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विदेशी मीडिया में 11 फ़रवरी की रैली में ईरानी जनता की भव्य उपस्थिति पर प्रतिक्रिया
विदेशी मीडिया ने ईरानी जनता की जोरदार और वीरतापूर्ण उपस्थिति को ईरानी इस्लामी क्रांति की वर्षगांठ की रैली में लाइव कवर किया।
बुधवार 11 फ़रवरी की सुबह मिलियनों लोग तेहरान, शहरों, गाँवों और ईरान के विभिन्न प्रांतों में ईरानी इस्लामी क्रांति की 47वीं वर्षगांठ मनाने के लिए सड़कों पर उतरे। इस वर्ष की 11 फरवरी की रैली में ईरान के 1400 से अधिक स्थानों पर रैलियाँ आयोजित की गईं और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 7200 स्थानीय और करीब 200 विदेशी पत्रकारों ने इस कार्यक्रम को कवर किया।
ईरानियों की व्यापक रैली की शुरुआत के साथ ही, विदेशी मीडिया ने इस जोरदार और वीरतापूर्ण उपस्थिति को लाइव कवर किया।
रॉयटर्स नेटवर्क ने रैली के शुरुआती क्षणों से ही ईरानी जनता की इस राष्ट्रीय वीरता को लाइव कवर किया।
कतर के अलजजीरा नेटवर्क ने भी ईरानी जनता की इस्लामी क्रांति की वर्षगांठ पर रैली को लाइव कवर किया।
रूसी नेटवर्क रियानोवोस्ती ने ईरानी जनता की रैली की तस्वीरें प्रकाशित करते हुए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पिज़िश्कियान के कुछ बयान साझा किए। रियानोवोस्ती के अनुसार मसूद पिज़िश्कियान ने रैली में कहा: हम परमाणु हथियार नहीं चाहते और किसी भी सत्यापन के लिए तैयार हैं। ईरान अत्यधिक मांगों और अन्याय के सामने नहीं झुकेगा।
पाकिस्तान का जियो न्यूज नेटवर्क ने लोगों की सड़कों पर मौजूदगी की तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि ईरानी जनता ने ईरानी इस्लामी क्रांति की 47वीं वर्षगांठ मनाई।
लेबनानी नेटवर्क अलमानार ने इस बड़ी रैली की शुरुआत का उल्लेख किया और कहा कि यह रैली विभिन्न शहरों में आयोजित की गई।
लेबनानी नेटवर्क अलमयादीन ने ईरानी जनता की शानदार रैली का लाइव कवर किया और बताया कि ईरानी जनता ने क्रांति की 47वीं वर्षगांठ पर विभिन्न प्रांतों और शहरों में बड़ी रैली आयोजित की।
फिलिस्तीनी नेटवर्क कुद्स ने तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि इस्लामी क्रांति की वर्षगांठ पर ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रदर्शन किया।
लेबनानी नेटवर्क अलअहद ने शहरों, गाँवों और विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी रैली की तस्वीरें साझा कीं और बताया कि वर्तमान में ईरान के विभिन्न शहरों में इस्लामी क्रांति की वर्षगांठ की रैली जारी है।
इराकी नेटवर्क अलअहद ने 11 फरवरी की रैली का लाइव कवर करते हुए कहा कि “क्रांति की 47वीं वर्षगांठ के मौके पर आजादी मैदान में बड़ी संख्या में मिसाइलों का प्रदर्शन किया गया। इस मीडिया ने स्वतंत्रता मैदान पर पैराशूट के उतरने के दृश्य भी दिखाए।
रूसी नेटवर्क रूसिया अलयूम ने रिपोर्ट में बताया कि ईरानी इस्लामी क्रांति की वर्षगांठ रैली में ईरान के अधिकारी और राजनेता भी उपस्थित थे।
