رضوی
कला और हुनर;वर्तमान सांस्कृतिक संघर्ष में धर्म का संदेश पहुँचाने का प्रभावी और टिकाऊ माध्यम हैं
दसवें फ़ुनूने आसमानी फ़ेस्टिवल के सचिव ने धर्म का संदेश पहुँचाने में कला की अहम भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहा कि आज के सांस्कृतिक संघर्ष के हालात में कला और हुनर की भाषा दुनिया भर तक धर्म का संदेश पहुँचाने का सबसे प्रभावी और टिकाऊ तरीका है उन्होंने कहा कि हौज़ा-ए-इल्मिया को इस क्षेत्र में समझदारी और सक्रियता के साथ आगे आना चाहिए।
दसवें फ़ुनूने आसमानी फ़ेस्टिवल के सचिव हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रफ़ीई ने समापन समारोह के अवसर पर कहा कि हम इस समय दसवें फ़ुनूने आसमानी फ़ेस्टिवल के समापन कार्यक्रम में मौजूद हैं और अल्लाह का शुक्र है कि इस आयोजन में छात्र, उलेमा, शिक्षक और हौज़ा-ए-इल्मिया की सहायक परिषद के सदस्यों ने बड़ी संख्या में भाग लिया और सहयोग किया।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में कला एक बुनियादी और रणनीतिक विषय बन चुकी है। कला और हुनर के ज़रिये धर्म का संदेश दुनिया तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सकता है। अगर आज के समय में धर्म का संदेश वैश्विक स्तर तक पहुँचाना है, तो यह कला की भाषा के बिना संभव नहीं है।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रफ़ीई ने मौजूदा दौर की सांस्कृतिक टकराव की स्थिति की ओर इशारा करते हुए कहा कि आज हम एक सांस्कृतिक युद्ध में हैं। इस युद्ध में दुश्मन और पश्चिमी ताक़तों ने बड़े मीडिया नेटवर्क खड़े कर रखे हैं और मीडिया व कला के ज़रिये लोगों पर असर डालने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने आगे कहा कि इस समय लगभग 290 फ़ारसी भाषा के सैटेलाइट चैनल हमारे देश के ख़िलाफ़ सक्रिय हैं, जिनका मक़सद समाज में निराशा फैलाना है। ऐसे हालात में अगर धर्म का संदेश सही और प्रभावी तरीक़े से लोगों तक पहुँचाना है, तो कला और हुनर की भाषा को अपनाना बेहद ज़रूरी है।
हज़रत अली असगर (अ), मुखतसर हयात पर मोअस्सिर असर!
मौला हज़रत अली असगर (अ) का 10 रजब, 60 हिजरी को जन्म हुआ। हज़रत उम्मे रबाब की शाखे तमन्ना पर जो कली मुस्कुराई, उसने हकीमे कर्बला के होठों पर मुस्कान बिखेरी; खानदाने इस्मत व तहारत मे शमे फ़रहत व मुसर्रत रोशन हो गई।
लेखक: मौलाना गुलज़ार जाफ़री
मौला हज़रत अली असगर (अ) का 10 रजब, 60 हिजरी को जन्म हुआ। हज़रत उम्मे रबाब की शाखे तमन्ना पर जो कली मुस्कुराई, उसने हकीमे कर्बला के होठों पर मुस्कान बिखेरी; खानदाने इस्मत व तहारत मे शमे फ़रहत व मुसर्रत रोशन हो गई। सभी नौजवानों और रईसों के चेहरे खिल गए, कर्बला की धरती को सबसे कम उम्र का शहीद मिला, वो शहजादा जिसकी पलकों पर इस्लाम धर्म का खौफ सजता था, अपनी मुस्कुराहट के साथ इस दुनिया में कदम रखता है और करीब 18 दिन बाद, जब इस्मत का यह कारवां अपने सफर पर निकला तो हकीमे कर्बला ने भी कर्बला की महान त्रासदी के लिए एक 18 दिन के निहत्थे सगीर को चुना, कारण यह था कि किसी भी विभाग में कोई भी आदेश तब तक स्वीकार्य नहीं होता जब तक उस पर छोटी सी मुहर न हो। मुहर होती तो छोटी सी है, लेकिन पूरे कागज़ का ऐतेबार बढ़ाती है। शायद इसीलिए हुसैन इब्न अली (अ) हज़रत अली असगर (अ) को अपने साथ ले गए थे, ताकि अली के नाम की आखिरी मुहर बन सके शहादत की सूची को स्वीकार करने के लिए मुहर का छोटा होना आवश्यक था, इसलिए अली असगर को अंत में पेश करके हुसैन (अ) ने उनके नाम पर हस्ताक्षर किए और इस तरह शहादत की सूची को स्वीकार करने की गारंटी हज़रत बाब अल-हवाईज के नहीफ कंधों पर रखी गई थी।
यह ज्ञान और अंतर्दृष्टि वाले लोगों के लिए, कलम और कागज़ वाले लोगों के लिए, चेतना और भावना वाले लोगों के लिए चिंतन का क्षण है; हज़रत अली असगर (अ) के बाब अल-हवाइज की तरह ब्रह्मांड में किसी भी व्यक्ति की आयु इतनी छोटी और इतनी गहरी और रहस्यमयी नहीं होगी। उम्र कम है, बुद्धि और ज्ञान आश्चर्य और विस्मय में खो गए हैं, कलम विचारों में व्याकुल है। चेतना की झीलों में एक अजीब सी उछाल है, उड़ती कल्पना प्रेम और जुनून के अंतरिक्ष में उड़ने में असमर्थ लगती है, विचारों की घाटी में एक अजीब सी खामोशी है, जब एक छोटा बच्चा, एक शिशु, एक ऐसे बच्चे का अनमोल जीवन नष्ट कर देता है जिसके वली के माथे पर उसके साहस की टूटन में "शक्ति, क्रूरता और बर्बरता" के शब्द लिखे होते हैं। जिसकी आँखों में सफलता और उपलब्धि की चमक देखी जा सकती है। गालों की लालिमा इस्लाम की नसों में बहते खून के प्रवाह का प्रतीक है। उसके सूखे होंठ शरिया की सर्वोच्चता को व्यक्त करते हैं। उसके छोटे हाथों की तहों के माध्यम से इस्लामी आस्था की सुंदरता और भव्यता देखी जा सकती है। उसकी भुजाएँ हैं इस्लाम की ताकत का अंदाजा उसकी ताकत से लगाया जा सकता है। इसकी मुबारक गर्दन पर लगा तीर शहादत की शमा का प्रतीक है जिसे किसी भी दौर की कोई बुराई नहीं बुझा सकती। इसने शहादत की शमा को अपनी मुबारक गर्दन के खून से भर दिया और आग लगा दी। आने वाली पीढ़ियों के लिए क़यामत के दिन तक शहादत का जुनून। उन्होंने आकांक्षाओं को पोषित किया, और उनके होठों पर मुस्कान ने जीवन के वृक्ष को प्रकट किया।
यह पहला अवसर था कि मृत्यु के माथे पर पसीना था, तीन नुकीले तीर अपनी लंबाई के बावजूद बौने लग रहे थे, धनुर्धर का कौशल और चालाकी धरती पर दिखाई दे रही थी, मुस्कुराते हुए शहज़ादे ने शहादत की बाहों में हथियार डाल दिए। महानता, शहादत और अनंत जीवन की निश्चितता का संदेश मानवता के लोगों के मन तक पहुँचाया गया। कर्बला की त्रासदी से परिचित हर विवेकशील व्यक्ति इस शहादत की शाश्वतता, स्थायित्व और अनित्यता को जानता है, जिसके खून की बूंदें मासूमियत का चेहरा प्रकट करती हैं, जिसकी लाली कर्बला के बुद्धिमान व्यक्ति को आशूरा की रात से लेकर ईद के दिन तक शर्मिंदा कर देती है। आशूरा, जो पालता है मैं शहादत के जुनून में अपनी भटकती चेतना को जगाता रहा हूँ, और नैनवा के रेगिस्तान में, अपने खून की धारा से आज़ादी के शब्द लिखकर, मैं इस धूल को उपचार की धूल में बदल देता हूँ, और फिर यह धूल आसमान के सातों पर्दों को फाड़ देती है और आसमान को चीर देती है। हां, रजब के दस दिनों से लेकर मुहर्रम के आशूरा तक जो लोग जिंदगी में नहीं चले, उनके पदचिह्न आज भी ज्ञान के विद्यालयों में जीवन के प्रतीक बने हुए हैं।
होठों की खामोशी से वाणी की नदियाँ बह निकलीं; हुस्न और नज़ाकत की दौलत ने हिदायत, रहमत और रहमत का सोता छोड़ा। एड़ियाँ घिसीं मगर ज़मज़म का चश्मा न फूटा। प्यास ने शहादत की शमा जलाई। अमल में आने की कोशिश कामयाब न हो सकी, मगर इस एहसास के बिना , प्रयास को कागज पर स्वीकार्य नहीं लिखा जा सकता।
ज़मज़म की बज़्म इबादत का विकास है, लेकिन नैनवा के मैदान पर शहादत का चढ़ना इसकी जगह है। माथे पर जोश का तीर तीन दिशाओं से शहादत का शब्द है, होठों पर मुस्कान की निशानी सबूत है, कर्बला शहादत का प्रतीक है और अली असगर (अ) का छोटा जीवन इसका सबूत है। रहस्यमय प्रभाव विचारशील लोगों के लिए चिंता का विषय हैं।
अल्लाह हमें सोचने, समझने और कार्य करने की क्षमता प्रदान करें।
हज़रत अली असगर (अ) के शुभ जन्म दिवस पर सभी मवालीयान ए हैदर कर्रार को बधाई!
इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) के शागिर्द
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) की तरह हमारे आइम्मा अलैहिमुस्सलाम भी लोगों की तालीमो तर्बियत मे हमेशा कोशीश करते रहते थे। आइम्मा अलैहिमुस्सलाम का तरीकाऐ तालीम और तरबियत को तालीमी और तरबियती इदारो की सरगर्मियों पर क्यास नहीं किया जा सकता है। तालीमी इदारे खास औक़ात में तालीम देते हैं और बकीया औकात मोअत्तल रहते हैं। लेकिन आइम्मा अलैहेमुस्सलाम की तालीमो तरबियत के लिये कोई खास वक्त मोअय्यन नहीं था। आइम्मा अलैहिमुस्सलाम लोगों की तालीमो तरबियत मे मसरूफ रहते थे। आइम्मा अलैहिमुस्सलाम का हर गोशा , उन की रफ्तारो गुफ्तार , अवाम की तर्बियत का बेहतरीन ज़रिया था। जब भी कोई मुलाक़ात का शरफ हासिल करता था। वो आइम्मा के किरदार से फायदा हासिल करता था और मजलिस से कुछ न कुछ ले कर उठता था। अगर कोई सवाल करना चाहता था तो उसका जवाब दिया जाता था।
वाज़ेह रहे कि इस तरह का कोई मदरसा दुनिया मे कहीं मौजूद नहीं है। इस तरह का मदरसा तो सिर्फ अम्बिया अलैहेमुस्सलाम की ज़िन्दगी मे मिलता है ज़ाहिर सी बात है कि इस तरह के मदरसे के असारात फायदे और नताएज बहुत ज़्यादा ताज्जुब खैज़ हैं। बनी अब्बास के खलीफा ये जानते थे कि अगर अवाम को इस मदरसा की खुसूसियात का इल्म हो गया और वो उस तरफ मुतावज्जेह हो गए तो वो खुद-बखुद आइम्मा अलैहिमुस्सलाम की तरफ खिंचते चले जाएगे और इस सूरत मे ग़ासिबों की हुकूमत खतरो से दो-चार हो जाएगी। इस लिये खलीफा हमेशा ये कोशिश करते रहे कि अवाम को आइम्मा अलैहेमुस्सलाम को दूर रखा जाए और उन्हे नज़्दीक न होने दिया जाए। सिर्फ इमाम मौहम्मद बाक़िर (अ.स) के ज़माने मे जब उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ की हुकूमत थी और इमाम जाफर सादिक़ (अ.स) के इब्तेदाई दौर में जब बनी उमय्या और बनी अब्बास आपस मे लड़ रहे थे और बनी अब्बास ने ताज़ा ताज़ा हुकूमत हासिल की थी और हुकूमत मुस्तहकम नहीं हुई थी। उस वक्त अवाम को इतना मौका मिल गया कि वो आज़ादी से अहलेबैत से इस्तेफादा कर सकें। लेहाज़ा हम देखते हैं कि इस मुख्तसर सी मुद्दत में शागिर्दों और रावियों की तादाद चार हज़ार तक पहुंच गयी।
( रेजाल शैख तूसी , पेज न 142 , 342 )
लेकिन इसके अलावा बक़िया आइम्मा के ज़मानो मे शागिर्दों की तादाद बहुत कम नज़र आती है। मसलन इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) के शागिर्दों और रावियों की तादाद 110 है।
(रेजाल शैख तूसी , पेज न. 397 , 409)
इससे ये पता चलता है कि इस दौर मे अवाम को इमाम (अ.स) से कितना दूर रखा जाता था। लेकिन इस मुख्तसर सी तादाद में भी नुमाया अफराद नज़र आते हैं। यहा नमूने के तौर पर चन्द का ज़िक्र करते हैः
अली बिन महज़ियार
इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) के असहाबे खास और इमाम के वकील थे। आप का शुमार इमाम रज़ा (अ.स) और इमाम अली नक़ी (अ.स) के असहाब मे भी होता है। बहुत ज़्यादा इबादत करते थे , सजदे की बना पर पूरी पेशानी पर घट्टे पड़ गए थे। तोलूवे आफताब के वक्त सर सजदे मे रखते और जब तक एक हज़ार मोमिनो के लिये दुआ न कर लेते थे। उस वक्त तक सर ना उठाते थे। और जो दुआ अपने लिये करते थे वही उन के लिये भी।
अली बिन महज़ियार अहवाज़ मे रहते थे , आप ने 30 से ज़्यादा किताबें लिखी हैं।
ईमानो अमल के उस बुलन्द मर्तबे पर फाएज़ थे कि एक मर्तबा इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) ने आप की कद्रदानी करते हुए आप को एक खत लिखाः
बिसमिल्ला हिर्रहमा निर्रहीम
ऐ अली। खुदा तुम्हे बेहतरीन अज्र अता फर्माए , बहिश्त मे तुम्हे जगह दे दुनियाओ आखेरत की रुसवाई से महफूज़ रखे और आखेरत मे हमारे साथ तुम्हे महशूर करे। ऐ अली। मैंने तुम्हे उमूर खैर , इताअत , एहतराम और वाजेबात की अदाएगी के सिलसिले मे आज़माया है। मैं ये कहने मे हक़ बजानिब हुं कि तुम्हारा जैसा कहीं नहीं पाया। खुदा वंदे आलम बहिश्ते फिरदोस मे तुम्हारा अज्र करार दे। मुझे मालूम है कि तुम गर्मियों , सर्दियों और दिन रात क्या क्या खिदमत अन्जाम देते हो। खुदा से दुआ करता हूं कि जब रोज़े कयामत सब लोग जमा होंगे उस वक्त रहमते खास तुम्हारे शामिले हाल करे। इस तरह कि दूसरे तुम्हे देख कर रश्क करें। बेशक वो दुआओ का सुनने वाला है।
(ग़ैबत शैख तूसी पेज न. 225 , बिहारुल अनवार जिल्द 50 पेज न. 105)
अहमद बिन मौहम्मद अबी नस्र बरनती
कूफे के रहने वाले इमाम रज़ा (अ.स) और इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) के असहाबे खास और उन दोनो इमामो के नज़्दीक अज़ीम मन्ज़ेलत रखते थे , आपने बहुत-सी किताबें तहरीर की। जिनमे एक किताब अल जामेआ है। ओलामा के नज़्दीक आपकी फिक्ही बसीरत मशहूर है। फोक़्हा आप के नज़रयात को एहतरामो इज़्ज़त की निगाह से देखते हैं।
(मोअज्जिम रेजाल अल हदीस जिल्द 2 पेज न. 237 वा रेजाल कशी पेज न. 558)
आप उन तीन आदमियों मे हैं जो इमाम रज़ा (अ.स) की खिदमत मे शरफयाब हुए और इमाम ने उन लोगो को खास इज़्ज़तो एहतराम से नवाज़ा।
ज़करया बिन आदम कुम्मी
शहरे क़ुम मे आज भी उनका मज़ार मौजूद है। इमाम रज़ा (अ.स) और इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) के खास असहाब मे से थे। इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) ने आपके लिये दुआ फर्मायी। आपको इमाम (अ.स) के बावफा असहाब मे शुमार किया जाता है।
(रजाल कशी पेज न. 503)
एक मर्तबा इमाम रज़ा (अ.स) की खिदमत मे हाज़िर हुए। सुब्ह तक इमाम ने बातें की। एक शख्स ने इमाम रज़ा (अ.स) से दर्याफ्त कियाः मैं दूर रहता हूं और हर वक्त आपकी खिदमत मे हाज़िर नहीं हो सकता हूं। मैं अपने दीनी एहकाम किससे दर्याफ्त करुं।
(मुन्तहल आमाल सवानेह उमरी इमाम रज़ा (अ.स) पेज न. 85)
फर्मायाः ज़कर्या बिन आदम से अपने दीनी अहकाम हासिल करो। वो दीनो दुनिया के मामले मे अमीन है।
(रिजाल कशी पेज न. 595)
मौहम्मद बिन इस्माईल बिन बज़ी
इमाम मूसा काज़िम , इमाम रज़ा और इमाम मौहम्मद तक़ी अलैहिमुस्सलाम के असहाब मे ओलामा शिया के नज़्दीक मोअर्रिद एतमाद ,बुलंद किरदार और इबादत गुज़ार थे। मोतदिद किताबें तहरीर की हैं। बनी अब्बास के दरबार मे काम करते थे।
(रिजाले नजाशी पेज न. 254)
इस सिलसिले मे इमाम रज़ा (अ.स) ने आपसे फर्मायाः
सितमगारों के दरबार मे खुदा ने ऐसे बंदे मुअय्यन किये हैं। जिन के ज़रीये वो अपनी दलील और हुज्जत को ज़ाहिर करता है। उन्हे शहरों मे ताकत अता करता है ताकि उनके ज़रीये अपने दोस्तो को सितमगारों के ज़ुल्मो जौर से महफूज़ रखे। मुसलमानो के मामलात की इस्लाह हो। ऐसे लोग हवादिस और खतरात मे साहेबाने ईमान की पनाहगाह हैं। हमारे परेशान हाल शिया उन की तरफ रुख करते हैं और अपनी मुश्किलात का हल उन से तलब करते हैं। ऐसे अफराद के ज़रिये खुदा मोमिनो को खौफ से महफूज़ रखता है। ये लोग हक़ीकी मोमिन हैं। ज़मीन पर खुदा के अमीन हैं। उन के नूर से क़यामत नूरानी होगी। खुदा की क़सम ये बहिश्त के लिये और बहिश्त इन के लिये है। नेमतें इन्हें मुबारक हों।
उस वक्त इमाम (अ.स) ने फर्मायाः तुममे से जो चाहे इन मक़ामात को हासिल कर सकता है।
