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अल-मायादीन के हवाले से सीरिया में लोकल लोगों ने बताया कि ISIS के लोगों ने दीर अलज़ोर में जुलानी सरकार के एक चेकपॉइंट पर हमला किया हैं।

अल-मायादीन के हवाले से, सीरिया के लोकल सोर्स ने बताया कि ISIS टेररिस्ट ऑर्गनाइज़ेशन से जुड़े एक ग्रुप ने दीर अल ज़ोर के पूर्वी इलाके में मौजूद अल बसीरा शहर में जौलानी सरकार के एक चेकपॉइंट को निशाना बनाया।

अल-अखबरिया सीरिया ने यह भी बताया कि अनजान लोगों ने रक्का के उत्तर में मौजूद ताल अब्याद शहर के आस-पास जौलानी सरकार से जुड़े एक आदमी की हत्या कर दी। कल, सीरिया के सोर्स ने भी सीरियाई सिक्योरिटी फोर्स पर ISIS के हमले की खबर दी।

सीरियन टीवी को बताया,उत्तरी सीरिया में रक्का शहर के पश्चिमी एंट्रेंस पर सबाहिया चेकपॉइंट पर ISIS के लोगों के हमले में एक सिक्योरिटी फ़ोर्स मेंबर मारा गया और दूसरा घायल हो गया।

यह तब हुआ जब ISIS ने पहले एक कड़े शब्दों वाला बयान जारी किया था जिसमें उसने नई सीरियाई सरकार को “सेक्युलर और धर्म से भटकी हुई” सरकार बताया था और सीरिया की ज़मीन को साफ़ करने के लिए उसके ख़िलाफ़ जंग को ज़रूरी माना था।

किरमानशाह में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि ने इस बात की तरफ़ इशारा करते हुए कि इंसान हर वक़्त ख़ुदा को याद रखे और उसका दिलो-जान इस एहसास से मुतवज्जेह रहे कि वह परवरदिगार की बारगाह में मौजूद है इबादत की असल हक़ीक़त ख़ुदा से राब्ता क़ायम करना और हुज़ूर-ए-कल्ब की हालत में है।

किरमानशाह से, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन ग़फ़ूरी ने कल शहर किरमानशाह के इलाक़ा फ़रहंगियान फ़ाज़ 2 में वाक़े मस्जिद सलमान फ़ारसी में नमाज़-ए-ज़ुहर व अस्र नमाज़ियों के दरमियान अदा की। इसके बाद उन्होंने इबादत की हक़ीक़त और इंसानी ज़िंदगी में नमाज़ के मुक़ाम पर तफ़सीली ख़िताब किया।

उन्होंने बयान किया कि इबादत की असल रूह हुज़ूर-ए-क़ल्ब और हालते-ज़िक्र है। यानी इंसान हर वक़्त ख़ुदा को याद रखे और उसका दिल इस एहसास से सरशार रहे कि वह अपने रब की हाज़िरी में खड़ा है यही असल इबादत है।

इमाम-ए-जुमआ किरमानशाह ने कहा कि अल्लाह तआला ने इबादत को इसलिए वाजिब क़रार दिया है ताकि बंदों और अपने दरमियान राब्ता बरक़रार रहे। यह राब्ता मुनाजात की तरह है, जिसमें इंसान अपने ख़ालिक़ से दिल की बातें कर सकता है और अपनी तमाम फ़िक्रों और मसाइल को उसके सामने बयान कर सकता है।

हुज्जतुल इस्लाम ग़फ़ूरी ने पाँच वक़्त की नमाज़ को रूहानी ज़िंदगी का ज़रिया क़रार देते हुए कहा, जिस तरह जिस्म को साँस लेने की ज़रूरत होती है, उसी तरह रूह को भी “साँस” की ज़रूरत है, और रूह की साँस ख़ुदा से राब्ता और उससे गुफ़्तगू है।

उन्होंने नमाज़ में हुज़ूर-ए-क़ल्ब की अहमियत पर रिवायात का हवाला देते हुए कहा, अगर नमाज़ तवज्जोह और मुकम्मल शराइत के साथ अदा की जाए तो वह नमाज़गुज़ार की हिफ़ाज़त की दुआ करती हुई उसकी तरफ़ लौटती है, लेकिन अगर ग़फ़लत के साथ पढ़ी जाए तो वह उसे ज़ाए करने पर मलामत भी करती है।

इमाम ए जुमआ किरमानशाह ने अपने ख़िताब के आख़िर में माहे मुबारक रमज़ान की आमद की तरफ़ इशारा करते हुए कहा,यह महीना फ़य्यूज़ाते-इलाही से इस्तिफ़ादा करने का इस्तिसनाई मौक़ा है। दुआओं, मुनाजातों और नफ़्ल इबादतों को पूरे तवज्जोह के साथ अंजाम देना चाहिए ताकि इंसान उनकी बरकतों और समरात से बहरेयाब हो सके।

