رضوی

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ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरानी जनता और नेतृत्व देश की इज़्ज़त, संप्रभुता और अंतिम सफलता के लिए हर प्रकार की क़ुर्बानी देने को तैयार हैं। ईरान की सरबलंदी और सम्मान की रक्षा के लिए वे आख़िरी सांस तक डटे रहेंगे।

 ईरानी संसद के स्पीकर डॉ. मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने इज़राइल और अमेरिका की ओर से ईरान पर किए गए हमलों की पहली वर्षगांठ के अवसर पर जारी अपने संदेश में राष्ट्रीय दृढ़ता और प्रतिरोध के संकल्प को दोहराया।

उन्होंने कहा कि एक वर्ष पहले शुरू हुई आक्रामक कार्रवाइयों के दौरान मासूम बच्चों सहित अनेक निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया गया तथा हमलावरों ने अत्याचार और क्रूरता की सभी सीमाएँ पार कर दीं।

डॉ. क़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरान की सरबलंदी, राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष आख़िरी सांस तक जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि बारह दिवसीय युद्ध के शहीदों ने त्याग, धैर्य, प्रतिरोध और देशभक्ति की उज्ज्वल मिसाल कायम की है।

उन्होंने आगे कहा कि उन्हीं शहीदों के मार्ग पर चलते हुए ईरानी जनता और देश का नेतृत्व अपनी राष्ट्रीय गरिमा, संप्रभुता और अंतिम विजय के लिए हर प्रकार की क़ुर्बानी देने को तैयार है।

ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरानी जनता और नेतृत्व देश की इज़्ज़त, संप्रभुता और अंतिम सफलता के लिए हर प्रकार की क़ुर्बानी देने को तैयार हैं। ईरान की सरबलंदी और सम्मान की रक्षा के लिए वे आख़िरी सांस तक डटे रहेंगे।

 ईरानी संसद के स्पीकर डॉ. मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने इज़राइल और अमेरिका की ओर से ईरान पर किए गए हमलों की पहली वर्षगांठ के अवसर पर जारी अपने संदेश में राष्ट्रीय दृढ़ता और प्रतिरोध के संकल्प को दोहराया।

उन्होंने कहा कि एक वर्ष पहले शुरू हुई आक्रामक कार्रवाइयों के दौरान मासूम बच्चों सहित अनेक निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया गया तथा हमलावरों ने अत्याचार और क्रूरता की सभी सीमाएँ पार कर दीं।

डॉ. क़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरान की सरबलंदी, राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष आख़िरी सांस तक जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि बारह दिवसीय युद्ध के शहीदों ने त्याग, धैर्य, प्रतिरोध और देशभक्ति की उज्ज्वल मिसाल कायम की है।

उन्होंने आगे कहा कि उन्हीं शहीदों के मार्ग पर चलते हुए ईरानी जनता और देश का नेतृत्व अपनी राष्ट्रीय गरिमा, संप्रभुता और अंतिम विजय के लिए हर प्रकार की क़ुर्बानी देने को तैयार है।

सोमवार, 15 जून 2026 16:59

काफ़िर से समझौता; कैसे?

कुफ़्र अर्थात सत्य को जान-बूझकर न मानना और उससे मुँह मोड़ लेना की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए, मोमिन और काफ़िर के बीच मूल सिद्धांत, उद्देश्य, योजना और कार्यप्रणाली में कोई समानता नहीं रहती। इसलिए न तो उनके बीच रणनीतिक सामंजस्य संभव है और न ही वैचारिक समानता पर आधारित कोई स्थायी समझौता। हालांकि, उनके साथ व्यवहार के तरीके और स्तर सभी मामलों में एक जैसे नहीं होते।

स्वर्गीय उस्ताद अली सफ़ाई हाइरी ने अपनी एक रचना में “काफ़िर से समझौता” विषय पर चर्चा की है, जिसे आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।

काफ़िरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? क्या उनसे किसी प्रकार का समझौता किया जा सकता है? क्या उन्हें मित्र बनाया जा सकता है? क्या उनके साथ राजनीतिक या सामाजिक गठजोड़ किया जा सकता है? संधियाँ कब की जानी चाहिए और कब तोड़ी जानी चाहिए? क्या सभी काफ़िरों के साथ हर समय एक जैसा व्यवहार होना चाहिए, या उनके भी अलग-अलग स्तर और श्रेणियाँ होती हैं?

सामने वाला एक विरोधी है, और उसके प्रति अति या उपेक्षा—दोनों ही अनुचित प्रतिक्रियाएँ हैं। क्योंकि वहाँ दया और करुणा की वह छाया नहीं है जो सुरक्षा प्रदान कर सके। विश्वास, विचार, योजना और कर्म की सीमाएँ दोनों को एक-दूसरे से अलग करती हैं। वे एक जैसी सोच नहीं रखते और न ही उनकी योजनाएँ समान होती हैं। इसलिए उनके कार्य भी एक जैसे नहीं हो सकते, चाहे ऊपर से वे समान दिखाई दें। इसी कारण वास्तविक अपनापन और निष्कपटता वहाँ नहीं मिलती, भले ही उसका दावा किया जाए।

कुफ़्र के अर्थ और सत्य को पहचान लेने के बाद भी उससे मुँह मोड़ लेने की स्थिति को ध्यान में रखा जाए, तो मोमिन और काफ़िर के बीच वास्तविक वैचारिक मेल-मिलाप की कोई गुंजाइश नहीं बचती। जिस सत्य को तुम चाहते हो और जिसे ईश्वर चाहता है, वह उसे पहचानता है, फिर भी उसे ठुकरा देता है। ऐसे साथी के साथ तुम आखिर कहाँ तक जा सकोगे?

