رضوی

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सूडान आख़िर आतंकी इस्राईली शासन का निशाना क्यों है, जबकि वह अपनी छवि बचाने के लिए इस्राईली दज्ज़ाली शैतानों का प्यादा, मिनी अमीराती दज्जाल बिन ज़ायेद, (UAE) को सामने रखता है जो ख़ुद अब एक क़ब्ज़ाधारी शैतान बन गया हैं।

इस्राईली दज्ज़ाली शैतानों का प्यादा, मिनी अमीराती दज्जाल बिन ज़ायेद, (UAE) को सामने रखता है जो ख़ुद अब एक क़ब्ज़ाधारी शैतान बन गया हैं।

यहाँ सूडान के आधिकारिक आँकड़े हैं जो दिखाते हैं कि यह देश प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज़ से दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है और जो कुछ ज़मीनों में छिपा है, वह इससे भी बड़ा है।

200 मिलियन एकड़ ज़मीन खेती योग्य है, लेकिन फिलहाल सिर्फ़ 64 मिलियन एकड़ पर ही खेती होती है।

115 मिलियन एकड़ प्राकृतिक चरागाह (पशु चरने की भूमि) है।

हर साल 400 अरब घन मीटर (400 बिलियन m³) वर्षा जल गिरता है।

सूडान के पास दुनिया की छठी सबसे बड़ी पशुधन संपत्ति है 13 करोड़ (130 मिलियन) से ज़ियादा पशु हैं।

हर साल 42 हज़ार टन मछलियों का उत्पादन होता है।

सोने का भंडार अनुमानितः 1550 टन है।

अफ्रीका में तीसरा सबसे बड़ा सोना उत्पादक देश है 93 टन सालाना उत्पादन के साथ।

चाँदी का भंडार लगभग 1500 टन है।

तांबे (कॉपर) का भंडार 50 लाख टन (5 मिलियन टन) है।

यूरेनियम का भंडार 14 लाख टन (1.4 मिलियन टन) है।

सूडान दुनिया के अरबी गोंद (Gum Arabic) उत्पादन का 80% हिस्सा रखता है यह 180 से ज़ियादा उद्योगों (खाद्य, दवा आदि) में इस्तेमाल होता है।
लेकिन हर साल इसका 70% हिस्सा स्थानीय और विदेशी कंपनियों द्वारा तस्करी या क़ब्ज़े में ले लिया जाता है।

यह दुनिया के सफ़ेद तिल (white sesame) उत्पादन का 39% और लाल तिल (red sesame) का 23% पैदा करता है।

इन्हीं तमाम संसाधनों पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए सूडान में शैतानों का जमावड़ा लगा हुआ हैं।

लेखक: तौसिफ शीरानी

 

सऊदी अधिकारियों ने उमराह वीज़ा जारी करने और उसकी वैधता में नए बदलावों की घोषणा की है। इस निर्णय के अनुसार, उमराह वीज़ा की वैधता अवधि जारी होने की तारीख से तीन महीने से घटाकर एक महीने कर दी गई है।

सऊदी सूत्रों के अनुसार, यदि कोई तीर्थयात्री वीज़ा जारी होने के 30 दिनों के भीतर सऊदी अरब में प्रवेश नहीं करता है, तो उसका वीज़ा स्वतः ही रद्द हो जाएगा। इस निर्णय का कार्यान्वयन अगले सप्ताह से शुरू होगा।

सूत्रों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि सऊदी अरब में प्रवेश करने के बाद तीर्थयात्रियों के ठहरने की अवधि में कोई बदलाव नहीं हुआ है और यह तीन महीने ही रहेगी।

यह निर्णय सऊदी हज और उमराह मंत्रालय द्वारा उमराह तीर्थयात्रियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि को प्रबंधित करने के लिए की जा रही तैयारियों के तहत लिया गया है।

खासकर गर्मी के मौसम की समाप्ति और मक्का और मदीना में तापमान में कमी के बाद; और इसका उद्देश्य तीर्थयात्रियों के प्रवाह को नियंत्रित करना और दोनों पवित्र शहरों में भीड़भाड़ को रोकना है।

 

भारत के मशहूर ख़तीब और मुबल्लिग़ हुज्‍जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन सय्यद मोहम्मद ज़की हसन से खास बातचीत में इस्लाम की पहचान, धार्मिक जागरूकता, उम्मत की एकता और आज के दौर में तबलीग की ज़िम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा की।

आपने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी दीन की तबलीग और मजलिसों के क्षेत्र में बड़ी सेवाएं दी हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए, आपके अनुसार आज मज़हब-ए-तशय्यु (शिया धर्म) को किन चुनौतियों का सामना है?

