की अवधारणा एक ऐसे युग से संबंधित है जब आज के विनाशकारी हथियार मौजूद नहीं थे, इसलिए आधुनिक युद्धों को उसी पैमाने पर मापना सही नहीं है।
उन्होंने परोक्ष रूप से अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के उस रुख को खारिज कर दिया जिसमें ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का बचाव किया गया था।
पोप लियो चौदहवे पिछले कई महीनों से क्षेत्र में तनाव को समाप्त करने और युद्धविराम की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने कई मौकों पर उन बयानों और धमकियों की भी आलोचना की है जो उनके अनुसार संघर्षों को और भड़का सकते हैं और शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का कोई स्पष्ट औचित्य नहीं थाः रूस के राष्ट्रपति
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि पश्चिमी देशों को विश्वास था कि सैन्य कार्रवाइयों के बाद ईरान अंदर से बिखर जाएगा, लेकिन ईरान ने अपनी सरकार और जनता के नेतृत्व में इसके बिल्कुल विपरीत साबित कर दिया।
,रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि पश्चिमी देशों को विश्वास था कि सैन्य कार्रवाइयों के बाद ईरान अंदर से बिखर जाएगा, लेकिन ईरान ने अपनी सरकार और जनता के नेतृत्व में इसके बिल्कुल विपरीत साबित कर दिया।
पुतिन ने आगे कहा कि अमेरिका का ईरान पर हमला बिना किसी उचित कारण के किया गया था। उन्होंने कहा,हमें ईरान की ओर से ऐसा कोई उकसाने वाला कदम दिखाई नहीं दिया जो अमेरिका के हमले को उचित ठहरा सके।
रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कहा: हम ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाइयों को रोकने के निर्णय का समर्थन करते हैं और मानते हैं कि यह एक समझदारी भरा कदम है, जो स्थायी शांति की दिशा में ले जा सकता है।
हम ईरान से संबंधित स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं और क्षेत्रीय पक्षों के बीच तनाव कम करने के प्रयास कर रहे हैं।
वर्तमान घटनाक्रम को लेकर हम अमेरिका, ईरान और इज़रायल के साथ लगातार संपर्क में हैं। हमारा मानना नहीं है कि ईरान परमाणु हथियार प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है, हालांकि इज़रायल को इस संबंध में चिंताएं हैं।
पुतिन ने कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का कोई स्पष्ट औचित्य नहीं था, ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है, और रूस क्षेत्रीय तनाव कम करने तथा शांति स्थापित करने के प्रयासों का समर्थन करता है।
आक्रमण के विरुद्ध ईरान का समर्थन एक धार्मिक कर्तव्य हैः मिस्री सुन्नी विद्वान
मिस्र के सुन्नी विद्वान और पूर्व वक़्फ़ मंत्रालय अधिकारी शेख़ सलामा अब्दुलक़वी ने कहा है कि ईरान एक मुस्लिम देश है। इसलिए अमेरिका और इज़राइल के हमलों के खिलाफ उसका समर्थन करना एक “धार्मिक और इस्लामी कर्तव्य” है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को हमेशा उस पक्ष के साथ खड़ा होना चाहिए जो अत्याचार का शिकार हो, न कि उस पक्ष के साथ जो आक्रमण कर रहा हो।
क्षेत्र में जारी राजनीतिक तनावों के बीच शेख़ सलामा अब्दुलक़वी ने अरब खाड़ी देशों और ईरान के बीच विवादों पर टिप्पणी करते हुए ईरान के समर्थन को धार्मिक रूप से आवश्यक बताया।
मिस्र के सुन्नी विद्वान शैख़ सलामा अब्दुलक़वी, जिन्होंने मिस्र के राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी के कार्यकाल (2012–2013) में वक़्फ़ मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता और सलाहकार के रूप में काम किया था, ने अपने निजी यूट्यूब चैनल पर दिए गए एक बयान में कहा कि अमेरिका और इज़राइल के दबाव और हमलों के खिलाफ ईरान का समर्थन करना केवल राजनीतिक पक्षधरता नहीं है, बल्कि यह एक धार्मिक और शरई कर्तव्य है।
अब्दुलक़वी ने इस सवाल के जवाब में कि “आप खाड़ी देशों में अपने भाइयों के मुकाबले ईरान का पक्ष क्यों ले रहे हैं?” कहा कि यह प्रश्न मूल रूप से ही गलत है, क्योंकि वर्तमान विवाद ईरान और खाड़ी देशों के बीच नहीं है।
