رضوی

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१५ जमादिल अव्वल का मुबारक दिन तारीख़ के सफ़हात पर एक नूरी चराग़ की मानिंद है। यह वह दिन है जिसने इंसानियत के सफ़र में इबादत की लतीफ़ खुशबू, दुआ की पाकीज़गी और किरदार के वक़ार का इज़ाफ़ा किया। इसी सआत में आग़ोश-ए-ज़हरा के घराने में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अलैहिस सलाम) की विलादत हुई। वह हस्ती जिसकी ज़िंदगी ने कर्बला के दर्द को हिकमत-ए-इलाही के पयाम में बदल दिया और टूटे हुए मआशरे को सब्र, रज़ा और अख़लाक़ की नई बुनियाद अता की।

१५ जमादिल अव्वल का मुबारक दिन तारीख़ के सफ़हात पर एक नूरी चराग़ की मानिंद है। यह वह दिन है जिसने इंसानियत के सफ़र में इबादत की लतीफ़ खुशबू, दुआ की पाकीज़गी और किरदार के वक़ार का इज़ाफ़ा किया। इसी सआत में आग़ोश-ए-ज़हरा के घराने में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अलैहिस सलाम) की विलादत हुई। वह हस्ती जिसकी ज़िंदगी ने कर्बला के दर्द को हिकमत-ए-इलाही के पयाम में बदल दिया और टूटे हुए मआशरे को सब्र, रज़ा और अख़लाक़ की नई बुनियाद अता की।

इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) की विलादत सिर्फ़ एक तारीखी वाक़ेआ नहीं है। यह हर दौर के नौजवान को किरदारसाज़ी के नए सफ़र की दावत देती है—वह सफ़र जिसकी मंज़िल इंसानियत की तामीर, अख़लाक़ की बुलंदी और रूह की बेदारी है।

विलादत-ए-सज्‍जाद (अलैहिस सलाम): कर्बला के पस-ए-मनज़र में एक नूरी आग़ाज़

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अहैलिस सलाम) की विलादत ऐसे ख़ानदान में हुई जो ईमान, अद्ल और वफ़ा का सरचश्मा था। आप की तर्बियत सैय्यदा ज़ैनब (अलैहिस सलाम), इमाम हुसैन (अलैहिस सलाम) और इमाम हसन (अलैहिस सलाम) जैसे अज़ीम किरदारों के माहौल में हुई। यही माहौल नौजवानी की वह पहली दरसगाह साबित होता है जिसमें किरदार की बुनियाद रखी जाती है।

जब किसी शख़्सियत की विलादत नूरानी हो, नसब पाकीज़ा हो, मशाहिदा कर्बलायी हो और किरदार अज़ीम हो तो उसकी हयात सिर्फ़ फ़र्द की नहीं, बल्कि ज़माने की दरसगाह बन जाती है।

इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम): नौजवानों के लिए किरदारसाज़ी का कामिल नमूना

नौजवानी ख़्वाहिशात, तवानाई और इमकानात का ज़माना है। इसी मरहले में इंसान की शख्सियत या तो बुलंदी हासिल करती है या सतहीत में खो जाती है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अलैहिस सलाम) की ज़िंदगी नौजवानों के लिए यह वाज़ेह करती है कि अस्ल अज़मत न तो जिस्म की ताक़त में है, न ज़बान के हुनर में, न सिर्फ़ तालीम के अतीए में, और न दौलत के दिखावे में। हक़ीक़ी अज़मत किरदार, बसीरत, इस्तिक़लाल और बातिनी पाकीज़गी में है।

इमाम (अलैहिस सलाम) का अंदाज़ नौजवान के अंदर मौजूद सलाहियतों को सिम्त देता है और उसकी शख्सियत को निखारता है।

किरदारसाज़ी का पहला स्तंभ: बंदगी और ख़ुदा से रिश्ता

इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) सैय्यदुस्साजेदीन कहलाए। उनका सज्दा सिर्फ़ जिस्मानी मशक़्क़त या रोज़मर्रा के वज़ाइफ़ का नाम नहीं था। उनकी इबादत ख़ुज़ू से ख़ुदी की तामीर, रियाज़त से किरदार की पाकीज़गी और दुआ से बसीरत की बेदारी का नाम थी।

सहीफ़ा सज्जादिया नौजवान को बताता है कि दुआ महज़ माँगने का अमल नहीं बल्कि रूह और फ़िक्र को बुलंद अहदाफ़ के लिए तैयार करने का ज़रिया है। आज के नौजवान के लिए सफ़र यहीं से शुरू होता है — ख़ालिक़ की मआरिफ़त, दिल की हया और सोच की शफ़ाफ़ियत से।

किरदारसाज़ी का दूसरा स्तंभ: इल्म, फ़हम और बसीरत

इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) का ज़माना फ़िक्री इन्तिशार का ज़माना था। आपने इबादत की आड़ में एक अ़मीक़ इल्मी इंक़लाब बरपा किया। सहीफ़ा सज्जादिया की दुआओं में तौहीद का फ़लसफ़ा, अख़लाक़ का निज़ाम, मआशरती हुक़ूक़, समाजी ज़िम्मेदारियाँ, मआशी तक़सीम और इंसानी अदब सब मौजूद हैं।

आज का नौजवान मुख़्तलिफ आवाज़ों और बेशुमार इत्तिलाआत के हुजूम में मुंतशिर होता है। ऐसे माहौल में इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) का पैग़ाम यह बनता है कि तालीम हासिल करो मगर फ़हम के साथ, सुनो मगर शउर के साथ, देखो मगर बसीरत के साथ। इल्म जब किरदार का हिस्सा बन जाए तो इंसान भी मजबूत होता है और मआशरा भी।

किरदारसाज़ी का तीसरा स्तंभ: अख़लाक़-ए-सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) और इंसानी वक़ार

इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) के अख़लाक़ का हर बाब नौजवान के लिए रौशनी का चराग़ है। दुश्मन के साथ हिल्म, ग़ुलामों पर मेहरबानी, यतीमों व फ़क़ीरों की रातों में ख़ुफ़िया मदद, वालिदैन के हुक़ूक़ में बे-मिसाल एहतराम, बाज़ार में ग़लती करने वाले ताजिर को दरगुज़र, और ज़ालिम के सामने वक़ार के साथ खड़ा रहना — यह सब बताता है कि अख़लाक़ कमज़ोरी नहीं बल्कि ताक़त है। अख़लाक़ ही वह दरवाज़ा है जिससे मआशरे के दिल खुलते हैं और शख्सियत निखरती है।

