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अमेरिका इराक पर अपनी मर्जी नहीं थोप सकता, राष्ट्रीय इच्छा से होंगे फैसले
इराकी राजनीतिक गठबंधन 'दौलतुल कानून' ने देश के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप को खारिज करते हुए कहा है कि बगदाद राष्ट्रीय इच्छा और हितों के अनुसार खुद फैसले करेगा।
इराक के राजनीतिक गठबंधन 'दौलतुल कानून' के सदस्य वलीद अल-असदी ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका कभी भी इराक पर अपनी इच्छाएं नहीं थोप सकता और देश के नेतृत्व का चुनाव खालिस रूप से राष्ट्रीय इच्छा के तहत किया जाएगा।
अल-असदी ने कहा कि इराक के आंतरिक राजनीतिक मामले और प्रमुखों के चयन की प्रक्रिया आंतरिक सहमति से तय होती है। बाहरी दबाव राजनीतिक सुलह की प्रक्रिया को नहीं बदल सकता।
उन्होंने कहा कि अमेरिका अतीत में भी इराक की राजनीतिक प्रगति से बेखबर नहीं रहा है, हालांकि वह कभी भी इराकी जनता या राजनीतिक ताकतों पर अपनी मर्जी नहीं थोप सका।
उन्होंने आगे कहा कि किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को इराक के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप माना जाएगा। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के निर्धारण का अंतिम फैसला भी बाहरी दबाव से ऊपर उठकर गठबंधन में शामिल समूह आपसी सलाह-मशविरे से करेंगे।
मुंबई में मौलाना सैयद अनीसुल हसन ज़ैदी सुपुर्द-ए-ख़ाक, सैकड़ो की संख्या में लोगों ने भाग लिया
मौलाना सैयद अनीसुल हसन ज़ैदी को मुंबई में सैकड़ों सोगवारों की मौजूदगी में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया। नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन के मौक़े पर शहर की इल्मी, समाजी और मज़हबी शख्सियात की बड़ी तादाद मौजूद रही।
मौलाना सैयद अनीसुल हसन ज़ैदी को मुंबई में सैकड़ों अफ़राद की मौजूदगी में दफ़्न किया गया। शदीद गर्मी और रोज़े की हालत के बावजूद मोमिनीन की क़ाबिले-गौर तादाद ने तशीई ए जनाज़ा में शिरकत करके अपने महबूब आलिम-ए-दीन और ख़ादिम-ए-क़ौम-ओ-मिल्लत से अपनी अकीदत का इज़हार किया।
तदफ़ीन के मौक़े पर मुख़्तलिफ़ समाजी व दीनी इदारों के ज़िम्मेदारान ने शिरकत करके मरहूम की इल्मी और समाजी ख़िदमात को ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया। इस मौक़े पर जुम्हूरिया-ए-इस्लामी ईरान के कौंसलर जनरल मुसीब रज़ा मुतलक, कल्चरल डायरेक्टर रज़ा फ़ाज़िल, सदर खोजा ट्रस्ट रज़ा अली बंदे अली, ग़ुलाम मोहम्मद लाखानी, अली अकबर लाखानी, मोहम्मद अली नासिर और ज़ैन नासिर समेत दीगर मुअज्ज़ज़ शख्सियात मौजूद थीं।
उलमा-ए-किराम में नमायां तौर पर हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अहमद अली आबिदी इमाम-ए-जुमआ व जमाअत मुंबई, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रूहे ज़फ़र, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद ज़की हसन नूरी, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन शौकत अब्बास, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन ग़ुलाम असकरी, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन तक़ी आगा (हैदराबाद), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अख़्तर अब्बास जून (लखनऊ), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन कुमैल असग़र (पूना), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन फ़ैयज़ बाक़िर, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आदिल हुसैन ज़ैदी (इमाम जमाअत इमामिया मस्जिद), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद मोहम्मद क़ैसर (उस्ताद जामिआ अमीरुल मोमिनीन), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद ज़ुल्फ़िकार हुसैन (इमाम जमाअत खोजा मस्जिद बांद्रा), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन फ़रमान मौसवी, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अज़ीज़ हैदर, मौलाना वक़ार साहब, मौलाना नियाज़ हैदर साहब, मौलाना दुबैल असग़र, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहसिन नासिरी, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मशहदी जलालपुरी, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद तक़ी (इमाम-ए-जुमा बिजनौर लखनऊ), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आबिद रज़ा रिज़वी कर्रवी, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हसन रज़ा बनारसी, सैयद ग़ाज़ी नक़वी और ग़ुलाम मेंहदी मौलाई समेत दीगर उलेमा व फ़ोज़ला शरीक रहे।