उन्होंने कहा कि चाहे हम चाहें या न चाहें, चाहे हमें ईरान पसंद हो या न हो अंततः ईरान एक मुस्लिम देश है। यह देश अमेरिका जैसे गैर-मुस्लिम देशों और नेतन्याहू तथा उनके सहयोगियों के हमलों का निशाना बना हुआ है। यदि हम इस विषय को इस्लामी शरीअत और आस्था के दृष्टिकोण से देखें, तो एक मुसलमान कभी दूसरे मुसलमान के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता।
इस मिस्री विद्वान ने स्पष्ट किया कि उनकी सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सहित खाड़ी देशों से कोई शत्रुता नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका रुख धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है, न कि राजनीतिक झुकावों या अस्थायी मतभेदों पर।
उन्होंने आगे कहा कि यदि अमेरिका सऊदी अरब या संयुक्त अरब अमीरात पर हमला करता है, तो वे बिना किसी संदेह के इन देशों के साथ खड़े होंगे, क्योंकि इस्लामी फिक़्ह के अनुसार जिस पक्ष पर हमला होता है, उसे आत्मरक्षा का वैध अधिकार प्राप्त होता है।
अब्दुलक़वी ने आगे कुछ अहम बिंदु को बयान किया जैसे
- उन्होंने कहा कि आत्मरक्षा इस्लामी कानून और अंतरराष्ट्रीय नियमों दोनों में मान्य है।
- उन्होंने फ़िलिस्तीन और ग़ज़ा के लोगों को छोड़ दिए जाने पर अरब देशों की आलोचना की।
- उन्होंने कहा कि ईरान ने फ़िलिस्तीन और प्रतिरोध आंदोलन का समर्थन किया है, इसलिए उसके प्रति सम्मान होना चाहिए।
- उन्होंने सऊदी अरब और क़तर जैसे देशों में युद्ध-विरोधी रुख को सकारात्मक बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि जो अरब विचारक यह मानते हैं कि इज़राइल के कारण ईरान से संबंध खराब नहीं होने चाहिए, वे सही सोच रखते हैं।
अंत में उन्होंने कहा: “अमेरिका एक अत्याचारी आक्रमणकारी है, और हम हमेशा उसी पक्ष का समर्थन करते हैं जो मज़लूम होता है, न कि आक्रमणकारी का। जहाँ भी सत्य होगा, मैं हमेशा उसी पक्ष के साथ खड़ा रहूँगा। धार्मिक और राजनीतिक मतभेदों को क्षेत्रीय संकटों के संबंध में नैतिक और शरई दृष्टिकोण पर हावी नहीं होने देना चाहिए।”
एकता मुसलमानों की सबसे बड़ी ताकत
वास्तव में हम मुसलमानों को क्या हो गया है?। बहुत आश्चर्य की बात है कि हम सारे मुसलमान एक अल्लाह की इबादत करते हैं, एक पैग़म्बर को मानते हैं, एक ही किताब पर ईमान रखते हैं तथा सभी का क़िबला भी एक है, परन्तु हम लोगों में एकता नही है, हम लोग नाइत्तेफ़ाक़ी का शिकार हैं और हमें एहसास भी नही है।
वास्तव में हम मुसलमानों को क्या हो गया है?। बहुत आश्चर्य की बात है कि हम सारे मुसलमान एक अल्लाह की इबादत करते हैं, एक पैग़म्बर को मानते हैं, एक ही किताब पर ईमान रखते हैं तथा सभी का क़िबला भी एक है, परन्तु हम लोगों में एकता नही है, हम लोग नाइत्तेफ़ाक़ी का शिकार हैं और हमें एहसास भी नही है।
इस संक्षिप्त लेख में यह प्रयत्न किया है कि एकता के अर्थ को बयान करके उसके महत्व पर प्रकाश डाला जाये तथा उससे प्राप्त होने वाली प्रगतियों को स्पष्टीकरण किया जाये। ताकि हम लोगों में इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ के साथ रहने का जज़्बा पैदा हो।अल्लाह से यही प्रार्थना करता हूँ कि वह हम मुसलमानों को एकता के साथ रहने की तौफ़ीक़ प्रदान करे।
एकता का अर्थ
शब्दकोष में एकता का अर्थ है एक होना, एक करना, यक जहती, यक दिली आदि।[1]
एकता की परिभाषा यह है कि हम सभी मुसलमान कुछ चीज़ों में अपने अक़ीदों की सुरक्षा करते हुए आपस में एक हो जायें।
अत: अब स्पष्ट हो गया कि एकता का अर्थ यह नही है कि सारे मुसलमान शिया हो जायें या सारे मुसलमान सुन्नी हो जायें बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम फ़िरक़े का मुसलमान अपने अपने अक़ीदे पर गामज़न रहते हुए, इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों के विरुद्ध एक हो जाएँ तथा उनके प्रति ग़फ़लत से काम न लें।
एकता का महत्व
इस्लाम एक समाजिक धर्म है। और यहा कारण है कि इस धर्म में एकता व भाईचारगी की दावत दी गई है तथा घृणा एवँ नाइंसाफ़ी का विरोध किया गया है।
अल्लाह तबारत व तआला क़ुरआने मजीद में फ़रमा रहा है कि ...