किरदारसाज़ी का चौथा स्तंभ: सब्र, इस्तिक़ामत और हौसला

कर्बला के बाद जो कुछ इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) पर गुज़रा, वह तारीख़ की सबसे सख़्त आज़माइशों में से था — कैद, भूख, ज़ख़्म, तज़हीक, मेहनत। मगर आपने सब्र का दामन नहीं छोड़ा। यही सबक़ नौजवान को मुश्किलात में क़ुव्वत बख़्शता है।

इम्तेहान आए तो हिम्मत न हारो। नाकामी हो तो गिर कर नहीं बल्कि उठकर देखो। रास्ता रुके तो क़दम बदल दो मगर सफ़र जारी रखो। लोग तंज़ करें तो उनकी बात नहीं, अपने हदफ़ को देखो। हालात इंसान को नहीं बदलते — इंसान हालात को बदलता है।

किरदारसाज़ी का पाँचवाँ स्तंभ: मआशरती ख़िदमत और ज़िम्मेदारी

इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) रातों को मदीना के फ़ुक़रा की मदद किया करते थे। कोई नहीं जानता था पर आसमान गवाह था कि सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) इबादत के साथ ख़िदमत का भी सबक़ दे रहे हैं। आज का नौजवान जब अपने माहौल में कमज़ोर तलबा की मदद, बीमारों की तीमारदारी, समाजी बेदारी, दीनी ख़िदमत और तालीमी रहनुमाई का किरदार अदा करता है, तो गोया इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) के रास्ते पर चल रहा होता है। ख़िदमत वह ज़बान है जो नौजवान को दिलों में महबूब बना देती है।

आज का नौजवान और किरदारसाज़ी का नया सफ़र

दुनिया की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी नौजवान को ज़हनी इन्तिशार, अख़लाक़ी दबाव, समाजी तनहाई और रूहानी कमज़ोरी की तरफ़ ढकेलती है। इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) की विलादत हमें यह समझाती है कि अगर नौजवान अपने अंदर इबादत की पाकीज़गी, इल्म की रौशनी, अख़लाक़ की नरमी और ख़िदमत की गर्मी पैदा कर ले, तो वह न सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी बल्कि पूरे मआशरे की राह बदल सकता है।

यही वह नया सफ़र है जिसकी दावत आज का दिन देता है — एक ऐसा सफ़र जिसकी मंज़िल इंसान के बाहर नहीं बल्कि उसके अंदर है। जहां जीत दूसरों पर नहीं, अपने नफ़्स पर है। जहां बुलंदी शोहरत में नहीं, बल्कि किरदार में है।

इमाम सज्‍जाद (अलैहिस सलाम) की विलादत नौजवानों को याद दिलाती है कि हक़ीक़ी अज़मत किरदारसाज़ी में है — वह किरदार जो सज्दे की रौशनी से चमकता हो, वह बसीरत जो दुआ से परवान चढ़ती हो, वह इल्म जो ख़िदमत में ढल जाए और वह अख़लाक़ जो दिलों को जोड़ने की सलाहियत रखता हो।

आज का नौजवान अगर इस रास्ते का इन्तिख़ाब कर ले तो उसका सफ़र कोई नया कर्बला नहीं लाता, बल्कि एक नई मदीना-ए-हिदायत बसाता है।

लेखकः मौलाना अक़ील रज़ा तुराबी

मुंबई की ख़ोजा शिया इसना अशरी जामा मस्जिद में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे में कहा कि मोमिन की खुशी और ग़म अहले बैत अलैहेमुस्सलाम के अनुसरण में होते हैं, और हमारी फ़त्ह उस अज़ान और नमाज़ के सिलसिले में है जो फ़त्ह-ए-हुसैनी का ऐलान है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई / ख़ोजा शिया इसना अशरी जामा मस्जिद पालागली मुंबई में नमाज़े जुमा 7 नवम्बर 2025 को हुज्जतुल-इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी के नेतृत्व में अदा की गई।
मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की हदीस शरीफ़ “हमारे शिया हमारी खुशी में खुश होते हैं और हमारे ग़म में ग़मगीन होते हैं।” बयान करते हुए फ़रमाया: हमारी न अपनी कोई खुशी है और न ही अपना कोई ग़म है। हम अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की खुशी में खुश होते हैं और उनके ग़म में ग़मगीन होते हैं। कल हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का यौमे शहादत था इसलिए हमने ग़म मनाया, आज इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम का यौमे विलादत है लिहाज़ा हम खुश हैं।

मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने अपने उस्ताद आलिमे दीन अल्लामा सय्यद वसी मोहम्मद (आ) का तज़किरा करते हुए फ़रमाया: जब उनकी वालिदा का इंतक़ाल हुआ और हम सब दफ़्न के बाद वापस आए तो वह रात किसी मासूम की विलादत की रात थी। लिहाज़ा मरहूम उस्ताद ने फ़रमाया “आज हम ग़म नहीं मनाएँगे, आज हम मजलिस नहीं करेंगे बल्कि आज की रात महफ़िल होगी जिसमें मैं खुद भी पढ़ूँगा।” क्योंकि हमारे ग़म और खुशी को आले मोहम्मद अलैहिमुस्सलाम की खुशी और ग़म पर कोई फौक़ियत नहीं है। हम उनके ताबे हैं, वे जब खुश होंगे तो हम भी खुश होंगे, और जब वे ग़मगीन होंगे तो हम भी सोगवार होंगे।

इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम के दौर-ए-इमामत के पर-आशूब माहौल का ज़िक्र करते हुए मौलाना सैय्यद अहमद अली आबिदी ने फ़रमाया: वह ऐसा पर-आशूब दौर था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत हो चुकी थी, मक्का और मदीना की हरमतें पामाल हो चुकी थीं, ज़ुल्म का हर तरफ बोलबाला था। लेकिन इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने ऐसे माहौल में भी दीन की इस तरह तबलीग़ और तहफ़्फ़ुज़ फ़रमाया कि आज दीन हम तक पहुँच गया।

अबदुल्लाह बिन जुबैर का ज़िक्र करते हुए मौलाना सैय्यद अहमद अली आबिदी ने कहा कि यह वही अबदुल्लाह है जो अपने बाप की गुमराही का सबब बना। उसको आले मोहम्मद अलैहिमुस्सलाम से इतनी दुश्मनी थी कि यह जुमा के ख़ुत्बों में अहले बैत अलैहिमुस्सलाम का नाम तक नहीं लेता था। इसलिए ऐसी औलाद से पनाह माँगनी चाहिए जो अपने वालिदैन की गुमराही का सबब बने।

मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने आगे फ़रमाया: यही अबदुल्लाह बिन जुबैर ने इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम से वाक़ेआ-ए-कर्बला के बाद पूछा: कौन जीता? तो इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: जब अज़ान का वक़्त हो और अज़ान दी जाए और नमाज़ पढ़ी जाए तो समझ जाना कि हम आले मोहम्मद (अलैहिमुस्सलाम) जीत गए हैं। यह अज़ान हमारी फ़तेह का ऐलान है, यानी यह अज़ान फ़तेहे हुसैनी का ऐलान है।

 

 

विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) के अनुसार, फिलहाल रोज़ाना औसतन 145 इमदादी ट्रक ग़ज़्ज़ा में दाख़िल हो रहे हैं, हालाँकि समझौते के अनुसार यह संख्या कम से कम 600 ट्रक होनी चाहिए।

ग़ज़्ज़ा में सर्दी ने पहले से मौजूद मानवीय त्रासदी को और ज़्यादा संगीन बना दिया है। अंतर्राष्ट्रीय सहायता संगठन मुसलसल मांग कर रहे हैं कि इसराईल फ़ौरी तौर पर ग़ज़्ज़ा पर लगी पाबंदियाँ खत्म करे ताकि इमदादी सामान की पहुंच बिना रुकावट मुमकिन हो सके। हज़ारों बेघर फलस्तीनी इस वक़्त ख़ैमों में सख़्त खाद्य सामाग्री की किल्लत और बुनियादी सहूलतों की कमी से दोचार हैं।

संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) की वक्ता अबीर अतीफ़ा के अनुसार, “हम वक़्त के ख़िलाफ़ दौड़ में हैं, सर्दी क़रीब है और लोग भूख से तड़प रहे हैं।” उनका कहना है कि युद्ध विराम के बावजूद इमदाद की मिक़दार ज़रूरत के मुकाबले में निहायत कम है। ग़ज़्ज़ा अधिकारियी के अनुसार, युद्ध विराम के बाद रोज़ाना औसतन 145 ट्रक इमदादी सामान लेकर दाख़िल हो रहे हैं, जबकि निर्धारित समझौते के तहत यह तादाद कम से कम 600 ट्रक होनी चाहिए।

उधर अरब मीडिया के अनुसार, हमास ने एक इसराईली क़ैदी की लाश इंटरनेशनल कमेटी ऑफ़ रेड क्रॉस के ज़रिए इसराईल के हवाले कर दी है। इसराईल के प्रधानमंत्री के कार्यलाय ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि अब भी छः मजीद क़ैदियों की लाशें ग़ज़्ज़ा में मौजूद हैं। इसराईली हुकूमत का कहना है कि जब तक तमाम लाशें वापस नहीं मिलतीं, इंसानी इमदाद की आज़ादाना फराहमी के वादे पर अमल नहीं किया जाएगा।

इसी दौरान इसराईली फौज ने केंद्रीय ग़ज़्ज़ा में दो फलस्तीनियों को इस आरोप में शहीद कर दिया कि वे युद्ध विरीम की सीमा के क़रीब पहुँच गए थे। इसराईल का दावा है कि हमास ने मुआहदे की ख़िलाफ़वर्ज़ी की है, जबकि हमास का कहना है कि तबाहशुदा इलाक़ों में लाशों की तलाश मुश्किल है और इसराईल खुद भारी मशीनरी और इमदादी साज़ो-सामान के दाख़िले की इजाज़त नहीं दे रहा।

मानवधिकार संगठनो ने ख़बरदार किया है कि अगर इमदादी रास्ते फ़ौरी तौर पर न खोले गए तो ग़ज़्ज़ा में अकाल और बीमारियों का ख़तरा संगीन सूरत इख़्तियार कर सकता है।

बहरैन सरकार ने लगातार 57वें हफ्ते भी अल देराज़ क्षेत्र में केंद्रीय जुमआ की नमाज के आयोजन पर रोक लगा दी। आंतरिक मंत्रालय से जुड़े सशस्त्र बलों और अर्ध-सैन्य बलों के कर्मियों ने शहर को पूरी तरह से घेर कर शिया नागरिकों को इमाम सादिक मस्जिद में जुमआ की नमाज अदा करने से मना कर दिया।

बहरैन सरकार ने लगातार 57वें हफ्ते भी अद्दीराज क्षेत्र में केंद्रीय जुमा की नमाज के आयोजन पर रोक लगा दी। आंतरिक मंत्रालय से जुड़े सशस्त्र बलों और अर्ध-सैन्य बलों के कर्मियों ने शहर को पूरी तरह से घेर कर शिया नागरिकों को इमाम सादिक मस्जिद में जुमआ की नमाज अदा करने से मना कर दिया।

7 नवंबर, 2025 की सुबह से ही अद्दीराज के आसपास बख्तरबंद वाहनों, सशस्त्र कर्मियों और सुरक्षा बलों की बड़ी संख्या में तैनाती कर दी गई ताकि किसी भी सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन को रोका जा सके। यह कदम इस आशंका के तहत उठाए गए कि नागरिक धार्मिक घेराबंदी, गाजा के लोगों के साथ एकजुटता जताने और इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में बहरैनी लोगों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन करते हुए सरकार द्वारा धार्मिक स्वतंत्रताओं पर लगाई गई पाबंदियों और शिया मुसलमानों के धार्मिक प्रतीकों को सीमित करने की नीतियों की निंदा की। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे धार्मिक मामलों पर सरकारी दखल और लंबे समय से जारी सांप्रदायिक दबाव को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे।

प्रतिभागियों ने राजनीतिक कैदियों की तत्काल रिहाई और जेलों में कैदियों पर जारी व्यवस्थित उत्पीड़न की नीति के खात्मे की मांग की। उन्होंने केंद्रीय जेल "जो" में शिया मुसलमानों की आस्थाओं का अपमान और समुदाय विरोधी व्यवस्थित कार्रवाइयों की भी कड़ी निंदा की।

विरोध प्रदर्शनकारियों ने गाजा के लोगों पर इजरायली घेराबंदी और भूखमरी की भी कड़े शब्दों में निंदा की, और बहरीन सरकार से मांग की कि वह इजरायल के साथ संबंध तुरंत तोड़े, कब्जे वाले राज्य के राजदूत को देश से निकाले और मनामा में इजरायली दूतावास बंद करे।