यमनी नेटवर्क अलमसिरा ने बताया कि आज सुबह से ही ईरान के कई शहरों में शानदार रैली शुरू हुई। बड़ी संख्या में लोग सड़कों और मुख्य चौकों में मौजूद थे जो मजबूत जन समर्थन और इस महत्वपूर्ण अवसर पर बढ़ते राजनीतिक और मीडिया तनाव के लिए तैयार होने का संकेत था। रैली में शामिल लोगों ने ईरानी झंडे और क्रांतिकारी नेता की तस्वीरें लहराईं और स्वतंत्रता के समर्थन और विदेशी दबाव के खंडन में नारे लगाए।
अलमसिरा के अनुसार ईरानी जनता ने क्रांति की 47वीं वर्षगांठ की रैली में व्यापक उपस्थिति दर्ज कराई और इस्लामी क्रांति के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोबारा व्यक्त की। तेहरान के आज़ादी मैदान में फ़ातेह 110, हाज़ क़ासिम और फ़त्ह मिसाइलों का प्रदर्शन किया गया। साथ ही 12 दिन की लड़ाई में गिराए गए इज़राइली ड्रोन के मलबे भी प्रदर्शित किए गए।
ईरान अमेरिका और यूरोप की बेतुकी मांगों के सामने नहीं झुकेगा
ईरान के राष्ट्रपति ने कहा: आज दुनिया को यह देखना चाहिए कि ईरानी जनता अपनी क्रांति की रक्षा, शासन के नेतृत्व का पालन और अपने गौरवशाली देश और मूल्यों की रक्षा के लिए पूरे देश में लाखों की संख्या में सड़कों पर उतरी है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पिज़िशकियान ने बुधवार को इस्लामी क्रांति की 47वीं वर्षगांठ पर तेहरान के आज़ादी चौक में आयोजित भव्य 22 बहमन रैली में कहा: ईरानी जनता ने यह सुनिश्चित करने के लिए विद्रोह किया कि न्याय स्थापित हो, ईरान स्वतंत्र रहे और दुनिया को दिखा सके कि ईरानी अपनी शक्ति, इच्छा, ज्ञान और कला से देश का निर्माण कर सकते हैं और गरिमा व स्वतंत्रता ला सकते हैं।
राष्ट्रपति ने जोर दिया: अमेरिका और यूरोप ने इस्लामी क्रांति को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुए। उन्होंने हमें आठ साल का युद्ध थोपने की कोशिश की, सद्दाम का समर्थन किया ताकि ईरान को विभाजित और कब्ज़ा किया जा सके लेकिन बहादुर ईरानी युवाओं ने अपने जीवन की आहुति देकर देश, व्यवस्था और क्रांति की रक्षा की।
मसूद पिज़िशकियान ने कहा कि कुछ लोग अतीत में ईरान के सभी संसाधनों को लूटकर ले गए और आज भी दावा करते हैं कि वे देश को चला सकते हैं। उन्होंने कहा: ईरान के वीर शहीदों के पास अपनी जान के अलावा कोई और संपत्ति नहीं थी और उन्होंने इसे भी देश की सेवा और राष्ट्र की शान के लिए बलिदान किया। ये शहीद साबित करते हैं कि दुश्मन उन्हीं को निशाना बनाते हैं जो देश के लिए अपने सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हैं।
राष्ट्रपति ने क्षेत्रीय और इस्लामी देशों की भूमिका को दुश्मनों की साजिशें विफल करने में महत्वपूर्ण बताया और कहा कि क्षेत्रीय देश लगातार फोन के माध्यम से अपनी चिंताएँ और रुख हमारे साथ साझा कर रहे थे। उन्होंने तुर्किये, कतर, अरब अमीरात, पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र आदि के अधिकारियों और राष्ट्रपतियों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने ईरान की चिंता की और क्षेत्रीय मुद्दों के शांतिपूर्ण और कूटनीतिक समाधान की दिशा में काम किया ताकि इज़राइल और अमेरिका अपनी दुष्ट योजनाओं को लागू न कर सकें।