मोमिनीन आपस में एक दूसरे के भाई हैं तो तुम लोग अपने दो भाईयों के बीच मेल जोल करा दिया करो।[2]
इसी प्रकार दूसरे स्थान पर फ़रमा रहा है कि .....................................
बेशक यह तुम्हारी उम्मत एक उम्मत है और मैं ही तुम सब का पालने वाला हूँ तो फिर तुम लोग मेरी ही इबादत किया करो।[3]
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे वा आलिहि वसल्लम जब मक्के से हिजरत करके मदीने तशरीफ़ ले गये तो आपने अपने अनुयाईयों के बीच भाईचारगी का अक़्द पढ़ा तथा उन्हे एक दूसरे का हमदर्द ठहराया।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) का फ़रमान है कि ....................................
सारे मुसलमान आपस में एक दूसरे के भाई हैं तथा बरतरी एवँ उत्तमता तक़वा के आधार पर है।[4]
दूसरे स्थान पर फ़रमाते हैं कि ......................................
ऐ लोगो, तुम पर ज़रुरी है कि इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ के साथ रहो तथा इख़्तिलाफ़ एवँ इफ़्तेराक़ से अपने को बचाओ।[5]
आयतों एवँ रिवायतों से यह स्पष्ट हो गया कि इस्लाम धर्म में एकता एवँ इत्तेहाद का बहुत महत्व है।
एकता से संबंधित प्रगतियाँ
एकता से संबंधित प्रगतियाँ बहुत हैं, परन्तु उनमें से कुछ पर प्रकाश डालना है जो इस प्रकार है:
1. इज़्ज़त एवँ क़ुदरत में वृद्धि
इत्तेहाद एवँ एकता इज़्ज़त एवँ क़ुदरत का आधार है। जैसे जैसे एकता में दृढ़ता (इस्तेहकाम) आता चला जायेगा। उसी प्रकार क़ुदरत एवँ इज़्ज़त में वुद्धि होती चली जायेगी। एकता से क़ौम एवँ मिल्लत को शक्ति मिलती है और इज़्ज़त में बढ़ोत्तरी होती है।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) फ़रमाते हैं कि .......................
एक इज़्ज़तदार क़ौम उस वक़्त जलील होती है जब सुस्त एवँ कमज़ोर हो जाए और क़ौम सुस्त एवँ कमज़ोर उस वक़्त होती है जब नाइत्तेफ़ाक़ी का शिकार हो जाये और नाइत्तेफ़ाक़ी उस वक़्त वुजूद में आती है जब लोगों के दिलों में बुग़्ज़ जन्म ले ले।[6]
अल्लाह तबारक व तआला फ़रमाता है कि ...................................