नमाज़-ए-जनाज़ा शहर के बुज़ुर्ग आलिम-ए-दीन हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हुसैन मेंहदी हुसैनी ने पढ़ाई, जबकि इससे पहले एक मुख़्तसर मगर पुरअसर मजलिस से हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन वसी हसन ख़ान ने ख़िताब किया। उन्होंने मरहूम की इल्मी ख़िदमात, तक़वा, इख़लास और क़ौम-ओ-मिल्लत के लिए उनकी शबाना-रोज़ कोशिशों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया।ख़िताब के दौरान मसाएब-ए-सैयदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम का तज़किरा इस अंदाज़ में किया गया कि शोरक़ा की आंखें नम हो गईं।
मौसम की शदीद तपिश और रोज़े की हालत के बावजूद जनाज़े में अवाम की बड़ी तादाद की शिरकत इस बात का अमली सुबूत थी कि मौलाना सैयद अनीसुल हसन ज़ैदी एक हर दिलअज़ीज़, मुख़लिस और बाक़िरदार रहनुमा थे। सोगवारान ने उन्हें आख़िरी आरामगाह तक पहुंचाया और उनकी बुलंदी-ए-दराज़ात के लिए ख़ुसूसी दुआएं कीं।
इंसान जब ख़ुद को ख़ुदा और अहल-ए-बैत अ.स. से बेनियाज़ समझने लगता है तो तुग़यानी करता है।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन मुर्तज़ा आग़ा तेहरानी ने बयान किया कि कुछ सख़्तियाँ इंसान की ख़ुदा की तरफ़ रुजूअ का ज़रिया बनती हैं। उन्होंने कहा कि फ़क़्र, बीमारी और परेशानियाँ ज़ाहिर में नापसंदीदा होती हैं, लेकिन कभी-कभी यही हालात इंसान को ग़फ़लत से बाहर निकालकर बारगाह-ए-इलाही की तरफ़ मोड़ देता हैं। क़ुरआन तंबीह करता है कि इंसान जब ख़ुद को बेनियाज़ समझता है तो तुग़यानी करने लगता है।
हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन मुर्तज़ा आग़ा तेहरानी ने माह-ए-मुबारक रमज़ान की तक़रीब में, जो आस्तान-ए-मुक़द्दस मस्जिद जमकरान में मुनअक़िद हुई, इस बात की तरफ़ इशारा किया कि दुआ-ए-इफ्तिताह हज़रत वली-ए-अस्र(अज) की जानिब से शियों तक पहुँची है। उन्होंने कहा कि यह दुआ नुव्वाब-ए-अरबा के ज़रिये, जिनमें मोहम्मद बिन उस्मान (इमाम ज़माना(अज) के दूसरे नायब) भी शामिल हैं, शियों के हवाले की गई और यह गहरे तौहीदी व तरबियती मआरिफ़ पर मुश्तमिल है।
उन्होंने फ़िक्रे اللهم اَذِنتَ لی فی دُعائک و مسألَتِک»” की तशरीह करते हुए कहा कि हम में से बहुत से लोग दुआ को एक मामूली अमल समझते हैं, जबकि ख़ुदा-ए-मुतआल से हमकलाम होने की इजाज़त मिलना ही उसकी ख़ास इनायत है। जिस तरह किसी बड़ी शख़्सियत से मुलाक़ात फ़ख़्र समझी जाती है, उसी तरह बारगाह-ए-इलाही में हाज़िरी की इजाज़त भी बेमिसाल एज़ाज़ है।
उन्होंने दोहराया कि क़ुरआन आगाह करता है इंसान जब ख़ुद को बेनियाज़ समझता है तो सरकशी करता है। कुछ सख़्तियाँ दरअस्ल इंसान को अपनी हक़ीक़त पहचानने और ख़ुदा की तरफ़ पलटने का मौक़ा देती हैं।
उन्होंने हिदायत-ए-आम और हिदायत-ए-ख़ास का फ़र्क़ बयान करते हुए कहा कि अंबिया तमाम लोगों की हिदायत के लिए आए, मगर ख़ास इनायत उन लोगों के लिए है जो अपने इख़्तियार से बंदगी का रास्ता चुनते हैं। जिस तरह एक आम दावत में कुछ लोग ही बुलंद मरातिब तक पहुँचते हैं, उसी तरह राह-ए-सुलूक में भी अहल-ए-इजाबत में से ख़ास अफ़राद मुंतख़ब होते हैं।
उन्होंने कहा कि ज़ालिमों को दी जाने वाली मुहलत, रज़ामंदी की निशानी नहीं, बल्कि इम्तिहान का मौक़ा है। आख़िरकार हर शख़्स अपने आमाल का नतीजा देखेगा।
आख़िर में उन्होंने सैय्यदुश्शोहदा हज़रत इमाम हुसैन(अ) की ख़िदमत में सलाम पेश करते हुए कहा कि इमाम हुसैन(अ) से मोहब्बत और तवस्सुल शिफ़ाबख़्श और निजातबख़्श है। उन्होंने ताकीद की कि इस माह-ए-मुबारक से ज़ुहूर-ए-इमाम(अज) की क़ुर्बत हासिल करने के लिए फ़ायदा उठाना चाहिए।
हम ईरान के खिलाफ हम अपनी धरती का इस्तेमाल नहीं करने देंगें। जॉर्डन
जॉर्डन के सरकारी टेलीविज़न ने एक अधिकारी के हवाले से कहा कि जॉर्डन की ज़मीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ़ किसी भी कार्रवाई के लिए नहीं किया जाएगा।
अनादोलु एजेंसी का हवाला देते हुए, जॉर्डन के रॉयल टेलीविज़न ने घोषणा की कि देश के एक अधिकारी ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि जॉर्डन घाटी की ज़मीन का इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए नहीं किया जाएगा।