विरोध प्रदर्शन में शामिल प्रतिभागियों ने अंत में लेबनान, गाजा, यमन और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान में इस्लामिक प्रतिरोध धुरी का पूर्ण समर्थन करने की घोषणा की और हिजबुल्लाह के शहीद महासचिव सैय्यद हसन नसरुल्लाह के प्रति अपनी वफादारी दोहराई।

जामिअतुल मुस्तफा अल आलमिया के उस्ताद और ईरान के प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन डॉ. नासिर रफीई ने कहा कि पारिवारिक जीवन शैली और आपसी प्यार ही इस्लामी समाज की मजबूती की नींव है, जबकि पश्चिमी जीवन शैली ने दुनिया भर में पारिवारिक व्यवस्था को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया है।

जामिअतुल मुस्तफा अल-आलमिया के तरीख के प्रिंसिपल और ईरान के प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन डॉ. नासिर रफीई ने कहा कि पारिवारिक जीवन शैली और आपसी प्यार ही इस्लामी समाज की मजबूती की नींव है, जबकि पश्चिमी जीवन शैली ने दुनिया भर में पारिवारिक व्यवस्था को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया है।

उन्होंने खुमैन शहर में अय्याम-ए-फातिमिया की चौथी रात की मजलिस को संबोधित करते हुए कहा कि यह दिन रहमत और मग़फिरत के हैं और हमें चाहिए कि हज़रत फातिमा जहरा सल्लल्लाहो अलैहा की शफाअत के तलबगार रहें। उन्होंने कहा कि आज के समाज को "फातिमी जीवन शैली" के अध्ययन और उसे व्यवहार में लाने की सख्त जरूरत है।

हुज्जतुल इस्लाम रफीई ने स्पष्ट किया कि हज़रत जहरा सल्लल्लाहो अलैहा इबादत, घर की जिम्मेदारी, समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति के मैदान में पूरा इस्लामी नमूना हैं। इस्लाम ने परिवार को सुकून और प्यार का केंद्र बनाया है जबकि पश्चिम ने आज़ादी और आधुनिकता के नाम पर इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया है, जिसका नतीजा तलाक, बेराहवी और औलाद से बेरगबी के रूप में सामने आया है।

उन्होंने कुरान की कई आयतों जैसे आयत-ए-तत्हीर, मुबाहिला, मावद्दत, सूरह कौसर और सूरह दहर का हवाला देते हुए कहा कि ये सभी आयतें अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के परिवार की अज़मत और पाकीज़गी को साफ करती हैं और बताती हैं कि परफेक्ट पारिवारिक व्यवस्था इसी घराने से सीखी जा सकती है।

हौज़ा के शिक्षक ने कहा कि ज़ुबानी और अमली मुहब्बत, तआवुन, हया और एहतराम, सादगी, माफी और दरगुजर, और शुक्रगुज़ारी वो तत्व हैं जो परिवार को कायम रखते हैं, और ये सभी खूबियाँ हज़रत अली अलैहिस्सलाम और हज़रत जहरा सल्लल्लाहो अलैहा की ज़िंदगी में नुमायाँ हैं। उन्होंने आगे कहा कि अगर पति-पत्नी आपसी प्यार, कुर्बानी, सब्र और सादा जीवन शैली को अपनाएँ तो खुदावंद-ए-आलम उनकी ज़िंदगी में बरकत और सुकून नाज़िल करता है।

अंत में हुज्जतुल इस्लाम रफीई ने जोर देकर कहा कि फातिमी परिवार ही मिसाली इस्लामी समाज का परफेक्ट नमूना है, और जो शख्त सुकून और इज़्ज़त भरी ज़िंदगी चाहता है, उसे इसी जीवन शैली को अपनी अमली ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहिए।

नौ वर्ष की आयु तक हज़रत फ़ातिमा सला मुल्ला अलैहा अपने पिता के घर पर रहीं।जब तक उनकी माता हज़रत ख़दीजा स.ल. जीवित रहीं वह गृह कार्यों मे पूर्ण रूप से उनकी साहयता करती थीं। तथा अपने माता पिता की अज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करती थीं

नौ वर्ष की आयु तक हज़रत फ़ातिमा सला मुल्ला अलैहा अपने पिता के घर पर रहीं।जब तक उनकी माता हज़रत ख़दीजा स.ल. जीवित रहीं वह गृह कार्यों मे पूर्ण रूप से उनकी साहयता करती थीं। तथा अपने माता पिता की अज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करती थीं

आदर्श पुत्री:

नौ वर्ष की आयु तक हज़रत फ़ातिमा सला मुल्ला अलैहा अपने पिता के घर पर रहीं।जब तक उनकी माता हज़रत ख़दीजा जीवित रहीं वह गृह कार्यों मे पूर्ण रूप से उनकी साहयता करती थीं। तथा अपने माता पिता की अज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करती थीं।

अपनी माता के स्वर्गवास के बाद उन्होने अपने पिता की इस प्रकार सेवा की कि पैगम्बर आपको उम्मे अबीहा कहने लगे। अर्थात माता के समान व्यवहार करने वाली। पैगम्बर आपका बहुत सत्कार करते थे। जब आप पैगम्बर के पास आती थीं तो पैगमबर आपके आदर मे खड़े हो जाते थे, तथा आदर पूर्वक अपने पास बैठाते थे।

जब तक वह अपने पिता के साथ रही उन्होने पैगमबर की हर आवश्यकता का ध्यान रखा। वर्तमान समय मे समस्त लड़कियों को चाहिए कि वह हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा का अनुसरण करते हुए अपने माता पिता की सेवा करें।

आदर्श पत्नि:

हज़रत फ़तिमा संसार मे एक आदर्श पत्नि के रूप मे प्रसिद्ध हैं। उनके पति हज़रत अली ने विवाह उपरान्त का अधिकाँश जीवन रण भूमी या इस्लाम प्रचार मे व्यतीत किया। उनकी अनुपस्थिति मे गृह कार्यों व बच्चों के प्रशिक्षण का उत्तरदायित्व वह स्वंय अपने कांधों पर संभालती व इन कार्यों को उचित रूप से करती थीं।

ताकि उनके पति आराम पूर्वक धर्मयुद्ध व इस्लाम प्रचार के उत्तर दायित्व को निभा सकें। उन्होने कभी भी अपने पति से किसी वस्तु की फ़रमाइश नही की। वह घर के सब कार्यों को स्वंय करती थीं। वह अपने हाथों से चक्की चलाकर जौं पीसती तथा रोटियां बनाती थीं।