ओमान के विदेश मंत्री ने कन्फर्म किया है कि ईरान-US बातचीत का तीसरा राउंड गुरुवार को जिनेवा में होगा।

ओमान के विदेश मंत्री ने कन्फर्म किया है कि ईरान-US बातचीत का तीसरा राउंड गुरुवार को जिनेवा में होगा।

ओमान के विदेश मंत्री ने रविवार शाम को घोषणा की, मुझे यह कन्फ़र्म करते हुए खुशी हो रही है कि यूनाइटेड स्टेट्स और ईरान के बीच बातचीत अगले गुरुवार को जिनेवा में होगी।” पांच दिन पहले, ईरान और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच नई न्यूक्लियर बातचीत का दूसरा राउंड ओमान की मध्यस्थता से स्विट्जरलैंड के जिनेवा में हुआ था।

आज, ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराकची ने कहा कि नई बातचीत गुरुवार को जिनेवा में होगी।

ओमान ने पहले भी इस्लामिक रिपब्लिक के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर इनडायरेक्ट बातचीत होस्ट की है और पिछले हफ़्ते जिनेवा में बातचीत के नए राउंड को आसान बनाया। व्हाइट हाउस ने अभी तक इन रिपोर्ट्स पर ऑफिशियली कमेंट नहीं किया है कि बातचीत का नया राउंड हो रहा है।

यूनाइटेड स्टेट्स ने हाल के महीनों में इस्लामिक रिपब्लिक पर डील मानने का दबाव बढ़ा दिया है, जिससे मिडिल ईस्ट में दशकों में सबसे बड़ी U.S. मिलिट्री प्रेजेंस तैनात हो गई है। US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को चेतावनी दी कि इस्लामिक रिपब्लिक की जगहों के खिलाफ लिमिटेड मिलिट्री एक्शन एजेंडा में हो सकता है।

वॉशिंगटन ने ऐलान किया है कि इस्लामिक रिपब्लिक को न सिर्फ़ न्यूक्लियर हथियार नहीं बनाने चाहिए, बल्कि उन्हें बनाने की कैपेसिटी भी नहीं रखनी चाहिए, और यूरेनियम को एनरिच करना जारी नहीं रखना चाहिए। मिसाइल प्रोग्राम, प्रॉक्सी टेररिस्ट ग्रुप्स को सपोर्ट, और ईरान में लोगों पर ज़ुल्म भी US द्वारा एग्रीमेंट के लिए तय किए गए दूसरे एरिया हैं।

जामेअ-ए-मुदर्रिसीन हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के सदस्य आयतुल्लाह रज़ा उस्तादी ने नहजुल बलाग़ा की एतेबारियत के ख़िलाफ़ उठाए गए शुब्हात को तारीखी शवाहिद की रौशनी में मुस्तरद करते हुए कहा कि इस अज़ीम किताब के मुरत्तिब सैयद रज़ी न सिर्फ़ अदीब और शायर थे, बल्कि एक मुमताज़ फ़क़ीह और अज़ीम मुफस्सिर ए क़ुरआन भी थे।

जामेअ ए मुदर्रिसीन हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के रुक्न आयतुल्लाह रज़ा उस्तादी ने नहजुल बलाग़ा की सनद और एतेबार के ख़िलाफ़ पेश किए गए शुब्हात को तारीखी दलाइल के साथ रद्द करते हुए तअकीद की कि इस किताब के मुरत्तिब सैयद रज़ी को महज़ अदबी शख़्सियत क़रार देना दुरुस्त नहीं।

नहजुल बलाग़ा के सिलसिले में मुनअक़िद सिलसिला-वार नशिस्तों की इफ़्तिताही तक़रीब में मुहक़्क़िक़ीन और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कलाम से दिलचस्पी रखने वाले अफ़राद की मौजूदगी में आयतुल्लाह रज़ा उस्तादी ने ख़िताब किया। इस नशिस्त का मक़सद नहजुल बलाग़ा पर तहक़ीक़ी मबानी को वाज़ेह करना था।

सैयद रज़ी की इल्मी शख़्सियत;

आयतुल्लाह उस्तादी ने अपनी गुफ़्तगू के पहले हिस्से में सैयद रज़ी की शख़्सियत से मुतअल्लिक़ एक तारीखी ग़लत-फ़हमी की इस्लाह करते हुए कहा कि आम तौर पर उन्हें सिर्फ़ शायर और अदीब समझा जाता है, जबकि हक़ीक़त यह है कि वह अपने ज़माने के जलीलुल-क़द्र फ़क़ीह और मुफस्सिर-ए-क़ुरआन थे।