अधिकारी ने, जिसका नाम नहीं बताया गया, कहा कि जॉर्डन को उम्मीद है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत से एक राजनीतिक समझौता होगा जो इस क्षेत्र को युद्ध से दूर रखेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, जॉर्डन के टेलीविज़न ने दूसरे अनजान अधिकारियों के हवाले से यह भी कहा कि इन लोगों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि जॉर्डन में अमेरिकी सेना की मौजूदगी अमेरिका और जॉर्डन के बीच रक्षा समझौतों के दायरे में है।
इस्राईल की ईरान से दुश्मनी की जड़ सरहद या जुग़राफ़िया नहीं, बल्कि इस्लाम है
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के कमांडर ने इस्लामिक गणराज्य और इज़राईली शासन के बीच टकराव की वैचारिक प्रकृति पर जोर देते हुए कहा,ईरान के साथ इज़राइल की दुश्मनी की मुख्य जड़ इस्लाम और ईरानी राष्ट्र की धार्मिक पहचान है, और यह शत्रुता सीमा, भौगोलिक स्थिति या सामयिक राजनीतिक मुद्दों से संबंधित नहीं है।
जनरल सैयद अली हुसैनी-निया, कमांडर सिपाह ज़िला कंगान, ने आज शहर बनक में शहीद यूसुफ़ हाजी-पूर की यादगारी तक़रीब में शहादत के आला मुक़ाम पर तअकीद करते हुए कहा कि हमारे शोहदा ने ख़ुदा से आगाहाना सौदा किया और इंसानी मरतबे की बुलंद तरीन मंज़िल हासिल की उन्होंने इस्लाम को ज़िंदा रखने के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।
उन्होंने कहा कि जभा-ए-इस्तेक़बार और सियूनी रेजीम की इस्लामी जम्हूरिया से अस्ल दुश्मनी की जड़ इस्लाम है। उन्होंने अफ़ज़ूद किया कि वह दिन हरगिज़ नहीं आएगा जब इस्राईल इस सरज़मीन पर क़दम रख सके, मगर यह कि इस मुल्क में कोई पासदार या बसीजी बाक़ी न रहे। और ऐसा दिन कभी नहीं आएगा।
कमांडर ने क़ुरआनी वादों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि क़ुरआन करीम ने सबको जन्नत का वादा नहीं दिया, बल्कि यह वादा हक़ीक़ी मोमिनीन, सालिहीन और राह-ए-ख़ुदा में जिहाद करने वालों के लिए मख़सूस है; वे लोग जिनके आमाल को अल्लाह ज़ाए नहीं करता, उन्हें हिदायत देता है और उस जन्नत में दाख़िल करता है जिससे पहले ही उन्हें आगाह कर दिया गया है।
हुसैनी-निया ने शहीद हाज क़ासिम सुलेमानी के क़ौल का हवाला देते हुए कहा,जब तक शहीद न बनो, शहीद नहीं बनोगे।” यानी इंसान को पहले अमलन ख़िदमतगुज़ार-ए-ख़ल्क़ होना चाहिए और शोहदा की सिफ़ात अपने अंदर पैदा करनी चाहिए, तब ही उसे मक़ाम-ए-शहादत नसीब होता है।
उन्होंने शहीद यूसुफ़ हाजी-पूर की याद को ताज़ा करते हुए कहा कि दुनिया, ख़ानदान और औलाद से गुज़र जाना बहुत मुश्किल है, लेकिन शोहदा ने इन तअल्लुक़ात से ऊपर उठकर बुलंदतर वाबस्तगी का इंतिख़ाब किया और अपनी जान राह-ए-ख़ुदा में पेश कर दी; जैसा कि शहीद हुज्जाजी की विदाई के मंज़र में यह बात वाज़ेह तौर पर दिखाई दी।
उन्होंने आख़िर में तअकीद की कि ये शोहदा इसलिए गए ताकि इस्लाम ज़िंदा रहे, और हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि उनके बुलंद मक़ाम की क़द्रदानी करें और उनके रास्ते को जारी रखें।
क़ुरआन से तमस्सुक इंसान की ज़िन्दगी को तब्दील कर देता है
हुज्जतुल इस्लाम वहदानी फ़र ने कहा कि क़ुरआन से तमस्सुक इंसान की ज़िन्दगी का अस्ली सरमाया है और उसकी तरफ़ तवज्जो देना ज़िन्दगी के रास्ते को इस्लाह करता है।
हुज्जतुल इस्लाम वहदानी फ़र ने कहां, क़ुरआन करीम को सबसे मुस्तहकम इलाही सनद क़रार दिया, जो दिलों पर हुकूमत करता है। उन्होंने इज़हार किया कि क़ुरआन से तमस्सुक इंसान की ज़िन्दगी का बुनियादी सरमाया है और उसकी पैरवी ज़िन्दगी की राह को दुरुस्त कर देती है।
उन्होंने यूरोपी मुल्कों में इस आसमानी किताब की तौहीन के कुछ वाक़िआत के बाद अवाम में क़ुरआन की तरफ़ बढ़ते रुझान की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ज़िन्दगी आयतों के साथ प्रोजेक्ट के हवाले से तख़स्सुसी नशिस्तों का इनइक़ाद और उस्तादों व तलबा की तरबियत बेहद ज़रूरी है।
उन्होने कहां इर्शाद-ए-इस्लामी, जमीयत-ए-हिलाल-ए-अहमर, बसीज, रिटायर्ड फ़रहंगी अफ़राद और फ़आल क़ुरआनी इदारों से दरख़्वास्त की कि इस मंसूबे की तन्फ़ीज़ में शरीक हों। उन्होंने यह भी तजवीज़ दी कि देहाती इलाक़ों के दाख़िली रास्तों को क़ुरआनी पैग़ामात से मुअज़्ज़न व सजाया जाए।
उन्होंने नगरपालिका से भी दरख़्वास्त की कि इन प्रोग्रामों के निफ़ाज़ में मुकम्मल तआवुन करे, ताकि इदारों की हमआहंगी से मआशरे में फ़रहंग-ए-क़ुरआन के ज़्यादा से ज़्यादा फ़रोग़ का मौक़ा फ़राहम हो सकें।
अमेरिकी राजदूत के विवादित रुख पर सऊदी अरब की तीखी प्रतिक्रिया