अल्लाह और उसके रसूल की पैरवी करो और आपस में झगड़ा एवँ इख़्तिलाफ़ न करो वरना सुस्त और कमज़ोर हो जाओगे।[7]
2. आर्थिक स्थिति में सुधार
जब सारे मुसलमान एकता के साथ रहेगें तो उनके अंदर मुहब्बत पैदा होगी। एक दूसरे के साथ भाई जैसा व्यवहार करेगें। अत: कठिनाईयों के अवसर पर एक दूसरे का सहयोग करेगें। इस तरह मुसलमान अपनी आर्थिक स्थिति को अच्छी से अच्छी बनाने के लिये विभिन्न सुझावों को अमली जामा पहना सकते हैं।
अ. इस्लामी देशों की बहुमुल्य संपत्तियों को सामराजी हुकूमतों की लूटमार से बचाना और उनका सही प्रयोग करना।
आ. टेकनालाँजी की कमी (महरुमियत) को दूर करना। अर्थात इसके लिये निवेश (सरमाया गुज़ारी) करना और इस्लामी देशों के विभिन्न विशेषज्ञों से सहयोग लेना। मुसलमानों की सर्वोच्च शिक्षा के लिये एक देश से दूसरे देश में आने जाने की सुविधा उपलब्ध कराना।
इ. संयुक्त इस्लामी बैंक की स्थापना की जाए और उसके ज़रिये बड़ी बड़ी कंपनियाँ बनाई जाएँ तथा उसमें मुसलमानों को रोज़गार से लगाया जाये या उन्हे बैंक से लोन देकर व्यापार कराया जाये। इस प्रकार मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है।
3. शाँति में सुविधा
जब मुसलमान प्रेम के साथ अपना जीवन गुज़ारेगें तो उनकी फिक्र सही काम करेगी और उन पर उनके एहसासात ग़ालिब नही होगें। अत: एक दूसरे की दिल आज़ारी नही होगी। एक दूसरे की मुक़द्देसात की हुरमत सुरक्षित रहेगी तथा एक फ़िरक़े का दूसरे फ़िरक़े पर किचड़ उछालना, तोहमत लगाना, ग़लत प्रोपगंडा करना, एक दूसरे को काफ़िर कहना आदि बंद हो जायेगा। अत: मुसलमानों के हाथों मुसलमानों का क़त्ल नही होगा।
इसके अतिरिक्त दुश्मन, मुसलमानों के मुक़द्देसात की बे हुरमती करने की हिम्मत एवँ जुरअत नही करे सकेगें तथा उनकी तरफ़ आँख नही उठाया जायेगा। उनसे कोई नफ़रत नही करेगा और दहशतगर्द की तोहमत लगा कर उनकी क़त्ले आम नही किया जायेगा।
अत: यह स्पष्ट हो गया कि मुसलमाल केवल एकता के साये में अपना जीवन शाँति पूर्वक गुज़ार सकते हैं।
आज दुनिया में मुसलमानों की संख्या लगभग डेढ़ अरब है और 56 इस्लामी देश हैं तथा अल्लाह के फ़ज़्ल के संसार की सारी बहुमुल्य संम्पत्तियाँ उनके पास है। यदि दुनिया के सारे मुसलमान मुत्तहिद हो जायें तो एक अज़ीम शक्ति के रूप पर दुनिया में छा सकते हैं और दुश्मन इसी से भयभीत है तथा मुसलमानों को विभिन्न बहानों से मुतफ़र्रिक़ रखने के लिये हर मुम्किन कोशिश करते चले आ रहे हैं, यहाँ तक कि सालाना लाखों डालर्स इस हदफ़ के लिये ख़र्च कर रहे हैं।
अत: मुसलमानों को भी चाहिये कि वे एकता कायम करने के लिये हर मुमकिन प्रयास करें तथा हमेशा बेदार व होशियार रहें ताकि दुश्मनों की शैतानी हरकतों के शिकार न हों और अपने क़ौल एवँ अमल के ज़रिये मुसलमानों की एकता की रुकावट का सबब न बनें।
[1]. अल मुन्जिद, तर्जुम ए मुहम्मद बंदरबेगी, जिल्द 2 पेज 2152
[2]. क़ुरआने मजीद सूर ए हुजरात आयत 10
[3]. सूर ए अंबिया आयत 92
[4]. कंज़ुल उम्माल जिल्द 1 पेज 149
[5]. कंज़ुल उम्माल जिल्द 1 पेज 206
[6].