उन्होंने सैयद रज़ी के फ़िक़ही उस्तादों, उनके फ़तावा और क़ुरआन करीम की दस जिल्दों पर मुश्तमिल तफ़्सीर की तालीफ़ का हवाला देते हुए कहा कि नहजुल बलाग़ा को मुरत्तिब करने में उनकी इल्मी जामेअियत सब पर साबित है।

नहजुल बलाग़ा की सनद और शुब्हात का रद्द
आयतुल्लाह उस्तादी ने इस दावे को भी रद्द किया कि नहजुल बलाग़ा सैयद रज़ी की तरफ़ मंसूब नहीं है। उन्होंने तारीखी शवाहिद पेश करते हुए कहा कि सैयद रज़ी के अपने हाथ से लिखे हुए नुस्ख़े उनकी वफ़ात के कई सदियों बाद तक मौजूद रहे, जिन्हें बुज़ुर्ग उलेमा ने देखा, जिनमें इब्न अबिल-हदीद भी शामिल हैं। यह अम्र खुद इस किताब की सेहत और इंतिसाब की ताईद करता है।

उन्होंने किताब के “मुरसल” होने के शुब्हे के जवाब में वज़ाहत की हैं कि सैयद रज़ी ने अदबी उस्लूब को मलहूज़ रखते हुए असनाद को हज़्फ़ किया, लेकिन बाद के उलेमा ने मुस्तदरकात तहरीर करके इन ख़ुत्बात और मक़तूबात की असनाद को इस्तिख़राज और मुरत्तिब किया है।

मशहूर शरूह पर तनक़ीदी नज़र:

आयतुल्लाह उस्तादी ने अहल-ए-सुन्नत की दो मशहूर शरहों का जायज़ा लेते हुए कहा कि अगरचे मुहम्मद अब्दुह ने नहजुल बलाग़ा को आलम-ए-अरब में मुतआरिफ़ कराने में अहम किरदार अदा किया, लेकिन उनके तरीक़ा-ए-कार पर संजीदा एतराज़ात मौजूद हैं। उनके बक़ौल, जहाँ कहीं अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम का कलाम अहल-ए-सुन्नत अक़ाइद से हम-आहंग न था, वहाँ उन्होंने या तो उसमें तबदीली की या उसे ग़ैर-मुस्तनद क़रार दिया।

इसी तरह इब्ने अबिल हदीद की बीस जिल्दों पर मुश्तमिल शरह को अदबी और तारीखी लिहाज़ से निहायत वक़ीअ क़रार देते हुए कहा कि कलामी और एतिक़ादी पहलू से उसमें तअस्सुबात और इनहिराफ़ात पाए जाते हैं, लिहाज़ा उसका मुतालिआ तनक़ीदी नज़र के साथ होना चाहिए।

कलाम-ए-अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की अज़मत:

आयतुल्लाह उस्तादी ने अकाबिरिन के अक़वाल का हवाला देते हुए कहा कि नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कलाम फ़साहत व बलाग़त के आला तरीन दर्जे पर फ़ाइज़ है। उन्होंने कहा कि यह कलाम ख़ालिक़ के कलाम से एक दर्जा कम और मख़लूक़ के कलाम से बुलंद-तर है, जो उसकी बे मिसाल अज़मत का वाज़ेह सुबूत है।

इंसान के जीवन में दूसरों के साथ लेन देन बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इंसान के सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने में सामाजिक संबंध बहुत महत्वपूर्ण हैं। इंसान एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक होने की मांग यह है कि इंसान अपने सामाजिक दायित्वों को पहचाने और उसे ठीक तरह से अंजाम दे। ईश्वरीय धर्म इस्लाम ने भी इस महत्वपूर्ण विशेषता पर बहुत ध्यान दिया है। इस्लाम धर्म के बहुत से आदेश सामाजिक संबंधों से विशेष हैं।

इंसान के जीवन में दूसरों के साथ लेन देन बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इंसान के सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने में सामाजिक संबंध बहुत महत्वपूर्ण हैं। इंसान एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक होने की मांग यह है कि इंसान अपने सामाजिक दायित्वों को पहचाने और उसे ठीक तरह से अंजाम दे। ईश्वरीय धर्म इस्लाम ने भी इस महत्वपूर्ण विशेषता पर बहुत ध्यान दिया है। इस्लाम धर्म के बहुत से आदेश सामाजिक संबंधों से विशेष हैं।

चूंकि अनुचित व्यवहार से इंसान के सामाजिक संबंध खराब हो सकते हैं और वह दिग्भ्रमित हो सकता है इसलिए महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने पवित्र कुरआन की बहुत सी आयतों में अनुचित कार्यों की ओर संकेत किया है और उन्हें स्वस्थ समाज एवं सामाजिक संबंधों के विघटन का महत्वपूर्ण कारण बताया है। इस आधार पर इस्लाम धर्म की बहुत सी शिक्षाओं में उचित और अनुचित कार्यों को बयान किया  गया है और जो कार्य उचित नहीं हैं उनसे रोका गया है।

