رضوی
अबू तालिब और रसूल अल्लाह जैसा प्रेम
शिर्क करने वाला बड़ा ज़ालिम होता है इस लिए जो लोग हजरत अबू तालिब को ईमान वाला नहीं मानते वो माज अल्लाह हजरत अबू तालिब को मुशरिक समझते हैं यानी बड़ा ज़ालिम समझते हैं।
हजरत अबू तालिब को मोमिन न मानने वाले नीचे लिखी हुई कुरानी आयतों पर गौर फिक्र कर के तौबा करें और फिर से कलमा पढ़ कर मुसलमान बनें।
याद रखिए जो लोग हजरत अबुतालिब को मोमिन नहीं मानते वो अपने इस अमल से रसूल अल्लाह को माज अल्लाह जहन्नम की आग में जलने वाला साबित करते हैं।
कुराने मजीद ने सूरए लुकमान की आयत नंबर 13 में शिर्क को बड़ा जुल्म कहा है और अल्लाह ताला ने साफ साफ एलान कर दिया है की।
"अल्लाह के साथ किसी को शरीक मत करना,शिर्क ज़ुल्मे अज़ीम है।
क्यों की शिर्क करने वाला बड़ा ज़ालिम होता है इस लिए जो लोग हजरत अबू तालिब को ईमान वाला नहीं मानते वो माज अल्लाह हजरत अबू तालिब को मुशरिक समझते हैं यानी बड़ा ज़ालिम समझते हैं।
सूरए हूद की आयत नंबर 113 में रसूल अल्लाह को हुक्म दिया गया है।
"और जालिमों की ओर न झुकना,अन्यथा तुम्हें भी अग्नि स्पर्श कर लेगी और अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई सहायक नहीं है,फिर तुम्हारी सहायता नहीं की जायेगी"।
दोनों आयतों ने साफ कर दिया की क्यों की मुशरिक ज़ालिम है इस लिए जालिम की तरफ झुकने वाले को जहन्नम की आग जलाए गी ये किसी और का नहीं अल्लाह का फैसला है जिसे कोई बदल नहीं सकता।
दुनिया का कोई भी मौलाना ये नहीं साबित कर सकता की रसूल अल्लाह का झुकाओ हजरत अबू तालिब की तरफ नही था? या रसूल अल्लाह अपने चचा हजरत अबू तालिब और अपनी चची जनाबे फातिमा बिनते असद को दिल से नहीं चाहते थे ? उनकी इज़्जत नहीं करते थे?
सब जानते हैं की रसूल अल्लाह के दिल में हजरत अबू तालिब की और हजरत अबू तालिब के दिल में रसूल अल्लाह की बेपनाह मोहब्बत थी, सब जानते हैं की दोनो का झुकाओ एक दूसरे की तरफ बहुत ज्यादा था इतना था की हजरत अबू तालिब के इंतकाल के साल को रसूल अल्लाह ने "आमुल हुजन" बना दिया यानी गम का साल कहा और रसूल अल्लाह ने खुद साल भर हजरत अबू तालिब का गम मनाया और गम मानने को कहा भी। इसका मतलब हजरत अबू तालिब के इंतेकाल के बाद भी रसूल अल्लाह का दिल हजरत अबू तालिब की तरफ पूरी तरह से झुका हुआ था और इसी लिए साल भर रसूल अल्लाह ने उनका गम मनाया और गम मानने का हुक्म दिया। इससे बड़ा ईमाने अबू तालिब के लिए और क्या सुबूत हो सकता है।
आखरी वक्त में कलमा पढवाने के इसरार की रवायत बुग्जे अली में गढ़ लेने वाले जाहिलों क्या कुरान के हुक्म के बाद भी रसूल अल्लाह किसी ईमान न रखने वाले मुशरिक की मौत के बाद भी उसकी तरफ झुक सकते थे? याद रखिए हजरत अबू तालिब और रसूल अल्लाह जैसी मोहब्बत की कोई मिसाल दुनिया नहीं पेश कर सकती।
दोनों आयतों और सीरते अबु तालिब पर गौर करने से ये नतीजा निकला की जो लोग हजरत अबू तालिब को मोमिन नहीं मानते हैं वो रसूल अल्लाह को माज अल्लाह जालिम की तरफ झुकाओ रख कर जहन्नम की आग में जलने वाला समझते हैं ऐसे लोग अपने अपने ईमान पर गौर करें की वोह हजरत अबू तालिब के ईमान का इंकार कर के रसूल अल्लाह पर बोहतन बांध रहे हे और खुद जहन्नम के दहाने पर कहां खड़े हो गए हैं।
जब तक अबू तालिब जिंदा रहे रसूल अल्लाह ने उनकी तरफ अपना झुकाओ रख कर और उनके इंतकाल के बात भी उनके तरफ झुकाओ रखा जिसका सुबूत उनके इंतकाल के साल का नाम रसूल अल्लाह ने आमुल हूजन रख दिया और अपने इस अमल से हजरत अबू तालिब के ईमान को रहती दुनिया तक कुरान की आयतों से साबित कर दिया।