[7]. सूर ए अनफ़ाल आयत 46
इमाम महदी (अ) के ज़ुहूर और उनके शासन में महिलाओं की भूमिका और स्थान
समाज के पुरुषों की तरह महिलाओं को भी इलाही उद्देश्यों की पूर्ति में अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरा प्रयास करना चाहिए। वास्तव में, उनके सक्रिय योगदान के बिना अल्लाह के वादों की पूर्ति संभव नहीं होगी। इसी कारण अल्लाह तआला ने पुरुष और महिला—दोनों को आध्यात्मिक मूल्यों से स्वयं को सुशोभित करने का आदेश दिया है, क्योंकि केवल नेक समाज और सदाचारी मनुष्य ही धरती के उत्तराधिकारी बन सकते हैं।
महदीवाद पर चर्चाओं का कलेक्शन, जिसका टाइटल "आदर्श समाज की ओर" है, आप सभी के लिए पेश है, जिसका मकसद इस समय के इमाम से जुड़ी शिक्षाओं और ज्ञान को फैलाना है।
इमाम महदी (अ) के ज़ुहूर और उनकी सरकार से संबंधित महत्वपूर्ण विषयों में से एक विषय महिलाओं का स्थान और उनकी भूमिका है कि वे ज़ुहूर की प्रक्रिया और महदवी शासन में किस प्रकार योगदान देंगी।
इस विषय में प्रवेश करने से पहले, हम महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति के बारे में शहीद इमाम, अली ख़ामेनेई के क़ुरआनी दृष्टिकोण का एक अंश प्रस्तुत करते हैं: "इस्लाम में महिलाओं की बैअत, उनकी संपत्ति का अधिकार और राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में उनकी भागीदारी को मान्यता दी गई है। إِذَا جَائَکَ الْمُؤْمِنَاتُ یُبَایِعْنَکَ عَلَی أَنْ لَا یُشْرِکْنَ بِاللَّه. इज़ा जाअकल मोमेनातो योबायेनका अला अल्ला युशरिकना बिल्लाह 'जब ईमान वाली स्त्रियाँ तुम्हारे पास आएँ और तुमसे बैअत करें कि वे अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं ठहराएँगी...' (सूर ए मुम्तहेना: 12) महिलाएँ स्वयं पैग़म्बर के पास आकर बैअत करती थीं। इस्लाम के पैग़म्बर ने यह नहीं कहा कि केवल पुरुष आकर बैअत करें और महिलाएँ उनके निर्णयों का अनुसरण करने के लिए बाध्य हों। बल्कि महिलाओं को भी इस शासन और सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को स्वीकार करने में सहभागी बनाया गया।" (महिलाओं के एक बड़े समूह से मुलाक़ात में भाषण, 30 सितम्बर 2000)
"जब इस्लाम कहता है:وَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِیَاءُ بَعْضٍ یَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَیَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْکَرِ वल मोमेनूना वल मोमेनातो बअज़ोहुम औलियाओ बअज़िन यअमोरूना बिल मअरूफ़े व यन्हौना अनिल मुनकरे 'ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली महिलाएँ एक-दूसरे के सहायक हैं; वे भलाई का आदेश देते हैं और बुराई से रोकते हैं।' (सूर ए तौबा: 71) तो इसका अर्थ यह है कि समाज की व्यवस्था की रक्षा, भलाई का आदेश और बुराई से रोकने में पुरुष और महिलाएँ दोनों साझेदार हैं। इस्लाम ने महिलाओं को इससे अलग नहीं किया और न ही हम उन्हें अलग कर सकते हैं। इस्लामी समाज के संचालन और उसकी प्रगति की जिम्मेदारी सभी पर है—पुरुषों पर भी और महिलाओं पर भी—हर एक अपनी क्षमता के अनुसार।" (प्रतिभाशाली महिलाओं के समूह से मुलाक़ात, 4 जुलाई 2007)
इसके अतिरिक्त, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अल्लाह तआला ने पवित्र क़ुरआन में आध्यात्मिक मूल्यों के दस गुणों का उल्लेख किया है और इन सभी में पुरुषों और महिलाओं को समान भागीदार बताया है। यदि ये गुण समाज में न हों, तो वह एकेश्वरवादी समाज, जो इस्लाम के साए में स्थापित होना है, कभी अस्तित्व में नहीं आ सकता।
إِنَّ الْمُسْلِمِینَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِنِینَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْقَانِتِینَ وَالْقَانِتَاتِ وَالصَّادِقِینَ وَالصَّادِقَاتِ وَالصَّابِرِینَ وَالصَّابِرَاتِ وَالْخَاشِعِینَ وَالْخَاشِعَاتِ وَالْمُتَصَدِّقِینَ وَالْمُتَصَدِّقَاتِ وَالصَّائِمِینَ وَالصَّائِمَاتِ وَالْحَافِظِینَ فُرُوجَهُمْ وَالْحَافِظَاتِ وَالذَّاکِرِینَ اللَّهَ کَثِیرًا وَالذَّاکِرَاتِ أَعَدَّ اللَّهُ لَهُمْ مَغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِیمًا.