जैसाकि आप जानते हैं कि सामाजिक संबंधों का जारी व बाकी रहना आपसी समझ बूझ, प्रेम और एक दूसरे के सम्मान पर निर्भर है। इस आधार पर मनुष्य वह व्यवहार को अंजाम देने पर बाध्य है जिसे वह चाहता है कि दूसरे भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करें।

अगर वह सच्चाई को पसंद करता है और वफादारी को पसंद करता है और अपने वचनों के प्रति कटिबद्ध रहना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह स्वयं भी इन चीज़ों पर अमल करे और उसके बाद इस बात की अपेक्षा करे कि दूसरे भी उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे।

अगर उसे यह अपेक्षा है कि लोग उसके साथ भलाई से पेश आयें तो वह स्वयं दूसरों के साथ भलाई से पेश आये। अगर वह यह चाहता है कि कोई उस पर अत्याचार न करे तो वह स्वयं भी दूसरों पर अत्याचार न करे दूसरों के अधिकारों का सम्मान करे और इस संबंध में उसे अग्रणी होना चाहिये।

पवित्र कुरआन ने इस बात की आलोचना की है कि इंसान सामाजिक दायित्वों का निर्वाह न करे और दूसरों से उसे अंजाम देने की अपेक्षा रखे। पवित्र कुरआन उसे ग़ैर बुद्धिमत्ता का चिन्ह मानता है। पवित्र कुरआन के सूरये बक़रह की ४४वीं आयत में महान ईश्वर कहता है” क्या लोगों को अच्छे कार्य का आदेश देते हो और स्वयं को भूल गये हो जबकि तुम किताब पढ़ते हो क्या तुम लोग सोचते नहीं?

तो इस बात को हमें जान लेना चाहिये कि समाज के हर सदस्य पर कुछ दायित्व हैं जिसे हर व्यक्ति को चाहिये कि उसे अंजाम दे और उस चीज को अंजाम देना जिसे वह दूसरों से अपेक्षा रखता है यह समाज के हर व्यक्ति का न्यूनतम अधिकार है। हज़रत इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम से मोमिन का मोमिन पर अधिकार के बारे में पूछा गया तो आपने फरमायाः तुम्हारे मोमिन भाई का तुम पर न्यूनतम अधिकार यह है कि तुम जो चीज़ अपने लिए पसंद नहीं करते हो उसे उसके लिए भी पसंद न करो

जिन चीजों को इस्लाम और समाज पसंद नहीं करता है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं जैसे दूसरों को कष्ट पहुंचाना, लोगों के मध्य फूट डालना, उपहास करना, असंतुलित बात करना, दूसरों पर आरोप लगाना, कंजूसी, दूसरों की जासूसी करना, घमंड, अत्याचार, विश्वासघात और दूसरों के बारे में ग़लत विचारों की ओर संकेत किया जा सकता है और ये वह चीज़ें हैं जिनकी और पवित्र कुरआन की विभिन्न आयतों में संकेत किया गया है।

दूसरी ओर महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में उनमें से कुछ चीज़ों को भी बयान किया है जिसे इंसान को समाज में अंजाम देना चाहिये। जैसे अमानत का अदा करना, वादे का वफा करना, सच बोलना, अच्छे कार्यों में एक दूसरे की सहायता करना, परोपकार, विन्रमता, सुशील व्यवहार, न्याय,दूसरों को क्षमा कर देना और विचार विमर्श।

इन चीज़ों को विचार करने से भलिभांति समझा जा सकता है कि इन चीज़ों का ध्यान रखना सामाजिक संबंधों के बेहतर बनाने में कितना प्रभावी है। उदाहरण स्वरूप जो इंसान दूसरों की गलतियों की अनदेखी कर देता है उसे माफ कर देता है यह भी भलाई व परोपकार है और इस कार्य से ग़लती करने वाले व्यक्ति के लिए यह संभावना उत्पन्न हो जाती है कि वह अपने को सुधारने का प्रयास करता है।

दूसरे शब्दों में दूसरों की ग़लतियों को माफ करने वाला ग़लती करने वाले व्यक्ति को परिपूर्णता का मार्ग तय करने के लिए अवसर प्रदान करता है और उसका प्रभाव स्वयं माफ करने वाले पर भी पड़ता है। क्योंकि इंसान एक बंद वातावरण में नहीं रहता है और भौतिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति सामाजिक संबंधों के माध्यम से एक स्वाभाविक चीज़ है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