पेज़िशकियान ने जोर देकर कहा: ईरान अमेरिका और यूरोप की लालसा के सामने झुकेगा नहीं; हम परमाणु हथियार नहीं चाहते और सत्यापन के लिए तैयार हैं हम शांति और स्थिरता के लिए क्षेत्रीय देशों के साथ वार्ता कर रहे हैं।
ईरान के राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे क्षेत्र को बाहरी ताकतों की जरूरत नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया: हम अंतरराष्ट्रीय कानून और ईरान के अधिकारों के ढांचे में बातचीत के लिए तैयार हैं और क्रांति के नेता द्वारा निर्धारित लाल रेखाओं का उल्लंघन नहीं करेंगे।
इमाम ख़ुमैनी: इस्लामी इतिहास का एक महान अध्याय
अहले बैत फ़ाउंडेशन के उपाध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकत्तवि ने कहा कि: इमाम ख़ुमैनी इस्लामी इतिहास के एक महान अध्याय और एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने अपने समय के तंत्र को चुनौती दी और एक नए युग की शुरुआत की। उनकी नेतृत्व में ईरान ने एक ऐसा क्रांति देखा जिसने न केवल ईरान बल्कि सम्पूर्ण इस्लामिक दुनिया को प्रभावित किया। इमाम ख़ुमैनी का संदेश केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि यह एक बौद्धिक और आध्यात्मिक क्रांति थी जिसने इस्लामी समाज की नींव को मजबूत किया।
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकत्तवि ने कहा: इमाम ख़ुमैनी की रणनीति, संघर्ष और उनके विचारों ने ईरानी कौम को एक नई पहचान दी। उनकी नेतृत्व में ईरानी जनता ने उपनिवेशवादी ताकतों के खिलाफ आवाज उठाई और एक मजबूत, आत्मनिर्भर इस्लामी राज्य की स्थापना की। इमाम ख़ुमैनी की सरलता, संकल्प और समझदारी ने दुनिया भर के मुसलमानों को एक नया हौंसला दिया और यह साबित किया कि अगर इरादा मजबूत हो तो किसी भी शक्तिशाली दुश्मन का सामना किया जा सकता है।
अहले बैत फ़ाउंडेशन के उपाध्यक्ष ने कहा कि: उनके विचार न केवल ईरान के लिए, बल्कि पूरी इस्लामी दुनिया के लिए एक मार्गदर्शन बन गए। इमाम ख़ुमैनी ने इस्लाम के आध्यात्मिक और राजनीतिक संदेश को इस तरह पेश किया कि वह दुनिया भर के मुसलमानों के लिए एक आदर्श बन गए। उनकी संघर्ष ने एक नई आंदोलन को जन्म दिया जिससे न केवल ईरान, बल्कि सम्पूर्ण मुस्लिम उम्मा को जागरूकता का एहसास हुआ।
उन्होने कहा कि: इमाम ख़ुमैनी की नेतृत्व ने एक ऐसा क्रांति लाया जिसने ईरान को केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं बल्कि एक मजबूत इस्लामी राज्य में बदल दिया, जिसकी अपनी अलग पहचान, आत्मनिर्भरता और संस्कृति थी। आज भी इमाम ख़ुमैनी का सिद्धांत और उनकी मार्गदर्शन मुसलमानों के दिलों में जीवित है और उनके प्रभाव आज भी वैश्विक स्तर पर महसूस किए जा रहे हैं। अगर यह कहा जाए कि आज ईरान वैश्विक स्तर पर विकास, स्थिरता और मध्य पूर्व में एक अजेय शक्ति के रूप में उभर रहा है, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस सफलता के पीछे इमाम ख़ुमैनी की मार्गदर्शन और उनके साथ शहीद होने वाले महान शहीदों की बलिदानें हैं, जिन्होंने अपने खून से क्रांति की सफलता की राहें खोलीं। ये बलिदान न केवल ईरान के भविष्य को बदलने का कारण बने, बल्कि सम्पूर्ण इस्लामी दुनिया के लिए एक नई उम्मीद और हौंसला भी प्रदान किया।