तुम उसके साथ न विचारों में, न योजनाओं में, न कार्यों में, न कार्यनीति में और न ही दीर्घकालिक रणनीति में सामंजस्य स्थापित कर सकते हो। तुम्हारे और उसके बीच कोई साझा आधार नहीं है—न मूल सिद्धांतों में और न ही उद्देश्यों में।

यहाँ तक कि अत्याचार और शोषण के विरुद्ध संघर्ष में भी तुम उसके साथ मूल आधार और लक्ष्य के स्तर पर एक नहीं हो सकते। क्योंकि अत्याचार के बारे में तुम्हारी समझ और उसकी समझ अलग है। यही अंतर संघर्ष की योजना को प्रभावित करता है, संघर्ष के तरीकों को प्रभावित करता है और अंततः पूरे संघर्ष की दिशा और परिणाम को भी प्रभावित करता है।

स्रोत: चश्म-हाए बस्ते, चश्मे-हाए कूर

कश्मीर में मुहर्रमुल हराम 1448 हिजरी के आगमन के मद्देनज़र मौलाना मसरूर अब्बास अंसारी के निवास ‘दारुल अब्बास’ में एक महत्वपूर्ण परामर्श बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में मुहर्रम के दौरान आयोजित होने वाली मजलिसों, अज़ादारी के जुलूसों तथा अन्य धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों की व्यवस्थाओं पर विस्तार से विचार विमर्श किया गया।

,कश्मीर में मुहर्रमुल हराम 1448 हिजरी के आगमन के मद्देनज़र मौलाना मसरूर अब्बास अंसारी के निवास ‘दारुल अब्बास’ में एक महत्वपूर्ण परामर्श बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में मुहर्रम के दौरान आयोजित होने वाली मजलिसों, अज़ादारी के जुलूसों तथा अन्य धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों की व्यवस्थाओं पर विस्तार से विचार विमर्श किया गया।

बैठक में विभिन्न क्षेत्रों के ज़िम्मेदार व्यक्तियों, उलेमा-ए-किराम, ज़ाकिरों, अंजुमनों के प्रतिनिधियों तथा सामाजिक हस्तियों ने भाग लिया।

बैठक के प्रतिभागियों ने मुहर्रमुल हराम की पवित्रता और महत्व को ध्यान में रखते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि सभी धार्मिक कार्यक्रम अनुशासन, एकता, आपसी सहयोग और भाईचारे के साथ आयोजित किए जाएँ, ताकि हज़रत इमाम हुसैन (अ.) और शोहदाए-कर्बला की महान कुर्बानियों का संदेश प्रभावी ढंग से जनता तक पहुँच सके।

बैठक को संबोधित करते हुए मौलाना मसरूर अब्बास अंसारी ने सभी अज़ादारों, अंजुमनों और आयोजकों से अपील की कि वे मुहर्रम के कार्यक्रमों के दौरान अनुशासन का विशेष ध्यान रखें तथा उम्मत की एकता, भाईचारे और पारस्परिक सद्भाव को बढ़ावा देने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ।

उन्होंने कहा कि सभी प्रमुख अज़ादारी जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से, कानून का पूर्ण पालन करते हुए निकाले जाएँगे और सफलतापूर्वक संपन्न होंगे। साथ ही उन्होंने लोगों से सहयोग, धैर्य और धार्मिक मूल्यों की रक्षा करने की भी अपील की।

जो लोग मैदान में मौजूद हैं और जिन्होंने कठिनाइयों और प्रतिबंधों को सहन किया है, वे किसी भी स्थिति में यह स्वीकार नहीं करेंगे कि उनकी राष्ट्रीय गरिमा और ऐतिहासिक सम्मान पर सवाल उठे या उनके संघर्ष और शहीदों के खून से हासिल उपलब्धियाँ प्रभावित हों। इसलिए वे अंतिम परिणाम, दुश्मन की पूरी निराशा और राष्ट्र के अधिकारों की प्राप्ति तक चुप नहीं बैठेंगे और किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही को सहन नहीं करेंगे।

 ईरान की इस्लामी परामर्शी सभा (मजलिस-ए-ख़ुबरेगान) के कई सदस्यों और क़ुम के मदरसा शिक्षकों ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी कर जनता और अधिकारियों से अपील की है कि वे “पवित्र एकता” को मजबूत करें और महान नेता (रहबर) के आदेशों और मार्गदर्शन का पूरी तरह पालन करें।

इस बयान में यह भी कहा गया है कि इमाम ख़ुमैनी (र) के कथन के अनुसार, दुश्मन के साथ वार्ता के विषय में कोई गुप्त या छिपी हुई बात नहीं होनी चाहिए, और जनता के साथ सच्ची साझेदारी का अर्थ है कि सरकारें इस विषय में पारदर्शिता रखें।

उलेमा और शिक्षकों ने आगे कहा कि नेतृत्व द्वारा निर्धारित ढांचे के अनुसार—दुश्मन की पहचान और उसके दंड का निर्धारण, किए गए अपराधों और नुक़सान का मुआवज़ा लेना, और ईरान की समुद्री सीमा का प्रबंधन जो राष्ट्र का अटल अधिकार है, तथा परमाणु अधिकारों के विषय में बातचीत न करना—इन बिंदुओं को किसी भी बहाने से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। और यदि कोई इन सीमाओं से हटेगा तो वह अवैध और अस्वीकार्य होगा तथा जनता की प्रतिक्रिया का सामना करेगा।

पूरा बयान इस प्रकार है:

ईरान के सम्मानित और सक्रिय जनता तथा देश के सम्मानित अधिकारियों के लिए:

वर्तमान में जब वार्ता और संभावित समझौते की विभिन्न खबरें सुनने में आ रही हैं, हम अपने कर्तव्य के रूप में कुछ बातें प्रस्तुत करना आवश्यक समझते हैं।

1- इमाम ख़ुमैनी (र) के कथन के अनुसार, दुश्मन के साथ वार्ता के विषय में कोई गोपनीयता नहीं होनी चाहिए, और पारदर्शी जानकारी देना जनता के साथ सहानुभूति का हिस्सा है।

2- इस विषय में अंतिम निर्णय सर्वोच्च नेता के मार्गदर्शन और उनके द्वारा निर्धारित सीमाओं और ढांचे के अनुसार होगा।

3- इन लाल रेखाओं से किसी भी प्रकार का विचलन अवैध और अस्वीकार्य होगा और जनता की प्रतिक्रिया का सामना करेगा।

4- दुश्मन की लगातार शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों, विशेषकर समुद्री घेराबंदी और ज़ायोनी शासन के हमलों और अपराधों को देखते हुए, वर्तमान स्थिति युद्ध जैसी है और “युद्धविराम” की कोई वास्तविक अवधारणा मौजूद नहीं है।

5- दुश्मन की कार्रवाइयों को देखते हुए, विशेष रूप से समुद्री घेराबंदी के जवाब में, प्रतिशोधी कदम उठाना आवश्यक है।

6- नेतृत्व द्वारा निर्धारित ढांचे के अनुसार—दुश्मन की पहचान, दंड, नुकसान का मुआवज़ा, और हुर्मुज़ स्ट्रेट का प्रबंधन—ये सभी ईरान के अटल अधिकार हैं और परमाणु अधिकारों के विषय में बातचीत किसी भी स्थिति में नहीं छोड़ी जा सकती।