इस्लाम के अनुसार इंसान के सामाजिक संबंध को सोच विचार के चरण में प्रेम, शुभ चिन्ता और सदभावना पर आधारित होना चाहिये। इसका अर्थ यह है कि एक मुसलमान को अपने दूसरे मुसलमान भाई के संबंध में अच्छा विचार रखना चाहिये। अपने विचार में शुभ चिन्ता, नसीहत, दोस्ती और भलाई को जन्म दे और उनके विरूद्ध षडयंत्र रचने से परहेज़ करे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस संदर्भ में फरमाते हैं ईश्वर इस बात को पसंद करता है कि इंसान अपने जैसे दूसरे इंसानों के बारे में अच्छा खयाल रखे

इस्लाम ने अमल के चरण में भी दायित्वों को सामाजिक संबंधों का आधार बनाया है। इसका मूल आधार महान ईश्वर पर ईमान और इंसान की आत्मा की मजबूती है। इस्लाम धर्म की शिक्षाएं इस संबंध में मनुष्य की प्रकृति व प्रवृत्ति से इस सीमा तक सूक्ष्म व समन्वित हैं कि अगर उस पर अमल किया जाये तो मानव जीवन की तस्वीर बदल सकती है।

महान ईश्वर ने एक इंसान का दूसरे इंसान से दोस्ती का सबसे अच्छा मापदंड ईमान बताया है। क्योंकि मोमिनों के गैर मोमिनों से संबंधों से नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इंसान जिस सीमा तक प्रभाव डाल सकता है उसी सीमा तक दूसरों से प्रभाव स्वीकार भी सकता है। इस आधार पर दोस्ती के लिए ईमान की शर्त पर बल दिया जाता है। उदाहरण स्वरूप पवित्र कुरआन के सूरये नेसा की ४४वीं आयत में हम पढते हैं” हे ईमान लाने वालों मोमिनों के बजाये काफिरों से दोस्ती मत करो क्या तुम ईश्वर के समक्ष अपने विरुद्ध स्पष्ट निशानी उपलब्ध करना चाहते हो”

सामाजिक व्यवहार एवं लेनदेन का मूलभूत आधार यह है कि इंसान दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार व बर्ताव करे। न्याय का ध्यान रखे जो चीज़ अपने लिए पसंद करता है वही चीज़ दूसरों के लिए भी पसंद करे और जो चीज अपने लिए पसंद नहीं करता वह चीज दूसरों के लिए भी पसंद नहीं करता लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करे और उनके मामलों पर ध्यान दे।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने जेष्ठ सुपुत्र हज़रत इमाम हसन के नाम वसीयत के एक भाग में कहते हैं” स्वयं को अपने और दूसरों के बीच मापदंड बनाओ जो चीज अपने लिए पसंद करते हो वही चीज दूसरों के लिए पसंद करो और जिस चीज को तुम अपने लिए पसंद नहीं करते उसे दूसरों के लिए भी पसंद मत करो। दूसरों पर अत्याचार न करो जिस तरह तुम यह पसंद नहीं करते कि तुम पर अत्याचार किया जाये और दूसरों के साथ अच्छाई करो जिस तरह तुम यह चाहते हो कि तुम्हारे साथ अच्छाई की जाये।

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम भी लोगों के साथ संबंध के बारे में फरमाते हैं लोगों के साथ मिलो जुलो उनकी सभाओं में भाग लो लोगों के कार्यों में उनकी सहायता करो अलग थलग न हो जाओ और समाज से कटो नहीं और लोगों से उस तरह बात करो जिस तरह ईश्वर ने कहा है कि लोगों से अच्छी तरह बात करो”

चूंकि उठना बैठना और दोस्ती का इंसान के व्यक्तित्व के निर्माण पर सीधा प्रभाव पड़ता है इसलिए इस्लाम ने कुछ लोगों के साथ उठने बैठने से मना किया है। जैसे अत्याचारी, अन्यायी, तुच्छ, पापी व अपराधी, कंजूस, भ्रष्ठ, झूठे,  अज्ञानी और ईश्वर से शत्रुता रखने वाले व्यक्तियों के साथ उठने बैठने से मना किया है।

अगर रोज़े की वजह से दूध सूख जाता है या कम हो जाता है और बच्चे को नुकसान होने का डर है, तो रोज़ा न रखें और आपको हर रोज़े के बदले किसी गरीब को एक मुद खाना देना होगा और फिर रोज़ों की क़ज़ा करनी होगी।

गर्भवति और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए हुक्म

सवाल: क्या उस गर्भवति महिला पर रोज़ा फ़र्ज़ है? जिसे नहीं पता कि रोज़ा रखने से उसके बच्चे को नुकसान होगा या नहीं?