मौहम्मद बिन इस्माईल ने अर्ज़ किया। आप पर क़ुर्बान हो जाऊ। किस तरह हासिल कर सकता हूं।
इमाम ने फर्मायाः सितमगारों के साथ रहे। हमें खुश करने के लिये हमारे शियों को खुश करे। (यानी जिस ओहदा और मनसब पर हो। उस का मकसद मोमिनो से ज़ुल्मो सितम दूर करना हो।)
मौहम्मद बिन इस्माईल ,जो बनी अब्बास के दरबार मे वज़ारत के ओहदे पर फाएज़ थे। इमाम ने आखिर में उन से फर्मायाः ऐ मौहम्मद। तुम भी इन मे शामिल हो जाओ।
(रिजाले नजाशी पेज न. 255)
हुसैन बिन खालिद का बयान है कि एक गिरोह के हमराह इमाम रज़ा (अ.स) की खिदमत मे हाज़िर हुआ। दौरान गुफ्तगू मौहम्मद बिन इस्माईल का ज़िक्र आया। इमाम (अ.स) ने फर्मायाः मैं चाहता हूं कि तुममे ऐसे अफराद हों।
(रिजाले नजाशी पेज न. 255)
मौहम्मद बिन अहमद याहिया का बयान है कि मैं , मौहम्मद बिन अली बिन बिलाल , के हमराह मौहम्मद बिन इस्माईल बज़ी की कब्र की ज़ियारत को गया।मौहम्मद बिन अली कब्र के किनारे क़िबला रुख बैठे और फर्माया कि साहिबे क़ब्र ने मुझ से बयान किया कि इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) ने फर्मायाः जो शख्स अपने बरादर मोमिन की क़ब्र की ज़ियारत को जाए , क़िबला रुख बैठे और क़ब्र पर हाथ रख कर 7 मर्तबा सूरह इन्ना अन्ज़लना की तेलावत करे , खुदा वंदे आलम उसे क़यामत की परेशानियों और मुशकलात से नजात देगा।
(रेजाल कशी पेज न. 564)
मौहम्मद बिन इस्माईल की रिवायत है कि मैने इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) से एक लिबास की दरख्वास्त की कि अपना एक लिबास मुझे इनायत फर्माए ताकि उसे अपना कफन करार दूं। इमाम ने लिबास मुझे अता फर्माया और फर्मायाः इस के बटन निकाल लो।
(रेजाल कशी पेज न. 245-564)
हज़रत इमाम तक़ी अलैहिस्सलाम का जीवन परिचय
हज़रत इमाम तक़ी अलैहिस्सलाम का नाम मुहम्मद व आपकी मुख्य उपाधियाँ तक़ी व जवाद है।
जन्म व जन्म स्थान
हज़रत इमाम तक़ी अलैहिस्सलाम का जन्म सन् 195 हिजरी क़मरी मे रजब मास की दसवी (10) तिथि को हुआ था।
माता पिता
हज़रत इमाम तक़ी अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत इमाम रिज़ा अलैहिस्सलाम व आपकी माता हज़रत सबीका थीं। जिनको ख़ीज़रान भी कहा जाता है।
शहादत (स्वर्गवास)
हज़रत इमाम तक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत सन् 220 हिजरी क़मरी मे ज़ीक़ादाह मास की अन्तिम तिथि को हुई। आपको अब्बासी शासक मोतासिम के आदेश पर आपकी पत्नि उम्मे फ़ज़्ल ने विष दिया। उम्मे फ़ज़्ल अब्बासी शासक मोतासिम के भाई मामून की पुत्री थी।
समाधि
इमाम तक़ी अलैहिस्सलाम की समाधि बग़दाद के समीप काज़मैन नामक स्थान पर है। जहाँ पर हर समय हज़ारों श्रद्धालु आपकी समाधि के दर्शन हेतू उपस्थित रहते हैं।
।। अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व आले मुहम्मद।।
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इमाम तकी अलैहिस्सलाम के मोजेज़ात
(1) इमाम अली रज़ा (अ.स) की शहादत के बाद मुखतलिफ शहरो से 80 ओलामा और दानिशमंद हज करने के लिये मक्का रवाना हुए। वो सफर के दौरान मदीना भी गए , ताकि इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की ज़ियारत भी करलें। उन लोगो ने इमाम सादिक़ (अ.स) के एक खाली घर में क़याम किया।
इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) जो उस वक्त कमसिन थे। उन की बज़्म में तशरीफ लाए ,मौफिक़ ,नामी शख्स नें लोगों से आप का तारुफ कराया। सब ही ऐहतेराम में खड़े हो गए ,और सब ने आपको सलाम किया। उसके बाद उन लोगोनें सवालात करना शुरु किये। हज़रत ने हर एक का जवाब दिया (उस वाक़ए से हर एक को आपकी इमामत का मज़ीद यक़ीन हो गया) हर एक खुशहाल था। सब ने आपकी ताज़ीम की और आपके लिये दुआऐं कीं।
उनमें से एक शख्स इस्हाक़ भी थे जिस का बयान है कि मैंने एक ख़त में दस सवाल लिख लिये थे कि मौक़ा मिलने पर हज़रत से इस का जवाब चाहुंगा। अगर उन्होंने तमाम सवालों का जवाब दे दिया तो उस वक्त हज़रत से उस बात का तक़ाज़ा करुंगा कि वो मेरे हक़ में ये दुआ फरमाऐं कि मेरी ज़ौजा के हमल को खुदा फरज़ंद करार दे। नशिस्त काफी तूलानी हो गयी। लोग मुसलसल आपसे सवाल कर रहे थे और आप हर एक का जवाब दे रहे थे। ये सोच कर मैं उठा कि खत कल हज़रत की खिदमत में पेश करुंगा। इमाम की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी इरशाद फरमायाः
इस्हाक़। खुदा ने मेरी दुआ क़ुबूल कर ली है। अपने फरज़ंद का नाम अहमद रखना।
मैंने कहाः खुदाया तेरा शुक्र , यक़ीनन यही हुज्जते खुदा हैं।
जब इस्हाक़ वतन वापस आया खुदा ने उसे एक फरज़ंद अता किया जिसका नाम उसने ,अहमद ,रखा।
(ऐवानुल मौजेज़ात , पेज न.109)
शियो के हालात का इल्म
(2) इमरान बिन मौहम्मद अशअरी का बयान है कि मैं हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की खिदमत में शरफयाब हुआ तमाम बातों के बाद इमाम से अर्ज़ किया कि।
उम्मुलहसन ने आपकी खिदमत में सलाम अर्ज़ किया है और ये दरख्वास्त की है कि आप अपना एक लिबास इनायत फरमाऐं जिसे वो अपना कफन बना सके।
इमाम ने फरमायाः वो इन चीज़ों से बेनियाज़ हो चुकी है।
मैं इमाम के इस जुम्ले का मतलब नहीं समझ सका। यहा तक की मुझ तक ये खबर पहुची कि जिस वक्त मैं इमाम की खिदमत में हाज़िर था उस से 13,14 रोज़ पहले ही उम्मुल हसन का इन्तेक़ाल हो चुका था।
(बिहारुल अनवार , जिल्द 50 , पेज न. 43 , खराइज रावंदी पेज न. 237)
लूट के माल की खबर होना
(3) अहमद बिन हदीद का बयान है कि एक काफिला के हमराह जा रहा था रास्ते में डाकूओं नें हमें घेर लिया (और हमारा सारा माल लूट लिया) जब हम लोग मदीना पहुचे एक गली में इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) से मुलाक़ात हुई। हम लोग उनके घर पहुचे और सारा वाक़ेआ बयान किया। इमाम (अ.स) ने हुक्म दिया और कपड़ा , पैसा हम को लाकर दिया गया। इमाम ने फरमायाः जितने पैसे ड़ाकू ले गए हैं उसी हिसाब से आपस में तक़सीम कर लो। हमने पैसा आपस में तक़सीम किया। मालूम ये हुआ कि जितना ड़ाकू ले गए थे उसी कद्र इमाम (अ.स) ने हमें दिया है। उस मिक़्दार से न कम था न ज़्यादा।
(बिहारुल अनवार , जिल्द 50 , पेज न. 44 , मुताबिक रिवायत खराइज रावंदी।)
इमाम का लिबास
(4) मौहम्मद बिन सहल क़ुम्मी का बयान है कि मै मक्के में मुजाविर हो गया था। वहा से मदीना गया और इमाम का मेहमान हुआ। मैं इमाम से उनका एक लिबास चाहता था मगर आखिर वक्त तक अपना मतलब बयान ना कर सका। मैंने अपने आप से कहाः अपनी इस ख्वाहिश को एक खत के ज़रिये इमाम की खिदमत में पेश करुं और मैने यही किया। उसके बाद मैं मस्जिदे नबवी चला गया और वहा ये तय किया की दो रकत नमाज़ बजा लाऊं और खुदा वंदे आलम से 100 मर्तबा तलब खैर करुं। उस वक्त अगर दिल ने गवाही दी तो खत इमाम की खिदमत में पेश करुंगा। वरना इस को फाड़ कर फेंक दूंगा।।।मेरे दिल ने गवाही नहीं दी ,मैंने खत फाड़ कर फेंक दिया और मक्का की तरफ रवाना हो गया।।।।रास्ते मे मैंने एक शख्स को देखा जिसके हाथ मे रुमाल है जिस्में एक लिबास है और वो शख्स काफिला में मुझे तलाश कर रहा है।जब वो मुझ तक पौंहचा तो कहने लगाः तुम्हारे मौला ने ये लिबास तुम्हारे लिये भेजा है।