अब वो लोग जो हजरत अबू तालिब को मोमिन नहीं मानते हैं वो अपना ईमान बचाने के लिए तौबा करें और कलमा पढ़ कर फिर से मुसलमान बनें और दोबारा कभी अपनी जुबान से हजरत अबू तालिब के ईमान का इंकार न करें इसी में उनकी खैर है।
काश मुसलमान मुल्ला की किताबों के बजाए अल्लाह की किताब मे गौर फिक्र कर के रसूल अल्लाह की सही मायनों में मदद करने वाले हजरत अबू तालिब के खिलाफ़ अपनी ज़ुबान न खोलता या कलम न चलाता तो उसका ईमान कभी बर्बाद न होता।
हजरत अबू तालिब के ईमान का इंकार करने वाले मुसलमानों सूरए लुकमान और सूरए हूद की आयत नंबर 113 में गैरो फिक्र करो,हजरत अबू तालिब की दी हुई बेशुमार कुर्बानियों पर गौर करो और तौबा कर के फिर से कलमा पढ़ लो ताकि तुम अपने आपको मुसलमान कह सको।
मोहसिने इस्लाम हज़रत अबू तालिब अ.स. के बारे में क़ुरआन में अल्लाह तआला का क्या नज़रिया
अहलेबैत अलैहिस्सलाम से बुग़ज़ रखने वाले कुछ नाम निहाद मुसलमान अक्सर ये बात बोलते हैं कि हज़रत इमरान इब्ने अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम (हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम) मुसलमान नही बल्कि गैर मुस्लिम थे।आज हम इस ही बात को अल्लाह तआला के कलाम मतलब क़ुरआन पाक की आयतों से साबित करते हैं कि हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम सिर्फ़ मुसलमान ही नही बल्कि मोमिन के भी आगे के दर्जे मतलब मुत्तक़ी व परहेज़गार भी थे।
एक रिपोर्ट के अनुसार ,अहलेबैत अलैहिस्सलाम से बुग़ज़ रखने वाले कुछ नाम निहाद मुसलमान अक्सर ये बात बोलते हैं कि हज़रत इमरान इब्ने अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम (हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम) मुसलमान नही बल्कि गैर मुस्लिम थे।आज हम इस ही बात को अल्लाह तआला के कलाम मतलब क़ुरआन पाक की आयतों से साबित करते हैं कि हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम सिर्फ़ मुसलमान ही नही बल्कि मोमिन के भी आगे के दर्जे मतलब मुत्तक़ी व परहेज़गार भी थे।
बस यहाँ मेरी आप से सिर्फ़ एक ही गुज़ारिश है कि इस पूरी पोस्ट को पढ़ते वक़्त अपने दिमाग़ को खुला रखते हुए अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करना है और साथ ही साथ अपने बुग़ज़ का चश्मा भी थोड़ी देर के लिए उतार के साइड में रख देना है।
चलिए बात शुरू करते हैं,ये बात उस वक़्त की है जब अब्रहा नाम के दुश्मने ख़ुदा ने मक्का पर हमला करने और खाना ए ख़ुदा, बैतुल्लाह मतलब काबा को तोड़ने की नीयत से अपनी हाथियों की फ़ौज लेकर निकला।
उस वक़्त मक्का में क़ुरैश के सरदार और बैतुल्लाह (काबा) के मुतवल्ली मतलब काबे के रख रखाव के ज़िम्मेदार रसूलअल्लाह saws के दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम थे।अब्रहा ने हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के ऊँटों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया तो हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम अपने ऊँटों को छुड़ाने के लिए अब्रहा के पास गए तो उसने हैरत से पूछा कि मुझे तो लगता था कि तुम मेरे पास काबे को बचाने के लिए आओगे क्योंकि तुम उसके ज़िम्मेदार हो ,लेकिन यहाँ तो तुम सिर्फ़ अपने इन मामूली ऊँटों को बचाने आये हो ?