7- जो लोग मैदान में मौजूद हैं और जिन्होंने सभी कठिनाइयाँ और प्रतिबंध झेले हैं, वे किसी भी स्थिति में अपनी राष्ट्रीय गरिमा और ऐतिहासिक सम्मान को कमजोर नहीं होने देंगे और शहीदों के रक्त और संघर्ष के परिणामों को नुकसान नहीं पहुँचने देंगे। इसलिए वे अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक चुप नहीं बैठेंगे।

8- हम अधिकारियों के प्रयासों और सेवाओं का आभार व्यक्त करते हुए अपेक्षा करते हैं कि वे इस ईश्वरीय आंदोलन में नेतृत्व के साथ खड़े रहें और जनता के साथ मिलकर उनके आदेशों को लागू करने में कोई देरी न करें और दुश्मन के सामने किसी प्रकार की वापसी से बचें।

9- जागरूक और वफादार जनता पहले की तरह “पवित्र एकता” को बनाए रखते हुए और शांतिपूर्ण रात्री सभाओं में भाग लेते हुए हर चरण में महान नेता के आदेशों का पालन करेगी।

हम महान नेता और सम्मानित ईरानी राष्ट्र की निरंतर प्रगति और सफलता की अल्लाह से दुआ करते हैं। 

आयात और हुजज इस्लाम वल मुस्लिमीन:

  1. सैयद अहमद अलम उल हुदा; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे खुरासान रज़वी प्रांत के प्रतिनिधि,
  2. मोहसिन आराकी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे  मध्य प्रांत के प्रतिनिधि, 
  3. महमूद रजब़ी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे तेहरान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  4. अब्बास काबी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे ख़ुज़ेस्तान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  5. सय्यद मोहम्मद महदी मीर बाकडरी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे सेमनान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  6. महमूद अब्दुल्लाही; हौज़ा इल्मिया की उच्च परिषद के सदस्य
  7. सय्यद हसन आमेली; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे अर्दबील प्रांत के प्रतिनिधि, 
  8. अली अब्बासी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे मध्य प्रांत के प्रतिनिधि, 
  9. मौलवी अब्दुर्रहमान आरिफ़ी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  10. सय्यद अब्दुर्रहीम तवक्कुल; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे माज़ंदरान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  11. हसन आलमी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे खुरासान रज़वी प्रांत के प्रतिनिधि, 
  12. सय्यद यदुल्लाह यज़दानपानाह; हौज़ा इल्मिया के शिक्षक
  13. हुसैन मोज़फ़्फ़री; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे क़ज़वीन प्रांत के प्रतिनिधि, 
  14. रसूल फ़लाहती; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे गीलान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  15. मोहम्मद बाक़िर मोहम्मदी लाएनी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे माज़ंदरान प्रांत के प्रतिनिधि,
  16. मौलवी इक़बाल बहमनी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे कुर्दिस्तान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  17. ग़ुलाम रज़ा फ़य्याज़ी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे  खुरासान शमाली (उत्तरी) प्रांत के प्रतिनिधि, 
  18. मोहसिन हैदरी आले-ख़ैस; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे ख़ुज़िस्तान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  19. क़ुर्बान अली दरी नजफ़ाबादी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे तेहरान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  20. सय्यद बाक़िर सिद्दी बिनाबी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे पूर्वी अज़रबैजान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  21. सय्यद अबुल हसन महदवी निया; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे इस्फ़हान प्रांत के प्रतिनिधि,
  22. अब्दुल जवाद इब्राहीमी फ़र; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे तेहरान प्रांत के प्रतिनिधि,
  23. यदुल्लाह सफ़री; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे अर्दबील प्रांत के प्रतिनिधि, 
  24. मौलवी अली अहमद सलामी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  25. मौलवी फ़ाइक़ रस्तमी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे कुर्दिस्तान प्रांत के प्रतिनिधि,
  26. कमाल आख़ुंद ग़रावी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे गुलिस्तान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  27. लुत्फ़ुल्लाह देजकाम; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे फ़ार्स प्रांत के प्रतिनिधि,
  28. अमानुल्लाह अलीमुरादी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे किरमान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  29. अब्दुल्लाह किवानी हफ़्शजानी; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे चारमहल और बख़्तियारी प्रांत के प्रतिनिधि, 
  30. मोहम्मद हुसैन बयाती; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे पश्चिम अज़रबैजान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  31. जवाद जाफ़री; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे ज़िंजान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  32. जवाद हाजीज़ादेह; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे पूर्वी अज़रबैजान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  33. असकर दर्बाज़; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे पश्चिम अज़रबैजान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  34. सईद सुलह मीरज़ाई; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे तेहरान प्रांत के प्रतिनिधि, 
  35. मोहम्मद रज़ा फ़ल्लाह तफ़्ती; मजलिस-ए-ख़ुबरेगान मे अल्बोर्ज़ प्रांत के प्रतिनिधि, 

यह वाक्या 10 हिजरी का है जब अरब में मौजूद एक इलाक़ा जिसको नजरान के नाम से जाना जाता था वहाँ के ईसाइयों ने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद स.ल.व.व.से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में बहस की और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बताया पैगंबर ने उन्हें कई बार समझाया कि अल्लाह के बंदे है इसी सिलसिले को लेकर झूठ और सच के लिए मुबाहिला हुआ

,यह वाक्या 10 हिजरी का है जब अरब में मौजूद एक इलाक़ा जिसको नजरान के नाम से जाना जाता था वहाँ के ईसाइयों ने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद स.ल.व.व.से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में बहस की और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बताया
पैगंबर ने उन्हें कई बार समझाया कि अल्लाह के बंदे है इसी सिलसिले को लेकर झूठ और सच के लिए मुबाहिला हुआ

यह माजरा 10 हिजरी का है जब अरब में मौजूद एक इलाक़ा जिसको नजरान के नाम से जाना जाता था वहाँ के ईसाइयों ने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (स) से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में बहस की और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बताया (माज़अल्लाह) और हुज़ूर पाक (स) के लाख समझाने के बावजूद कि हज़रत ईसा (अ) अल्लाह के बेटे नहीं बल्कि अल्लाह की तरफ़ से नबी बनाये गए हैं

इस बात का इन्कार करते रहे जब नजरान के ईसाइयों के बड़े बड़े पादरी भी हुज़ूर (स) की बात को नहीं मानें बल्कि हुज़ूर पाक (स) को और  दीने इस्लाम को ही झूठा कहने लगे (माज़अल्लाह) तो फिर अल्लाह ने सूरए आले इमरान की आयत 61 को नाज़िल फ़रमाया:

فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

  फिर जब तुम्हारे पास इल्म (क़ुरआन) आ चुका उसके बाद भी अगर तुम से कोई (नसरानी) ईसा के बारे में हुज्जत करें तो कहो कि (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलाएं तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलाएं) और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों को बुलाएं और तुम अपनी जानों (नफ़्सों) को, उसके बाद हम सब मिलकर (ख़ुदा की बारगाह में) गिड़गिड़ायें और झूठों पर ख़ुदा की लानत करें।

  जब अल्लाह का यह हुक्म नाज़िल हुआ कि अब जब बात झूठ और सच की आ ही गई है तो फिर नबी (स) आप इन ईसाइयों के आलिमों से फ़रमा दीजिए कि आओ एक मैदान में हम अपने बेटों को बुलाएँ तुम अपने बेटों को बुलाओ, और हम अपनी औरतों को और तुम अपनी औरतों को बुलाओ और हम अपनी जानों (नफ़्सों) को बुलाएँ और तुम अपनी जानों (नफ़्सों) को बुलाओ उसके बाद हम सब मिलकर ख़ुदा की बारगाह में दुआ करते हैं कि हम में से जो झूठा है उस पर अल्लाह की लानत हो।

  जब दिन और वक़्त मुक़र्रर हो गया तो फिर 24 ज़िलहिज्ज 10 हिजरी को तमाम नजरान के बड़े बड़े आलिम व पादरी जमा हुए अपने पूरे लोगों के साथ और फिर रसूल अल्लाह (स) के आने का इंतज़ार करने लगे थोड़ी देर में वह लोग देखते हैं कि हुज़ूर पाक (स) चले आ रहे हैं लेकिन उनके साथ कोई भीड़ नहीं है ना असहाब का मजमा हैं बल्की क़ुरआन में अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ रसूल अल्लाह (स) के साथ हुक्मे परवरदिगार के मुताबिक़ बेटों में इमाम हसन अलैहिस्सलाम हुज़ूर पाक (स) की ऊंगली पकड़े हुए

और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हुज़ूर पाक (स) की गोद में उनके बाद औरतों में सिर्फ़ इकलौती ख़ातून ए जन्नत की सरदार हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा (जबकि हुक्म औरतों का हुआ था लेकिन शर्त सच्चा होने की थी जिसने पूरी ज़िन्दगी में झूठ न बोला हो इसलिए तन्हा एक ही ख़ातून) और रसूले ख़ुदा (स) की जान व नफ़्स के तौर पर सिर्फ़ हज़रत अली अलैहिस्सलाम (यहाँ पर भी नफ़्सों का हुक्म था लेकिन शर्त ऐसे इंसान की थी जिसने पूरी ज़िंदगी में कभी भी झूठ न बोला हो वरना वह झूठों पर लानत कैसे कर सकता है

जिसने ख़ुद झूठ बोला हो वरना लानत पलट के ख़ुद पर आ जाती) जब ईसाइयों के बड़े बड़े पादरियों ने इन पंजेतन पाक (अ) की इन नूरानी शख़्सियतों को आते देखा तो अचानक उन पादरियों ने बोलना शुरू किया कि हम ऐसी शख़्सियतों को मैदान में हमारी तरफ़ आते हुए देख रहे हैं

कि अगर यह लोग (पंजेतन पाक) पहाड़ की तरफ इशारा कर दें तो पहाड़ अपनी जगह से हट जायेंगे और अगर इन्होंने हमारे ऊपर लानत कर दी तो क़यामत तक कोई ईसाई नहीं आएगा सब अभी ख़त्म हो जायेंगे। इसलिए उन पादरियों ने हुज़ूर (स) से हार मानली और बिना मुबाहिला किये ही लौटने का फ़ैसला कर लिया और جزیه जिज़'या (इस्लामी टैक्स) भी देना मंज़ूर कर लिया।

अहले सुन्नत की मशहूर किताब मुसनद अहमद में हदीस नम्बर 12320 में इस वाक़ेए का ज़िक्र बयान हुआ है:

۔ (۱۲۳۲۰)۔ وَعَنْ سَعْدِ بْنِ اَبِیْ وَقَّاصٍ، قَالَ: وَسَمِعْتُہُ یَقُولُیَوْمَ خَیْبَرَ: ((لَأُعْطِیَنَّ الرَّایَۃَ رَجُلًا یُحِبُّ اللّٰہَ وَرَسُولَہُ، وَیُحِبُّہُ اللّٰہُ وَرَسُولُہُ۔)) فَتَطَاوَلْنَا لَہَا فَقَالَ: ((ادْعُوا لِی عَلِیًّا۔)) فَأُتِیَبِہِ أَرْمَدَ فَبَصَقَ فِی عَیْنِہِ وَدَفَعَ الرَّایَۃَ إِلَیْہِ فَفَتَحَ اللّٰہُ عَلَیْہِ، وَلَمَّا نَزَلَتْ ہٰذِہِ الْآیَۃُ {نَدْعُ أَبْنَائَ نَا وَأَبْنَائَ کُمْ} [آل عمران: ۶۱] دَعَا رَسُولُ اللّٰہِ صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ عَلِیًّا وَفَاطِمَۃَ وَحَسَنًا وَحُسَیْنًا، فَقَالَ: ((اَللّٰہُمَّ ھٰوُلَائِ اَھْلِیْ۔)) (مسند احمد: ۱۶۰۸)

  तर्जुमा: साद बिन अबी वकास से रिवायत है वह कहते हैं: जब सूरए आले इमरान की आयत 61 आई:

فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

  फिर जब तुम्हारे पास इल्म (क़ुरआन) आ चुका उसके बाद भी अगर तुम से कोई (नसरानी) ईसा के बारे में हुज्जत करें तो कहो कि (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलाएं तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलाएं) और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों (नफ़्सों) को बुलाएं और तुम अपनी जानों को, उसके बाद हम सब मिलकर (ख़ुदा की बारगाह में) गिड़गिड़ायें और झूठों पर ख़ुदा की लानत करें।

  जब आयत नाज़िल हुई तो रसूल अल्लाह (स) ने सय्यदना अली अलैहिस्सलाम, सय्यदा फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा, सैय्यदना इमाम हसन और सय्यदना इमाम हुसैन को बुलाया और फ़रमाया: ऐ अल्लाह! यह मेरे अहलेबैत हैं।

  एक और जगह सुनने इब्ने माजा में हदीस नम्बर 120 में आया है:

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيل الرَّازِيُّ، ‏‏‏‏‏‏حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، ‏‏‏‏‏‏أَنْبَأَنَا الْعَلَاءُ بْنُ صَالِحٍ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ الْمِنْهَالِ، ‏‏‏‏‏‏عَنْ عَبَّادِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ عَلِيٌّ:‏‏‏‏   أَنَا عَبْدُ اللَّهِ، ‏‏‏‏‏‏وَأَخُو رَسُولِهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ‏‏‏‏‏‏وَأَنَا الصِّدِّيقُ الأَكْبَرُ لا يَقُولُهَا بَعْدِي إِلا كَذَّابٌ، ‏‏‏‏‏‏صَلَّيْتُ قَبْلَ النَّاسِ بِسَبْعِ سِنِينَ  .