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकत्तवि ने कहा कि: २२ बहमन के इस महान अवसर पर हम इमाम ख़ुमैनी के साथ-साथ सभी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और रहबर मौज़मؒ और उनके अनुयायियों को दिल की गहराइयों से शुभकामनाएँ प्रस्तुत करते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि इस्लामी क्रांति की सफलता में उन महान जानों के बलिदान शामिल हैं जिन्होंने स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और इस्लामी सिद्धांतों की पुनर्स्थापना के लिए अपनी जानें दीं।
22 बहमन: दुश्मन पहचान, सब्र, समय पर कदम और एकता से संबंधित क़ुरआनी सिद्धांतों का व्यावहारिक प्रतिरूप
22 बहमन हमें यह सबक सिखाता है कि आज भी अगर हम दुश्मन को पहचानें, सब्र व स्थिरता अपनाएँ, समय पर कदम उठाएँ और एकता को मजबूत रखें, तो कोई भी ताकत हमें हरा नहीं सकता। यही इंक़ेलाब का पैग़ाम है, यही क़ुरआन की शिक्षा है और यही हमारी सफलता का रास्ता है।
22 बहमन महज एक ऐतिहासिक दिन नहीं है बल्कि एक जीवित संदेश, एक विचारधारा और एक स्थायी शिक्षा है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब कोई क़ौम अपने मक़सद को पहचान ले दुश्मन को समझ ले, सब्र और स्थिरता का दामन थामे, समय पर कदम उठाए और एकता को अपना शिआर बना ले, तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है। इस्लामी इंक़ेलाब की सफलता वास्तव में इन्हीं सिद्धांतों का व्यावहारिक प्रतिरूप है, जो हमें क़ुरआन-ए-करीम में बार-बार नज़र आते हैं।
दुश्मन पहचान किसी भी आंदोलन की स्थिरता के लिए बुनियादी अहमियत रखती है। क़ुरआन स्पष्ट रूप से आगाह करता है कि दुश्मन केवल ज़ाहिरी नहीं होते, बल्कि वे विचारधारात्मक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूपों में भी हमला करते हैं।
इंक़ेलाब-ए-इस्लामी के रहनुमाओं और अवाम ने समय रहते पहचान लिया कि असली ख़तरा कौन है और उसकी साज़िशों का मुक़ाबला कैसे करना है। यही बसीरत 22 बहमन की कामयाबी की बुनियाद बनी।
स्थिरता वह क़ुरआनी सिद्धांत है, जिसके बगैर कोई जद्दोजहद फलदायी नहीं हो सकती। क़ुरआन फ़रमाता है कि अल्लाह उन लोगों के साथ है जो साबित क़दम रहते हैं। इंक़ेलाब के दौरान सख़्त दबाव, कुर्बानियाँ और मुश्किलें आईं, मगर अवाम ने हिम्मत नहीं हारी। यही सब्र और स्थिरता आखिरकार ज़ालिम निज़ाम के ख़ात्मे और हक़ की फ़तह का सबब बनी।
समय पर कदम उठाना भी क़ुरआन की एक अहम तालीम है। सही वक़्त पर सही फ़ैसला इतिहास का रुख बदल देता है। 22 बहमन इस बात की रोशन मिसाल है कि जब क़ियादत और अवाम ने एक पल गँवाए बगैर मैदान में क़दम रखा, तो ताग़ूती ताकतें रेत की दीवार साबित हुईं।