जवाब: अगर माँ को रोज़े की वजह से अपने बच्चे को नुकसान होने का डर है और उसका डर किसी सही वजह से है, तो उसके लिए रोज़ा छोड़ना वाजिब है, अन्यथा रोज़ा रखना वाजिब है।

सवाल: एक महिला अपने बच्चे स्तनपान करा रही थी और गर्भवति भी थी और साथ ही रमज़ान के महीने में रोज़ा भी रख रही थी, लेकिन जब बच्चा पैदा हुआ, तो वह मर चुका था। अब अगर उसे पहले से नुकसान होने का डर था लेकिन उसने रोज़ा रखना जारी रखा, तो:

1. क्या उसके रोज़े सही होंगे या नहीं?

2. क्या उस पर ब्लड मनी (दियत) वाजिब है या नहीं?

3. और अगर उसने पहले नुकसान की संभावना नहीं बताई थी, लेकिन बाद में यह साबित हो गया कि रोज़ा रखने से बच्चे को नुकसान हुआ, तो इसका क्या हुक्म है?

जवाब: अगर नुकसान का डर था और डर की वजह भी सही थी और इसके बावजूद उसने रोज़ा रखा या बाद में उसे पता चला कि रोज़ा रखना ही उसके या उसके बच्चे के लिए नुकसानदायक था, तो रोज़े बातिल हैं और उनकी क़ज़ा करनी होगी, लेकिन ब्लड मनी (दियत) तब वाजिब होगी जब यह साबित हो जाए कि बच्चे की मौत रोज़े की वजह से हुई।

सवाल: अल्लाह तआला ने अपनी दया और कृपा से मुझे एक बच्चा दिया है, जिसे मैं स्तनपान करा रही हूँ, और रमज़ान का महीना आने वाला है, और मैं इस समय रमज़ान के महीने में रोज़ा रख सकती हूँ, लेकिन अगर मैंने रोज़ा रखा, तो दूध सूख जाएगा। यह ध्यान रखना चाहिए कि मैं शरीर से कमज़ोर हूँ और मेरा बच्चा हर दस मिनट में दूध माँगता है, तो मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब: अगर रोज़े की वजह से दूध सूख जाए या कम हो जाए और बच्चे को नुकसान होने का डर हो, तो रोज़ा न रखें और आपको हर रोज़े के लिए एक मुद खाना किसी गरीब को देना होगा और फिर रोज़े की कज़ा करनी होगी।

इस्तिफ़्ता: आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई

 रमज़ान के महीने का मतलब समझें। अल्लाह आपको हर साल एक महीना देता है ताकि आपको नेकी की ट्रेनिंग मिले। इसे अल्लाह समझें। रमज़ान सिर्फ़ बिना कुछ खाए-पिए दिन बिताने के बारे में नहीं है, बल्कि यह दूसरे गरीब, अनाथ और ज़रूरतमंद लोगों की भूख महसूस करने और उनके दर्द, दुख और तकलीफ़ को समझने के बारे में भी है।

लेखक: डॉ. मसरूर सुगरा रिज़वी

 रमज़ान का मतलब है गुनाहों को जलाने वाला... वो महीना जो हमारे छोटे-बड़े गुनाहों को माफ़ कर देता है। बेशक, अल्लाह माफ़ करने वाला, रहम करने वाला है, लेकिन क्या आपने सोचा है कि अल्लाह कौन से गुनाह माफ़ करेगा? ज़रूर, वे गुनाह हैं जिनमें आपने अल्लाह के हक़ को पूरा करने में लापरवाही दिखाई है या नासमझी, नासमझी और नासमझी की वजह से खुद पर ज़ुल्म किया है। अल्लाह उन सारे गुनाह तो माफ़ कर देंगा, लेकिन जो नाइंसाफ़ी, जो गुनाह तुमने बंदों के हक़ के साथ और अल्लाह के सबसे पवित्र बंदे के ख़िलाफ़ किया है, वो गुनाह अल्लाह तब तक माफ़ नहीं करेंगे जब तक वो इंसान जिसके तुम गुनहगार हो, तुम्हें माफ़ न कर दे। आज के ज़माने में लोग किसी न किसी तरह की ग़लतफ़हमी में डूबे हुए हैं और नशे में धुत हाथी की तरह बेफ़िक्री से अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं। इस खुद को नीचा दिखाने वाले घमंड के नशे में वो अपने अलावा सबको भूल गए हैं। उनका सजना-संवरना ही उनके लिए सब कुछ है। उन्हें सिर्फ़ अपने फ़ायदे पूरे करने की फ़िक्र है, और इसी बात को सुलझाने के लिए वो दूसरों के हक़ का हनन कर रहे हैं, उन पर ज़ुल्म हो रहे हैं, उनकी बेइज़्ज़ती हो रही है, उनका दिल दुखी हो रहा है। वो इन सब चीज़ों से बिल्कुल अनजान हैं। उन्हें हर हाल में अपना वजूद और बड़ाई साबित करनी है और इस काम के नतीजे में होने वाली बुराई और नाइंसाफ़ी की उन्हें कोई परवाह नहीं है। सच बताओ, क्या यही इबादत का तरीका है? क्या यही इबादत का तरीका है? नहीं, मुझे नहीं पता कि आज का इंसान किस तरह के खुदगर्ज़ी के नशे में है कि उसे लगता है कि वह कभी अल्लाह का सामना नहीं करेगा, कि उसे कभी अपने कामों का हिसाब नहीं देना पड़ेगा। वे भूल जाते हैं कि तुम जो भी बगावत कर रहे हो, वह सब इसी दुनिया में है। एक दिन ऐसा आएगा जब अल्लाह तुम पर फंदा कस देगा, तब तुम्हारी सारी ताकत धूल में मिल जाएगी और तुम्हें औंधे मुंह जहन्नुम में फेंक दिया जाएगा। जब तुम अपने किए कामों को देखोगे, तो तुम मुंह पीटोगे और दर्द से रोओगे, लेकिन उस समय तुम्हारे सफर में पछतावे और निराशा के अलावा कुछ नहीं होगा। इसलिए, रमजान के महीने की बुनियाद को समझो। अल्लाह तुम्हें हर साल एक महीने तक तकवा की ट्रेनिंग देता है। इसे अल्लाह समझो। रमजान सिर्फ बिना कुछ खाए-पिए दिन गुजारने के बारे में नहीं है, बल्कि दूसरे गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों की भूख महसूस करने और उनके दर्द, दुख और तकलीफ को समझने के बारे में भी है।