(खराइज रावंदी , पेज न. 237 , बिहारुल अनवार जिल्द 50 , पेज न. 44।)
(5) दरख्त पर फलो का आ जाना
मामून ने इमाम (अ.स) को बग़दाद बुलाया और अपनी बेटी से आपकी शादी की। लेकिन आप बग़दाद में ठहरे नहीं और अपनी बीवी के साथ मदीना वापस आ गये।
जिस वक्त इमाम मदीना वापस हो रहे थे। उस वक्त काफी लोग आप को विदा करने के लिये शहर के दरवाज़े तक आपके साथ आए और खुदा हाफिज़ कहा।
मग़रिब के वक्त आप ऐसी जगह पहुचे जहा एक पुरानी मस्जिद थी। नमाज़े मग़रिब के लिये इमाम (अ.स) उस मस्जिद में तशरीफ ले गए। मस्जिद के सहन में एक बेर का दरख्त था जिस पर आज तक फल नहीं आए थे। इमाम (अ.स) ने पानी तलब किया और उस दरख्त के नीचे वुज़ु फरमाया और जमाअत के साथ मगरिब की नमाज़ अदा फरमाई। उसके बाद आपने चार रकत नमाज़े नाफेला पढ़ी। उसके बाद आप सज्दए शुक्र बजा लाए और आपने तमाम लोगों को रुख्सत कर दिया।
दूसरे ही दिन उस दरख्त में फल आ गए और बेहतरीन फल ये देख कर लोगों को बहुत तआज्जुब हुआ।
(नूरुल अबसार शबलनजी , पेज न. 179 , ऐहक़ाक़ुल हक , जिल्द 12 पेज न. 424 , काफी , जिल्द न. 1 , पेज न. 497 , इर्शाद मुफीद , पेज न. 304 ,मुनाक़िब ,जिल्द न. 4 , पेज न. 390)
जनाब शैख मुफीद अलैहिर्रहमा का बयान है कि इस वाकए के बरसों बाद मैनें खुद उस दरख्त को देखा और उस का फल खाया।
(6) इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत का ऐलान
उमय्या बिन अली का बयान है कि जिस वक्त इमाम रज़ा (अ.स) खुरासान में तशरीफ फरमा थे उस वक्त मैं मदीने में ज़िन्दगी बसर कर रहा था और इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) के घर मेरा आना जाना था। इमाम के रिशतेदार आम-तौर से सलाम करने इमाम (अ.स) की खिदमत में हाज़िर होते थे। एक दिन इमाम (अ.स) ने कनीज़ से कहाः उन (औरतों) से कह दो अज़ादारी के लिये तैय्यार हो जाऐ। इमाम (अ.स) ने एक बार फिर इस बात की ताकीद फरमाई कि वो लोग अज़ादारी के लिये आमादा हो जाऐं।
लोगों ने दरयाफ्त कियाः किस की अज़ादारी के लिये।
फरमायाः रुए ज़मीन के सबसे बेहतरीन इन्सान के लिये।
कुछ अर्से के बाद इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत की खबर मदीना आई। मालूम हुआ कि उसी दिन इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत वाके हुई है जिस दिन इमाम (अ.स) ने फरमाया था कि अज़ादारी के लिये तैय्यार हो जाओ।
(आलामुलवरा , पेज न. 334)
(7) ऐतराफे क़ाज़ी
क़ज़ी याहिया बिन अक्सम , जो खान्दाने रिसालत व इमामत के सख्त दुशमनों में था। उस ने खुद इस बात का ऐतराफ किया है कि एक दिन रसूले खुदा (स.अ.वा.व) की क़ब्रे मुताहर के नज़दीक इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) को देखा उनसे कहा खुदा की क़सम। मैं कुछ बातें आप से दरयाफ्त करना चाहता हुं लेकिन मुझे शर्म महसूस हो रही है।
इमाम (अ.स) ने फरमायाः सवाल के बगैंर तुम्हारी बातों के जवाब दे दूंगा। तुम ये दरयाफ्त करना चाहते हो कि इमाम कौन है।
मैने कहाः खुदा की क़सम यही दरयाफ्त करना चाहता था।
फरमायाः मैं इमाम हुं ,
मैने कहाः इस बात पर कोई दलील है।
उस वक्त वो असा जो इमाम के हाथों मे था। वो गोया हुआ और उसने कहाः ये मेरे मौला हैं इस ज़माने के इमाम हैं और खुदा की हुज्जत है।
(क़ाफी , जिल्द 1 , पेज न. 353 , बिहारुल अनवार , जिल्द 50 , पेज न. 68)
(8) पड़ौसी की नजात
अली बिन जरीर का बयान है कि मैं इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की खिदमते अक़दस में हाज़िर था। इमाम के घर की एक बकरी ग़ायब हो गई थी। एक पडौसी को चोरी के इल्ज़ाम में खेंचते हुऐ इमाम (अ.स) की खिदमत में लाए।
इमाम ने फरमायाः
अफसोस हो तुम पर इसको आज़ाद करो इसने बकरी नहीं चुराई है। बकरी इस वक्त फलॉ घर में है जाओ वहा से ले आओ।
इमाम (अ.स) ने जहा बताया था वहा गए और बकरी को ले आए और घर वाले को चोरी के इल्ज़ाम मे गिरफ्तार किया। उस की पिटाई की उसका लिबास फाड़ ङाला और वो क़सम खा रहा था कि उसने बकरी नहीं चुराई है। उस शख्स को इमाम की खिदमत मे लाए।
इमाम ने फरमायाः वाए हो तुम पर। तुम ने इस शख्स पर ज़ुल्म किया। बकरी खुद इसके घर मे चली गयी थी। उसको खबर भी न थी।
उस वक्त इमाम ने उसकी दिलजोई के लिये और उसके नुक़सान को पूरा करने के लिये एक रक़म उसको अता फरमाई।
(बिहारुल अनवार , जिल्द 50 ,पेज न. 47 , खराइज रावंदी की रिवायत के मुताबिक)
(9) क़ैद की रेहाई
अली बिन खालिद , का बयान है कि सामर्रा मे मुझे ये ऐत्तेला मिली कि एक शख्स को शाम से गिरफतार करके यहा लाए हैं और क़ैद खाना में उसको क़ैद कर रखा है। मशहूर है कि ये शख्स नबुवत का मुददई है।
मैं क़ैदखाना गया। दरबान से नेहायत नर्मी और ऐहतराम से पेश आया। यहा तक की मैं उस क़ैदी तक पहुंच गया। वो शख्स मुझे बाहम और अक़्लमंद नज़र आया। मैने उससे दरयाफ्त किया कि तुम्हारा क्या किस्सा है।
कहने लगाः शाम मे एक जगह है जिसको रासुल हुसैन कहते हैं (जहा इमाम हुसैन (अ.स) का सरे मुक़द्दस रखा गया था) मैं वहा इबादत किया करता था। एक रात जब मैं ज़िक्रे इलाही मे मसरूफ था। एक-दम एक शख्स को अपने सामने पाया। उसने मुझ से कहा खड़े हो जाओ।
मै खड़ा हो गया। उसके साथ चन्द कदम चला। देखता क्या हुं कि मसिज्दे कूफा में हुं। उसने मुझ से पूछाः इस मस्जिद को पहचानते हो।
मैने कहाः हाँ ये मस्जिदे कूफा है।
वहा हमने नमाज़ पढ़ी फिर हम वहा से बाहर चले आए। फिर थोड़ी दूर चले थे कि देखा मदीना मे मसिज्दे नबवी मे हुं। रसूले अकरम की क़ब्रे अतहर की ज़ियारत की मसिज्द मे नमाज़ पढ़ी। फिर वहा से चले आए फिर चन्द कदम चले देखा कि मक्का मे मौजूद हुं। खानए क़ाबा का तवाफ किया और बाहर चले आए फिर चन्द कदम चले तो अपने को शाम मे उसी जगह पाया जहा। मैं इबादत कर रहा था और वो शख्स मेरी नज़रों से पोशीदा हो गया।
जो कुछ देखा था। वो मेरे लिये काफी ताअज्जुब खैज़ था। यहा तक की इस वाकऐ को कई साल गुज़र गया। एक साल बाद वो शख्स फिर आया। गुज़िशता साल की तरह इस मर्तबा भी वही सब वाकेआत पेश आए। लेकिन इस मर्तबा जब वो जाने लगा तो मैने उस को क़सम देकर पूछाः आप कौन हैं।
फरमायाः मौहम्मद बिन अली बिन मूसा बिन जाफर बिन मौहम्मद बिन अली इब्नुल हुसैन बिन अली इब्ने अबितालिब हुं।
ये वाकेआ मैने बाज़ लोगों से बयान किया उसकी खबर मोतसिम अब्बासी के वज़ीर मौहम्मद बिन अब्दुल मलिक ज़यात तक पहुची। उसने मेरी गिरफ्तारी का हुक्म दिया जिस की बना पर मुझे क़ैद करके यहा लाया गया है। झूठों ने ये खबर फैला दी कि मैं नबूवत का दावेदार हुं।
अली बिन खालिद का बयान है कि मैने उससे कहा कि अगर तुम इजाज़त दो तो सही हालात ज़यात को लिख कर भेजु ताकि वो सही हालात से बा खबर हो जाए।
वो कहने लगाः लिखो।
मैने सारा वाकेआ ज़यात को लिखा। उसने इसी खत की पुश्त पर जवाब लिखा कि उससे कहो कि जो शख्स एक शब मे उसे शाम से कूफा , मदीना और मक्का ले गया और वापस ले आया , उसी से रेहाई तलब करे।
ये जवाब सुन कर मै बहुत रन्जीदा हुआ। दूसरे दिन मै क़ैदखाना गया ताकि उसे सब्रो शुक्र की तल्कीन करुं और उसका हौसला बढ़ाऊं।
जब वहा पहुचा तो देखा दरबान और दूसरे अफराद परेशान हाल नज़र आ रहे हैं। दरयाफ्त किया कि वजह किया है।