एकता इंक़ेलाब का सबसे मज़बूत सुतून थी। क़ुरआन हमें तफ़रके से बचने और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थामने का हुक्म देता है। 22 बहमन के दिन क़ौम ने नस्ली, लिसानी और तबक़ाती इख़्तिलाफ़ात को बालाए ताक रखकर यकजिहती का मुज़ाहिरा किया और यही एकता एक अज़ीम मोजिज़ा बन गई।
अगर ग़ौर किया जाए, तो इस्लामी इंक़ेलाब बज़ाते-ख़ुद एक क़ुरआनी मोजिज़ा है। कम वसाइल, ज़ाहिरी कमज़ोरी और आलमी ताकतों की मुख़ालिफ़त के बावजूद एक बाइमान क़ौम का कामयाब होना इस बात का सबूत है कि जब क़ुरआनी उसूलों पर अमल किया जाए, तो अल्लाह की नुसरत शामिल-ए-हाल होती है।
22 बहमन हमें यह सबक देता है कि आज भी अगर हम दुश्मन को पहचानें, सब्र व स्थिरता अपनाएँ, समय पर कदम उठाएँ और एकता को मजबूत रखें, तो कोई ताकत हमें हरा नहीं सकती। यही इंक़ेलाब का पैग़ाम है, यही क़ुरआन की शिक्षा है और यही हमारी सफलता का रास्ता है।
ऑस्ट्रेलिया में इस्राइली अधिकारीयो के दौरे पर जन आक्रोश, व्यापक विरोध प्रदर्शन
ऑस्ट्रेलिया के हज़ारों नागरिकों ने एक व्यापक विरोध-प्रदर्शन के माध्यम से ईज़राईली सरकार के राष्ट्रपति इस्हाक हर्तज़ोग के अपने देश के दौरे की कड़ी निंदा की। प्रदर्शनकारियों ने हर्तज़ोग पर इस्राइल की ओर से नस्लसंहार को बढ़ावा देने और उसका समर्थन करने का आरोप लगाया हैं।
सोमवार को हज़ारों लोगों ने सिडनी के व्यावसायिक केंद्र के मुख्य मैदान में विरोध-प्रदर्शन किया, जबकि ऐसे प्रदर्शन देश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों में भी जारी रहे।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की ऑस्ट्रेलियाई शाखा ने एक बयान में कहा,हर्तज़ोग पिछले दो वर्षों से फ़िलिस्तीनियों और ग़ज़्ज़ा के पीड़ित लोगों पर गंभीर अत्याचार कर रहा है। वह ये कदम खुले तौर पर उठा रहा है। हम मौन नहीं रह सकते।
ऑस्ट्रेलियन ज्यूइश काउंसिल, जो इस्राइली सरकार की कड़ी आलोचक है, ने भी सोमवार को एक खुला पत्र जारी किया, जिस पर एक हज़ार से अधिक उच्च शिक्षित ऑस्ट्रेलियाई यहूदियों और सामुदायिक नेताओं के हस्ताक्षर थे।इस पत्र में प्रधानमंत्री अल्बानीज़ी से मांग की गई कि वे हर्तज़ोग को दी गई निमंत्रण वापस लें।
उल्लेखनीय है कि ग़ज़्ज़ा में इस्राइली युद्ध और नस्लसंहार के परिणामस्वरूप अब तक 72 हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीनी शहीद हो चुके हैं, जबकि हज़ारों शव अब भी मलबे के नीचे दबे हुए हैं जिनकी नियमित गिनती संभव नहीं हो सकी है।
यह अज़ीम और बा बरकत इंक़ेलाब, इस्लाम और तमाम मुसलमानों के लिए है
प्रमुख शेख़ ग़ाज़ी हुनीना ने इंक़िलाब-ए-इस्लामी ईरान की इस्लामी माहियत और उसके आलमी मक़ासिद पर ज़ोर देते हुए उसे पूरी उम्मत-ए-इस्लामी के लिए एक अहम मोड़ क़रार दिया है।
तजम्मोअ उलेमा-ए-मुस्लिमीन लेबनान के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के शेख ग़ाज़ी हुनीना ने इंक़िलाब-ए-इस्लामी ईरान की कामयाबी की 47वीं सालगिरह के मौक़े पर अपने एक वीडियो पैग़ाम में इस इंक़िलाब की आलमी हैसियत और उम्मत पर मबनी मक़ासिद को बयान किया हैं।