  तर्जुमा: हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि मैं अल्लाह का बन्दा और उसके रसूल (स) का भाई हूँ और मैं सिद्दिके अकबर (सबसे बड़ा सच्चा) हूँ मेरे बाद इस फ़ज़ीलत का दावा झूठा शख़्स ही करेगा, मैंने सब लोगों से सात बरस पहले नमाज़ पढ़ी।

  अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की फ़ज़ीलत बयान करने के लिए यह एक हदीस ही काफ़ी है कि अहले सुन्नत की बड़ी किताब जामये तिर्मिज़ी शरीफ़ में आया है:

حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْجَهْضَمِيُّ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَلِيٍّ، أَخْبَرَنِي أَخِي مُوسَى بْنُ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ مُحَمَّدِ بْنِ عَلِيٍّ، عَنْ أَبِيهِ عَلِيِّ بْنِ الْحُسَيْنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخَذَ بِيَدِ حَسَنٍ،‏‏‏‏ وَحُسَيْنٍ،‏‏‏‏ فَقَالَ:‏‏‏‏    مَنْ أَحَبَّنِي وَأَحَبَّ هَذَيْنِ،‏‏‏‏ وَأَبَاهُمَا،‏‏‏‏ وَأُمَّهُمَا كَانَ مَعِي فِي دَرَجَتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ قَالَ أَبُو عِيسَى:‏‏‏‏ هَذَا حَسَنٌ غَرِيبٌ، ‏‏‏‏‏‏لَا نَعْرِفُهُ مِنْ حَدِيثِ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ إِلَّا مِنْ هَذَا الْوَجْهِ.

  तर्जुमा: रसूल अल्लाह (स) ने इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़ा और फ़रमाया: जो मुझ से मोहब्बत करें और इन दोनों से और इन दोनों के बाप (हज़रत अली अलैहिस्सलाम) और इन दोनों की माँ (हज़रत फ़ातिमा ज़हरा) से मोहब्बत करे, तो वह क़यामत के दिन मेरे साथ मेरे दर्जे में होगा!

  ऊपर दी हुई क़ुरआन और अहादीस की तमाम मोतबर रिवायतों से एक बात तो समझ में आ गई कि तमाम आलमीन में पंजेतन पाक (अ) से बढ़कर कोई भी सच्चा व सिद्दिके अकबर नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा कोई और होता तो हुज़ूर (स) अल्लाह के हुक्म से उसको भी अपने साथ ईसाइयों के सामने मुबाहिला के लिए ले जाते...

  इस्लाम की ईसाइयों पर बिना हथियार से लड़ी गई जंग में जीत की ख़ुशी को ईद की ख़ुशी की तरह मुसलमानों और तमाम आलमे इस्लाम को हर साल मनाना चाहिए।

  तमाम आलमे इस्लाम को 24 ज़िलहिज्ज की इस ईदे मुबाहिला की ख़ुशी बहुत बहुत मुबारक हो।

बुधवार, 10 जून 2026 19:38

ईदे मुबाहिला मुबारक

मुबाहिला मुबारक, यह माजरा 10 हिजरी का है जब अरब में मौजूद एक इलाक़ा जिसको नजरान के नाम से जाना जाता था वहाँ के ईसाइयों ने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (स) से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में बहस की और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बताया (माज़अल्लाह) और हुज़ूर पाक (स) के लाख समझाने के बावजूद कि हज़रत ईसा (अ) अल्लाह के बेटे नहीं बल्कि अल्लाह की तरफ़ से नबी बनाये गए हैं इस बात का इन्कार करते रहे जब नजरान के ईसाइयों के बड़े बड़े पादरी भी हुज़ूर (स) की बात को नहीं मानें बल्कि हुज़ूर पाक (स) को और दीने इस्लाम को ही झूठा कहने लगे (माज़अल्लाह) तो फिर अल्लाह ने सूरए आले इमरान की आयत नज़िल हुई।

ईदे मुबाहिला मुबारक, यह माजरा 10 हिजरी का है जब अरब में मौजूद एक इलाक़ा जिसको नजरान के नाम से जाना जाता था वहाँ के ईसाइयों ने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (स) से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में बहस की और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बताया (माज़अल्लाह) और हुज़ूर पाक (स) के लाख समझाने के बावजूद कि हज़रत ईसा (अ) अल्लाह के बेटे नहीं बल्कि अल्लाह की तरफ़ से नबी बनाये गए हैं इस बात का इन्कार करते रहे जब नजरान के ईसाइयों के बड़े बड़े पादरी भी हुज़ूर (स) की बात को नहीं मानें बल्कि हुज़ूर पाक (स) को और  दीने इस्लाम को ही झूठा कहने लगे (माज़अल्लाह) तो फिर अल्लाह ने सूरए आले इमरान की आयत 61 को नाज़िल फ़रमाया:

فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

फिर जब तुम्हारे पास इल्म (क़ुरआन) आ चुका उसके बाद भी अगर तुम से कोई (नसरानी) ईसा के बारे में हुज्जत करें तो कहो कि (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलाएं तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलाएं) और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों को बुलाएं और तुम अपनी जानों (नफ़्सों) को, उसके बाद हम सब मिलकर (ख़ुदा की बारगाह में) गिड़गिड़ायें और झूठों पर ख़ुदा की लानत करें।

जब अल्लाह का यह हुक्म नाज़िल हुआ कि अब जब बात झूठ और सच की आ ही गई है तो फिर नबी (स) आप इन ईसाइयों के आलिमों से फ़रमा दीजिए कि आओ एक मैदान में हम अपने बेटों को बुलाएँ तुम अपने बेटों को बुलाओ, और हम अपनी औरतों को और तुम अपनी औरतों को बुलाओ और हम अपनी जानों (नफ़्सों) को बुलाएँ और तुम अपनी जानों (नफ़्सों) को बुलाओ उसके बाद हम सब मिलकर ख़ुदा की बारगाह में दुआ करते हैं कि हम में से जो झूठा है उस पर अल्लाह की लानत हो।