इन्नल मुस्लेमीना वल मुस्लेमाते वल मोमेनीना वल मोमेनाते वल क़ानेतीना वल क़ानेताते वस सादेक़ीना वस सादेक़ाते वस साबेरीना वस साबेराते वल ख़ाशेईना वल ख़ाशेआते वल मुतसद्देक़ीना वल मुतसद्देक़ाते वस साएमीना वस साएमाते वल हाफ़ेज़ीना फ़ुरूजहुम वल हाफ़ेज़ाते वज़ ज़ाकेरीनल्लाहा कसीरन वज़ ज़ाकेराते आअद्दल्लाहो लहुम मग़फ़ेरतन व अज्रन अज़ीमा
"निस्संदेह मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम महिलाएँ, ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली महिलाएँ, आज्ञाकारी पुरुष और आज्ञाकारी महिलाएँ, सत्यवादी पुरुष और सत्यवादी महिलाएँ, धैर्यवान पुरुष और धैर्यवान महिलाएँ, विनम्र पुरुष और विनम्र महिलाएँ, दान करने वाले पुरुष और दान करने वाली महिलाएँ, रोज़ा रखने वाले पुरुष और रोज़ा रखने वाली महिलाएँ, अपनी पवित्रता की रक्षा करने वाले पुरुष और महिलाएँ तथा अल्लाह को बहुत याद करने वाले पुरुष और महिलाएँ—अल्लाह ने इन सबके लिए क्षमा और महान प्रतिफल तैयार कर रखा है।" (सूर ए अहज़ाब: 35)
अतः क्या यह संभव है कि मानवता के उद्धारकर्ता के ज़ुहूर और उनके शासन की स्थापना के मार्ग में महिलाओं की कोई भूमिका न मानी जाए? क्या इलाही मिशनों में महिलाओं की भूमिका को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?
समाज के पुरुषों की भाँति महिलाओं को भी इलाही उद्देश्यों की पूर्ति में अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरा प्रयास करना चाहिए। वास्तव में, उनके योगदान के बिना अल्लाह के वादों की पूर्ति संभव नहीं होगी। इसी कारण अल्लाह ने पुरुष और महिला दोनों को आध्यात्मिक मूल्यों से सुसज्जित होने का आदेश दिया है, क्योंकि केवल नेक समाज और धर्मनिष्ठ लोग ही धरती के उत्तराधिकारी बन सकते हैं।
وَلَقَدْ کَتَبْنَا فِی الزَّبُورِ مِنْ بَعْدِ الذِّکْرِ أَنَّ الْأَرْضَ یَرِثُهَا عِبَادِیَ الصَّالِحُونَ.
वलक़द तकबना फ़िज़्ज़बूरे मिन बादज़ ज़िक्रे अन्नल अर्ज़ा यरेसोहा ऐबादियस सालेहूना
"और हमने ज़बूर में, ज़िक्र (तौरात) के बाद लिख दिया कि धरती के उत्तराधिकारी मेरे नेक बंदे होंगे।" (सूर ए अम्बिया: 105)
उपरोक्त बातों से स्पष्ट होता है कि समाज की महिलाओं पर भी पुरुषों की तरह इलाही उद्देश्यों की प्राप्ति के मार्ग में सामान्य कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ हैं, जिनकी ओर उन्हें ध्यान देना चाहिए। हाँ, महिलाओं के लिए कुछ विशेष और अद्वितीय भूमिकाएँ भी मानी जा सकती हैं, जिन पर हम इस श्रृंखला के अगले भाग में चर्चा करेंगे।
यह चर्चा जारी है...