सऊदी विदेश मंत्रालय ने शनिवार को कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन में US एम्बेसडर के विवादित बयानों पर रिएक्ट किया, जिसमें ज़ायोनी शासन के वेस्ट बैंक और वेस्ट एशिया पर कंट्रोल करने के अधिकार के बारे में कहा गया था।
अल जज़ीरा के मुताबिक, सऊदी विदेश मंत्रालय ने शनिवार को कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन में US एम्बेसडर के विवादित बयानों पर रिएक्ट किया, जिसमें ज़ायोनी शासन के वेस्ट बैंक और वेस्ट एशिया पर कंट्रोल करने के अधिकार के बारे में कहा गया था।
इस बारे में सऊदी विदेश मंत्रालय की तरफ़ से जारी एक बयान में कहा गया: रियाद, इज़रायल (कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी इलाकों) में US एम्बेसडर के उन बयानों की निंदा करता है, जिसमें उन्होंने लापरवाही से कहा था कि पूरे मिडिल ईस्ट पर इज़रायल का कंट्रोल मंज़ूर होगा।
सऊदी विदेश मंत्रालय ने इस बारे में आगे कहा, इज़रायल (कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी इलाके) में US एम्बेसडर के बयान इस इलाके के देशों और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच के रिश्तों को नज़रअंदाज़ करते हैं। इज़रायल (कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी इलाके) में US एम्बेसडर के एक्सट्रीमिस्ट रवैये के गंभीर नतीजे होंगे और यह इस इलाके के देशों और लोगों के खिलाफ दुश्मनी को बढ़ाकर ग्लोबल शांति और सिक्योरिटी के लिए खतरा है।
यह ध्यान देने वाली बात है कि तेल अवीव में US के एम्बेसडर माइक हकाबी ने पहले भी मशहूर अमेरिकन प्रेज़ेंटर टकर कार्लसन के साथ एक इंटरव्यू में इस नकली सरकार के इलाके के बारे में ऐसी बातें कही थीं जो पहले कभी नहीं हुई थीं।
इस इंटरव्यू में, जब हकाबी से पूछा गया कि क्या इज़रायल को तोराह की शिक्षाओं के आधार पर नील और फ़रात नदियों के बीच के सभी इलाकों पर कब्ज़ा करने का अधिकार है, तो उन्होंने एक छोटे और विवादित जवाब में कहा: अगर वे ये सभी इलाके ले लेते हैं, तो यह अच्छी बात होगी!
रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा खोलने का सवाब
हज़रत इमाम रज़ा (अ) ने अमीरूल मोमिनीन (अ) से वर्णन किया हैं कि अल्लाह के रसूल ने एक खुतबे में कहा: ऐ लोगों! तुम में से जो कोई भी इस रोज़े के महीने में किसी रोज़ेदार को खाना खिलाएगा, अल्लाह उसे एक गुलाम को आज़ाद करने के बराबर सवाब देगा, और उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।
हज़रत इमाम रज़ा (अ) ने अमीरूल मोमिनीन (अ) से वर्णन किया हैं कि अल्लाह के रसूल ने एक खुतबे में कहा: ऐ लोगों! तुम में से जो कोई भी इस रोज़े के महीने में किसी रोज़ेदार को खाना खिलाएगा, अल्लाह उसे एक गुलाम को आज़ाद करने के बराबर सवाब देगा, और उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे। कहा गया: ऐ अल्लाह के रसूल! हम सब इसके काबिल नहीं हैं! उन्होंने कहा: जहन्नम की आग से बचो, भले ही तुमने किसी रोज़ेदार को आधी खजूर खिला दी हो। खुद को जहन्नम की आग से बचाओ, चाहे पानी का एक घूंट ही क्यों न हो। (बिहार उल अनवार, भाग 96, पेज 357)
2. इमाम बाकिर (अ) ने फ़रमाया: अल्लाह के रसूल (स) ने शाबान महीने के आखिरी खुतबे में अल्लाह की तारीफ़ के बाद कहा, “जो कोई रमज़ान के महीने में किसी मोमिन का रोज़ा तोड़ेगा, अल्लाह उसे एक गुलाम आज़ाद करने का सवाब देगा, और उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।” उन्होंने कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल! हम सब रोज़ेदार का रोज़ा नहीं तोड़ सकते।” उन्होंने कहा: “अल्लाह बहुत रहम करने वाला है और वह तुममें से हर उस इंसान को यह सवाब देता है जो दूध या ताज़े पानी या दो छोटी खजूर के एक घूंट से रोज़ा तोड़ता है, और यह उन लोगों के लिए काफ़ी है जो इससे ज़्यादा नहीं कर सकते।” (बिहार उल अनवार, भाग 96, पेज 359)
3. शाबान के आखिरी दिन अपने खुतबे में, अल्लाह के रसूल (स) ने कहा: “जो कोई रमज़ान के महीने में किसी रोज़ेदार को खाना खिलाएगा, अल्लाह उसे मेरे फव्वारे से पानी पिलाएगा। उसके बाद, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।” (बिहार उल अनवार, भाग 96, पेज 342)
4. इमाम जाफ़र सादिक (अ) ने फ़रमाया: “जो कोई रमज़ान की एक रात में किसी दूसरे मोमिन को खाना खिलाएगा, अल्लाह उसे तीस मोमिन गुलाम लड़कियों को आज़ाद करने का इनाम देगा, और उस इफ़्तार के बदले में उसकी एक दुआ कबूल होगी।” (बिहार अल-अनवार, भाग 96, पेज 317)