कहने लगे जो शख्स पैग़म्बरी का दावेदार था वो कल रात क़ैद खाना से नहीं मालूम किस तरह बाहर चला गया। ज़मीन मे धंस गया या आसमान मे उड़ गया। मुसलसल तलाश के बाद भी उसका कोई पता ना चला।
(इर्शाद मुफीद ,पेज न. 304 , आलामुल वुरा , पेज न. 332 , ऐहक़ाक़ुल हक़ , जिल्द 12 , पेज न. 427 , अलफसूलुल मुहिम्मा , पेज न. 289)
अबासलत की रिहाई
(10) अबासलत हरवी इमाम रज़ा (अ.स) के मुकर्रब तरीन असहाब मे से थे इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत के बाद मामून के हुक्म से आप को कैद कर दिया गया।
आप का बयान है कि एक साल तक कैदखाना मे रहा। आजिज़ आ गया एक रात सारी रात दुआ इबादत मे मशग़ूल रहा। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) और अहलेबैत (अ.स) को अपने मसाएल के सिलसिले मे वास्ता क़रार देकर खुदा से दुआ मॉगी कि मुझे रेहाई अता फरमाऐ। अभी मेरी दुआ तमात भी न होने पाई थी कि देखा इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) मेरे पास मौजूद हैं। मुझ से फरमायाः ऐ अबासलत क्या क़ैद आजिज़ आ गये।
अर्ज़ कियाः ऐ मौला हा आजिज़ आ गया हु।
फरमायाः उठो आपने ज़न्जीरों पर हाथ फेरा। उसके सारे हल्के खुल गए। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और क़ैद खाना से बाहर ले आए। दरबानो ने मुझे देखा मगर हज़रत के रोअबो जलाल से किसी मे ज़बान खोलने की सकत नहीं थी। जब इमाम मुझे बाहर ले आए तो मुझ से फरमायाः जाओ खुदा हाफिज़ अब न मामून तुम्हे देखेगा और ना तुम ही उसको देखोगे। जैसा इमाम (अ.स) ने फरमाया था वैसा ही हुआ।
(मुन्तहल आमाल सवानेह उम्री हज़रत इमाम रज़ा (अ.स) , पेज न. 67 , उयूने अखबार , जिल्द 2 , पेज न. 247 , बिहारुल अनवार , जिल्द 49 , पेज न. 303)
(11) मोतसिम अब्बासी की नशिस्त
ज़रक़ान , जो इब्ने अबी दाऊद (इब्ने अबी दाऊद ,मामून ,मोतसिम ,वातिक़ और मुतावक्किल के ज़माने मे बग़दाद के क़ाज़ीयों मे था।) का गहरा दोस्त था। उसका बयान है कि एक दिन इब्ने अबी दाऊद , मोतसिम की बज़्म से रन्जीदा वापस आ रहा था। मैने रन्जीदगी का सबब दरयाफ्त किया कहने लगाः ऐ काश मै बीस साल पहले मर गया होता।
पूछाः आखिर क्युं।
कहा आज मोतसिम की बज़्म मे अबु जाफर इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) से जो सदमा मुझे पहुचा है।
पूछाः माजरा क्या है।
कहाः एक शख्स ने चोरी का एतराफ किया और मोतसिम से ये तकाज़ा किया कि वो हद जारी करके उसे पाक करदे मोतसिम ने तमाम फोक़हा को जमा किया उनमें मौहम्मद बिन अली इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) भी थे मोतसिम ने हमसे पूछा चोर का हाथ कहा से काटा जाए।
मैने कहाः कलाई से।
पूछा उसकी दलील क्या है।
मैने कहाः आयते तमय्युम मे हाथ का इत्लाक़ कलाई तक हुआ है।
अपने चेहरे और हाथों का मसह करो। कलाई तक हाथ का इत्लाक़ हुआ है। इस मसअले मे फोक़हा की एक जमाअत मेरे मवाफिक़ थी। सब का कौल यही था कि चोर का हाथ कलाई से काटा जाए। लेकिन दूसरे फोक़हा का नज़रिया ये था कि चोर का हाथ कोहनी से काटा जाए। मोतसिम ने उनसे दलील तलब की उन्होंने कहा आयये वुज़ु में हाथ का इत्लाक़ कोहनी तक हुआ है।
अपने चेहरों को धोओ और हाथों को कोहनियों तक यहा कोहनी तक हाथ का इत्लाक़ हुआ है।
उस वक्त मोतसिम ने मौहम्मद बिन अली (इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की तरफ रुख किया और पूछा कि इस मसअले मे आपकी क्या राए है।
फरमायाः इन लोगों ने अपने नज़रयात बयान कर दिये हैं। मुझे माफ रखो।
मोतसिम ने बहुत इसरार किया और कसम दे कर कहा कि आप अपना नज़रिया ज़रूर बयान फरमाइये।
फरमायाः चूंकि तुमने कसम दी है लेहाज़ा सुनो ये सब लोग गलती पर हैं। चोर की सिर्फ चार ऊगलिया काटी जाऐगी।
मोतसिम ने दरयाफ्त किया कि इस की दलील किया है।
फरमायाः रसूले खुदा (स.अ.व.व) का इर्शाद है कि सजदा सात आज़ा पर वाजिब हैः पेशानी , हाथ की हथेलिया , दोनो घुटने और पाँव के दोनो अंगूठे।
लेहाज़ा अगर कलाई या कोहनी से चोर का हाथ काटा जाए तो वो सज्दा किस तरह करेगा और खुदा वंदे आलम का इर्शाद है।
जिन सात आज़ा पर सज्दा वाजिब है। वो सब खुदा के लिये हैं। खुदा के साथ किसी और की इबादत ना करो और जो चीज़ खुदा के लिये हो वो काटी नहीं जा सकती है।
इब्ने अबी दाऊद का कहना है कि मोतसिम ने आप का जवाब पसंद किया और हुक्म दिया कि चोर की सिर्फ चार ऊगलिया ही काटी जाएं और सब के सामने हम सब की आबरु चली गयी। उस वक्त मैने (शर्म के मारे) मौत की तमन्ना की।
(तफसीर अय्याशी , जिल्द 1 , पेज न. 319 , बिहारुल अनवार , जिल्द 50 ,पेज न. 5)
इमाम तक़ी अ.स. का एक मुनाज़ेरा
इमाम रज़ा अ.स. को शहीद करने के बाद मामून चाहता था कि किसी तरह से इमाम तक़ी अ.स. पर भी नज़र रखे और इस काम के लिये उसने अपनी बेटी उम्मे फ़ज़्ल का निकाह इमाम तक़ी से करना चाहा।
इस बात पर तमाम अब्बासी मामून पर ऐतेराज़ करने लगे और कहने लगे कि अब जबकि अ़ली इब्ने मूसा रिज़ा अ.स. इस दुनिया से चले गये और खि़लाफ़त दुबारा हमारी तरफ़ लौटी है तो तू चाहता है कि फिर से खि़लाफ़त को अ़ली की औलाद को दे दे हम किसी भी हाल में यह शादी नहीं होने देगें।
मामून ने पूछाः तुम क्या चाहते हो? उन लोगों ने कहा ये लड़का नौजवान है और न ही इसके पास कोई इल्मो हिक्मत है तो मामून ने जवाब मे कहा तुम इस ख़ानदान को नहीं पहचानते अगर तुम चाहो तो आज़मा कर देख लो और किसी आलिम को बुला लाओ और इन से बहस करा लो ताकि मेरी बात की सच्चाई रौशन हो जाये।
अब्बासी लोगों ने याहिया बिन अक़सम नामक व्यक्ति को उसके इल्म की शोहरत की वजह से इमाम तक़ी अ.स. से मुनाज़रे के लिये चुना।
मामून ने एक जलसा रखा कि जिस में इमाम तक़ी अ.स. के इल्म और समझ को तौला जा सकता है। जब सब लोग हाज़िर हो गये तो याहिया ने मामून से पूछाः
क्या आपकी इजाज़त है कि मैं इस लड़के से सवाल करूं?
मामून ने कहा ख़ुद इन से इजाज़त लो, याहिया ने इमाम से इजाज़त ली तो इमाम ने फ़रमायाः जो कुछ भी पूछना चाहता है पूछ ले।
याहिया ने कहाः उस शख़्स के बारे में आप की क्या नज़र है कि जिसने अहराम की हालत में शिकार किया हो?
इमाम ने फ़रमायाः इस शख़्स ने शिकार को हिल मे मारा है या हरम में?
वो शख़्स अहराम की हालत में शिकार करने की मनाही को जानता था या नहीं जानता था??
उसने जानवर को जान के मारा है या ग़लती से??
ख़ुद वो शख़्स आज़ाद था या ग़ुलाम?
वह शख़्स छोटा था या बड़ा?
पहली बार यह काम किया था या पहले भी कर चुका था?
शिकार परिन्दा था या ज़मीनी जानवर?
छोटा जानवर था या बड़ा?
फिर से इस काम को करना चाहता है या अपनी ग़लती पर शरमिंदा है?
शिकार दिन में किया था या रात में?
अहराम उमरे का था या हज का?
याहिया बिन अक़सम अपने सवाल के अंदर होने वाले इतने सारे सवालों को सुन कर सकते में आ गया, उसकी कम इल्मी और कम हैसियती उसके चेहरे से दिखाई दे रही थी उसकी ज़बान ने काम करना बंद कर दिया था और तमाम मौजूदा लोगों ने उसकी हार को मान लिया था।
मामून ने कहा कि ख़ुदा का शुक्र कि जो मैं ने सोचा था वही हुआ है ओर फिर अपने रिश्तेदारों और ख़ानदान वालों से कहाः क्या अब उस बात को जान गये हो कि जिसे नहीं मान रहे थे?