उसके इस सवाल पर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम ने सिर्फ़ एक जवाब दिया कि में इन ऊँटों का रब (मालिक) हूँ इसलिए में इनको बचाने आया हूँ, और काबे का जो रब है वो काबे को बचाएगा। (लोग तो हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम के ईमान के पीछे पड़े हैं,पर यहाँ तो उनके वालिद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम ने अपने इस जवाब से ये साबित कर दिया कि वो खुद ईमान वाले और अल्लाह पर यकीन रखने वाले थे,जब ही तो उन्होंने ये कहा कि जो काबे का मालिक है वो ही उसे बचाएगा।
फिर वो पूरा वाक़या सबको मालूम है कि किस तरह से अबाबील नाम की छोटी छोटी चिड़ियाओं के ज़रिए अल्लाह ने बड़े बड़े हाथियों के लश्कर को भूसे की तरह मसल दिया था।और खानए काबा को टूटने से बचा लिया था।यहाँ पर कुछ लोग ये सवाल कर सकते हैं कि जब रसूलअल्लाह स.ल. ही नही थे तो फिर उनके दादा को अल्लाह के बारे में कैसे मालूम था ? वो इसलिए मालूम था क्योंकि हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम दीने इब्राहिम के पैरोकार थे।जिसके बारे में अल्लाह ने खुद क़ुरआन में फ़रमाया -
قُلْ صَدَقَ اللَّهُ ۗ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
[ अल-ए-इमरान - ९५ ]
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा ने सच फ़रमाया तो अब तुम मिल्लते इबराहीम (इस्लाम) की पैरवी करो जो बातिल से कतरा के चलते थे और मुशरेकीन से न थे।
तो क़ुरआन से ये बात साबित हो गई के जो दीने इब्राहिम अलैहिस्सलाम पर चलता है वो काफ़िर या मुशरिक नही होता,बल्कि अल्लाह को मानने वाला मोमिन ही होता है।अब आगे देखिए...
जब हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम की वफ़ात का वक़्त करीब आया तो उन्होंने बैतुल्लाह मतलब काबे के निगरानी का मुतवल्ली हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम को बनाया और साथ ही साथ अपने तमाम बेटों को बुलाया और रसूलअल्लाह saws को भी बुलाया और चूँकि रसूलअल्लाह उस वक़्त बहुत छोटे थे तो हज़रत अब्दुलमुत्तलिब अलैहिस्सलाम ने अपने पोते मतलब रसूलअल्लाह से पूछा कि आप अब मेरे बाद इन सब में से किसकी किफ़ालत में किसकी पनाह में रहना चाहते हैं,तो हुज़ूर ने अपने तमाम चचाओं में से सिर्फ़ हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम को ख़ुद के लिए चुना जबकि अल्लाह का क़ुरआन में कलाम देखिए -
لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي شَيْءٍ
(अल-ए-इमरान - 28)
मोमिनीन मोमिनीन को छोड़ के काफ़िरों को अपना सरपरस्त न बनाऐं और जो ऐसा करेगा तो उससे ख़ुदा से कुछ सरोकार नहीं
सूरा ए मुबारक आले इमरान की आयत 28 में अल्लाह ख़ुद ये फ़रमा रहा है कि जो ख़ुद मोमिन हो मतलब ईमानवाला हो वो किसी गैर मोमिन या काफ़िर को अपना सरपरस्त न बनाओ, जबकि ऊपर के वाकिए में तो खुद अल्लाह के रसूल saws हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम को अपना सरपरस्त बना रहे हैं और वो इसलिए ही हज़रत अबूतालिब अस को चुन रहे हैं क्योंकि अल्लाह का फ़रमान है कि किसी काफ़िर को अपना सरपरस्त न बनाना और वहाँ उस वक़्त उनके चचाओं में हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम के अलावा कोई मोमिन नही था इसलिए रसूलअल्लाह ने अपनी सरपरस्ती के लिए एक मोमिन हज़रत अबुतालिब अस को चुना,आख़िर ये कैसे हो सकता है कि रसूलअल्लाह saws ख़ुद ही अल्लाह के हुक्म की मुख़ालिफत कर दें माज़ अल्लाह ?