5. इमाम जाफर सादिक (अ) ने अल्लाह के रसूल (स) से रिवायत किया कि उन्होंने कहा: “रमज़ान के महीने में अपने गरीब और ज़रूरतमंद मोमिन भाइयों को खाना खिलाओ, और तुम में से जो कोई भी रोज़ा रखने वाले को खाना खिलाएगा, उसे रोज़ा रखने वाले के बराबर सवाब मिलेगा, रोज़ा रखने वाले के सवाब में कोई कमी नहीं होगी।” (बिहार उल अनवार, भाग 97, पेज 77-78)
6. मसादाह ने इमाम जाफ़र सादिक (अ) से रिवायत किया: "सादिर रमज़ान के महीने में मेरे पिता, इमाम बाकिर (अ) के पास आए। इमाम ने उनसे कहा: क्या तुम जानते हो कि ये रातें कौन सी हैं? उन्होंने कहा: हाँ, मेरे माता-पिता मेरे लिए कुर्बान हों! ये रमज़ान की रातें हैं। उन्होंने कहा: ऐ सुदैर! क्या तुम इन रातों में हर रात इस्माइल (अ) के वंशजों में से दस गुलाम आज़ाद कर सकते हो?" सुदैर ने कहा: मेरे माता-पिता आपके लिए कुर्बान हों, मेरा पैसा उसके लिए काफ़ी नहीं होगा, इसलिए इमाम (अ) ने गुलामों की संख्या तब तक कम कर दी जब तक उन्होंने कहा: क्या तुम सिर्फ़ एक गुलाम आज़ाद कर सकते हो? और सुदैर कहते रहे कि नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता। इमाम ने कहा: क्या तुम रमज़ान की हर रात एक मुसलमान का रोज़ा नहीं खोल सकते? सुदैर ने कहा: हाँ, मैं दस लोगों का रोज़ा खोल सकता हूँ। उन्होंने कहा: ऐ सुदैर! मेरा यही मतलब था। असल में, जब तुम अपने मुसलमान भाई का रोज़ा तोड़ते हो, तो यह इस्माइल (अ) के वंश से एक गुलाम को आज़ाद करने के बराबर है। (काफ़ी, भाग 4, पेज 68-69)
रोज़े के चिकित्सीय और रूहानी फ़ायदे
रे दिन कुछ न खाने से खून की मात्रा कम हो जाती है, जिससे डायस्टोलिक प्रेशर कम होता है, जिससे दिल शांत और सुकून भरा रहता है।
लेखक: मिर्ज़ा मुहम्मद हैदर (लखनऊ)
दुनिया के रब ने हम पर रोज़ा फ़र्ज़ किया है, जैसा कि अल्लाह फ़रमाता हैं: “ऐ ईमान वालों, तुम्हारे लिए रोज़ा फ़र्ज़ किया गया है जैसे तुमसे पहले वालों के लिए फ़र्ज़ किया गया था, ताकि तुम तक़वा पा सको।” (सूर ए बक़रा, आयत 183)
यह मुबारक आयत रोज़े की फ़र्ज़ और उसकी नेकी दोनों के बारे में बताती है। अरबी में, रोज़े को सौम कहा जाता है। सौम का मतलब है ‘किसी चीज़ से रुकना, बचना, या अपना हाथ खींच लेना’, और इस्लाम में, सूरज उगने से सूरज डूबने तक खाने-पीने से परहेज़ करना रोज़ा कहलाता है। कुरान की आयत के अनुसार, रोज़े का मुख्य मकसद तक़वा और पवित्रता है, खुद को सभी बुराइयों से पाक करना।
अगर हम देखें, तो एक इंसान तीन ज़रूरी चीज़ों का मेल होता है। रूह जो आसमानी है। शरीर जो दुनिया यानी दुनिया का है और नैतिकता जो दुनिया वाले इंसान को आसमानी दुनिया की तरफ़ ले जाती है। रोज़ा इन तीनों चीज़ों की सफ़ाई करता है: जिस्मानी सफ़ाई, नैतिक सफ़ाई और रूहानी सफ़ाई और ये तीनों आपस में जुड़े हुए हैं।
कुरान की आयत से साफ़ है कि रोज़ा इंसानी इतिहास में कोई नई बात नहीं है। अगर हम इंसानी इतिहास का पहला पन्ना देखें, तो आदम के ज़माने में (चांद के दिन) यानी तेरहवां, चौदहवां और पंद्रहवां दिन फ़र्ज़ था। इसी तरह, यह रिवाज़ सभी धर्मों में चला आ रहा है, चाहे वे हिंदू हों या यहूदी या ईसाई, हालांकि उनके रोज़े के मसले अलग-अलग थे। हज़रत ईसा (अ) ने अपनी नबूवत का ऐलान करने से पहले चालीस दिन रोज़े रखे थे, यानी यह साफ़ है कि रोज़ा इंसानी इतिहास में कोई नई बात नहीं है।
असल में, इंसान का शरीर एक बायोलॉजिकल मशीन है, जैसे एक मशीन बिजली, पेट्रोल वगैरह से एनर्जी पाती है और ज़िंदा रहती है, लेकिन तभी तक जब तक उसके सभी पार्ट्स अपनी जगह पर ठीक से काम कर रहे हों, और यह तभी मुमकिन है जब इस मशीन की समय पर सर्विसिंग और ओवरहॉलिंग हो। उसी तरह, इंसान का शरीर, जिसे एक मशीन का दर्जा मिला है, उसे भी सर्विसिंग की ज़रूरत होती है। इसलिए, इस मशीन को बनाने वाले ने इसकी सर्विस के लिए एक खास काम, यानी उपवास को ज़रूरी बनाया। जिसका इंसान के शरीर, नैतिकता और आत्मा पर खास असर पड़ता है।