कुछ देर बाद जलसा ख़त्म हो गया और सिवाये ख़लीफ़ा के ख़ास लोगों के सब लोग चले गये मामून ने इमाम तक़ी अ.स. की तरफ मुंह किया और इमाम के बयान किये हुवे हर एक मसले का जवाब इमाम से मालूम किया।
(ये आरटीकल जनाब मेहदी पेशवाई की किताब सीमाये पीशवायान से लिया गया है।)
जवाद उल आइम्मा हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी (अ)
इमाम जवाद (अ) तक़वा और परहेज़गारी की मिसाल थे। इबादत, अल्लाह का ज़िक्र और लंबे सजदे उनकी खुशगवार ज़िंदगी का हिस्सा थे। साथ ही, वे आज़ादी और आज़ादी की निशानी थे और ज़ुल्म और ज़बरदस्ती के आगे कभी नहीं झुके। यह खूबी अहलुल बैत (अ.स.) के सभी इमामों में आम है।
लेखकः मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कोलकत्तवी
हज़रत इमाम मुहम्मद तकी (अ) कहते हैं: “तौबा में देर करना धोखा है, और इसे बहुत देर करना हैरानी और उलझन की वजह है, अल्लाह से बचना तबाही है, और बार-बार गुनाह करना अल्लाह की तरफ़ से बेखौफ़ होने का प्लान है, जैसा कि दुनिया के रब कहते हैं: “जो लोग अल्लाह का प्लान बनाते हैं, वे हारे नहीं।” (सूर ए आराफ़, आयत 99)
“सिर्फ़ वही लोग निडर होते हैं जिन्हें अल्लाह की योजना से नुकसान होता है।” (तोहफ़ उल उक़ूल, पेज 456)
रजब की 10 तारीख़ शिया दुनिया के नौवें इमाम, हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी, इमामों के जवाद (अ)—हज़रत इमाम अली बिन मूसा अल-रज़ा (अ), के नूर ए नज़र और सुकून ए दिल के मुबारक दिन के तौर पर एक यादगार दिन है। इस खुशी के मौके पर, मैं अपने सभी दोस्तों को, खासकर इमाम ज़माना (अ) को दिल से बधाई देता हूँ।
छोटी ज़िंदगी, बड़ी सेवाएँ और शानदार नैतिक हैसियत और पद:
नौवें इमाम, जिनका नाम मुहम्मद है, कुन्नियत अबू जाफ़र और सबसे मशहूर उपाधी तक़ी और जवाद हैं, 10वीं रजब को और एक रिवायत के मुताबिक, 19वीं रमज़ान को साल 195 हिजरी में मदीना में पैदा हुए। उनके पिता, हज़रत इमाम अली इब्न मूसा अल-रज़ा (अ) बा इज़्ज़त इंसान थे, जबकि उनकी माँ सबीका एक बहुत नेक औरत थी, जिन्हें इमाम अल-रज़ा (अ) खैज़रान के नाम से याद करते थे। उन्हें नैतिक गुणों के मामले में अपने समय की एक बेहतरीन औरत माना जाता था। इमाम अल-रज़ा (अ) अपनी पत्नी को पवित्रता, पवित्रता और ऊँचे नैतिक मूल्यों वाली बताते थे।¹
इमाम जवाद (अ) की कम पहचान के कारण:
ऐतिहासिक रूप से, इमाम जवाद (अ) की तुलना में कम पहचान के दो मुख्य कारण बताए जाते हैं। पहला कारण उनकी कम उम्र है; उन्होंने आठ साल की उम्र में इमाम का पद संभाला और पच्चीस साल की उम्र में शहीद हो गए।² दूसरा कारण वह खास ऐतिहासिक समय है जिसमें अब्बासि खिलाफत अंदरूनी कमज़ोरियों और राजनीतिक झगड़ों से जूझ रही थी, खासकर अल-मामून और अल-मोअतसिम के समय में। इसकी जटिलताएँ इस दौर ने इमाम (अ) के सामाजिक और मिशनरी कामों को सीमित कर दिया।
नैतिक और पढ़ाई-लिखाई के गुण:
इमाम जवाद (अ) पैगंबर के नैतिक मूल्यों के एक परफ़ेक्ट उदाहरण थे। अच्छे नैतिक मूल्य, सहनशीलता, विनम्रता और क्षमा करना उनके खास गुण थे। पवित्र कुरान ने पैगंबर (स) के नैतिक मूल्यों को अच्छाई का एक मॉडल बताया है, और घराने के इमाम (अ) इस नैतिक विरासत के ट्रस्टी थे। ⁴
ज्ञान के क्षेत्र में भी इमाम जवाद का स्थान असाधारण है। अपनी कम उम्र के बावजूद, वह दुनियावी ज्ञान वाले व्यक्ति थे और उन्होंने अपने समय के महान विद्वानों के साथ बहस में उल्लेखनीय सफलताएँ हासिल कीं। शिया मान्यता के अनुसार, यह इल्म ए इलाही द्वारा पैगंबर (स) से अमीरुल मोमेनीन (अ) तक और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी इमामों (अ) तक पहुँचाया गया। ⁵
तक़वा, इबादत और आज़ादी:
इमाम जवाद (अ) तक़वा और परहेज़गारी की मिसाल थे। इबादत, खुदा को याद करना और लंबे सजदे उनकी खुशनसीब ज़िंदगी का हिस्सा थे। साथ ही, वह आज़ादी और आज़ादी की निशानी थे और कभी ज़ुल्म और ज़बरदस्ती के आगे नहीं झुके। यह खूबी अहल-अल-बैत (अ.स.) के सभी इमामों में आम है। ⁶
इमाम जवाद (अ) के चमत्कार:
इमाम जवाद (अ) का जन्म अपने आप में एक बड़ा भगवान का चमत्कार था। इमाम रज़ा (अ) ने कई मौकों पर उन्हें इस्लाम का सबसे खुशनसीब बच्चा कहा है। ⁷ इसी तरह, कम उम्र में इमामत का पद मिलना और विद्वानों की बहसों में उनकी ज़बरदस्त कामयाबी उनकी इमामत की सच्चाई का साफ़ सबूत है, ठीक वैसे ही जैसे ईसा (अ) का उदाहरण पिछले नबियों में मिलता है।
शिष्य और वैज्ञानिक असर:
अपनी छोटी ज़िंदगी के बावजूद, इमाम जवाद (अ) ने ऐसे जाने-माने शिष्यों को ट्रेनिंग दी जिन्होंने इस्लामी साइंस और ज्ञान को बढ़ावा दिया। हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी (अ), अली बिन महज़्यार अहवाज़ी (र), फ़ज़्ल बिन शाज़ान नेशापुरी (र) और देबल ख़ुज़ाई (र) उनके जाने-माने शिष्यों में से हैं। ⁸
यह ध्यान देने वाली बात है कि न सिर्फ़ शिया हदीस के जानकारों ने बल्कि सुन्नी विद्वानों ने भी इमाम जवाद (अ) से हदीसें सुनाई हैं, जिनमें ख़तीब बगदादी और दूसरे हदीस के जानकारों के नाम काबिले-तारीफ़ हैं। ⁹
शहादत और रौज़ा:
अब्बासि ख़लीफ़ा मामून ने अपनी बेटी उम्म फ़ज़्ल की शादी राजनीतिक मकसद से इमाम जवाद (अ) से की थी, लेकिन वह इस तरीके से अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। मामून की मौत के बाद, मोअतसिम अब्बासी के आदेश पर, इमाम (अ) को बगदाद बुलाया गया, जहाँ उन्हें 220 हिजरी में ज़हर देकर शहीद कर दिया गया। ¹
उनका पवित्र मज़ार आज भी वहीं है। काज़मैन (बगदाद) में उनके परदादा, हज़रत इमाम मूसा काज़िम (अ) के बगल में, जो दुनिया भर के मानने वालों के लिए भक्ति का केंद्र और ज़रूरतों का ज़रिया है।
""سلام الله علیه یوم وُلد و یوم استشهد و یوم یُبعث حیّا" जिस दिन आप पैदा हुए, जिस दिन आप शहीद हुए, और जिस दिन आप फिर से ज़िंदा किए जाएँगे, उस दिन आप पर शांति हो।"
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रेफरेंस
1. शेख मुफ़ीद, अल-इरशाद
2. शेख तूसी, तारीख अल-आइम्मा
3. आगा बुज़ुर्ग तेहरानी, अल-जरीया एला तसानीफ़ अल शरीया
4. पवित्र कुरान, सूर ए अहज़ाब: 21
5. शेख कुलैनी, अल-काफ़ी
6. अल्लामा बरकी, अल-महासिन
7. शेख सदूक, ओयून अख़बार अल-रज़ा
8. फ़ज़्ल इब्न शाज़ान, हदीसें भेजी गईं
9. खतीब बगदादी, तारीख अल-बगदादी
10. इब्न शहर आशोब, मनक़िब अल-अबी तालिब
इमाम जवाद (अ); इल्म, तक़वा और मोज्ज़ा ए इमामत
इमाम मुहम्मद तक़ी (अ) अहले-बैत अतहार (अ) की इस चमकती हुई कड़ी का नाम है, जिन्होंने कम उम्र में इमामत का पद हासिल किया और ज्ञान, तक़वा और शान से सच्चाई को ज़ाहिर किया, और मुस्लिम उम्माह के लिए मार्गदर्शन और समझ का एक रोशन चिराग बन गए।
नसीम-ए-सहर कुरान की आवाज़, इस ऊंचे दर्जे के ईश्वरीय तोहफ़े ने आसमान को जलन दी, जिसकी महानता पर ब्रह्मांड एक क़सीदा गाता है। वह धन्य हस्ती जिसका ठिकाना गरीबों की उम्मीदों का पवित्र केंद्र, अनाथों की पनाह और कैदियों के लिए सुरक्षा की जगह है। यह वह इज़्ज़त का घर है जहाँ इंसानियत को बचाने के लिए इंसानियत के रूप में अचूकता का शरीर प्रकट हुआ।
अहले-बैत अतहार (अ) वे पवित्र लोग हैं जो बनाने वाले और दुनिया के बीच एक मज़बूत धागा हैं। ये पवित्र लोग खुदा की चमकती हुई रोशनी हैं, सितारों की महफ़िल का प्यार का काबा हैं, जहाँ ज्ञान और सच्चाई के प्यासे लोग तवाफ़ करते हुए देखे जाते हैं। यह वह सेंटर है जहाँ तहज़ीब और सभ्यता पक्की होती है और घमंड की दुनिया शिष्य के घुटने टेक देती है।