मौलाना सय्यद ज़की हसन: आज दुनिया इस इंतज़ार में है कि कोई ऐसी क़ौम सामने आए जो हमेशा हक़ और सच्चाई के रास्ते पर कायम रहे। वक्त गुजरने के साथ यह हकीकत और भी साफ हो रही है कि यही शिया क़ौम है जो हमेशा हक़ के साथ खड़ी रही है और आज भी सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर रही है।

दुनिया अंधेरे में किसी रोशनी की तलाश कर रही है, और यह रोशनी सिर्फ शिया क़ौम में दिखाई देती है। इसकी बुनियाद वह अकीदा है जो इमाम-ए-ज़माना (अ) पर ईमान की सूरत में हमारे दिलों में ज़िंदा है।

यही अकीदा हमें दुनिया के हर कोने में एक-दूसरे से जोड़ता है। अलग-अलग सभ्यताओं, भाषाओं और संस्कृतियों के बावजूद हम सब एक ही केंद्र से जुड़े हैं, और यही एकता हमारी असली ताकत है।

आपके विचार में मीडिया की दुनिया में उलेमा और धार्मिक छात्रो का क्या रोल होना चाहिए?

मौलाना सय्यद ज़की हसन: आज की दुनिया एक “वैश्विक गांव” बन चुकी है। खबरें अब मिनटों में नहीं, बल्कि कुछ ही सेकंड में दुनिया के हर कोने तक पहुंच जाती हैं। मीडिया अब सिर्फ खबर पहुंचाने का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज का माहौल और सोच बनाने का सबसे असरदार ज़रिया बन गया है।

इसलिए हमें चाहिए कि हम भी मीडिया के क्षेत्र में कदम बढ़ाएं और अपनी मौजूदगी को मजबूत बनाएं। सबसे ज़रूरी बात यह है कि हम अपनी भाषा को भरोसेमंद और सम्मानित बनाएं, क्योंकि मीडिया में वही भाषा असर करती है, जिस पर लोग विश्वास करते हैं। अगर हमारी ज़बान ईमान और सच्चाई की ज़बान बन जाए, तो लोग दूसरों की नहीं, बल्कि हमारी बात सुनेंगे।

हाल ही में ईरान और इस्राईल के बीच बारह दिन तक चलने वाली जंग के दौरान आप हिंदुस्तान में थे। उस समय वहाँ का माहौल कैसा था, और इस जंग के बाद लोगों की सोच में क्या बदलाव आया?

मौलाना सय्यद ज़की हसन: इस जंग में इस्लामी गणराज्य ईरान को जो सफलता मिली, वह वाकई बेमिसाल थी। इसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया कि एक ख़ुदा पर भरोसा करने वाली प्रणाली कितनी मज़बूत और संगठित हो सकती है।

यह सिर्फ़ हथियारों की नहीं, बल्कि सोच और विचार की जंग थी। दुनिया ने महसूस किया कि ईरान की असली ताकत उसका “इलाही विचार” है।

भारत में आम लोगों के मन में यह धारणा थी कि इस्राईल एक ऐसा देश है जिसे कोई हरा नहीं सकता, और जिसकी जासूसी और खुफिया ताकतें दुनिया में सबसे मज़बूत हैं। लेकिन इस जंग ने साबित कर दिया कि असली जीत ताकत से नहीं, बल्कि ईमान और तौहीद से होती है।

इस जंग ने लोगों के दिलों में यह यक़ीन पैदा किया कि ईरान अकेला नहीं है, बल्कि उसके पीछे इमाम-ए-वक़्त (अ) की मदद मौजूद है। हर पल यह महसूस होता रहा कि ख़ुदा की मदद ईरान के साथ है — और यही कारण था कि दुश्मन को खुद लड़ाई रोकने की मांग करनी पड़ी।

जब धार्मिक छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने वतन लौटते हैं, तो उनके लिए तब्लीग़ के क्षेत्र में सफलता के क्या सिद्धांत होने चाहिए?

मौलाना सय्यद ज़की हसन: धार्मिक छात्र को चाहिए कि वे हौज़ा ए इल्मिया क़ुम में अपनी तालीम के दिनों को गंभीरता से बिताएं, लेकिन साथ ही उन्हें ज़माने के हालात से भी पूरी तरह अवगत रहना चाहिए।

जब वे अपने देश लौटें, तो पहले से यह पता करें कि वहाँ के सामाजिक और वैचारिक हालात कैसे हैं, लोगों के मन में कौन से संदेह या सवाल मौजूद हैं, और उन्हें किस तरह के प्रश्नों का सामना करना पड़ सकता है।

मैं जब किसी नए देश में जाता हूँ, तो पहले वहाँ के हालात का अध्ययन करता हूँ, फिर वहाँ के आम सवालों और शंकाओं की एक सूची तैयार करता हूँ। इसी तैयारी की वजह से मेरी बातें वहाँ असरदार होती हैं।

हमारे छात्रों को भी यही तरीका अपनाना चाहिए — अपने उलेमा, मराज ए इकराम और सुप्रीम लीडर की हिदायत में अपने देश की ज़रूरतों को समझकर तब्लिग़ी मैदान में कदम रखना चाहिए।

कई बार देखा गया है कि कुछ तालिबे-इल्म पढ़ाई पूरी किए बिना ही तब्लीग़ के लिए निकल जाते हैं और चाहते हैं कि उन्हें तुरंत सफलता मिल जाए। इस सोच को आप कैसे देखते हैं?