मशहूर फिलॉसफर सुकरात, जिनका समय 470 साल है, जब किसी ज़रूरी टॉपिक पर सोचना शुरू करते थे, तो पहले दस दिन दिमागी ध्यान के लिए उपवास करते थे। उन्होंने उपवास के मेडिकल फायदों के बारे में काम के तरीके से बताया है। इसके मेडिकल फायदे इस तरह हैं: हर इंसान के अंदर एक डॉक्टर होता है, हमें अपने अंदर के डॉक्टर, यानी इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करना चाहिए, और इसे सपोर्ट करने का सबसे अच्छा तरीका उपवास है। इंसान की मशीन दो तरह के ब्लड प्रेशर पर चलती है, जिनमें से एक सिस्टोलिक प्रेशर और दूसरा डायस्टोलिक प्रेशर है। इन दोनों प्रेशर का ज़्यादा होना इंसान के शरीर के लिए नुकसानदायक होता है और इस बीमारी को आम तौर पर हाई ब्लड प्रेशर या BP कहा जाता है, जो एक जानलेवा बीमारी है। इन दोनों में से ज़्यादा खतरा डायस्टोलिक प्रेशर के बढ़ने से होता है।
पूरे दिन कुछ न खाने की वजह से ब्लड वॉल्यूम थोड़ा कम हो जाता है, जिससे डायस्टोलिक प्रेशर कम लेवल पर हो जाता है, जिससे हार्ट रिलैक्स और शांत हो जाता है। व्रत का खून पर खास असर होता है। अब सभी जानते हैं कि आर्टरी ब्लड में कमज़ोरी और डिप्रेशन का एक मुख्य कारण यह है कि इसमें ऐसे रेमनेंट्स होते हैं जो पूरी तरह से घुल नहीं पाते। ये ब्लड के साथ मिलकर उसके सिस्टम को खराब करते हैं। व्रत के दौरान, व्रत तोड़ने के समय तक ये सब्सटेंस पूरी तरह से घुल जाते हैं, और ये घुले हुए सब्सटेंस ब्लड वेसल पर जमा नहीं होते, जिससे ब्लड बराबर बहता रहता है।
इंसान के शरीर में हार्ट की सेंट्रल जगह होती है और व्रत दिल की सभी बीमारियों के लिए फायदेमंद होता है, क्योंकि हार्ट का काम शरीर के सभी अंगों में खून की पहचान करना है। डॉक्टरों के अनुसार, दिल उन अंगों को दस परसेंट खून सप्लाई करता है जिनका काम खाना पचाना है। अब जब इंसान दिन भर कुछ नहीं खाता है, तो दिल को दिन में दस परसेंट आराम मिलता है, जो उसके लिए बहुत फायदेमंद है। समय के साथ, दिल हीमोग्लोबिन बनाने में बिज़ी हो जाता है, जिससे शरीर का डिफेंस सिस्टम, इम्यून सिस्टम मज़बूत होता है। इसी तरह, उपवास करने से पाचन तंत्र को एक महीने का आराम मिलता है, जिससे पेट की ऐंठन खत्म हो जाती है। उपवास के दौरान, फेफड़े सारी बेकार और बेकार चीज़ों को तेज़ी से बाहर निकाल देते हैं, जिससे खून साफ़ होता है और शरीर के सिस्टम में सेहत की लहर दौड़ जाती है। उपवास के दौरान, शरीर से बाइल एसिड (यूरिन) जैसे सभी ज़हरीले पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे जोड़ों और पीठ के दर्द में आराम मिलता है। उपवास का सबसे ज़रूरी शारीरिक फ़ायदा शरीर और दिमाग के बीच तालमेल है। ज़्यादातर लोग जो स्लिमिंग सेंटर जाते हैं, जैसे ही वे अपनी डाइटिंग छोड़ते हैं, उनका मोटापा पहले से ज़्यादा बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दिमाग का हाइपोथैलेमस नाम का हिस्सा, जिसका काम वज़न कंट्रोल करना होता है, एक्टिवेट हो जाता है। अगर कोई इंसान भूखा रहता है, तो भूखा रहने के बाद यह हिस्सा तेज़ी से काम करता है, जिससे पहले से ज़्यादा वज़न बढ़ता है।
रोज़ा बाहरी प्रदूषण के साथ-साथ अंदरूनी प्रदूषण से भी राहत दिलाता है। उपवास बाहरी प्रदूषण जैसे झूठ, चुगली, बुराई, बदनामी, अश्लीलता, छल, झगड़े, ज़ुल्म और हिंसा से बचने का एक शानदार तरीका है, साथ ही जलन, नफ़रत, द्वेष, शक, गुस्सा और क्रोध जैसी अंदरूनी बीमारियों से भी बचाता है। नैतिकता की पवित्रता में उपवास का एक खास काम इच्छाशक्ति को बढ़ाना है। अक्सर देखा जाता है कि अच्छे और बुरे में फर्क करने के बावजूद इंसान इच्छाओं की ओर भागता है। इच्छाओं के तूफ़ान को रोकने के लिए मज़बूत और पक्की इच्छाशक्ति का होना ज़रूरी है। उपवास इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।
और उसे इतना मज़बूत करता है कि इंसान अपने इरादों पर पक्का रहता है, ठीक वैसे ही जैसे रोज़े के दौरान, सारी नेमतों के सामने होने के बावजूद, वह उन्हें छूता नहीं है। एक अच्छा समाज बनाने के लिए एक-दूसरे के दुख-दर्द को जानना और उन्हें राहत देना ज़रूरी है। रोज़े के दिनों में, हर इंसान इन सभी गरीब लोगों के दुख-दर्द से वाकिफ़ हो जाता है और उन्हें इफ़्तार के रूप में राहत देता है, जो निश्चित रूप से एक अच्छे समाज की पहचान है। यह देखा गया है कि लोगों में स्वार्थ या स्वभाव की कठोरता उनमें चिड़चिड़ापन पैदा करती है। रोज़ा हमारे स्वार्थ को खत्म करता है, जिससे चिड़चिड़ापन दूर हो जाता है और इंसान चैन की सांस लेता है।
रोज़े का एक खास काम जो इंसान के नैतिक मूल्यों पर असर डालता है, वह है नेमतों की कद्र करना। नेमतों की कद्र न करने से इंसान का दिल धीरे-धीरे सख़्त हो जाता है। वह सोचने लगता है कि ये सारी नेमतें उसकी मिल्कियत हैं। नतीजतन, वह क्रूरता और हिंसा का सहारा लेता है। एक महीने के लंबे समय में, उसे एहसास होता है कि वह नेमतों का मालिक नहीं है। सभी चीज़ों से खुद को दूर करने के बाद, वह अपने पास मौजूद नेमतों के लिए शुक्रगुज़ार हो जाता है।