या तो उम्मत ज़्यादा जानती है या रसूलअल्लाह saws ज़्यादा जानते हैं अबुतालिब अलैहिस्सलाम के बारे में,पता नही किसको ज़्यादा हक़ीक़त मालूम है उनकी ! ख़ैर ...
अब आगे बात करते हैं, में आप की ख़िदमत में एक ऐसी चीज़ पेश करना चाहता हूँ कि उसके बाद तो ये सारा किस्सा ही ख़त्म हो जाएगा कि हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम मोमिन थे या नही !
अब फिर में अल्लाह तआला की ही किताब यानी क़ुरआन मजीद जिसमें किसी भी तरह की कमी नही है जिसमे अव्वल से आख़िर तक हर बात का इल्म मौजूद है उसमें से एक आयत पेश करता हूँ, देखिये
وَمَا لَهُمْ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللَّهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَا كَانُوا أَوْلِيَاءَهُ ۚ إِنْ أَوْلِيَاؤُهُ إِلَّا الْمُتَّقُونَ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
(अल-अनफाल - 34)
और जब ये लोग लोगों को मस्जिदुल हराम (ख़ान ए काबा की इबादत) से रोकते है तो फिर उनके लिए कौन सी बात बाक़ी है कि उन पर अज़ाब न नाज़िल करे और ये लोग तो ख़ानाए काबा के मुतवल्ली भी नहीं फिर क्यों रोकते है इसके मुतवल्ली तो सिर्फ परहेज़गार लोग हैं मगर इन काफ़िरों में से बहुतेरे नहीं जानते
सूरा ए अनफाल की आयत नम्बर 34 में अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि जब मक्के के काफ़िर दूसरे मोमिन लोगों को बैतुल्लाह मतलब काबे में इबादत से रोकते हैं तो अब कोनसी बात है कि इन पर अज़ाब नाज़िल न करे, और सबसे बड़ी बात तो ये की *ये जो लोग काबे में इबादत से रोक रहे हैं ये तो काबे के मुतवल्ली (care taker) मतलब वहाँ के ज़िम्मेदार भी नही हैं फिर क्यों रोकते हैं, बल्कि इस काबे के मुतवल्ली तो सिर्फ़ परहेज़गार लोग हैं* मगर इस बात को ये काफ़िर लोग नही जानते।
यहाँ पर एक बात तो अच्छे से समझ में आ गई के काबे के मुतवल्ली जो थे वो सिर्फ़ मुसलमान ही नही बल्कि मोमिन ही नही बल्कि इस से भी एक दर्जा ऊपर यानी मुत्तक़ी (परहेज़गार) के दर्जे पर फ़ाइज़ होते हैं।और दुनिया इस बात को अच्छे से जानती है कि हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अस के बाद ख़ान ए काबा के मुतवल्ली हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम ही थे उन्ही के पास ख़ान ए काबा की तमाम चाबियाँ मौजूद थीं,तब ही तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के वक़्त लोग हैरत में थे कि जब काबे की चाबियाँ हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम के पास मौजूद थीं तो फिर ये मौला अली की वालिदा के काबे में जाने के वक़्त दीवार क्यों फट गई ??