उनके पैग़ाम का मज़मून इस तरह है:
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
ईरान में इंक़िलाब-ए-इस्लामी की कामयाबी के फ़ौरन बाद जब उसे इस्लामी उनवान के साथ पेश किया गया और मुल्क का नाम “जम्हूरिया-ए-इस्लामी ईरान” रखा गया, तो यह खुद इस बात की साफ़ दलील है कि इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी (रह.) की क़ियादत में आने वाला यह अज़ीम और बा बरकत इंक़िलाब इस्लाम और मुसलमानों के लिए है।
उन्होंने कहा कि यही बात ईरान के संविधान में भी साफ़ तौर पर बयान की गई है, जिसमें फ़िलिस्तीन की हिमायत, मज़लूमों की मदद और वहदत (एकता) पर मबनी सोच पर ज़ोर दिया गया है।
यह तमाम बातें इस हक़ीक़त को मज़बूत करती हैं कि 22 बहमन (11 फ़रवरी) को कामयाब होने वाला यह इंक़िलाब सिर्फ़ ईरान तक महदूद नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के इस्लामी मुल्कों और तमाम मज़लूम क़ौमों के लिए एक इस्लामी इंक़िलाब है।
ईरान की क्रांति, उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ मज़लूमों की क्रांति है
लेबनान के अहले सुन्नत आलिम-ए-दीन शेख़ अहमद क़त्तान ने इंक़िलाब-ए-इस्लामी ईरान की कामयाबी की 47वीं सालगिरह की तकरीब में शिरकत की।
लेबनान में तंजीम «क़ौलना वल अमल» के सरबराह शेख अहमद क़त्तान ने जम्हूरिया-ए-इस्लामी ईरान के दूतावास की जानिब से बैरूत के होटल «फिनीसिया» में मुनअक़िद 47वीं सालगिरह की तकरीब में हिस्सा लिया।
शेख़ क़त्तान ने अपने ख़िताब में इंक़िलाब के इंसानी और इस्लामी पहलुओं पर ज़ोर देते हुए कहा,यह इंक़ेलाब मज़लूमों और कमज़ोरों का ज़ालिमों और इस्तिकबार के ख़िलाफ़ इंक़िलाब है। यह ऐसा इंक़िलाब है जो हमेशा दुनिया भर के मज़लूमों के साथ खड़ा रहा है, ख़ास तौर पर फ़िलिस्तीन और क़ुद्स शरीफ़ के साथ, और आइंदा भी खड़ा रहेगा।
आख़िर में उन्होंने जम्हूरिया-ए-इस्लामी ईरान के इस्लामी और वहदत पैदा करने वाले मौक़िफ़, और दुनिया भर ख़ुसूसन फ़िलिस्तीन और लेबनान में मुक़ावमती तहरीकों की हिमायत में उसके मज़बूत रुख़ पर शुक्रिया और क़द्रदानी का इज़हार किया।
आज फिर जनता ने साबित कर दिया कि वह इस्लामी क्रांति और सुप्रीम लीडर के साथ खड़ी है
हौज़ा ए इल्मिया की आला काउंसिल के सेक्रेटरी ने 22 बहमन की रैली में विलायतमदार और इंक़िलाबी लोगो के साथ शिरकत की और उन्होने कहा कि अवाम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कुछ शिकवे और शिकायतों के बावजूद वह इस्लाम, इंक़ेलाब-ए-इस्लामी, निज़ाम और रहबर-ए-मुअज़्ज़म-ए-इंक़िलाब की हिमायत में साबित क़दम है।
हौज़ा ए इल्मिया की आला काउंसिल के सेक्रेटरी और फुक़हा-ए-शूरा-ए-निगहबान के रुक्न आयतुल्लाह मेंहदी शब ज़िन्दादार ने क़ुम में यौमुल्लाह 22 बहमन की रैली के मौके पर हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के नुमाइंदे से गुफ़्तगू करते हुए विलायतमदार और इंक़िलाबी अवाम की हमासी मौजूदगी का ज़िक्र किया।