वह पूर्ण रूप से समस्त कार्यों मे अपने पति का सहयोग करती थीं। पैगम्बर के स्वर्गवास के बाद जो विपत्तियां उनके पति पर पड़ीं उन्होने उन विपत्तियों मे हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सहयोग मे मुख्य भूमिका निभाई। तथा अपने पति की साहयतार्थ अपने प्राणो की आहूति दे दी।

जब हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा का स्वर्गवास हो गया तो हज़रत अली ने कहा कि आज मैने अपने सबसे बड़े समर्थक को खो दिया।

आदर्श माता:

हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने एक आदर्श माता की भूमिका निभाई उनहोनें अपनी चारों संतानों को इस प्रकार प्रशिक्षत किया कि आगे चलकर वह महान् व्यक्तियों के रूप मे विश्वविख्यात हुए। उनहोनें अपनी समस्त संतानों को सत्यता, पवित्रता, सदाचारिता, वीरता, अत्याचार विरोध, इस्लाम प्रचार, समाज सुधार, तथा इस्लाम रक्षा की शिक्षा दी।

वह अपने बच्चों के वस्त्र स्वंय धोती थीं व उनको स्वंय भोजन बनाकर खिलाती थीं। वह कभी भी अपने बच्चों के बिना भोजन नही करती थीं। तथा सदैव प्रेम पूर्वक व्यवहार करती थीं।

उन्होंने अपनी मृत्यु के दिन रोगी होने की अवस्था मे भी अपने बच्चों के वस्त्रों को धोया, तथा उनके लिए भोजन बनाकर रखा। संसार की समस्त माताओं को चाहिए कि वह हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा का अनुसरण करे तथा अपनी संतान को उच्च प्रशिक्षण द्वारा सुशोभित करें

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में शुक्रवार को एक दर्दनाक हादसा उस समय हुआ जब एक स्कूल परिसर के भीतर स्थित मस्जिद में जुमे की नमाज़ के दौरान अचानक धमाका हो गया। इस धमाके में 54 लोग घायल हो गए, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। स्थानीय प्रशासन और बचाव दल ने तुरंत मौके पर पहुंचकर राहत कार्य शुरू किया।

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में शुक्रवार को एक दर्दनाक हादसा उस समय हुआ जब एक स्कूल परिसर के भीतर स्थित मस्जिद में जुमे की नमाज़ के दौरान अचानक धमाका हो गया। इस धमाके में 54 लोग घायल हो गए, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। स्थानीय प्रशासन और बचाव दल ने तुरंत मौके पर पहुंचकर राहत कार्य शुरू किया।

पुलिस के अनुसार, धमाके का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है। हालांकि, जांच के शुरुआती चरण में 17 वर्षीय एक युवक को संदिग्ध आरोपी के रूप में पहचाना गया है। स्थानीय पुलिस प्रमुख आसेप एदी सुहेरी ने बताया कि अब तक मिली प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक लगभग 54 लोग इस धमाके से प्रभावित हुए हैं और तीन लोगो कि मौत हुई है। उन्होंने कहा कि “कुछ लोगों को हल्की चोटें आई हैं, कुछ को मध्यम चोटें हैं, जबकि कुछ को इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई है।

पुलिस और बम निरोधक दस्ते ने घटना स्थल की गहन जांच की। जांच के दौरान मस्जिद के पास कुछ खिलौना राइफलें और एक खिलौना बंदूक बरामद की गई हैं, जिससे यह संभावना जताई जा रही है कि धमाके की प्रकृति पारंपरिक विस्फोटक जैसी नहीं थी। पुलिस प्रमुख ने कहा कि यह पता लगाने के लिए जांच जारी है कि धमाका किसी रासायनिक प्रतिक्रिया, गैस लीक, या किसी अन्य वजह से हुआ।

इस घटना ने पूरे जकार्ता शहर में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। शुक्रवार की नमाज़ के समय मस्जिदें आम तौर पर भीड़ से भरी होती हैं, इसलिए प्रशासन ने सभी धार्मिक स्थलों की सुरक्षा बढ़ाने का निर्णय लिया है। पुलिस ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और जांच पूरी होने तक धैर्य रखने की अपील की है।

गुरुवार, 06 नवम्बर 2025 15:35

हज़रत फ़ातेमा की शहादत

शाफीक मां हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत का दिन है। हालांकि इस महान हस्ती ने इस नश्वर संसार में बहुत कम समय बिताया किन्तु उनका अस्तित्व इस्लाम और मुसलमानों को बहुत से फ़ायदे पहुंचने का आधार बना। ऐसी महान हस्ती के जीवन व व्यक्तित्व की समीक्षा से किताबें भरी हुयी हैं और उनके जीवन से बहुत से पाठ मिलते हैं जैसे धर्मपरायणता, ईश्वर से भय तथा उन्हें जीवन को अल्लाह की राह में और इबादत में बिता देना।

शाफीक मां हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत का दिन है। हालांकि इस महान हस्ती ने इस नश्वर संसार में बहुत कम समय बिताया किन्तु उनका अस्तित्व इस्लाम और मुसलमानों को बहुत से फ़ायदे पहुंचने का आधार बना। ऐसी महान हस्ती के जीवन व व्यक्तित्व की समीक्षा से किताबें भरी हुयी हैं और उनके जीवन से बहुत से पाठ मिलते हैं जैसे धर्मपरायणता, ईश्वर से भय तथा उन्हें जीवन को अल्लाह की राह में और इबादत में बिता देना।

इस दुखद अवसर पर हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के जीवन के मूल्यवान आयाम पर चर्चा करेंगे और ईश्वर से अपने लिए इस महान हस्ती को आदर्श बनाने की कामना करते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम सबसे अधिक हज़रत फ़ातेमा ज़हरा से स्नेह करते थे और आपका पवित्र वंश हज़रत फ़ातेमा ज़हरा से चला। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का प्रशिक्षण ईश्वरीय दूत के घर में हुआ। उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की ज़बान से क़ुरआन को सुना और उसके आदेशों को व्यवहार में उतार कर अपनी आत्मा को सुशोभित कर लिया।