इंसानी गुण सिर्फ़ दैवीय और जानवर जैसे नहीं होते, बल्कि इंसान में दोनों के बीच के गुण होते हैं। इसमें दया, उदारता, प्यार, दया, सब्र और सहनशीलता जैसे कुछ दैवीय गुण होते हैं जो इंसान को दूसरों की नज़रों में प्यारा बनाते हैं और उसे इज़्ज़त देते हैं। दूसरी तरफ, कुछ जानवर जैसे सेक्सुअल फीलिंग्स, आराम की तलाश, नयापन वगैरह होते हैं। असल में, इंसान में रूहानी और शारीरिक गुण होते हैं। जैसे भौतिक गुण भौतिक खाने से आते हैं, वैसे ही रूहानी खाना, यानी न खाना, इंसान की आत्मा को मज़बूत करता है। इसी वजह से, दुनिया के मालिक, जो सबसे अच्छी व्यवस्था के बनाने वाले हैं, ने हमारी शारीरिक ताकत बढ़ाने के लिए ग्यारह महीने तक भौतिक खाना और हमारी रूहानी ताकत बढ़ाने के लिए एक महीने का रोज़ा रखने को कहा है। रोज़े की सभी इबादतों में एक खास अहमियत है, और वह यह है कि सभी इबादतों से कुछ समय के लिए रूहानियत आती है, जबकि रोज़े के दौरान इंसान पूरे दिन रूहानी हालत से भरा रहता है।
इन सभी फ़ायदों के साथ-साथ रोज़े का एक खास मकसद खुदा की इबादत, सच्ची भक्ति और खुदा के करीब होना है, जो इन सभी फ़ायदों से बेहतर और बेहतर है, और मकसद इंसानी ज़िंदगी है। असल में, सच्चे रब ने इस दुनियावी इंसान पर जो भी फ़र्ज़ डाले हैं, उनमें इंसान के लिए दोनों दुनिया के फ़ायदे शामिल हैं। अल्लाह तआला से गुज़ारिश है कि वह हम सभी को रोज़े रखने की तौफ़ीक़ दे।
शैतानी सिफत लोगों के "तबाही के आइलैंड" में पश्चिमी सभ्यता की बदनामी का स्पष्ट सबूत
जेफ़री एपस्टीन केस को सिर्फ़ एक नैतिक स्कैंडल या निजी भटकाव तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह केस असल में वेस्टर्न लिबरल डेमोक्रेसी के स्ट्रक्चर में पावर, पैसा, करप्शन और पॉलिटिकल सिक्योरिटी के आपस में जुड़े होने का सबसे साफ़ और घटिया उदाहरण है।
हाल के दिनों और हफ़्तों में, मीडिया और सोशल मीडिया की दुनिया में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने जेफ़री एपस्टीन का नाम न सुना हो या इस करप्ट अमेरिकन कैपिटलिस्ट और उसके आइलैंड पर हुई दुखद घटना के बारे में कोई न्यूज़ या लिखा हुआ न पढ़ा हो।
क्रांति के सुप्रीम लीडर ने भी कुछ दिन पहले इस मामले पर कहा था, "बदनाम आइलैंड की घटना में हैरान करने वाले करप्शन का खुलासा वेस्टर्न सभ्यता और लिबरल डेमोक्रेसी की असलियत दिखाता है। हमने वेस्टर्न नेताओं के करप्शन के बारे में जो सुना था, वह एक तरफ है और इस आइलैंड का मामला दूसरी तरफ है। बेशक, यह उनके अनगिनत करप्शन का सिर्फ़ एक उदाहरण है, और जैसे यह मामला पहले छिपाया गया और फिर सामने आया, वैसे ही बाद में कई और मामले भी सामने आएंगे।"
वेस्टर्न लिबरल डेमोक्रेसी का बुरा नतीजा
मशहूर पत्रकार मुर्तज़ा मुफ़ीदनेज़ाद के अनुसार, वेस्टर्न मीडिया एपस्टीन केस को सिर्फ़ एक दुखद घटना बनाकर केस के सिस्टमैटिक और बुनियादी पहलू को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश कर रहा है।
पत्रकार ने कहा: फिर भी, छोटी और ऊपरी सोच की जगह एक लाइन पर आधारित नज़रिया और एक बड़ा नज़रिया अपनाना चाहिए। जेफ़री एपस्टीन केस को सिर्फ़ एक नैतिक स्कैंडल या निजी गलती कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह असल में वेस्टर्न लिबरल डेमोक्रेसी के स्ट्रक्चर में पावर, पैसा, करप्शन और पॉलिटिकल इम्यूनिटी के आपसी तालमेल का एक बहुत साफ़ उदाहरण है, जो सालों से ट्रांसपेरेंसी, कानून का राज और पॉलिटिकल एथिक्स के नारों के साथ खुद को एक ग्लोबल मॉडल के तौर पर पेश करता रहा है, लेकिन ऐसे केस के सामने, यह या तो बेबस लगता है या इसमें कुछ करने की इच्छा नहीं है।
उन्होंने आगे कहा: जेफ़री एपस्टीन कोई मामूली इंसान नहीं था, बल्कि ऐसा इंसान था जिसकी अमेरिका और यूरोप के पॉलिटिकल, फाइनेंशियल और मीडिया एलीट तक बहुत ज़्यादा पहुँच थी। उसके आस-पास बड़े नेताओं, अरबपतियों, अकेडेमिक्स और असरदार लोगों की मौजूदगी ने दुनिया को यह सच दिखाया कि पावर का ऐसा नेटवर्क कानून के संरक्षण में सालों से काम कर रहा था। यहीं पर इस बुनियादी सवाल की जड़ों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए: यह मामला इतने सालों तक और इतने सारे लोगों के शामिल होने के बावजूद कैसे दबा रहा और यह किसी नतीजे पर क्यों नहीं पहुँच सका?