उन्होंने कहा,अलहम्दुलिल्लाह, बसीरत रखने वाली और हालात को समझने वाली अवाम ने इस्लाम, रहबर-ए-मुअज़्ज़म-ए-इंक़िलाब और इंक़िलाब-ए-इस्लामी की आला अक़दार के दिफ़ा और दुश्मनों, ख़ुसूसन अमरीका और सियोनिस्तों से बराअत के इज़हार के लिए सड़कों को भर दिया।
उन्होंने मज़ीद कहा कि ईरान की बसीरत वाली अवाम ने साबित कर दिया कि कुछ शिकवे और शिकायतों के बावजूद वह इस्लाम, इंक़िलाब-ए-इस्लामी, निज़ाम और रहबर-ए-मुअज़्ज़म-ए-इंक़िलाब की हिमायत में डटी हुई है।
हौज़ा ए इल्मिया की आला काउंसिल के सेक्रेटरी ने दुआ की कि इंशा अल्लाह, ख़ुदावंद-ए-मुतआल ईरान की तमाम अवाम को दुनिया और आख़िरत में बेहतरीन अज्र अता फरमाए।
हम अपनी क्रांतिकारी पहचान को कभी कोई नुकसान नहीं होने देंगे।
आयतुल्लाह अली रज़ा आराफी ने क्रांतिकारी और धार्मिक लोगों के साथ क़ुम में 22 बहमन की दुश्मन विरोधी रैली में हिस्सा लिया।
हौज़ा ए इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा आराफ़ी ने ईरान के पवित्र शहर क़ुम में 22 बहमन की दुश्मन विरोधी रैली में वफ़ादार, रखवाले, समझदार, क्रांतिकारी और धार्मिक लोगों के साथ हिस्सा लिया।
उन्होंने रैली के दौरान बातचीत में हिस्सा लेने वालों को प्रत्साहित किया और कहा: क़ुम एक “ग्लोबल शहर” है जहाँ अलग-अलग देश, नस्लें और राष्ट्रीयताएँ रहती हैं। यौमुल्लाह के इस चमत्कार पर, 22 बहमन, बूढ़े और जवान औरतें और बच्चे, कुर्द और लुर, अरब और बलूच, तुर्क और फ़ारसी, ईरानी और गैर-ईरानी, सभी नारे लगाते हुए निकले हैं जैसे “अमेरिका मुर्दाबाद”, “इज़राइल मुर्दाबाद”, “देशद्रोही मुर्दाबाद”, “पाखंडी मुर्दाबाद”, “हमारी रगों में जो खून है वह हमारे नेता के लिए एक तोहफ़ा है”, “हम सब सुप्रीम लीडर के सिपाही हैं, सुप्रीम लीडर का हुक्म मानते हैं”, “दुश्मन की सेनाएँ धरती के नीचे से हैं”, शहीदों के खून की रक्षा में अपनी मौजूदगी का ऐलान करने और इस जश्न में पूरे ईरान में राष्ट्रीय एकता, एकजुटता और हमदर्दी दिखाने के साथ-साथ दुश्मनों, खासकर अपराधी अमेरिका और बच्चों को मारने वाली ज़ायोनी सरकार को यह संदेश देने के लिए कि वे कुछ नहीं कर सकते।
आयतुल्लाह आरफ़ी ने आगे कहा: इस्लामिक क्रांति के प्रति दुनिया भर में वफ़ादारी के ऐलान के इस दिन, हर कोई ईरान और ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों को यह बताने के लिए मैदान में आया कि वे क्रांति के महान रचयिता की विरासत और शहीदों के खून की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने को तैयार हैं, अपने नेता और मानने वाले हज़रत इमाम ख़ामेनेई के हुक्म के जवाब में, अल्लाह उनकी रक्षा करे। हम अपनी क्रांतिकारी पहचान को कभी कोई नुकसान नहीं होने देंगे। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद, हम उस ऊँचे लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं जिसका ऐलान मुसलमानों के सुप्रीम लीडर ने किया है, और यह सफ़र कभी नहीं रुकेगा।
22 बहमन के दिन पूरे ईरान में ऐतिहासिक रैलियां निकली, जनता ने एकता और वफ़ादारी का नया इतिहास रचा