ख़ैर वो अलग बात है,अब यहाँ क़ुरआन से ही एक और आयत पेश करदूँ,देखिये -
أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًا فَآوَىٰ
(अद-धुहा - 6)
क्या उसने (अल्लाह ने) तुम्हें यतीम पाकर (अबू तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी)
सूरा ए मुबारक धुहा की आयत नम्बर 6 में अल्लाह तआला रसूलअल्लाह saws को मुख़ातिब कर के फ़रमा रहा है कि जब आप यतीम थे तो क्या मेने आपको पनाह नही दी ?? और सबको मालूम है कि रसूलअल्लाह saws को हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम के अलावा किसी ने पनाह नही दी बल्कि रसूलअल्लाह के सबसे बड़े मददगार और जाँनिसार हज़रत अबुतालिब ही थे जो रसूलअल्लाह के बिस्तर पर उनकी जगह अपने बेटों को सुला देते थे कि अगर कुफ़्फ़ार उन पर हमला करें तो रसूलअल्लाह की जान बच जाए भले ही खुद के बेटों की जान चली जाए (अल्लाह हो अकबर)
अब यहाँ पर सबसे बड़ा सवाल के क्या मआज़ अल्लाह किसी काफ़िर के अमल को अल्लाह अपना खुदका अमल बता सकता है ? सब यही कहेंगे हरगिज़ नही,क्यों नही ? इसलिए के अगर काफ़िर के अमल को अपना अमल बता दिया तो वो फिर बुरा नही बल्कि अच्छा और सवाब का अमल समझा जाएगा,और करने वाला गुनाहगार नही बल्कि नेक और मोमिन ही समझा जाएगा।
*उम्मीद है कि क़ुरआन से इतने दलाइल देने के बाद अब हर साहिबे अक़्ल को ये बात अच्छे से समझ मे आ गई होगी कि अल्लाह तआला की नज़र में हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम सिर्फ़ मुसलमान ही नही बल्कि मोमिन व परहेज़गार भी हैं।जिन्होंने सिर्फ़ ज़बान से चिल्ला चिल्ला के नही बल्कि अपने हर अमल से ख़ुदको मोमिन व परहेज़गार मुसलमान साबित किया।*
आख़िर में कुछ लाइन मोहसिने इस्लाम हज़रत अबुतालिब अलैहिस्सलाम की शान में मुलाहिज़ा फरमाइए -
मै हूँ अबू तालिब मेरी पहचान यही है.!
कहते हो नबुवत जिसे, गोद मे पली है.!
पैदा हुआ घर मे मेरे पयम्बर ए आखिर.!
बेटे की विलादत मेरे काबे मे हुई है.!
घर मे है नबुवत मेरे घर मे है इमामत.!
जो मलिका ए ज़न्नत है बहू मुझको मिली है.!
क्या है मेरा ईमान जाओ पूछो ख़ुदा से.!
बचपन मे रिसालत मेरे सीने पे रही है.!
फतवा तो लगाते हो मगर ये याद रखना.!
गैब से औलाद मेरी सब देख रही है....!
समाचार कोड:393908
हज़रत इमाम काज़िम (अ) की शहादत दिवस पर ईरान सहित विभिन्न देशों में शोक
इराक़ और ईरान समेत दुनिया भर के शिया मुसलमान अपने सातवें इमाम हज़रत इमाम मूसा काज़िम (अ) के शहादत दिवस पर ग़म मना रहे हैं।
इराक़ और ईरान समेत दुनिया भर के शिया मुसलमान अपने सातवें इमाम हज़रत इमाम मूसा काज़िम अ.स की शहादत की बर्सी पर ग़म मना रहे हैं।
ईरान के पवित्र शहरों मशहद और क़ुम में स्थित इमाम मूसा काज़िम अ.स.के बेटे आठवें इमाम हज़रत अली रज़ा अ.स. और बेटी हज़रत फ़ातिमा मासूमा के मज़ारों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे हैं और अज़ादारी कर रहे हैं।
25 रजब 1446 हिजरी को सातवें इमाम हज़रत इमाम मूसा काज़िम अ.स. की शहादत की बर्सी है। मशहद और क़ुम के रौज़ों में कल रात से ही ईरान और दुनिया भर से श्रद्धालु जुटना शुरू हो गए है।
इसी प्रकार, इराक़ के काज़मैन समेत समस्त पवित्र शहरों में बड़ी संख्या में लोग पवित्र रौज़ों में उपस्थित होकर शोक सभाओं का आयोजन कर रहे हैं और मातम व अज़ादारी कर रहे हैं।
शानदार तरीक़े से मनाया गया गणतंत्रदिवस।
भारत ने 26 जनवरी 2025 को गणतंत्र दिवस को बड़े धूमधाम और शानदार तरीके से मनाया। इस दिन भारतीय संविधान को अपनाए जाने की 76वीं वर्षगांठ थी, और पूरे देश में इस ऐतिहासिक अवसर को बेहद उत्साह और गर्व के साथ मनाया गया।
नई दिल्ली के राजपथ पर आयोजित मुख्य समारोह में भारतीय राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया, और इसके बाद भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के जवानों ने अपनी शक्ति और अनुशासन का शानदार प्रदर्शन किया। इस वर्ष का परेड विशेष रूप से देश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर, सैन्य ताकत, और आधुनिक प्रौद्योगिकी के अद्भुत मिश्रण को दर्शाता था।