बहरैन शासन का हुसैनी मजलिसों से डर इमाम हुसैन (अ) के आंदोलन की प्रभावशीलता को दर्शाता है
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन सय्यद सदरुद्दीन क़ब्बानची, इमामे जुमा नजफ़ अशरफ़ ने अपने जुमे के ख़ुत्बों में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हुए इराक में पूर्ण कैबिनेट के गठन में तेजी लाने की अपील की और लेबनान में इज़राइल की कार्रवाइयों पर चेतावनी दी।
उन्होंने नजफ़ अशरफ़ की फ़ातिमिया मस्जिद में दिए गए ख़ुत्बों में कहा कि इराकी जनता अब भी मंत्रिमंडल के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रही है। इसलिए उन्होंने “कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क”, राजनीतिक दलों और प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वे इस प्रक्रिया को तेज करें, क्योंकि सरकार नौ मंत्रालयों के खाली रहने के साथ प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती।
इमामे जुमा ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2 मार्च से अब तक इज़राइल द्वारा लेबनान पर 200 से अधिक हमले किए गए हैं, जिनमें 3412 लोगों की मौत और 10269 घायल हुए हैं। उन्होंने कहा कि जब तक इज़राइल जैसा “कैंसर” मौजूद है, दुनिया में स्थायी शांति संभव नहीं है, और राष्ट्रों को आत्मरक्षा का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह को भंग करने की मांग वास्तव में इज़राइल को बेरूत में खुली एंट्री देने के समान है।
सय्यद सदरुद्दीन क़ब्बानची ने बहरीन की स्थिति पर कहा कि मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार वहां हुसैनी धार्मिक कार्यक्रमों पर कई प्रतिबंध लगाए गए हैं, जैसे: मजलिस के भाषण 40 मिनट से अधिक न हों, “हयहात मिन्ना-ज़िल्ला” का नारा न लगाया जाए, यज़ीद का नाम न लिया जाए, और मुहर्रम व अरबईन के दौरान इराक और ईरान यात्रा पर रोक।
उन्होंने कहा कि ये कदम पैग़म्बर (स) की शिक्षाओं के प्रति वफ़ादारी नहीं हैं, जिन्होंने हसन और हुसैन (अ) को जन्नत के युवाओं के सरदार बताया। उन्होंने कहा कि इन प्रतिबंधों से स्पष्ट होता है कि हुसैनी मजलिसों से डर दरअसल इमाम हुसैन (अ) के आंदोलन की निरंतर प्रभावशीलता और जनता को जागरूक करने की शक्ति का प्रमाण है।
नजफ के इमाम जुमा ने इमाम ख़ुमैनी की बरसी का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके निधन को 37 वर्ष हो चुके हैं। उन्होंने शहीद सय्यद मुहम्मद बाक़िर अल-सद्र प्रथम का कथन याद दिलाया कि इमाम ख़ुमैनी “नबियों के सपने को पूरा करने वाले व्यक्ति” थे।
उन्होंने कहा कि इस क्रांति ने कई महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए, जैसे: नेतृत्व मरजेइयत का अधिकार है, इस्लाम शासन योग्य है, जनता को उठ खड़ा होना चाहिए, और शासन इस्लामी कानूनों तथा राजनीतिक स्वतंत्रताओं दोनों पर आधारित होना चाहिए।
सदरूद्दीन कब्बांची ने मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाह मुहम्मद इस्हाक़ फ़य्याज़ के निधन का उल्लेख करते हुए इमाम हसन असकरी (अ) की प्रसिद्ध हदीस बयान की कि योग्य फ़क़ीह वह है जो आत्मसंयमी, धर्म का रक्षक और इच्छाओं से दूर हो — ऐसे विद्वान की तक़लीद जनता कर सकती है।
ग़दीर के अवसर पर उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि जो लोग इमाम अली (अ) के साथ थे लेकिन उनकी सहायता नहीं की, उनके बारे में अहलेबैत (अ) का दृष्टिकोण क्या है? उन्होंने कहा कि जो लोग विलायत से मुंह मोड़ते हैं वे भटकाव में हैं, जबकि जो पैग़म्बर (स) के साथ अच्छे व्यवहार में रहे और वफ़ादार रहे, वे स्वीकार्य हैं।
उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) की सहीफ़ा सज्जादिया का उल्लेख किया जिसमें पैग़म्बर के सच्चे साथियों के लिए दुआ की गई है।
नजफ के इमाम जुमा ने निष्कर्ष में कहा कि दृष्टिकोण संतुलित होना चाहिए: न पूर्ण प्रशंसा और न पूर्ण निंदा। इसके प्रमाण के रूप में उन्होंने कई हदीसें बयान कीं, जैसे:
“या अली! तुमसे केवल मोमिन प्रेम करता है और केवल मुनाफ़िक़ दुश्मनी करता है।”
“मेरे अहलेबैत नूह की कश्ती के समान हैं, जो इसमें सवार हुआ वह बच गया।”
और यह भी कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के बारे में: “अल्लाह उनकी रज़ा से राज़ी होता है और उनके ग़ज़ब से ग़ज़बनाक होता है।”
आयतुल्लाह फ़य्याज़ की बरकतें नजफ़ के हौज़ा में कभी भुलाई नहीं जाएँगी
आयतुल्लाहिल उज़्मा नासिर मकारिम शिराज़ी ने नजफ़ के महान मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाह शेख़ इस्हाक़ फ़य्याज़ के निधन पर शोक संदेश जारी किया है।
आयतुल्लाहिल उज़्मा नासिर मकारिम शिराज़ी ने नजफ़ के महान मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाह शेख़ इस्हाक़ फ़य्याज़ के निधन पर शोक संदेश जारी किया है। उनके शोक संदेश का पाठ इस प्रकार है:
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
एक रब्बानी विद्वान और महान मरजा-ए-तक़लीद, आयतुल्लाह हाजी शेख़ इस्हाक़ फ़य्याज़ (र) के निधन की खबर से गहरा दुख और शोक उत्पन्न हुआ, और इसने पवित्र हौज़ा-ए-इल्मिया नजफ़ अशरफ़ को शोक में डाल दिया।
नजफ़ अशरफ़ में उनका वर्षों तक निवास, अनेक छात्रों का प्रशिक्षण, पुस्तकों की रचना, उस हौज़ा की इल्मी गतिविधियों पर गहरी पकड़, और मोमिनों तथा मुक़ल्लिदों का मार्गदर्शन—ये सब उनके अस्तित्व की उन बरकतों में से हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता, और जिनके अमल-ए-सालेह इनशा-अल्लाह हमेशा बने रहेंगे।
मैं इस दुखद घटना पर नजफ़ के हौज़ा, अफ़ग़ानिस्तान और इराक की मोमिन जनता, उनके सभी अनुयायियों और चाहने वालों, विशेष रूप से उनके सम्मानित परिवार के प्रति संवेदना ज़ाहिर करता हूँ। और अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ कि वह इस दिवंगत को उच्च दर्जे प्रदान करे और उन्हें अपने औलिया के साथ महशूर करे, तथा पीछे रह गए लोगों को सब्र-ए-जमील और अज्र-ए-जज़ील प्रदान करे।
वस सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातोह
क़ुम — नासिर मकारिम शिराज़ी
6 जून 2026
आयतुल्लाह फ़य्याज़ की बरकतें नजफ़ के हौज़ा में कभी भुलाई नहीं जाएँगी
आयतुल्लाहिल उज़्मा नासिर मकारिम शिराज़ी ने नजफ़ के महान मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाह शेख़ इस्हाक़ फ़य्याज़ के निधन पर शोक संदेश जारी किया है।
आयतुल्लाहिल उज़्मा नासिर मकारिम शिराज़ी ने नजफ़ के महान मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाह शेख़ इस्हाक़ फ़य्याज़ के निधन पर शोक संदेश जारी किया है। उनके शोक संदेश का पाठ इस प्रकार है:
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
एक रब्बानी विद्वान और महान मरजा-ए-तक़लीद, आयतुल्लाह हाजी शेख़ इस्हाक़ फ़य्याज़ (र) के निधन की खबर से गहरा दुख और शोक उत्पन्न हुआ, और इसने पवित्र हौज़ा-ए-इल्मिया नजफ़ अशरफ़ को शोक में डाल दिया।
नजफ़ अशरफ़ में उनका वर्षों तक निवास, अनेक छात्रों का प्रशिक्षण, पुस्तकों की रचना, उस हौज़ा की इल्मी गतिविधियों पर गहरी पकड़, और मोमिनों तथा मुक़ल्लिदों का मार्गदर्शन—ये सब उनके अस्तित्व की उन बरकतों में से हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता, और जिनके अमल-ए-सालेह इनशा-अल्लाह हमेशा बने रहेंगे।
मैं इस दुखद घटना पर नजफ़ के हौज़ा, अफ़ग़ानिस्तान और इराक की मोमिन जनता, उनके सभी अनुयायियों और चाहने वालों, विशेष रूप से उनके सम्मानित परिवार के प्रति संवेदना ज़ाहिर करता हूँ। और अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ कि वह इस दिवंगत को उच्च दर्जे प्रदान करे और उन्हें अपने औलिया के साथ महशूर करे, तथा पीछे रह गए लोगों को सब्र-ए-जमील और अज्र-ए-जज़ील प्रदान करे।
वस सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातोह
क़ुम — नासिर मकारिम शिराज़ी
6 जून 2026