इस्लामिक क्रांति की 47वीं वर्षगाठ, यौमुल्लाह 22 बहमन के मौके पर पूरे ईरान में शानदार और ऐतिहासिक रैलियां निकली, जिनमें जनता की ज़बरदस्त हिस्सेदारी ने एक बार फिर दुनिया को ईरानी राष्ट्र की ताकत, एकता और क्रांतिकारी कमिटमेंट का व्यवहारिक सबूत दिया।
इस्लामिक क्रांति की 47वीं वर्षगाठ, यौमुल्लाह 22 बहमन के मौके पर पूरे ईरान में शानदार और ऐतिहासिक रैलियां निकली, जिनमें जनता की ज़बरदस्त हिस्सेदारी ने एक बार फिर दुनिया को ईरानी राष्ट्र की ताकत, एकता और क्रांतिकारी कमिटमेंट का व्यवहारिक सबूत दिया।।
आज, 22 बहमन, 1404 सौरवर्ष 11 फ़रवरी 2026 ई को, पूरे ईरान में मनाए जाने वाले इस राष्ट्रीय दिवस पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे और इस्लामिक क्रांति, शहीदों के खून और क्रांति के सुप्रीम लीडर हज़रत इमाम खामेनेई के प्रति अपनी पक्की वफ़ादारी दिखाई। यह दिन उस ऐतिहासिक पल की याद दिलाता है जब ईरानी लोगों ने 1979 में इमाम खुमैनी के नेतृत्व में ज़ालिम शासन को उखाड़ फेंका था।
इस साल की रैली खास तौर पर अहम थी, क्योंकि ईरान देश को हाल के महीनों में बाहरी दबाव, दुश्मनी भरी साज़िशों और देशद्रोह का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद, लोगों ने जोश के साथ हिस्सा लिया, जिससे यह साफ़ संदेश गया कि वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे।
इस्लामिक क्रांति का केंद्र और इस्लामी दुनिया का एक अहम शहर क़ुम उस दिन लोगों के जमावड़े का केंद्र बन गया। पुरुष और महिलाएँ, बूढ़े और जवान, अलग-अलग देशों और वर्गों के लोग राष्ट्रीय झंडा, इमाम खुमैनी और इमाम खामेनेई की तस्वीरें और शहीदों की तस्वीरें लेकर रैली में शामिल हुए।
रैली के दौरान, माहौल “अमेरिका मुर्दाबाद,” “इज़राइल मुर्दाबाद,” “हम सब खामेनेई के सैनिक हैं,” और “हमारी रगों में बहने वाला खून लीडर के लिए कुर्बान है” जैसे नारों से गूंज उठा। ये नारे लोगों के विरोध की भावना और दुश्मनों के खिलाफ उनके मज़बूत रवैये को दिखाते थे।
देश भर के 1,400 से ज़्यादा शहरों, कस्बों और हज़ारों गांवों में इसी जोश के साथ रैलियां हुईं। आर्थिक मुश्किलों, पाबंदियों और बाहरी खतरों के बावजूद, लोगों की हिस्सेदारी ने साबित कर दिया कि इस्लामिक क्रांति अभी भी देश के दिलों में ज़िंदा है।
रैली के मौके पर, आयतुल्लाह महदी शब ज़िंदादर ने लोगों के जज़्बे की तारीफ़ की और कहा कि तमाम मुश्किलों के बावजूद, ईरानी देश इस्लामी क्रांति और सुप्रीम लीडर के साथ खड़ा है और दुश्मनों को उनके मकसद में कभी कामयाब नहीं होने देगा।
हिस्सा लेने वालों ने “ओ मिहान खुदाई” जैसे राष्ट्रगान को मिलकर गाकर अपने वतन और देश की एकता के लिए अपना प्यार दिखाया। आखिर में, बोलने वालों ने इस पब्लिक मौजूदगी को दुश्मनों के लिए एक साफ़ मैसेज बताया कि ईरानी देश आखिरी पल तक क्रांति और सिस्टम की रक्षा करता रहेगा।
अल्लाह के दिन, 22 बहमन पर यह बड़ी रैली इस बात का पक्का सबूत बन गई कि ईरानी लोग अभी भी अपने क्रांतिकारी विचारों पर पक्के हैं और हर साज़िश के खिलाफ़ सीसे की दीवार की तरह खड़े रहेंगे।



