मौलाना सय्यद ज़की हसन: हर काम के लिए एक क्रमबद्ध और धीरे-धीरे बढ़ने वाला रास्ता होता है। कोई भी व्यक्ति पहले ही दिन सफलता की ऊंची मंज़िल पर नहीं पहुंच सकता।

तब्लीग़ के मैदान में भी शुरुआत में मुश्किलें आती हैं। बड़े-बड़े उलेमा ने भी यही रास्ता तय किया — पहले क़ुर्बानियां दीं, मेहनत और तकलीफ़ें झेलीं, तब जाकर उन्हें सफ़लता मिली।

अगर इंसान को शुरुआत में ही सारी सहूलियतें मिल जाएं, तो उसके अंदर आगे बढ़ने का जज़्बा खत्म हो जाता है। मुश्किलें ही इंसान में हिम्मत पैदा करती हैं और उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।

इसलिए तुल्लाब को चाहिए कि धैर्य और मज़बूती के साथ मेहनत करते रहें, क्योंकि यही रास्ता उन्हें सफ़लता और ऊंचे मकाम तक ले जाता है।

आख़िर में क्या कहना चाहेंगे?

मौलाना सय्यद ज़की हसन: मैं दिल की गहराइयों से हौज़ा न्यूज़ एजेंसी को मुबारकबाद देता हूँ। इस संस्था ने खुद को एक भरोसेमंद, अर्थपूर्ण और ईमानदार खबरों के स्रोत के रूप में साबित किया है।

जब पूरी दुनिया झूठी और नकारात्मक खबरों से भरी हुई है, तब हौज़ा न्यूज़ की खबरें लोगों के लिए उम्मीद और सुकून का कारण बनती हैं।

मैं दुआ करता हूँ कि यह संस्था इसी भरोसे, सच्चाई और ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ती रहे।

 

आयतुल्लाह हाशिम हुसैनी बुशहरी ने क़ुम अल मुक़द्देसा मे जुमा के खुत्बे मे अय्याम ए फ़ातिमिया की मुनासेबत से खिताब करते हुए कहा कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की शख़्सियत हर दौर के मुस्लमानो के लिए नूरे ए हिदायत है।

आयतुल्लाह सय्यद हाशिम हुसैनी बुशहरी ने अय्याम‑ए‑फातिमिया के मौक़े पर अपने ख़ुत्बे में कहा कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की शख्सियत हर दौर के मुसलमानों के लिए राह‑ए‑हिदायत है। उन्होंने कहा कि हज़रत ज़हरा (स) का उच्च मक़ाम केवल पैग़ंबर‑ए‑अकरम (स) की बेटी होने की वजह से नहीं, बल्कि आपकी इबादत, ज्ञान, सब्र और ईसार के कारण है, जिन्होंने आपको सबसे ऊँचे रूहानी दर्जे तक पहुँचाया।

उन्होंने कहा कि रिवायतों के अनुसार हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की शहादत पैग़ंबर‑ए‑इस्लाम (स) की वफ़ात के 75 दिन बाद हुई। कुरआन की आयत‑ए‑ततहीर समेत कई आयतें उनके मुकाम और पवित्रता की गवाही देती हैं।

आयतुल्लाह बुशहरी ने हज़रत ज़हरा (स) की एक रोशन हदीस बयान की: “मैं तुम्हारी इस दुनिया की तीन चीज़ों से मोहब्बत करती हूँ – कुरआन की तिलावत, रसूल का चेहरा देखना, और अल्लाह के रास्ते में खर्च करना।”

उन्होंने तक़वा को मोमिन की रूह और ताक़त बताया और हज़रत अली (अ) की यह हदीस पेश की: “उस ख़ुदा से डरो जो हर वक़्त तुम्हें देख रहा है, जिसके हाथ में तुम्हारा क़ाबू है, और जिसके इख़्तियार में तुम्हारा हर उठना‑बैठना, चलना‑फिरना है।”

आयतुल्लाह बुशहरी ने कहा कि अय्याम‑ए‑फातिमिया हमें याद दिलाते हैं कि अगर उम्मत तक़वा, ज़िक्र‑ए‑इलाही और एकता से जुड़ी रहे तो कोई ताक़त उसे हरा नहीं सकती। लेकिन जब मुसलमानों का समाज इख़्तिलाफ़ात (विभाजन), नफ़्स‑परस्ती और पश्चिमी जीवनशैली में डूब जाता है तो नुसरत‑ए‑इलाही उससे दूर हो जाती है।