गणतंत्र दिवस की परेड में देशभर की विभिन्न राज्यों की झांकियाँ शामिल थीं, जो भारत की विविधता, परंपराओं, और लोक कलाओं का जश्न मना रही थीं। हर राज्य ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर और ऐतिहासिक विरासत को झांकियों के माध्यम से प्रस्तुत किया। इसके साथ ही, भारतीय सेना द्वारा अत्याधुनिक हथियारों, टैंक और युद्धक विमानों का प्रदर्शन भी किया गया।
वहीं, भारतीय वायुसेना के जेट विमानों ने आकाश में ध्वज की आकृति बनाई और तिरंगे के रंगों से आकाश को रंग दिया। हेलीकॉप्टरों ने शानदार फ्लाईपास्ट किया, जिसमें सैन्य ताकत और तकनीकी विकास का अद्भुत समागम था।
गणतंत्र दिवस परेड में कई विद्यालयों के छात्रों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ अपना योगदान दिया, जिसमें भारत की विविधता और एकता का प्रतीक बनने वाले नृत्य और संगीत प्रस्तुत किए गए।
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने इस अवसर पर देशवासियों को बधाई दी और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, एकता और अखंडता को सशक्त बनाने के लिए उनके योगदान की सराहना की। इस गणतंत्र दिवस ने भारतीय जनता को अपने देश के इतिहास, संस्कृति और भविष्य पर गर्व महसूस कराया।
रोमानियाई भाषा में सहिफ़ा ए सज्जादिया के तर्जुमा की रूनुमाई
हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम की दुआओं के संग्रह सहिफ़ा ए सज्जादिया की परिचयात्मक बैठक के दौरान इस महान पुस्तक के रोमानियाई भाषा में अनुवाद का विमोचन किया गया यह बैठक बुखारेस्ट में इमाम अली अलैहिस्सलाम फाउंडेशन में आयोजित की गई।
एक रिपोर्ट के अनुसार ,हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की दुआओं के संग्रह सहिफ़ा सज्जादिया की परिचयात्मक बैठक में इस महान पुस्तक के रोमानियाई भाषा में अनुवाद का विमोचन किया गया यह कार्यक्रम रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में इमाम अली अलैहिस्सलाम फाउंडेशन में आयोजित हुआ।
इस आयोजन में बुखारेस्ट में कई प्रसिद्ध विद्वान और सांस्कृतिक हस्तियां उपस्थित थीं कार्यक्रम के वक्ताओं में डॉ. ग्रिगोरे, बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में अरबी भाषा के प्रोफेसर और पुस्तक के अनुवादक, शामिल थे।
इसके अलावा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद हमीद हुसैनी, बुखारेस्ट के इमाम और इमाम अली अलैहिस्सलाम फाउंडेशन के निदेशक, और डॉ. इज़्ज़त नज़ाकतगु, जो रोमानिया में रहने वाले एक प्रसिद्ध ईरानी व्यक्तित्व हैं, ने भी इस अवसर पर संबोधित किया।
कार्यक्रम के अंत में इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत ने डॉ. ग्रिगोरे का विशेष रूप से फूलों के साथ सम्मान किया राजदूत ने अपने संबोधन में आज की दुनिया में आध्यात्मिकता और धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला और इन मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
समारोह के अंत में इस पुस्तक को अनुवादक, प्रकाशक और इमाम अली अलैहिस्सलाम फाउंडेशन के निदेशक के हस्ताक्षरों के साथ उपस्थित मेहमानों में वितरित किया गया।
इस पहल ने प्रतिभागियों के बीच गर्मजोशी भरी बातचीत और विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया और इस सांस्कृतिक आयोजन को और अधिक ऊर्जावान बना दिया।
दुश्मन जल्लाद और शहीद का स्थान बदलना चाहता है
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन ख़त्तात ने कहा: अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अ) को लोगों को अंधकार, बहुदेववाद और मूर्तिपूजा से बचाने और उन्हें प्रकाश की ओर मार्गदर्शन करने का कार्य सौंपा, और एक अन्य जिम्मेदारी थी "व ज़क्किरहुम बे अय्यामिल्लाह।" इसका मतलब यह है कि पैगंबर मूसा (अ) का यह कर्तव्य था कि वे लोगों को अल्लाह के दिनों की याद दिलाएं।
हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लेमीन अब्दुल अमीर ख़त्तात ने अल्लाह के दिनों और भोर पर चर्चा करते हुए कहा: अल्लाह तआला ने पैगंबर मूसा (अ) के लिए दो ज़िम्मेदारियाँ बताई हैं। इस आयत में उन पर... पहली जिम्मेदारी इस प्रकार बताई गई है: "और हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा, ताकि वह तुम्हारी क़ौम को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाए।" अर्थात्, पैगम्बर मूसा (अ) को आदेश दिया गया था कि वह अपनी क़ौम को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाए। यह वह मिशन है जो सभी पैगम्बरों के लिए स्पष्ट और सामान्य है।
उन्होंने कहा: दूसरी जिम्मेदारी है "व ज़क्किरहुम बे अय्यामिल्लाह", जिसका अर्थ है कि लोगों को अल्लाह के दिनों की याद दिलाना पैगम्बर मूसा (अ) का कर्तव्य है। इसका अर्थ यह है कि पैगम्बर मूसा (अ) को लोगों को अल्लाह के दिनों की याद दिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जो उसकी शक्ति, दया और न्याय की अभिव्यक्तियाँ हैं।
हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लेमीन ख़त्तात ने मानवीय स्थिति को विस्मृति और लापरवाही बताया और कहा: अगर हम चाहते हैं कि कोई चीज़ हमारे दिल और दिमाग में बनी रहे तो हमें उस पर लगातार ध्यान देना चाहिए। यदि इसके संरक्षण और स्मरण पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह भुला दिया जाएगा। इसी प्रकार दुश्मन जल्लाद और शहीद का स्थान भी बदलना चाहता है, इसलिए हमें दुश्मन की चालों से सावधान रहने की जरूरत है।
तेहरान में इस्लामी मानवता पर बैठक
इस्लामी मानविकी पर चर्चा के लिए तेहरान में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें देश के विभिन्न धार्मिक और शैक्षणिक नेताओं ने भाग लिया।
इस्लामी मानविकी पर विचार-विमर्श के लिए तेहरान में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें देश के विभिन्न धार्मिक और शैक्षणिक नेताओं ने भाग लिया। यह बैठक हौज़ा इल्मिया के इस्लामिक ह्यूमैनिटीज लीडरशिप इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित की गई थी और इसका उद्देश्य इस्लामी सिद्धांतों के प्रकाश में मानविकी में बदलाव के तरीके खोजना था।
बैठक की अध्यक्षता हौज़ा ए इल्मिया और इस्लामिक ह्यूमैनिटीज के नीति-निर्माण संस्थान के प्रमुख आयतुल्लाह अली रजा आराफी ने की। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित मानवता में परिवर्तन लाना देश के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है।
आयतुल्लाह आरफ़ी ने कहा कि इस कार्य का उद्देश्य इस्लामी संस्थाओं और सरकारी क्षेत्रों के बीच सामंजस्य पैदा करना है ताकि शासन प्रणाली की समस्याओं का समाधान किया जा सके। उन्होंने कहा कि हमें वर्तमान युग की समस्याओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे कदम उठाने चाहिए जिनसे देश को व्यावहारिक रूप से लाभ मिल सके।
उन्होंने कहा कि इस्लामी मानवता के क्षेत्र में अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, लेकिन इमाम खुमैनी (र) और इमाम खामेनेई के विचार हमारे मार्गदर्शन के मूल सिद्धांत होने चाहिए। इसके अलावा, अल्लामा तबातबाई, शहीद मुताहरी, अल्लामा मिस्बाह और अन्य शैक्षणिक हस्तियों के विचारों से लाभ उठाना भी आवश्यक है।
आयतुल्लाह आरफ़ी ने आगे कहा कि मदरसों को इस्लामी मानवता के बुनियादी मुद्दों को समझना चाहिए और अपनी संरचना में सुधार करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि समकालीन न्यायशास्त्र विभाग की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई है ताकि न्यायशास्त्र आधुनिक युग के प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम हो सके।
अंत में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमें सिद्धांत-निर्माण और प्रणाली-निर्माण की ओर बढ़ना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि आर्टिफ़िशीयल इंटेलीजेंस (एआई) और मानविकी के एकीकरण पर महत्वपूर्ण प्रगति हो रही है, विशेष रूप से नूर रिसर्च सेंटर द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना की।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर क़ुम में भव्य समारोह का आयोजन