मुफिदनेज़ाद ने आगे कहा: एक ज़रूरी और बुनियादी बात यह है कि सालों तक, जब कुछ लोग वेस्टर्न सभ्यता के पतन की बात करते थे, तो कुछ लोग उनके कैरेक्टर और दिमागी तौर पर हमला करते थे, और पूरी ताकत से यह साबित करने की कोशिश करते थे कि वेस्टर्न सभ्यता अभी भी अपनी शान और शान के साथ अपनी ताकत बनाए हुए है, लेकिन समय ने साबित कर दिया है कि इस पुराने पेड़ के अंदर दीमक लग चुकी है और यह इतना खोखला हो गया है कि इसके खत्म होने और टूटने का खतरा बहुत ज़्यादा हो गया है।
एपस्टीन केस पर वेस्टर्न मीडिया का विरोधाभास
मीडिया लिटरेसी की टीचर और रिसर्चर डॉ. मासूमा नसीरी ने बताया कि मीडिया के नज़रिए से एपस्टीन केस का ध्यान से एनालिसिस और गहराई से जांच ज़रूरी है।
उन्होंने कहा: ऐसी दुनिया में जहां छोटी-छोटी घटनाएं भी बड़ी खबरों का विषय बन जाती हैं, बुनियादी सवाल यह उठता है कि इतने बड़े मामले पर मीडिया सेंसरशिप और लीपापोती कैसे हुई। इस केस से जुड़ी कुछ जानकारी सामने आने के बावजूद, मीडिया में वह ट्रांसपेरेंसी और जानकारी का फ्री फ्लो जिसका वेस्टर्न दुनिया हमेशा दावा करती रही है, वह अभी भी दिखाई नहीं दे रहा है। इसके अलावा, इस जानकारी का सामने आना असल में कुछ देशों के बीच पॉलिटिकल और सिक्योरिटी झगड़ों का नतीजा है, जिसका इस्तेमाल इस समय पब्लिक ओपिनियन की दिशा तय करने के लिए किया जा रहा है। असली बहस यह है कि वेस्टर्न सिस्टम, जो सालों से ह्यूमन राइट्स और जानकारी के फ्री सर्कुलेशन जैसे कॉन्सेप्ट का चैंपियन रहा है, इतने ज़रूरी मुद्दे को अपनी मीडिया सेंसरशिप और कंटेंट और प्लेटफॉर्म-बेस्ड डिक्टेटरशिप की परतों में कैसे छिपाए रखता है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या मीडिया हेजेमनी का सिस्टम यह तय करता है कि हम क्या देखें, कब देखें और किस एंगल से देखें?
उन्होंने आगे कहा: मीडिया के नज़रिए से, इस मामले को ह्यूमन राइट्स या बच्चों के यौन शोषण के पहलू तक सीमित नहीं रखना चाहिए, हालांकि ये पहलू भी बहुत ज़रूरी हैं। अगर ऐसी कोई घटना किसी मुस्लिम देश में हुई होती, तो वेस्टर्न मीडिया इसे ग्लोबल स्कैंडल बना देता, लेकिन अब जब वेस्टर्न एडल्ट्स इसमें शामिल हैं, तो कोई शर्म की बात नहीं है, और न ही मेनस्ट्रीम मीडिया कोई गंभीर सवाल उठा रहा है।
यौन शोषण से कहीं ज़्यादा एक समस्या
मीडिया लिटरेसी टीचर और रिसर्चर ने आगे कहा: अगर आप इस मामले को और गहराई से देखें, तो यह बच्चों के यौन शोषण से कहीं ज़्यादा है क्योंकि असली समस्या इस आइलैंड पर शैतानी रीति-रिवाजों का होना और एक नए तरह का धर्म बनाने की कोशिश है। इसलिए, सभी दैवीय और धार्मिक धर्मों को ग्लोबल लेवल पर इस ट्रेंड पर एक गंभीर और मिलकर प्रतिक्रयी देना चाहिए।

