उन्होंने मोमिनों को नसीहत की कि दुश्मन की सांस्कृतिक हमलों के सामने दीन की जागरूकता पैदा करें, अपने घर‑परिवार को ईमान और पवित्रता के सिद्धांतों पर कायम रखें और अय्याम‑ए‑फातिमिया को सिरत‑ए‑ज़हरा (स) पर अमल का संकल्प बनाएं।

 

लेबनान की हिज़्बुल्लाह के महासचिव शेख नईम क़ासिम ने कहा कि देश की सबसे बड़ी ताकत उसका प्रतिरोध है, और इस ताकत को हर हाल में सुरक्षित रखना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका लेबनान के मुद्दों में कोई निष्पक्ष पक्ष नहीं है, बल्कि वह इसराइली आक्रामकता का समर्थक है।

लेबनान की हिज़्बुल्लाह के महासचिव शेख नईम क़ासिम ने कहा कि देश की सबसे बड़ी ताकत उसका प्रतिरोध है, और इस ताकत को हर हाल में सुरक्षित रखना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका लेबनान के मुद्दों में कोई निष्पक्ष पक्ष नहीं है, बल्कि वह इसराइली आक्रामकता का समर्थक है।

वे यह बातें बेरूत के दक्षिणी इलाके में "सूक़ अरज़ी" नामक स्थानीय बाज़ार के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए कह रहे थे। यह बाज़ार कृषि, खाद्य और हस्तशिल्प उत्पादों की प्रदर्शनी के लिए आयोजित किया गया था।

अपने भाषण में शेख नईम क़ासिम ने कहा कि “इस बाज़ार में भाग लेने वाले वे लेबनानी लोग हैं जो अपनी मिट्टी से जुड़े हैं, दक्षिणी मोर्चे पर डटे हुए हैं और अपनी ज़मीन की उपज से जीवनयापन कर रहे हैं। ज़ैतून के पेड़ों के ये किसान असल में लेबनान की आज़ादी और स्वाभिमान के सच्चे रक्षक हैं।”

उन्होंने बल देकर कहा कि लेबनान का हर इलाका देश का अभिन्न हिस्सा है, और भूमि उन्हीं लोगों की है जो उस पर मजबूती से टिके रहते हैं।

उनके अनुसार, “जो लोग प्रतिरोध करते हैं, वे अपनी भूमि वापस ले लेते हैं, और जो समझौता करते हैं, वे उसे खो देते हैं।”

शेख क़ासिम ने कहा कि "ताएफ़ समझौता" की असल भावना लेबनान की स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा है, और इसे आंशिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने खेद जताया कि सरकार कृषि क्षेत्र की पर्याप्त सहायता नहीं कर रही है, जबकि उत्पादन बढ़ाने के लिए ठोस कदम ज़रूरी हैं जैसे शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह ने आत्मनिर्भरता और बाहरी दबाव का मुकाबला करने के लिए “जिहाद-ए-साज़ंदगी” परियोजनाएं शुरू की थीं।

उन्होंने कहा, “अमेरिका दावा करता है कि वह लेबनान की समस्याओं के समाधान की कोशिश कर रहा है, लेकिन असल में वह इसराइली विस्तारवाद और हमलावर नीति का समर्थक है। हर बार जब अमेरिकी प्रतिनिधि लेबनान आते हैं, इसराइली हमले बढ़ जाते हैं।”

शेख क़ासिम ने सवाल उठाया, “अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या होती है जब इसराइल ने 5000 से अधिक बार लेबनान की सीमा का उल्लंघन किया? जब उसने सरकारी कर्मचारियों और निर्दोष नागरिकों की हत्या की? क्या लेबनानी सेना द्वारा अपने देश और जनता की रक्षा करना अपराध है?”

उन्होंने कहा कि अमेरिका ने कभी भी लेबनान के लिए कुछ अच्छा नहीं किया। शेख क़ासिम ने ज़ोर देकर कहा, “धमकियाँ हमारे रुख़ को नहीं बदल सकतीं। हम हार मानने या झुकने वाले नहीं हैं। इसराइल कब्ज़ा तो कर सकता है, लेकिन उसे हमेशा के लिए कायम नहीं रख सकता।”

उन्होंने आगे कहा, “हम किसी से मदद नहीं मांगते, बस चाहते हैं कि कोई हमारी पीठ में छुरा न घोंपे और दुश्मन के हित में काम न करे। सरकार की पहली ज़िम्मेदारी देश की संप्रभुता की रक्षा करना है। हम किसी के अधीन नहीं होंगे और न ही लेबनान को दूसरों के इशारों पर चलने देंगे।”

शेख क़ासिम ने चेतावनी दी कि लेबनान इस समय अमेरिकी साज़िशों और इसराइली हमलों के कारण असली ख़तरे का सामना कर रहा है।