भारत के गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी के अवसर पर मदरसा अल-काइम क़ुम अल-मुक़द्देसा में एक भव्य समारोह आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया और अपनी मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम का इजहार किया। यह कार्यक्रम मगरिब की नमाज के बाद शाम 7 बजे से 9 बजे तक आयोजित किया गया।
26 जनवरी के अवसर पर मदरसा अल-काइम क़ुम अल-मुक़द्देसा में एक भव्य समारोह आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया और अपनी मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम का इजहार किया। यह कार्यक्रम मगरिब की नमाज के बाद शाम 7 बजे से 9 बजे तक आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत मौलाना फैजुल हसन द्वारा पवित्र कुरान के पाठ के साथ हुई, जिसके बाद राष्ट्रगान गाया गया। इसके बाद हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सैयद मुहम्मद जौन आबिदीन ने अपने संबोधन में भारत के इतिहास में मुस्लिम शासकों की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत ने मुस्लिम शासकों के काल में महत्वपूर्ण प्रगति की, जिसका उदाहरण ताजमहल और दिल्ली में जामा मस्जिद जैसी इमारतें हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अंग्रेजों ने भारत को सिर्फ लूटा और पिछड़ा बनाया।
कार्यक्रम का संचालन हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद हैदर अब्बास रिजवी ने किया। इस अवसर पर बोलते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना अली अब्बास खान ने भारत की आजादी में मुसलमानों की भूमिका और बलिदान पर विस्तृत चर्चा की।
मौलाना मुहम्मद काशिफ ने "जिंदा बद ऐ वतन" शीर्षक से एक सुंदर कविता प्रस्तुत की, जबकि मौलाना इरफान आलम पुरी और मौलाना नदीम सिरसिवी ने अपनी कविताओं के माध्यम से गणतंत्र दिवस के अवसर पर मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम का इजहार किया।
यह कार्यक्रम हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी मुशावरती काउंसिल (तशक्कुलहाए फरहांगी हिन्दुस्तान) द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों का उत्साह एवं देशभक्ति झलकी।
ईरानी सेना 100 हेलीकॉप्टरों के साथ बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास।
ईरानी सेना के हवाई दस्ते के 100 हेलीकॉप्टरों के साथ "इक्तेदार" सैन्य अभ्यास, जिसमें कई नए हेलीकॉप्टरों को इस ताकत में शामिल किया गया, की अध्यक्षता मेजर जनरल क़ियॉमर्थ हैदरी, ईरानी सेना के थलसेना के कमांडर द्वारा की गई। यह अभ्यास सुरक्षा, हमलावर और गतिशील अभ्यासों के साथ-साथ एक साथ आयोजित किया गया था, और यह नफ़्त शहर क्षेत्र में हुआ।
इस अभ्यास के दौरान, किरमंशाह स्थित हवाई दस्ते के पहले बेस में 205, 206, 209 और 214 हेलीकॉप्टरों का ओवरहाल किया गया और इन्हें हवाई दस्ते की हेलीकॉप्टर बेड़े में शामिल किया गया। ये हेलीकॉप्टर पहले ऑपरेशनल सर्कल से बाहर हो गए थे क्योंकि उन्हें अपनी मरम्मत और पुर्जों की आपूर्ति की जरूरत थी।
ईरान में हुकूमत गिराना सिर्फ ख़याली पुलाव है!
मेहदी खलजी, जो एक ईरान-विरोधी विश्लेषक हैं, ने बीबीसी के एंकर के इस सवाल के जवाब में कहा कि "क्या आपको लगता है कि ये नीतियां एक निश्चित समय के भीतर इस्लामी गणराज्य की रीढ़ तोड़ सकती हैं?"
उन्होंने कहा: "मुझे नहीं लगता कि ईरान का कमजोर होना इस्लामी गणराज्य के पतन का कारण बनेगा। केवल आर्थिक दबाव या अंतरराष्ट्रीय अलगाव किसी भी सरकार को गिराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।"
उन्होंने आगे कहा: "हम चाहते हैं कि ईरान की सरकार गिर जाए और एक गैर-धार्मिक शासन स्थापित हो, लेकिन सच्चाई यह है कि ईरान के विरोधी भ्रमित है और ईरानी समाज को समझने में पूरी तरह से असमर्थ है। यहां तक कि अधिकतम दबाव की नीतियां भी इस्लामी गणराज्य को बदलने में सक्षम नहीं हो सकतीं।"