रमजान सिर्फ जुबान और हाथ-पैरों से इबादत करने के बारे में नहीं है, बल्कि दिल से पूरी तरह से अल्लाह और शरीयत के हुक्म पर चलने के बारे में है।

अगर रमज़ान में आपकी ज़बान किसी का दिल दुखा रही है, आपकी ज़िंदगी किसी पर ज़ुल्म कर रही है, और आपके किए हुए या आज के अन्याय को याद करके किसी की आँखों में आँसू आ रहे हैं, तो आपका रोज़ा अल्लाह की नज़र में भुखमरी से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है।

अगर आप अपनी नश्वर दौलत के नशे में चूर हैं और रमज़ान में किसी की बेइज़्ज़ती करने पर उतारू हैं और उन्हें बेइज़्ज़त करने और बेइज़्ज़त करने के अपने बुरे कामों से बाज़ नहीं आते, तो वह रोज़ा पाखंड की कैटेगरी में आता है।

अगर आप रोज़े रखकर अपने माँ-बाप का दिल दुखाते हैं, अगर आप आदतन झूठ बोलते हैं, अगर आप दूसरों का मज़ाक उड़ाते हैं, तो इस रोज़े का कोई फ़ायदा नहीं है।

अल्लाह ने आपको सिर्फ़ भूखे या बेचैन रहने के लिए रोज़ा नहीं बनाया, बल्कि सच में आपको अपने और करीब लाने के लिए बनाया है। और जो कोई झूठा, ज़ुल्म करने वाला, पाखंडी, घमंडी, बदनाम करने वाला, चुगलखोर हो, उसका कोई भी काम मंज़ूर नहीं है...इसलिए सावधान रहें।

सच पूछो तो सब ऐशो-आराम के बिस्तर पर, लापरवाही का तकिया टेके, बगावत का चोला ओढ़े, ज़ुल्म और नाफ़रमानी की ज़मीन पर, ज़ोर-ज़बरदस्ती, झूठ और फ़रेब, मतलबी फ़ायदे के आसमान के नीचे सो रहे हैं... सब सपनों में खोए हैं। एक चीख ही सबको जगा देगी। सही मायने में सब किसी वजह से सो रहे हैं। सपने ज़िंदगी में खरगोशों की तरह खोए रहते हैं। जागते हुए तो समझते हैं, पर असल में सब सो रहे हैं। जब जागेंगे तो समझेंगे... क्या नहीं करना चाहिए था? सच में, इंसान ऐसे जीता है जैसे कभी मरेगा ही नहीं, और ऐसे मरता है जैसे कभी जिया ही नहीं। सच में, सभी समझदार लोग पागल होते हैं। सभी पागल लोग समझदार होते हैं। समझदार इंसान वह है जो इस दुनिया को एक रास्ता, एक राहत समझता है, और आख़िरत की तैयारी करता है। दुनिया के स्कूल में पता नहीं कब छुट्टी की घंटी बजेगी और फिर सब... बिजली कड़कने पर सब लेटे रह जाएंगे... बस... इना ललल्लाह... तो होश में आओ, आंखें खोलो, जाग जाओ इससे पहले कि तुम्हारे कंधे हिलाए जाएं और तुम्हें होश में लाने के लिए डांटा जाए...