उन्होंने राष्ट्रपति जनरल जोसेफ़ आउन के उस फ़ैसले की सराहना की जिसमें सेना को इसराइली घुसपैठ का मुंहतोड़ जवाब देने के आदेश दिए गए थे, और इसे जिम्मेदाराना तथा सराहनीय रुख बताया।

अंत में उन्होंने कहा, “मुक़ावमत यानी प्रतिरोध लेबनान की असली ताकत है। जो भी इसे कमजोर करेगा, वह दुश्मन की मदद करेगा। इसराइल को वही समझौता लागू करना चाहिए जो लेबनान पहले ही पूरा कर चुका है, क्योंकि कोई नया समझौता सिर्फ इसराइली कब्ज़े को वैध ठहराएगा और नई आक्रामकताओं के रास्ते खोलेगा।”

 

आयतुल्लाह कुरबानी अली दर्री नजफ़आबादी ने अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों की आलोचना करते हुए कहा,यह देश न केवल पूरी दुनिया में युद्ध अपराधों का समर्थन करता है, बल्कि ईरान की वित्तीय संपत्तियों को फ्रीज़ करके और इस्राईली सरकार का समर्थन करके विभिन्न राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुँचा रहा है।

ईरान के मर्कज़ी प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि आयतुल्लाह कुरबान अली दर्री नजफ़आबादी ने अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा,यह देश न केवल पूरी दुनिया में युद्ध अपराधों का समर्थन करता है।

बल्कि ईरान की वित्तीय संपत्तियों को फ्रीज़ करके और इस्राईली सरकार का समर्थन करके विभिन्न राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुँचा रहा है।”

उन्होंने पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ईरान की तटस्थता की ऐतिहासिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा,अहमद शाह के दौर में ईरान ने तटस्थता की घोषणा की थी लेकिन प्रथम विश्व युद्ध में ईरानी जनता गेहूं जैसी बुनियादी आवश्यकता से भी वंचित रही। हमारी किसी देश से दुश्मनी नहीं थी, लेकिन विश्व की बड़ी ताकतें स्वयं ही राष्ट्रों की दुश्मन हैं।

दूसरे विश्व युद्ध में जापान पर परमाणु बमबारी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा,अमेरिका ने जापान के आत्मसमर्पण करने के बाद भी परमाणु हमला किया, जिसमें लगभग तीन लाख लोगों की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी गई।

आज तक भी अमेरिका ऐसे अपराधों का समर्थन करता आ रहा है। हाल की बारह दिवसीय जंग के दौरान भी, जब बातचीत चल रही थी, अमेरिका और उसके सहयोगियों विशेषकर ब्रिटेन ने बड़े पैमाने पर अमानवीय कार्यवाहियाँ कीं।

अंत में आयतुल्लाह दर्री नजफ़आबादी ने अमेरिका की औपनिवेशिक सोच पर बात करते हुए कहा,अमेरिका खुद को एकमात्र महाशक्ति समझता है और दुनिया के सभी देशों को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। इस क्षेत्र में उसका मुख्य औज़ार ज़ायोनी शासन (इस्राईल) है, जिसे पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका ने इक्कीस अरब डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान की है।

 

 

मदरसा ए इल्मिया रेहाना अर रसूल (स.ल.व.), तेहरान में सांस्कृतिक कार्यक्रम गौहर शाद का आयोजन किया गया।

मदरसा ए इल्मिया रेहाना अर रसूल (स.ल.व.), तेहरान में सांस्कृतिक कार्यक्रम गौहर शाद का आयोजन किया गया। उक्त सांस्कृतिक कार्यक्रम के प्रारंभिक भाग में आज़मुस्सादात काज़मी ने हिजाब और शालीनता के विषय पर बात करते हुए कहा,हिजाब एक मूल्यवान मोती के समान है जो मुस्लिम महिला की गरिमा और व्यक्तित्व की सुरक्षा में अद्वितीय भूमिका निभाता है।

मदरसा ए इल्मिया रेहाना अररसूल (स.ल.) में सांस्कृतिक मामलों की प्रभारी महोदया ज़हेरा अर्दबीली ने ब्रह्मांड प्रणाली में महिला के अस्तित्व के महत्व और स्थान को व्यक्त करते हुए कहा, महिला की दैवीय पैग़म्बरी और उसके उच्च स्थान की सही पहचान ही सदाचारी संतान के पालन-पोषण और इस्लामी समाज की वास्तविक प्रगति की आधारशिला है।

रिपोर्ट के अनुसार कार्यक्रम के एक भाग में इस्लामी दृष्टिकोण से सुंदरता और उसकी विशेषताओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर प्रस्तुत शोध के अनुसार, वर्तमान समय में कुछ महिलाओं द्वारा अनुचित जीवनशैली अपनाने का एक महत्वपूर्ण कारण इस्लामी सौंदर्यशास्त्र की वास्तविक अवधारणाओं से अनभिज्ञता है।