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के व्यक्तित्व ऐसे गुणों से सुसज्जित हैं कि कोई और महिला उनके स्तर तक पहुंचती ही नहीं। इसलिए पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें लोक-परलोक की महिलाओं की सरदार का ख़िताब दिया। इसके साथ ही हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अरब प्रायद्वीप की तत्कालीन कलाओं से परिचित थीं। जैसा कि कुछ युद्धों में अपने पिता पैग़म्बरे इस्लाम के जख़्मों पर बहुत ही अच्छे ढंग से मरहम-पट्टी करती थीं। घर का काम भी बिना किसी की सहायता के करती थीं।

उन्होंने अपने बच्चों का श्रेष्ठ ढंग से प्रिशिक्षण किया और ऐसे किसी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती थीं जिससे उनका और उनके परिवार का संबंध न हो। सिर्फ़ आवश्यकता पड़ने पर ही वे बात करती थीं और जब तक उनसे कोई कुछ नहीं पूछता उस समय तक उत्तर नहीं देती थीं।
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की महानता के बारे में बहुत से कथन पाए जाते हैं।

अबु अब्दिल्लाह मोहम्मद बिन इस्माईल बुख़ारी सुन्नी समुदाय की सबसे प्रसिद्ध किताबों से एक सही बुख़ारी में पैग़म्बरे इस्लाम के एक कथन का उल्लेख करते हैं जिसमें उन्होंने कहाः फ़ातेमा मेरा टुकड़ा है जिसने उन्हें क्रोधित किया उसने मुझे क्रोधित किया। बुख़ारी एक और स्थान पर कहते हैः फ़ातेमा स्वर्ग की महिलाओं की सरदार हैं।

सुन्नी समुदाय के एक और बड़े धर्मगुरु अहमद इब्ने हंबल कि जिनके मत के अनुसरण करने वाले हंबली कहलाते हैं, अपनी किताब के तीसरे खंड में मालिक बिन अनस के हवाले से एक कथन का उल्लेख करते हैः पैग़म्बरे इस्लाम पूरे छह महीने तक जब वे सुबह की नमाज़ के लिए जाते तो हज़रत फ़ातेमा के घर से गुज़रते और कहते थेः नमाज़ नमाज़ हे परिजनो! और फिर पवित्र क़ुरआन के अहज़ाब नामक सुरे की 33 वीं आयत की तिलावत करते थे जिसमें ईश्वर कह रहा हैः हे पैग़म्बर परिजनो!

ईश्वर का इरादा यह है कि आपसे हर बुराई को दूर रखे और इस तरह पवित्र रखे जैसा पवित्र होना चाहिए।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की एक पत्नी हज़रत आयशा के हवाले से इस्लामी इतिहास में आया है। वह कहती हैः मैंने बात करने में पैग़म्बरे इस्लाम से समानता में हज़रत फ़ातेमा जैसा किसी को नहीं देखा। वह जब भी अपने पिता के पास आती थीं तो पैग़म्बर उनके सम्मान में अपने स्थान से उठ जाते थे, उनके हाथ चूमते थे, उनका हार्दिक स्वागत करते थे और उन्हें अपने विशेष स्थान पर बिठाते थे और जब भी पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत फ़ातेमा के यहां जाते थे तो वह भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार करती थीं।

प्रसिद्ध धर्म गुरु फ़ख़रूद्दीन राज़ी ने पवित्र क़ुरआन के कौसर नामक सूरे की व्याख्या में कौसर से तात्पर्य कई बातें बताई हैं जिनमें से एक हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के वंश से पैग़म्बरे इस्लाम के वंश का आगे बढ़ना है। वह कहते हैः यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम के शत्रुओं की ताने के जवाब में है जो पैग़म्बरे इस्लाम को अबतर कहते थे जिसका अर्थ हैः निःसंतान। इस आयत का उद्देश्य यह है कि ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम को ऐसा वंश देगा जो सदैव बाक़ी रहेगा।

ध्यान देने से स्पष्ट हो जाता है कि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन बड़ी संख्या में मारे गए किन्तु अभी भी पूरे संसार में वे बाक़ी हैं। जबकि बनी उमय्या परिवार में कि जिनके बच्चों की संख्या बहुत थी इस समय कोई उल्लेखनीय व्यक्ति नहीं है किन्तु पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के बच्चों को देखें तो इमाम मोहम्मद बाक़िर, इमाम जाफ़र सादिक़, इमाम मूसा काज़िम, इमाम रज़ा इत्यादि जैसे महाविद्वान व महान हस्तियां आज भी अमर हैं।

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का अस्तित्व विभिन्न आयामों से पूरी दुनिया के लोगों के लिए आदर्श है और शीया, सुन्नी तथा ईसाई विद्वानों तथा पूर्वविदों ने उनके जीवन की समीक्षा की है।
फ़्रांसीसी विचारक हेनरी कॉर्बेन की गिनती पश्चिम के बड़े दार्शनिकों में होती है। उन्होंने भी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के जीवन की समीक्षा की है। हेनरी कॉर्बेन ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के जीवन को ईश्वर की पूर्ण पहचान का माध्यम बताया है। उन्होंने अपनी एक किताब में कि जिसका हिन्दी रूपांतर आध्यात्मिक दुनिया है, हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के बारे में लिखा हैः हज़रत फ़ातेमा के अस्तित्व की विशेषताओं पर यदि ध्यान दिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि उनका अस्तित्व ईश्वर के अस्तित्व का प्रतिबिंबन है।

प्रसिद्ध फ़्रांसीसी पूर्वविद व शोधकर्ता लुई मैसिन्यून ने अपने जीवन का एक कालखंड हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के व्यक्तित्व के बारे में शोध पर समर्पित किया और उन्होंने इस संदर्भ में बहुत प्रयास किए हैं। उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम और नजरान के ईसाइयों के बीच मुबाहेला नामक घटना के संबंध में एक शोधपत्र लिखा है जो मदीना में घटी थी। इस लेख में उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर संकेत किया है। वे अपने शोध-पत्र में कहते हैः हज़रत इब्राहीम की प्रार्थना में हज़रत फ़ातेमा के वंश से बारह प्रकाश की किरणों का उल्लेख है... तौरैत में मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और उनकी महान सुपुत्री और हज़रत इस्माईल और हज़रत इस्हाक़ जैसे दो सुपुत्र हसन और हुसैन की शुभसूचना है और हज़रत ईसा की इंजील अहमद सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के आने की शुभसूचना देती है जिनके एक महान बेटी होगी।