जब दिन और वक़्त मुक़र्रर हो गया तो फिर 24 ज़िलहिज्ज 10 हिजरी को तमाम नजरान के बड़े बड़े आलिम व पादरी जमा हुए अपने पूरे लोगों के साथ और फिर रसूल अल्लाह (स) के आने का इंतज़ार करने लगे थोड़ी देर में वह लोग देखते हैं कि हुज़ूर पाक (स) चले आ रहे हैं लेकिन उनके साथ कोई भीड़ नहीं है ना असहाब का मजमा हैं।

बल्की क़ुरआन में अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ रसूल अल्लाह (स) के साथ हुक्मे परवरदिगार के मुताबिक़ बेटों में इमाम हसन अलैहिस्सलाम हुज़ूर पाक (स) की ऊंगली पकड़े हुए और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हुज़ूर पाक (स) की गोद में उनके बाद औरतों में सिर्फ़ इकलौती ख़ातून ए जन्नत की सरदार हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा (जबकि हुक्म औरतों का हुआ था लेकिन शर्त सच्चा होने की थी जिसने पूरी ज़िन्दगी में झूठ न बोला हो इसलिए तन्हा एक ही ख़ातून) और रसूले ख़ुदा (स) की जान व नफ़्स के तौर पर सिर्फ़ हज़रत अली अलैहिस्सलाम (यहाँ पर भी नफ़्सों का हुक्म था लेकिन शर्त ऐसे इंसान की थी जिसने पूरी ज़िंदगी में कभी भी झूठ न बोला हो वरना वह झूठों पर लानत कैसे कर सकता है।

जिसने ख़ुद झूठ बोला हो वरना लानत पलट के ख़ुद पर आ जाती) जब ईसाइयों के बड़े बड़े पादरियों ने इन पंजेतन पाक (अ) की नूरानी शख़्सियतों को आते देखा तो अचानक उन पादरियों ने बोलना शुरू किया कि हम ऐसी शख़्सियतों को मैदान में अपने तरफ़ आते हुए देख रहे हैं कि अगर यह लोग (पंजेतन पाक) पहाड़ की तरफ इशारा कर दें तो पहाड़ अपनी जगह से हट जायेंगे और अगर इन्होंने हमारे ऊपर लानत कर दी तो क़यामत तक कोई ईसाई नहीं आएगा सब अभी ख़त्म हो जायेंगे।

इसलिए उन पादरियों ने हुज़ूर (स) से हार मानली और बिना मुबाहिला किये ही लौटने का फ़ैसला कर लिया और جزیه जिज़'या (इस्लामी टैक्स) भी देना मंज़ूर कर लिया।

अहले सुन्नत की मशहूर किताब मुसनद अहमद में हदीस नम्बर 12320 में इस वाक़ेए का ज़िक्र बयान हुआ है:

۔ (۱۲۳۲۰)۔ وَعَنْ سَعْدِ بْنِ اَبِیْ وَقَّاصٍ، قَالَ: وَسَمِعْتُہُ یَقُولُیَوْمَ خَیْبَرَ: ((لَأُعْطِیَنَّ الرَّایَۃَ رَجُلًا یُحِبُّ اللّٰہَ وَرَسُولَہُ، وَیُحِبُّہُ اللّٰہُ وَرَسُولُہُ۔)) فَتَطَاوَلْنَا لَہَا فَقَالَ: ((ادْعُوا لِی عَلِیًّا۔)) فَأُتِیَبِہِ أَرْمَدَ فَبَصَقَ فِی عَیْنِہِ وَدَفَعَ الرَّایَۃَ إِلَیْہِ فَفَتَحَ اللّٰہُ عَلَیْہِ، وَلَمَّا نَزَلَتْ ہٰذِہِ الْآیَۃُ {نَدْعُ أَبْنَائَ نَا وَأَبْنَائَ کُمْ} [آل عمران: ۶۱] دَعَا رَسُولُ اللّٰہِ صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ عَلِیًّا وَفَاطِمَۃَ وَحَسَنًا وَحُسَیْنًا، فَقَالَ: ((اَللّٰہُمَّ ھٰوُلَائِ اَھْلِیْ۔)) (مسند احمد: ۱۶۰۸)

  तर्जुमा: साद बिन अबी वकास से रिवायत है वह कहते हैं: जब सूरए आले इमरान की आयत 61 आई:

فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

फिर जब तुम्हारे पास इल्म (क़ुरआन) आ चुका उसके बाद भी अगर तुम से कोई (नसरानी) ईसा के बारे में हुज्जत करें तो कहो कि (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलाएं तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलाएं) और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों (नफ़्सों) को बुलाएं और तुम अपनी जानों को, उसके बाद हम सब मिलकर (ख़ुदा की बारगाह में) गिड़गिड़ायें और झूठों पर ख़ुदा की लानत करें।

जब आयत नाज़िल हुई तो रसूल अल्लाह (स) ने सय्यदना अली अलैहिस्सलाम, सय्यदा फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा, सैय्यदना इमाम हसन और सय्यदना इमाम हुसैन को बुलाया और फ़रमाया: ऐ अल्लाह! यह मेरे अहलेबैत हैं।

एक और जगह सुनने इब्ने माजा में हदीस नम्बर 120 में आया है:

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيل الرَّازِيُّ، ‌‌‌‌‌‏حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، ‌‌‌‌‌‏أَنْبَأَنَا الْعَلَاءُ بْنُ صَالِحٍ، ‌‌‌‌‌‏عَنْ الْمِنْهَالِ، ‌‌‌‌‌‏عَنْ عَبَّادِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، ‌‌‌‌‌‏قَالَ، ‌‌‌‌‌‏قَالَ عَلِيٌّ:‌‌‌‏   أَنَا عَبْدُ اللَّهِ، ‌‌‌‌‌‏وَأَخُو رَسُولِهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ‌‌‌‌‌‏وَأَنَا الصِّدِّيقُ الأَكْبَرُ لا يَقُولُهَا بَعْدِي إِلا كَذَّابٌ، ‌‌‌‌‌‏صَلَّيْتُ قَبْلَ النَّاسِ بِسَبْعِ سِنِينَ  .
तर्जुमा: हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि मैं अल्लाह का बन्दा और उसके रसूल (स) का भाई हूँ और मैं सिद्दिके अकबर (सबसे बड़ा सच्चा) हूँ मेरे बाद इस फ़ज़ीलत का दावा झूठा शख़्स ही करेगा, मैंने सब लोगों से सात बरस पहले नमाज़ पढ़ी।

अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की फ़ज़ीलत बयान करने के लिए यह एक हदीस ही काफ़ी है कि अहले सुन्नत की बड़ी किताब जामये तिर्मिज़ी शरीफ़ में आया है:

حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْجَهْضَمِيُّ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَلِيٍّ، أَخْبَرَنِي أَخِي مُوسَى بْنُ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ مُحَمَّدِ بْنِ عَلِيٍّ، عَنْ أَبِيهِ عَلِيِّ بْنِ الْحُسَيْنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخَذَ بِيَدِ حَسَنٍ،‌‌‌‏ وَحُسَيْنٍ،‌‌‌‏ فَقَالَ:‌‌‌‏    مَنْ أَحَبَّنِي وَأَحَبَّ هَذَيْنِ،‌‌‌‏ وَأَبَاهُمَا،‌‌‌‏ وَأُمَّهُمَا كَانَ مَعِي فِي دَرَجَتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ قَالَ أَبُو عِيسَى:‌‌‌‏ هَذَا حَسَنٌ غَرِيبٌ، ‌‌‌‌‌‏لَا نَعْرِفُهُ مِنْ حَدِيثِ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ إِلَّا مِنْ هَذَا الْوَجْهِ.

तर्जुमा: रसूल अल्लाह (स) ने इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़ा और फ़रमाया: जो मुझ से मोहब्बत करें और इन दोनों से और इन दोनों के बाप (हज़रत अली) और इन दोनों की माँ (हज़रत फ़ातिमा ज़हरा) से मोहब्बत करे, तो वह क़यामत के दिन मेरे साथ मेरे दर्जे में होगा!

ऊपर दी हुई क़ुरआन और अहादीस की तमाम मोतबर रिवायतों से एक बात तो समझ में आ गई कि तमाम आलमीन में पंजेतन पाक (अ) से बढ़कर कोई भी सच्चा व सिद्दिके अकबर नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा कोई और होता तो हुज़ूर (स) अल्लाह के हुक्म से उसको भी अपने साथ ईसाइयों के सामने मुबाहिला के लिए ले जाते...

इस्लाम की ईसाइयों पर बिना हथियार से लड़ी गई जंग में जीत की ख़ुशी को ईद की ख़ुशी की तरह मुसलमानों और तमाम आलमे इस्लाम को हर साल मनाना चाहिए।

तमाम आलमे इस्लाम को 24 ज़िलहिज्ज की इस ईदे मुबाहिला की ख़ुशी बहुत बहुत मुबारक हो।

,बाज़ औक़ात तारीख़ के उफ़ुक़ पर ऐसे मंज़र नमूदार होते हैं जिनके सामने क़लम लरज़ने लगता है, अल्फ़ाज़ ख़ामोश हो जाते हैं और अक़्ल हैरत के समंदर में डूब जाती है। हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम की सूली भी ऐसा ही एक अज़ीम और नाक़ाबिले-फ़रामोश मंज़र है।

यह कोई मामूली फाँसी न थी। यह एक ग़ुलामे अली (अ०स०) और सल्तनते बातिल के दरमियान आख़िरी मुकालमा था। यह एक आशिक़े विलायत और जाबिर इक़्तेदार के दरमियान फ़ैसला-कुन मआरका था। यह एक ज़बान और हज़ारों तलवारों की जंग थी। यह एक दिल और एक सल्तनत का मुक़ाबला था। हैरतअंगेज़ बात यह है कि इस मआरके में तलवारें हार गईं और ज़बान जीत गई, हुकूमत हार गई और सूली जीत गई, क़ातिल शिकस्त खा गया और मक़तूल अमर हो गया।

सूली पर एक इंसान नहीं, एक मकतब खड़ा था

लोग समझते हैं कि इब्ने ज़ियाद ने एक फ़र्द को सूली दी थी। नहीं! उसने एक जिस्म को सूली दी थी, मगर उस जिस्म के अंदर एक पूरा मकतब धड़क रहा था।

वहाँ एक इंसान नहीं खड़ा था बल्कि अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम की मआरिफ़त खड़ी थी। वहाँ एक क़ैदी नहीं लटका था बल्कि विलायत का परचम लहरा रहा था। वहाँ एक मजबूर शख़्स नहीं था बल्कि इस्तिक़ामत का एक बुलंद पहाड़ ईस्तादा था। वहाँ कोई मुजरिम नहीं था बल्कि सदाक़त का एक रौशन सितारा जगमगा रहा था।

जिस लम्हे हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम दार पर बुलंद हुए, उसी लम्हे उनकी क़ामत ज़मीन से उठकर तारीख़ के आसमान तक पहुँच गई।

दार की बुलंदी और रूह की परवाज़

सूली का मक़सद इंसान को रुसवा करना होता है, लेकिन हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम की सूली उनकी रिफ़अत व अज़मत का सबब बन गई। ज़ालिमों ने उन्हें ज़मीन से इसलिए बुलंद किया था कि लोग इबरत हासिल करें, मगर ख़ुदा ने उन्हें इसलिए बुलंद किया कि लोग हिदायत हासिल करें। वह जितना सूली पर बुलंद होते गए, उतना ही उनका मक़ाम दिलों में बुलंद होता गया। वह जितना जिस्मानी तौर पर पाबंद होते गए, उतनी ही उनकी रूह आज़ाद होती गई।

यह अमीरे काइनात अली अलैहिस्सलाम की मआरिफ़त की दुनिया है; जहाँ ज़ंजीरें आज़ादी बन जाती हैं, क़ैद इबादत बन जाती है, शहादत ज़िंदगी बन जाती है और सूली मिंबर में बदल जाती है।

ख़तीबे विलायत, ज़ाकिरे मआरिफ़त, सुख़नराने बसीरत

हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम ने सूली पर इश्क़े अली (अ.स.) का आख़िरी ख़ुत्बा दिया।

तसव्वुर कीजिए! कूफ़ा का बाज़ार है, लोगों का हुजूम है, सिपाहियों का मुहासरा है, ख़ौफ़ की फ़िज़ा है, तलवारों की चमक है और दरमियान में सूली पर लटका हुआ एक आशिक़े अली (अ.स.) है।

आम इंसान होता तो अपने ज़ख़्म गिनता, अपनी तकलीफ़ बयान करता और अपनी जान बचाने की फ़िक्र करता, लेकिन हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम अपनी ज़ात को फ़रामोश कर चुके थे। वह अपनी प्यास भूल गए थे, अपने ज़ख़्म भूल गए थे, अपनी मौत भूल गए थे और सिर्फ़ मौला अली (अ.स.) को याद कर रहे थे।