तेहरान के इमाम ए जुमआ ने वैश्विक साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ ईरानी जनता के प्रतिरोध का जिक्र करते हुए कहा कि ईरानी राष्ट्र ने इमाम हुसैन के सिद्धांतों की शिक्षा और इस्लामी क्रांति की रोशनी में वैश्विक साम्राज्यवाद के सामने संप्रभुता, सम्मान और प्रतिरोध का झंडा बुलंद रखा है और यही चेतना क्षेत्र के राष्ट्रों को आज़ादी का रास्ता दिखा रही है।

तेहरान के इमाम ए जुमआ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हाज़ अली अकबरी ने जुमे की नमाज़ के दौरान दिए गए अपने खुतबे में वैश्विक साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध का उल्लेख करते हुए कहा कि ईरान की संप्रभु पहचान, इस्लामी क्रांति और इमाम हुसैन के सिद्धांतों की शिक्षा का परिणाम है जो वैश्विक साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गई है और क्षेत्र के राष्ट्रों के लिए आज़ादी का रास्ता आसान कर रही है।

उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी गणतंत्र ईरान ने विकास के रास्ते पर तेजी से कदम बढ़ाया है और कभी भी अपमान को स्वीकार नहीं किया।

तेहरान के जुमे के इमाम ने अमेरिकी जासूसी अड्डे पर कब्जे को एक क्रांतिकारी कदम बताते हुए कहा कि इमाम ख़ुमैनी ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जे को क्रांति से भी बड़ा कदम बताया था; यह कदम न केवल तनाव से बचने का कारण बना, बल्कि ईरान के खिलाफ कई खतरों को कम करने का साधन भी साबित हुआ।

तेहरान के जुमआ के इमाम ने पवित्र रक्षा और हाल के 12 दिनों के प्रतिरोध का जिक्र करते हुए कहा कि ईरानी राष्ट्र ने एकता, एकजुटता और सैन्य शक्ति विशेष रूप से मिसाइल शक्ति के माध्यम से वैश्विक साम्राज्यवाद को घुटने टेकने पर मजबूर किया; यह अनुभव इस बात का सबूत है कि जब प्रतिरोध राष्ट्रीय एकता और शक्ति के साथ हो तो सफलता निश्चित होती है।

तेहरान के जुमे के इमाम अली अकबरी ने फिलिस्तीनी शहीदों और मुजाहिदीन, विशेष रूप से शहीद याहया अल-सनवार, शहीद इस्माइल हनिया और अन्य प्रतिरोध नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके संघर्ष ने पश्चिमी एशिया में साम्राज्यवाद की सभी साजिशों को विफल कर दिया है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका और ज़ायोनी शासन की दुष्ट प्रकृति अभी भी जारी है जो युद्धविराम के उल्लंघन और लगातार अपराध कर रही है।

हज्जतुल इस्लाम अकबरी ने हमास आंदोलन, इस्लामिक जिहाद आंदोलन, लेबनान की हिज़्बुल्लाह, शहीद सैय्यद हसन नसरुल्लाह और शेख नईम कासिम के नेतृत्व को प्रतिरोध के उज्ज्वल उदाहरण बताते हुए कहा कि यमन के अंसारुल्लाह और अन्य प्रतिरोध ताकतें फिलिस्तीन के साथ खड़ी हैं और सैन्य और कूटनीतिक मोर्चों पर उल्लेखनीय सफलताएं हासिल कर चुकी हैं।

तेहरान के जुमे के इमाम हुज्जतुल इस्लाम अली अकबरी ने युवा पीढ़ी, विशेष रूप से छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि वे गाजा के मजलूम शहीदों से सबक लेते हुए इस्लामी मूल्यों और प्रतिरोध के रास्ते पर कायम रहें और जब तक फिलिस्तीन पूर्ण आज़ादी और सुरक्षा हासिल नहीं कर लेता, प्रतिरोध के साथ खड़े रहें; यही पीढ़ी भविष्य में ईरान और क्षेत्र की आज़ादी और संप्रभुता की गारंटी बनेगी।

 

खोजा शिया अशना अशरी जामा मस्जिद पाला गली में मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने जुमआ के खुतबे में बयान करते हुए कहा कि ईमान और अमल के लिहाज़ से जो मज़बूत होगा, वही क़यामत के दिन आगे होगा। उन्होंने कहा कि क़यामत के दिन जनाब सैय्यदा स.ल. की अज़मत और शान बेमिसाल होगी।

खोजा शिया अशना अशरी जामा मस्जिद पाला गली में नमाज़-ए-जुमआ हुज्जतुल इस्लाम वाल मुस्लिमीन मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी की इक़्तिदा में अदा की गई। उन्होंने खुत्बे नें कहा, ईमान और अमल के आधार पर जो इंसान मज़बूत होगा, वही क़ियामत के दिन आगे रहेगा।उन्होंने कहा कि क़ियामत के दिन जनाब सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की महानता और शान बेमिसाल होगी।