क़ाहेरा विश्वविद्यालय में इस्लामी इतिहास के शिक्षक डाक्टर अली इब्राहीम हसन भी हज़रत फ़ातेमा की प्रशंसा में कहते हैः हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का जीवन इतिहास के स्वर्णिम पन्ने हैं।
उन पन्नों में उनके महान जीवन के विभिन्न पहलुओं को हम देखते हैं किन्तु वह बिलक़ीस या क़्लुपित्रा जैसी नहीं हैं कि जिनका वैभव उनके बड़े सिंहासन, अथाह संपत्ति व अद्वितीय सौंदर्य में दिखाई देता है और उनका साहस लश्कर भेजने और पुरुषों का नेतृत्व करने में नहीं है बल्कि हमारे सामने ऐसी हस्ती है जिनका वैभव पूरी दुनिया में फैला हुआ है। ऐसा वैभव जिसका आधार धन-संपत्ति नहीं बल्कि आत्मा की गहराई से निकला आध्यात्म है।

सुलैमान कतानी नामक ईसाई लेखक, कवि और साहित्यकार ने, जो इस्लामी हस्तियों को पहचनवाने से संबंधित बहुत सी प्रसिद्ध किताबें लिखी हैं, अपनी एक किताब में जिसका हिन्दी रुपान्तरः फ़ातेमा ज़हरा नियाम में छिपी तलवार है, लिखते हैः हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का स्थान इतना ऊंचा है कि उसके लिए ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का उल्लेख किया जाए। उनकी हस्ती के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वह मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की बेटी, अली अलैहिस्सलाम की पत्नी, हसन और हुसैन अलैहेमस्सलाम की मां और संसार की महान महिला हैं।

सुलैमान कतानी अपनी किताब के अंत में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा को संबोधित करते हुए कहते हैः हे मुस्तफ़ा की बेटी फ़ातेमा! हे धरती की सबसे प्रकाशमय हस्ती। आप ज़मीन पर केवल दो बार मुस्कुराईं। एक बार पिता के चेहरे पर जब वह परलोक सिधारने वाले थे और उन्होंने आपको इस बात की शुभसूचना दी थी कि तुम मुझसे मिलने वाली पहली हस्ती होगी और दूसरी बार आप उस समय मुस्कुराईं जब आप इस नश्वर संसार को छोड़ कर जा रही थीं।

आपका जीवन स्नेह से भरा रहा। आपने पवित्र व चरित्रवान जीवन बिताया। सबसे पवित्र मां जिसने दो फूल को जन्म दिए, उनका प्रशिक्षण किया और उन्हें दूसरों को क्षमा करना सिखाया। आपने इस धरती को व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट के साथ विदा कहा और अमरलोक सिधार गयीं हे पैग़म्बर की बेटी! हे अली की पत्नी! हे हसन और हुसैन की मां! और हे सभी संसार व युग की महान महिला!

इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के महान व्यक्तित्व की इन शब्दों में प्रशंसा करते हैः मुसलमान महिलाओं को चाहिए कि अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और पारिवारिक जीवन में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के जीवन को बुद्धिमत्ता और ईश्वरीय पहचान की दृष्टि से आदर्श बनाएं और प्रार्थना, उपासना, इच्छाओं से संघर्ष, मंच पर उपस्थिति, सामाजिक, पारिवारिक, दांपत्य जीवन और बच्चों के प्रशिक्षण से संबंधित बड़े फ़ैसलों में उनका अनुसरण करें क्योंकि इस्लाम की इस महान हस्ती का जीवन यह दर्शाता है कि मुसलमान महिला राजनैतिक व व्यवसायिक मंच पर उपस्थिति और साथ ही समाज में शिक्षा, उपासना, दांपत्य जीवन और बच्चों के प्रशिक्षण के साथ सक्रिय भूमिका निभाने में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की अनुसरणकर्ता बन सकती है और ईश्वर के महान पैग़म्बर की महान बेटी को अपना आदर्श बना दे

अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की विलायत और मज़लूमियत-ए-हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा इस्लाम की तारीख़ के वो दो रोशन बाब हैं जिनमें हक़ और बातिल की तमीज़ हमेशा वाज़ेह रही है। मगर सदा अफ़सोस कि इन्हीं दो हक़ीक़तों को उम्मत ने सबसे ज़्यादा फरामोश कर दिया।

अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम की विलायत और मज़लूमियत-ए-हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा इस्लाम की तारीख के वो दो रोशन बाब हैं जिनमें हक़ और बातिल का फर्क़ हमेशा वाज़ेह रहा है। मगर सदा अफ़सोस कि इन्हीं दो हक़ीक़तों को उम्मत ने सबसे ज़्यादा फरामोश कर दिया।

आज हमारी हालत ये है कि अभी ग़दीर नहीं आती कि हम आशूरा के रोज़ों का शुमार शुरू कर देते हैं, मगर ग़दीर जो कि विलायत की ईद है, उसके लिए कोई एहतमाम नहीं। गोया हमें इस ईद की हक़ीक़त का शऊर ही नहीं।

हालाँकि ग़दीर वो दिन है जिसके लिए हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने खुद को और अपने फ़र्ज़ंदों को क़ुर्बान कर दिया। ग़दीर उनके नज़दीक महज़ एक वाक़ेआ नहीं बल्कि ईमान का महवर थी — क्योंकि ये दिन अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की विलायत का एलान था, और यही विलायत दीन की रूह है।

मगर अफ़सोस! उम्मत ने इसी विलायत को भुला दिया और इसी के मुक़ाबिल क़ियाम करने वालों को मुक़द्दस बना दिया।

यही वो मक़ाम है जहां तारीख़ चीख़ चीख़ कर कहती है कि जब दलील खत्म हो जाती है, ज़ुबान गाली देने लगती है।

हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का मसअला महज़ एक तारीखी सानिहा नहीं बल्कि एक फ़िक्री आज़माइश है।

जिस तरह मसअला-ए-ग़दीर में गुफ़्तगू इल्मी बुनियादों पर हो सकती है — दलील के साथ, आयत के साथ, रिवायत के साथ — लेकिन जब बात फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा पर ज़ुल्म की आती है, वहां मुख़ालिफ़ के पास कोई दलील बाक़ी नहीं रहती।

क्योंकि अगर वो हक़ीक़त को तस्लीम करे तो अपने अ़क़ीदे की बुनियाद हिल जाती है। इसी बेबसी में वो गाली का सहारा लेता है, और यही फ़ुक़दान-ए-बुरहान की अलामत है।

वो कहता है: "फातिमा (अ) के घर में अमवाल-ए-बैतुलमाल बंद थे!"