इन सज्जनों का ज्ञान उस हमेशा रहने वाले इंसान से जुड़ा है जो हमेशा से है और हमेशा रहेगा। ये लोग हर रुके हुए रास्ते के लिए मुक्ति का दरवाज़ा हैं। ज़ुल्म और हिंसा, कैद और मुश्किलों को अपनाते हुए, वे मुस्लिम उम्मा के लिए सच के शब्द का झंडा ऊँचा रखते हैं। जेलों की अंधेरी कोठरियों से, उन्होंने इस्लाम की आवाज़ पूरी दुनिया तक पहुँचाई, लेकिन ज़ुल्म और ज़ुल्म की हवाएँ कभी भी उनकी मज़बूती को कम नहीं कर सकीं। ये वे लोग हैं जो इस्लाम के लिए अपना वजूद कुर्बान कर देते हैं, जिनकी महानता बुलंदियों के आसमान को छूती है।
उनकी आसमानी हस्ती हमारी समझ और समझ से परे है। उनकी खुशी अल्लाह तआला की खुशी का पर्याय है, और उनके गुणों और अच्छाइयों का सागर हर ज्ञान के प्यासे के लिए एक पनाह है।
इमाम मुहम्मद तकी (अ) के खुशनुमा जन्म से इमाम अली रज़ा (अ) को खास सुकून मिला, क्योंकि उस समय इमाम रज़ा (अ) की उम्र चालीस साल से ज़्यादा हो चुकी थी और उनके कोई बच्चे नहीं थे, जो उस समय के शियाओं के लिए चिंता की बात थी। वह लगातार इमाम के दरबार में आते और दुआ मांगते। इमाम रज़ा (अ.स.) उन्हें दिलासा देते और कहते:
“दुनिया का रब मुझे एक बेटा देगा जो मेरा वारिस होगा और मेरे बाद इमाम होगा।”
(बिहार उल-अनवार, भाग 5, पेज 15)
इमाम मुहम्मद तकी (अ.स.) का जन्म 10 रजब 195 हिजरी को हुआ था। उनका मुबारक नाम “मुहम्मद” है, उनका कुन्या “अबू जाफ़र” है और उनके मशहूर टाइटल “तक़ी” और “जवाद” हैं। उनकी माँ का नाम “सबिका” था, जिन्हें इमाम रज़ा (अ) ने “खिज़रान” का टाइटल दिया था। वह पवित्र पैगंबर (स) की पत्नी, श्रीमती मारिया क़ब्तिया (अ) के परिवार से थीं। एक रिवायत में, उन्हें “खैर अल-इमा” के टाइटल से याद किया जाता है, जिसका मतलब है भगवान का सबसे अच्छा बंदा।
(अल-काफ़ी, भाग 1, पेज 323)
इमाम रज़ा (अ) की बहन श्रीमती हकीमा बताती हैं कि जन्म के तीसरे दिन, नवजात ने अपनी आँखें खोलीं, आसमान की ओर देखा, दाएँ और बाएँ देखा और शुद्ध ज़बान पर शहादत के शब्द बोले। जब यह घटना इमाम रज़ा (अ) को सुनाई गई, तो उन्होंने कहा:
“इसके बाद तुम जो देखोगे वह और भी कमाल का होगा।”
(मनक़िब इब्न शहर आशोब, भाग 4, पेज 394)
इमाम रज़ा (अ) ने इमाम मुहम्मद तकी (अ) के बारे में कहा:
“यह शियाओं के किसी भी दूसरे पैदा होने से ज़्यादा खुशनसीब है।”
(इरशाद मुफ़ीद, पेज 299)
इमाम मुहम्मद तकी (अ) ने आठ या नौ साल की उम्र में इमामत का पद संभाला। मुअली बिन अहमद कहते हैं कि इमाम रज़ा (अ) की शहादत के बाद मैं इमाम मुहम्मद तकी (अ) की सेवा में आया और उनके हुस्न और कद को ध्यान से देखने लगा। उस समय इमाम ने कहा:
“ऐ मुअली! अल्लाह ने इमामत के लिए वही सबूत पेश किए हैं जो उसने नबूवत के लिए पेश किए थे।”
फिर उन्होंने यह आयत पढ़ी:
ऐ याह्या, किताब को ताकत से ले और हमने उसे बचपन में ही अक्ल दी थी﴾
(सूर ए मरयम, आयत 12)
इमाम मुहम्मद तकी (अ) नेक थे और लोग उनकी पवित्र पर्सनैलिटी से ठीक हो जाते थे। मुहम्मद इब्न मैमन बताते हैं कि मैं अंधा हो गया था। जब इमाम के मुबारक हाथ ने मेरी आँखों को छुआ, तो मेरी नज़र तुरंत वापस आ गई, और मैं ठीक और सुरक्षित होकर लौटा। (बिहार उल-अनवार, भाग 50, पेज 46)
कर्बला का दूधमोहा बच्चा; जिसने इंसानियत को जगाया
कर्बला के मैदान में छह महीने के हज़रत अली असगर (अ) की शहादत इंसानियत के इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय है जिसने ज़ुल्म और ज़ुल्म के सामने सच्चाई, सब्र और कुर्बानी का हमेशा रहने वाला संदेश दिया और सोई हुई इंसानियत को हिलाकर रख दिया।
लेखक: हाफ़िज़ हैदर अली
अहले-बैत (अ) के इंट्रोडक्शन में जिन हस्तियों को बाब अल-हवाईज का टाइटल दिया गया है, उनमें सबसे कम उम्र के और सबसे अनोखे महान व्यक्ति हज़रत अब्दुल्लाह बिन हुसैन बिन अली इब्न अबी तालिब (अ) हैं। वह नबी और रसूल के खानदान की आँख और चिराग थे और इमाम हुसैन (अ) के बेटे थे। उनका जन्म रजब महीने, 60 हिजरी में हुआ था।
इमाम हुसैन (अ) ने उनका नाम अली रखा क्योंकि इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ) के अनुसार, इमाम हुसैन (अ) को अपने पिता, अमीरुल मोमेनीन (अ) से बहुत प्यार था, और इसी प्यार को दिखाने के लिए उन्होंने अपने सभी बेटों का नाम अली रखा। (1)
हज़रत अली असगर (अ) को अली असगर, तिफ़ल-ए-सगीर, शीर-ख़ार, शिश-महा, बाबुल हवाईज, और तिफ़ल-ए-रज़ी' जैसे टाइटल से भी जाना जाता है।
उनकी आदरणीय माँ
हज़रत अली असगर (अ) की माँ रबाब बिन्त अम्र-ए-क़ैस बिन अदी बिन औस थीं। उनके परिवार को अहले बैत (अ) से बहुत प्यार था। रबाब (स) अपने समय की बहुत नेक और जानी-मानी महिला थीं। इमाम हुसैन (अ) को उनसे बहुत प्यार था, जिसे इतिहास में इन शब्दों में बताया गया है:
"मुझे वह घर पसंद है जिसमें सकीना और रबाब हों।"(2)
जनाब रबाब (स) से इमाम हुसैन (अ) के दो बच्चे हुए: शहज़ादी सकीना (स) और शहज़ादा अली असगर (अ)।
बाबुल हवाईज (अ) की शहादत
बाबुल हवाईज हज़रत अली असगर (अ) को कर्बला की घटना के सबसे खास शहीदों में से एक माना जाता है। उनकी शहादत ने सभी शहीदों की कुर्बानियों पर मुहर लगा दी।
मुहर्रम की 10 तारीख 61 हिजरी को, जब इमाम हुसैन (अ) ने अपने सभी साथियों और मददगारों की कुर्बानी दे दी और टेंट में औरतों, बच्चों और इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ) के अलावा कोई नहीं बचा, तो इमाम हुसैन (अ) ने एक दर्दनाक गुहार लगाई:
"क्या कोई है जो अल्लाह के रसूल (स) के मज़ार की हिफ़ाज़त करे?
क्या कोई है जो हमारे मामले में अल्लाह से डरता है?
क्या कोई मददगार है जो अल्लाह के लिए हमारी मदद के लिए आएगा?
क्या कोई ऐसा सपोर्टर है जो अल्लाह के इनाम की उम्मीद में हमारा साथ देगा?"
यह गुहार सुनकर, टेंट से औरतों और बच्चों की चीखें उठने लगीं। इमाम हुसैन (अ) टेंट की तरफ गए और कहा:
"मेरे बेटे अली (सबसे छोटे) को ले आओ ताकि मैं उसे अलविदा कह सकूं।"
मासूम बच्चा अभी इमाम हुसैन (अ) की गोद में था, तभी बदनसीब हरमाला ने उसे तीर मारकर शहीद कर दिया। इमाम हुसैन (अ) ने हज़रत अली असगर (अ) का खून हाथ में लिया, आसमान की तरफ फेंका और कहा:
"यह मुसीबत मेरे लिए आसान है क्योंकि अल्लाह इसे देख रहा है।" (3)
भले ही हज़रत अली असगर (अ) जंग के मैदान में मुजाहिद बनकर नहीं लड़ सके, लेकिन उन्होंने कर्बला में अपनी मासूम जान के साथ सारी तकलीफें और दर्द सहे। उनकी उम्र सिर्फ़ छह महीने थी।
प्यास और इंसानियत का इम्तिहान
मुहर्रम की सातवीं तारीख से दसवीं तारीख तक हुसैनी कारवां के लिए पानी पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। हज़रत अली असगर (अ) दूसरे बच्चों के साथ तीन दिन तक प्यास की तपिश झेलते रहे, लेकिन यज़ीदी सेना ने इन मासूमों की चीखों पर कोई रहम नहीं दिखाया।
हज़रत अली असगर (अ) की शहादत ने इंसानियत को हिलाकर रख दिया। आज दुनिया में ह्यूमन राइट्स और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए इंटरनेशनल कानून हैं, और बच्चों पर ज़ुल्म की हर लेवल पर बुराई की जाती है। लेकिन यह ऐतिहासिक सच अपनी जगह पर है कि अगर इमाम हुसैन (अ) ने अपने छह महीने के बेटे की कुर्बानी न दी होती, तो लोग हज़रत इस्माइल (अ) की कुर्बानी को भूल गए होते।
इस्माइल (अ) की कुर्बानी का सिलसिला
हज़रत अली असगर (अ) की कुर्बानी सबसे पक्के पैगंबर हज़रत इब्राहिम (अ) की कुर्बानी की सुन्नत का सिलसिला है। अगर कोई पूछे कि हज़रत इस्माइल (अ) और हज़रत अली असगर (अ) की कुर्बानी में क्या फ़र्क है, तो जवाब यह है:
हज़रत इस्माइल (अ) को वेदी पर ले जाने से पहले, हज़रत इब्राहिम (अ) ने उनकी इजाज़त मांगी, जबकि हज़रत अली असगर (अ) ने गर्दन में गोली लगने के बाद एक मासूम मुस्कान के साथ अपनी इजाज़त का ऐलान किया।
हज़रत अली असगर (अ) की नाइंसाफ़ी में हुई हत्या पर, कवि कासिम शब्बीर नक़वी नसीराबादी ने इंसानियत से यह दर्दनाक सवाल पूछा है:
इंसानी इंसाफ़ के बारे में तब तक सोचो जब तक क़यामत न आ जाए!