मौलाना आबिदी ने कहा कि अल्लाह के यहाँ न तो कोई पक्षपात है और न ही कोई पार्टीबाज़ी वहाँ केवल ईमान और अमल की क़ीमत है। इसलिए जो अपने ईमान और अमल में मज़बूत होगा, वही अल्लाह के दरबार में ऊँचा दर्जा पाएगा।

उन्होंने जनाब फ़ातिमा ज़हेरा (स.अ.) की अज़ादारी की अहमियत और ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि अज़ादारी करने वालों की कद्र करनी चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा अज़ादारी में हिस्सा लेना चाहिए।

मौलाना ने कहा कि क़ियामत के दिन जो मक़ाम और इज़्ज़त अल्लाह तआला ने जनाब फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) को अता की है, वह किसी और को नहीं दी गई, क्योंकि ईमान और अमल के लिहाज़ से कोई भी उनके बराबर नहीं है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि आने वाले दिनों में जनाब फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की मजलिसों में उनकी सीरत को ज़्यादा से ज़्यादा बयान किया जाए और इस तरह बयान किया जाए कि वह बातें हमारे घरों में अमल के क़ाबिल बनें।

मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने आज के दौर में तलाक़ की बढ़ती दर और घरेलू झगड़ों का ज़िक्र करते हुए कहा कि हम सैय्यदा ज़हेरा (स.अ.) का ज़िक्र तो करते हैं, लेकिन फ़ातिमी तहज़ीब पर अमल नहीं करते, बल्कि पश्चिमी संस्कृति को अपनाए हुए हैं, इसी वजह से हमारे घरों में मतभेद और समस्याएँ बढ़ रही हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारा मतलब यह नहीं है कि आप उनसे बिल्कुल दूर रहें आप विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में उनसे क़दम से क़दम मिलाकर चलें, लेकिन अख़लाक़  और तहज़ीब के मामलों में इस्लाम के साथ रहें।

 

क़ुम अल मुक़द्देसा मे रहने वाले भारतीय शिया धर्मगुरू, कुरआन और हदीस के रिसर्चर मौलाना सय्यद साजिद रज़वी से हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के पत्रकार ने अय्याम ए फ़ातिमा के अवसर पर हज़रत ज़हरा द्वारा दिए गए खुत्बा ए फ़दाकिया के हवाले से विशेष इंटरव्यू किया। जिसमे मौलाना ने खुत्बा ए फ़दकिया के असली मक़सद को बयान किया। 

क़ुम अल मुक़द्देसा मे रहने वाले भारतीय शिया धर्मगुरू, कुरआन और हदीस के रिसर्चर मौलाना सय्यद साजिद रज़वी से हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के पत्रकार ने अय्याम ए फ़ातिमा के अवसर पर हज़रत ज़हरा द्वारा दिए गए खुत्बा ए फदाकिया के हवाले से विशेष इंटरव्यू किया। जिसे हम अपने प्रिय पाठको के लिए सवाल व जवाब के रुप मे प्रस्तुत कर रहे है।

बीबी ज़हरा (स.अ.) ने ख़ुतबा-ए-फ़दाक़िया पृष्ठभूमि क्या थी और इस खुत्बे का बुनयादी मक़सद क्या था
मौलाना साजिद रज़वीः रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद जब हुकूमत और ख़िलाफ़त का मामला उलझा और फ़दक़ की ज़मीन जो नबी (स) ने बीबी ज़हरा (स) को दी थी, उनसे उनका हक़ छीना गया, तब आपने मस्जिद-ए-नबवी में यह ख़ुतबा दिया। यह वक्त ऐसा था जब मुसलमान सियासी और रूहानी इम्तहान में थे। इस ख़ुतबे का असल मकसद इस्लाम की हक़ीक़त को याद दिलाना, अहले-बैत के हुक़ूक़ को लोगों पर ज़ाहिर करना  और उम्मत को इन्साफ़, अद्ल और अमानतदारी की तरफ़ बुलाना था।

हज़रत ज़हरा (स) ने इस खुत्बे मे तौहीद, नुबूवत और इमामत को किस अंदाज़ में बयान किया उनके अहम प्वाइंट क्या है?
मौलाना साजिद रज़वीः आपने तौहीद को फ़लसफ़ी और रूहानी दोनों रंग में पेश किया। फ़रमाया कि अल्लाह बेनियाज़ है, उसकी कोई मिसाल नहीं, हर चीज़ उसी पर क़ायम है और उसकी इबादत इंसान की रूह का सुकून है। आपने नुबूवत को इंसानियत की हिदायत का ज़रिया बताया। कहा कि रसूल (स) वह नूर हैं जिनसे जेहालत मिटती है और अल्लाह का पेग़ाम बंदों तक पहुंचता है। और आपने इमामत को दीन की हिफ़ाज़त और उम्मत की रहनुमाई का मरकज़ बताया। 