ये कितना बड़ा झूठ और कितना बड़ा बहुतान-ए-अज़ीम है। क़ुरआन ने ऐसे ही लोगों के बारे में फ़रमाया: "व बि कुफ़्रिहिम वा क़ौलिहिम अला मर्यम बहुतानन अज़ीमा" और हम भी कहते हैं: "व बि कुफ़्रिहिम वा क़ौलिहिम अला फातिमा बहुतानन अज़ीमा"

ये इल्ज़ाम सिर्फ़ नासिबी लगा सकते हैं। इब्ने तैमिया और उसके पैरोक़ारों ने इसी ज़ुबान में ज़हर उगला, और अब्दुलअज़ीज़ देहलवी जैसे लोगों ने उसे "फ़ज़ीलत" के लिबास में पेश किया।

ये वो लोग हैं जो एक तरफ़ तो आयशा (रज़ि) के नाम के ज़िक्र पर भी ग़ैरत दिखाते हैं, मगर दूसरी तरफ़ नबी (स) की बेटी पर तोहमत लगाने में आर महसूस नहीं करते।

तारीख़ में ये तज़ाद खुल कर सामने आता है।

सयूती नक़्ल करता है कि अगर कोई फ़क़ीह ये कहे कि "औरत की गवाही आधे मर्द के बराबर है, हत्ता कि अगर वो आयशा ही क्यों न हो" — तो उसके नज़दीक ये गुस्ताख़ी है, और ऐसे शख़्स का मुँह तोड़ देना चाहिए। मगर जब फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की बात आती है, तो यही लोग उनके घर को "घर-ए-ओबाश" कहने से नहीं झिझकते!

ये वही दलील से महरूम ज़ेहन हैं जो तकद्दुस के मयार अपनी मरज़ी से बदल लेते हैं।

यही लोग कहते हैं: "यारान-ए-पैग़म्बर पर कोई तनक़ीद नहीं कर सकता, चाहे वो एक लमह के लिए ही रसूल (स) के क़रीब रहा हो।" मगर जब इन्हीं के हाथों नबी (स) की बेटी पर ज़ुल्म होता है, तो सब ख़ामोश रहते हैं।

अब्दुल्लाह बिन मुबारक, जो ताबेईन में से हैं, से पूछा गया:

"उमर बिन अब्दुलअज़ीज़ बेहतर हैं या मुआविया?"

उसने कहा: "तुमने बेअदबी की! मुआविया के घोड़े की नाक में जो ग़ुबार गया, वो सौ उमर बिन अब्दुलअज़ीज़ से बेहतर है!"

देखिए कैसा अंधा तअस्सुब है — एक ऐसा शख़्स जो फत्ह-ए-मक्का के बाद मजबूरन मुसलमान हुआ, उसके घोड़े का ग़ुबार भी मुक़द्दस ठहरता है, मगर फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा, जो नबी (स) की रूह का हिस्सा हैं, उनके घर को "महल-ए-फ़साद" कहा जाता है!

क्या ये ईमान है? या बातिल के दिफ़ा का जुनून?

हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का क़ियाम महज़ एक एहतिजाज नहीं था, बल्कि विलायत की बाक़ा का एलान था। उन्होंने दुनिया को बताया कि हक़ ख़ामोश नहीं रह सकता। उनका गरिया, उनकी फ़रियाद, उनका ख़ुत्बा — सब विलायत की सदा थे। और यही सदा थी जिससे बातिल लरज़ उठा। जब दलील उनके पास न रही, तो उन्होंने फातिमा (स) की आवाज़ को ख़ामोश करने की कोशिश की। मगर आज चौदह सदियाँ बाद भी ज़हरा (अ) की सदा-ए-हक़ ज़िंदा है, और उनके क़ियाम ने बातिल का चेहरा हमेशा के लिए बेनकाब कर दिया।

सलाम हो उस हस्ती पर, जिसने दलील-ए-हक़ बनकर बातिल की तमाम दलीलों को बातिल कर दिया। सलाम हो फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा पर — महवर-ए-विलायत, मज़लूमा-ए-तारीख़, और सदा-ए-अबदी-ए-हक़।

लेखकः मौलाना सय्यद मंज़ूर अली नक़वी

शिया उलेमा काउंसिल ऑस्ट्रेलिया के सदर और इमाम जुमा मेलबर्न हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद अबू अल-क़ासिम रिज़वी ने मलाइशिया की मार्कज़ी व कदीम तरीन इमाम बारगाह बाब अल-हिदायत में अय्याम-ए-अज़ा-ए-फातिमिया की मजलिसों से खिताब करते हुए कहा कि जनाब फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की सीरत दुनिया की तमाम खवातीन के लिए बेहतरीन नमूना-ए-अमल है।

मलाइशिया की ऐतिहासिक इमाम बारगाह बाब अल-हिदायत में अय्याम-ए-अज़ा-ए-फातिमिया की मजलिसें जारी हैं, जिनमें हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद अबू अल-क़ासिम रिज़वी, सदर शिया उलेमा काउंसिल ऑस्ट्रेलिया और इमाम जुमा मेलबर्न "फातिमा की जिंदगी: दुनिया की तमाम महिलाओं के लिए नमूना-ए-अमल" के शीर्षक से संबोधित कर रहे हैं।

मौलाना अबू अल-क़ासिम रिज़वी ने अपने भाषण में ज़ोर देते हुए कहा कि "जनाब फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की सीरत पर बातचीत करना काफी नहीं है, बल्कि हमें उनकी तालीमात पर अमल करके अपनी दुनिया को जन्नत बनाना चाहिए।"

उन्होंने अफ़सोस का इज़हार करते हुए कहा कि "आज रिश्तों का एहतराम खत्म हो रहा है, तलाकें आम हो गई हैं, हुक़ूक़ पामाल किए जा रहे हैं, फिर भी हम खुद को फातिमी समाज कहते हैं।"

मौलाना ने वज़ाहत की कि "फातिमी समाज वही है जो दीन्दार और जिम्मेदार हो, जहां किसी का हक न पामाल हो। हम फदक की बात करते हैं मगर अपनी बहनों और बेटियों को उनके हकूक़ नहीं देते, ये रवैया फातिमी तर्ज़-ए-जिंदगी के खिलाफ है।"

उन्होंने आखिर में कहा कि "जनाब फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा पहली शहीदा-ए-राह-ए-विलायत हैं, जिन्होंने अपने अमल और इस्तेक़ामत के ज़रिए मुनाफिक़ों को बेनकाब किया और विलायत के दिफ़ा की लाजवाल मिसाल क़ायम की।"