अमेरिका के राजदूत माइक हकाबी के बयान पर सऊदी अरब, जॉर्डन, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात समेत मिडिल ईस्ट में कड़ा विरोध शुरू हो गया है। 12 से ज्यादा मुस्लिम और अरब देशों ने संयुक्त बयान जारी कर अमेरिकी राजनयिक की इस हरकत को खतरनाक बताया है। 
14 मुस्लिम देश और संगठनों ने हकाबी के बयान की आलोचना की है।  
एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में हकाबी ने कहा था कि अगर ज़ायोनी शासन बाइबिल में ज़िक्र किए गए पूरे इलाके पर कब्जा कर ले तो ठीक रहेगा। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब गज़्ज़ा जनसंहार और वेस्ट बैंक को लेकर पहले ही क्षेत्र में तनाव चरम पर है।
 पूर्व बैपटिस्ट पादरी और लंबे समय से ज़ायोनी शासन समर्थक माइक हकाबी ने टकर कार्लसन के पॉडकास्ट में यह बयान दिया। 
बातचीत के दौरान बाइबिल की एक आयत का जिक्र हुआ, जिसे कुछ लोग इस तरह समझते हैं कि इस्राईल को मिस्र की नील नदी से लेकर सीरिया और इराक की फरात नदी तक की जमीन का अधिकार है। 
इस पर हकाबी ने कहा, ‘अगर वे सब कुछ ले लें तो भी ठीक है।’ हालांकि बाद में उसने कहा कि इस्राईल ऐसा मांग नहीं रहा। 
इस बयान के बाद 12 से ज्यादा अरब और मुस्लिम देशों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक साझा बयान में इस टिप्पणी को ‘खतरनाक और भड़काऊ’ बताया गया। इस बयान पर UAE, सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, पाकिस्तान, कतर, कुवैत, ओमान, बहरैन, लेबनान, सीरिया और फिलिस्तीन समेत कई देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। 

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, ज़ायोनी शासन के रेडियो ने नेतन्याहू के कैबिनेट के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट दी है कि तल अवीव ने ट्रंप को सूचित कर दिया है कि वह उसकी तथाकथित शांति परिषद को कोई भुगतान नहीं करेगा।
यह स्थिति तब है जब दुनिया के कई देशों, खासकर यूरोपीय देशों ने ट्रंप की इस कथित शांति परिषद में भाग लेने का विरोध किया है।
ट्रंप ने पहले जोर देकर कहा था कि स्थायी सीटें हासिल करने के लिए सदस्य देशों को भारी रकम चुकानी होगी। उन्होंने यह भी दावा किया था कि सदस्य देशों ने गज़्ज़ा में मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण के लिए 5 अरब डॉलर से अधिक देने का वचन दिया है।
उल्लेखनीय है कि मूल रूप से गज़्ज़ा पट्टी में मानवीय संकट पैदा करने का कारण ज़ायोनी शासन की इस परिषद में भागीदारी ने भी इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अल-अरबिया के अनुसार रमज़ान के पवित्र महीने में "सहाबुल-अर्ज़" नामक एक मिस्री टीवी सीरियल के मात्र 2 एपिसोड के प्रसारण ने ज़ायोनी शासन का गुस्सा भड़का दिया है, इस सीरियल में गज़्ज़ा पट्टी के खिलाफ ज़ायोनी शासन के कुछ अत्याचारों को दिखाया गया है।
 रिपोर्ट के अनुसार, ज़ायोनी शासन के रेडियो और टेलीविजन संस्थान ने इस सीरियल पर एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके इस बात पर जोर दिया कि  गज़्ज़ा जनसंहार के विषय को इस तरह से चित्रित किया गया है जो जायों शासन की छवि को सकारात्मक रूप में पेश नहीं करता है और यह एकतरफा है!
ज़ायोनी शासन के टेलीविजन चैनल 12 ने भी इस सीरियल की कड़ी आलोचना करते हुए दावा किया कि मिस्र अपनी छवि सुधारना चाहता है और यह सीरियल महज एक राजनीतिक कार्रवाई है।
येदिऊत अहारोनोत ने भी सीरियल के प्रसारण से पहले इसकी सामग्री पर चिंता व्यक्त की थी। इस अखबार ने लिखा कि उक्त सीरियल का जनमत पर, विशेष रूप से गज़्ज़ा पट्टी में बच्चों के मुद्दे और उनके साथ ज़ायोनी शासन की सेना के व्यवहार के क्षेत्र में, नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और इसके लाखों दर्शक होंगे।

इस सीरियल का अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया है। सीरियल 'सहाबुल-अर्ज़' गज़्ज़ा पट्टी के खिलाफ ज़ायोनी शासन के हमलों के बाद वहाँ के निवासियों के मानवीय संकट पर केंद्रित है, जिसमें इयाद नस्सार ने एक फिलिस्तीनी पिता की भूमिका और मना शलबी ने एक मिस्री डॉक्टर की भूमिका निभाई है।