फ़दक की ज़मीन का रूहानी या दीनी पहलू क्या था? और आपने फ़दक के हक़ मे कौन कौन सी दलीली पेश की
मौलाना साजिद रज़वीः फ़दक़ सिर्फ़ ज़मीन नहीं थी बल्कि इस्लामी इन्साफ़ की निशानी थी। इसका छीना जाना दरअसल अहले-बैत के हक़ और नबूवत के वारिसों की तौहीन थी। आपने क़ुरआन की आयतें पेश कीं कि पैग़म्बर अपने रिश्तेदारों को मीरास देते हैं। गवाहों का ज़िक्र किया और साफ़ कहा कि फ़दक़ नबी (स) ने हिबा (तोहफ़े) के तौर पर दिया था।

आप (स) ने ख़ुतबे में औरत के किरदार को किस तरह उजागर किया और उम्मत को किस चीज़ से खरदार किया
मौलाना साजिद रज़वीः बीबी ज़हरा (स) ने साबित किया कि औरत इस्लाम में सच्चाई, इन्साफ़ और दीनी हिम्मत की आवाज़ बन सकती है। आप एक माँ, बेटी और अल्लाह की बंदी के तौर पर समाज की रहनुमा थीं। आपने चेतावनी दी कि अगर उम्मत हक़ से मुँह मोड़ेगी, अहले-बैत की रहनुमाई को छोड़ेगी तो ज़ुल्म, फितना और गुमराही उसका अंजाम होगा।

जब बीबी (स) ने मस्जिद में कलाम किया तो मदीना का माहौल और वहा पर मौजूद सहाबा का रद्दे अमल क्या था
मौलाना साजिद रज़वीः मदीना में सन्नाटा था। लोग रसूल की जुदाई से ग़मज़दा थे लेकिन सियासी हवाएं बदल चुकी थीं। बीबी का कलाम सुनते ही सारा माहौल रूहानी और पुरअसर हो गया। कुछ सहाबा रो पड़े, कुछ ख़ामोश रहे और कुछ हैरान। बहुतों के दिलों में पछतावा और कुछ के दिलों में डर था कि उन्होंने अहले-बैत का हक़ न पहचाना।

बीबी (स) ने विरासत-ए-रसूल (स) के बारे में कौन सी आयतें बयान कीं?
मौलाना साजिद रज़वीः आपने सूरह नमल की आयत का हवाला दिया: "और सुलेमान ने दाऊद का वारिस हुआ"  ताकि साबित करें कि नबी की विरासत दीनी भी होती है और माली भी।

इस ख़ुतबे से बीबी (स.अ.) के इल्मी और फ़िक्री मक़ाम का क्या अंदाज़ा होता है?
मौलाना साजिद रज़वीः आपका कलाम इल्म, तर्क और वाकपटुता का शाहकार है। इससे मालूम होता है कि आप इल्म-ए-रसालत की वारिस थीं और तौहीद, नुबूवत, इमामत की गहराई को बयान करने वाली आलिम-ए-बे-मिसाल थीं।

ख़ुतबे में अद्ल और ज़ुल्म के हवाले से अख़लाक़ी पैग़ाम बयान करते हुए उम्मत की रुहानी गिरावट की तरफ़ कैसे तव्ज्जो दिलाई?
मौलाना साजिद रज़वीः आपने कहा कि अद्ल अल्लाह की सुन्नत है और ज़ुल्म उसकी नाफ़रमानी। जो इन्साफ़ करेगा, वह अल्लाह के करीब होगा; जो ज़ुल्म करेगा, वह गुमराह होगा। आपने कहा कि लोग अब दुनियावी लालच में पड़ गए हैं, अल्लाह के हुक्मों को भूल गए हैं और अहले-बैत की मोहब्बत से दूर हो गए हैं,  यही गिरावट की शुरुआत है।

आज के समाज को ख़ुतबा ए फदकिया किन पहलुओं से रहनुमाई देता है?
मौलाना साजिद रज़वीः यह ख़ुतबा हमें याद दिलाता है कि हक़ के लिए आवाज़ उठाना ईमान का हिस्सा है, और इस्लामी समाज की इस्लाह के लिए औरत व मर्द दोनों बराबर ज़िम्मेदार हैं ।

अगर इस ख़ुतबे का ख़ुलासा एक जुमले में किया जाए तो वह क्या होगा?

मौलाना साजिद रज़वीः  यह ख़ुतबा इंसाफ़, तौहीद और अहले-बैत के हक़ की आवाज़ है  जो हर दौर में उम्मत को याद दिलाता है कि दीन की बुनियाद हक़, इन्साफ़ और इल्म पर है।