सिर्फ़ असगर का खून-खराबा क्या है?
सोर्स
1. अल-मलहूफ़, पेज 202
2. मक़ातिल उत तालेबीन, पेज 94
3. खुत्बात ए हुसैन इब्न अली (अ), बातें और खत, मदीना से कर्बला तक, पेज 370
अफ़्रीका को बांटने का प्लान नए तरीके से फिर से लागू किया जा रहा है, शेख ज़कज़ाकी
हमारा संबोधन उन शासकों के लिए है जो दौलत और पद के लिए अपने ही लोगों को मारते हैं। जान लें कि जब आपका काम पूरा हो जाएगा, तो वही लोग आपको मार डालेंगे जिन्होंने आपको इस काम के लिए रखा था। जैसे उन्होंने सद्दाम और गद्दाफ़ी के साथ किया था।
अफ़्रीकी मीडिया ने नाइजीरिया में चल रही घटनाओं और अफ़्रीका, खासकर नाइजीरिया के मामलों में यूनाइटेड स्टेट्स के दखल के संदर्भ में शेख इब्राहिम ज़कज़की का एक ऐतिहासिक भाषण फिर से छापा है।
यह भाषण 25 रजब 1435 AH को, जो 24 मई, 2014 के बराबर है, ज़ारिया शहर में "शहीद दिवस" के मौके पर हज़ारों मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं की मौजूदगी में दिया गया था।
भाषण का टेक्स्ट इस तरह है:
"हम अपने देश में एक नई प्रॉब्लम का सामना कर रहे हैं। मैंने पहले भी अपने भाषण में चेतावनी दी है कि एक बड़ी घटना होने वाली है। यह नई घटना अफ्रीका पर फिर से कब्ज़ा करने के अलावा और कुछ नहीं है।
दुनिया की ताकतों ने कई साल पहले ऐलान किया था कि अगली सदी 'अफ्रीकी सदी' होगी। क्यों? क्योंकि उनके अंदाज़े के मुताबिक, अफ्रीका के पास दुनिया की कुल दौलत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा होगा। इसलिए, उन्होंने अफ्रीका पर फिर से कब्ज़ा करने का फ़ैसला किया है। एक नए तरीके से; जिसे वे खुद 'अफ्रीका का दूसरा बंटवारा' कह रहे हैं।
अफ्रीका के पहले बंटवारे में, यूरोपियन ताकतें—इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पुर्तगाल और बेल्जियम—बर्लिन कॉन्फ्रेंस में इकट्ठा हुईं और अफ्रीका को आपस में बांट लिया। अब वही सीन एक नए रूप में फिर से दोहराया जा रहा है।
यूनाइटेड स्टेट्स ने साफ़-साफ़ ऐलान किया है कि वह अफ्रीका पर फिर से कब्ज़ा करने के लिए 'आतंक के हथियारों' का इस्तेमाल करेगा। आज हम जो देख रहे हैं, वह इस प्लान का लागू होना है।
उन्होंने कहा कि यह सिलसिला लीबिया से शुरू हुआ। अरब देशों के जागने के बाद और मिस्र में पॉपुलर क्रांति, जो पश्चिम के लिए डरावनी थी, उन्होंने लीबिया को तबाह कर दिया, गद्दाफी को मार डाला और देश को सिर्फ़ मार-काट, कबीलाई लड़ाइयों और खून-खराबे के साथ छोड़ दिया, जबकि वे खुद रिसोर्स लूटने में बिज़ी हैं।
लीबिया और नाइजीरिया दोनों के पास हाई-क्वालिटी तेल (स्वीट क्रूड) है। लीबिया का तेल लगभग उनके कब्ज़े में है और नाइजीरिया का तेल भी सालों से ज़ब्त किया हुआ है। वे देश के रिसोर्स लूटने के लिए बस कुछ बेकार मोहरे — एक कठपुतली प्रेसिडेंट, वाइस प्रेसिडेंट, गवर्नर या मिनिस्टर — अपॉइंट करते हैं।
अब वे नए तरीके से देशों पर कब्ज़ा कर रहे हैं। इसीलिए उन्होंने 'माली' पर कब्ज़ा किया। किडाल और गाओ में झड़पों की खबरें हैं। अचानक हथियारबंद लोग आते हैं, अंधाधुंध गोलियां चलाते हैं और फिर उन्हें 'इस्लामिक जिहादी' कहा जाता है।
हालांकि, सच तो यह है कि माली में सोने के बड़े भंडार मिले हैं; वही सोना जिसके बारे में पुराने ज़माने से कहानियां सुनाई जाती रही हैं; माली के ऐतिहासिक राजा मनसा मूसा का सोना, जिनकी दौलत ऐतिहासिक है।
अब जबकि यह दौलत मिली, तो माली पर कब्ज़ा करने का एक सीन तैयार किया गया। कहा गया कि अल्जीरिया के ग्रुप्स ने आधे से ज़्यादा माली पर कब्ज़ा कर लिया और 'अज़ावाद' नाम की सरकार बना ली; फिर फ्रांस आया और आतंकवाद से लड़ने का नाटक किया, हालाँकि असली मकसद सोना लूटना था।
सेंट्रल अफ्रीका में भी 'सेलेका' नाम के हथियारबंद ग्रुप्स के बीच झड़प के बहाने कत्लेआम शुरू कर दिया गया। फिर मुसलमानों (खासकर फुलानी चरवाहों) का कत्लेआम करने के लिए ईसाई मिलिशिया 'एंटी-बालाका' को बनाया गया। हालाँकि असली टारगेट हीरे थे।
सेंट्रल अफ्रीका में कहा गया कि 'माइकल ओडोफिया' नाम के एक 'मुस्लिम लीडर' ने मिलिट्री तख्तापलट किया था! क्या आपने कभी 'माइकल' नाम के किसी मुस्लिम के बारे में सुना है? यह सिर्फ़ मिलिट्री दखल और मुसलमानों के कत्लेआम को सही ठहराने के लिए एक साफ़ झूठ है।
इसी मैप का इस्तेमाल साउथ सूडान और नाइजीरिया में बोको हराम में कबीलों के बीच मतभेद भड़काने के लिए किया जाता है, जिसे तथाकथित प्रोजेक्ट के ज़रिए दोहराया जाता है; एक ऐसा प्रोजेक्ट जिसे कई अमेरिकी एनालिस्ट भी वेस्टर्न सिक्योरिटी एजेंसियों का काम मानते हैं।
स्कूल से लड़कियों की किडनैपिंग यह भी एक सरकारी प्रोजेक्ट था। सभी परिवारों को अच्छी तरह पता था कि उनके बच्चों को किसने किडनैप किया है। इसके लिए सीधे तौर पर जोनाथन सरकार ज़िम्मेदार थी। विरोध बेकार है; अगर सरकार है, तो सरकार की मांग करो; अगर बोको हराम है, तो वह कहाँ है? वह भी उसी सरकारी मिलिट्री बेस के कंट्रोल में है।
बोको हराम असल में है ही नहीं; यह एक बड़ा झूठ है। अगर तुम्हारा मकसद ट्रेड करना है, तो हमारे साथ ट्रेड करो, लेकिन हमारे धर्म को धोखे का ज़रिया मत बनाओ और यह मत दिखाओ कि तुम हमें बचाने आए हो, जब तुम लूटने आए हो।
अब असली टेररिस्ट, यूनाइटेड स्टेट्स, मैदान में आ गया है। वही प्लान जो अफ़गानिस्तान और इराक में लागू किया गया था, अब यहाँ भी लागू किया जा रहा है। बिन लादेन और फ्राइडे ऑफ़ आर्म्स के बहाने उन्होंने देशों को बर्बाद कर दिया और अभी भी उनके रिसोर्स लूट रहे हैं।
वही प्लान नाइजीरिया में लागू किया जा रहा है; ज़मफ़ारा, बर्नीन, ग्वारी, ज़ारिया, सोकोटो और बोर्नो में सोने, यूरेनियम और कीमती मेटल के लिए।
हम उन शासकों से बात कर रहे हैं जो अपने ही लोगों को मार रहे हैं। पैसे और पद के लिए। जान लो कि जब तुम्हारा काम खत्म हो जाएगा, तो वही लोग जिन्होंने तुम्हें काम पर रखा था, तुम्हें भी मार डालेंगे; जैसा उन्होंने सद्दाम और गद्दाफी के साथ किया था।
यह संकट सीधे हमें टारगेट कर रहा है। इसका सामना करना हमारा धार्मिक कर्तव्य है। जो कोई भी इस तरह मारा जाता है, वह शहीद है। हमारे पास अपना हथियार है; विश्वास, जागरूकता और विरोध का हथियार।
हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें अगले शहीदों के दिन तक सुरक्षित रखे, हमारी मदद करे और
अपने दुश्मनों पर जीत दिलाओ।
और मुहम्मद और उनके परिवार पर शांति हो, और तुम पर शांति हो, और अल्लाह की रहमत और दुआएं तुम पर हों।”
सोर्स: शेख इब्राहिम ज़कज़की पब्लिशिंग सेंटर