गोया उनकी हर साँस यह एलान कर रही थी, “अगर ज़िंदगी मिली तो अली (अ.स.) के लिए, और अगर मौत आई तो अली (अ.स.) के लिए।”

यह इश्क़ की वह मंज़िल है जहाँ आशिक़ अपनी ज़ात से निकलकर महबूब में फ़ना हो जाता है।

ज़ालिम की सबसे बड़ी शिकस्त

ज़ालिम की कामयाबी सिर्फ़ किसी को क़त्ल कर देना नहीं होती बल्कि उसकी अस्ल कामयाबी यह होती है कि वह अपने मुख़ालिफ़ को ख़ामोश कर दे। लेकिन हज़रत मैसम तम्मार अलैहिस्सलाम के मामले में इब्ने ज़ियाद नाकाम हो गया। वह जिस्म को क़त्ल कर सका, फ़िक्र को नहीं; ज़बान को काट सका, अक़ीदे को नहीं; ख़ून बहा सका, पैग़ाम को नहीं। यही उसकी सबसे बड़ी शिकस्त थी।

वह सूली को ख़ामोशी की अलामत बनाना चाहता था, मगर हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने उसे बेदारी की अलामत बना दिया। वह मौत को ख़ौफ़ की निशानी बनाना चाहता था, मगर हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने उसे शुजाअत और हुर्रियत की निशानी बना दिया।

लहू का ख़िताब

जब ख़ून तक़रीर करता है तो उसकी गूँज अफ़लाक पर छा जाती है।

दुनिया की तक़रीरें चंद लम्हों के लिए असर रखती हैं, दुनिया के ख़तीब चंद बरसों बाद भुला दिए जाते हैं, मगर ख़ून की तक़रीर कभी ख़त्म नहीं होती। शहीद का ख़ुत्बा सदियों तक जारी रहता है।

हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम की ज़बान काट दी गई, मगर उनका ख़ून बोलता रहा, उनके ज़ख़्म बोलते रहे, उनकी सूली बोलती रही, उनकी ख़ामोशी बोलती रही और आज चौदह सौ बरस गुज़र जाने के बाद भी उनका पैग़ाम ज़िन्दा है।

इरफ़ाने फ़ना और बक़ाए अबदी

अहले इरफ़ान कहते हैं कि जब इंसान ख़ुदा की राह में अपनी ज़ात को फ़ना कर देता है तो उसे बक़ा नसीब होती है। हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने ख़ुद को विलायते अली (अ.स.) में फ़ना कर दिया था, इसी लिए उन्हें बक़ाए अबदी नसीब हुई।

उनका जिस्म ज़ेरे ख़ाक चला गया, मगर उनका नाम ज़िन्दा रहा। उनकी आवाज़ ख़ामोश हो गई, मगर उनका पैग़ाम बाक़ी रहा। उनकी आँखें बंद हो गईं, मगर उनकी बसीरत नस्लों को जगाती रही। इसी लिए आज भी जब उनका नाम लिया जाता है तो दिलों में अकीदत के चिराग़ रौशन हो जाते हैं।

कर्बला के सूरज की पहली किरन

अगर कर्बला को इन्क़िलाबे हुसैनी का नुक़्तए उरूज कहा जाए तो हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम उस इन्क़िलाब के इब्तिदाई तम्हीदी किरदारों में नुमायाँ नज़र आते हैं। यूँ महसूस होता है कि मीसम (अ.स.) की सूली दरअसल कर्बला के सूरज की पहली किरन थी।

उन्होंने कूफ़ा में वही पैग़ाम दिया जिसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में अपने ख़ून से रक़म किया। हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने सूली पर एलान किया कि हक़ को दबाया नहीं जा सकता, और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में साबित कर दिया कि हक़ को शिकस्त भी नहीं दी जा सकती। हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़बान क़ुर्बान की और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपना सर क़ुर्बान किया।

हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने दार को मिंबर बनाया और हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने असीरी को मिंबर बना दिया। यूँ मकतबे अहले बैत अलैहिमुस्सलाम ने दुनिया को सिखा दिया कि हक़ का मुबल्लिग़ हालात का मोहताज नहीं होता।

मीसम ए अस्र कौन?

अगर आज हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम हमारे दरमियान होते तो शायद हमसे पूछते कि क्या तुम्हारी ज़बान हक़ के लिए खुलती है? क्या तुम इंसाफ़ और सदाक़त का साथ देते हो? क्या तुम मस्लेहत के बुत तोड़ सकते हो? क्या तुम हक़ की ख़ातिर नुक़सान बर्दाश्त कर सकते हो? क्या तुम अपने ज़माने के फ़ित्नों और आज़माइशों को पहचानते हो?

क्योंकि हर दौर अपने इम्तिहानात के साथ आता है, हर ज़माना इंसान के ज़मीर, किरदार और इस्तिक़ामत को परखता है, और हर अहद को ऐसे अफ़राद की ज़रूरत होती है जो सच्चाई, इंसाफ़ और इंसानी अक़दार का परचम बुलंद रख सकें।

मीसम ए अस्र वह है जो हालात के दबाव में भी अपने उसूलों का सौदा न करे, मुश्किलात के साये में भी सच्चाई, इंसाफ़ और इंसानी अक़दार का परचम बुलंद रखे, और अपने अहद की फ़िक्री तारीकियों में उम्मीद और शऊर का चिराग़ बनकर जलता रहे।

हर ज़माने में ऐसे मौक़े आते हैं जब हक़ व बातिल, सदाक़त व मस्लेहत और उसूल व मफ़ाद के दरमियान इंतिख़ाब करना पड़ता है। मीसम ए अस्र वही है जो आसान रास्तों के बजाय दुरुस्त रास्ते का इंतिख़ाब करे, ख़्वाह उसके लिए सब्र, इस्तिक़ामत और क़ुर्बानी ही क्यों न दरकार हो।

वह इख़्तिलाफ़ के बावजूद अख़लाक़ को, ताक़त के बावजूद इंसाफ़ को, और मुश्किलात के बावजूद उम्मीद को ज़िन्दा रखता है। उसकी जद्दोजहद किसी फ़र्द, जमाअत या गिरोह के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि आला इंसानी अक़दार, सच्चाई, दियानत और ख़ैर के फ़रोग़ के लिए होती है।

मीसम ए अस्र दरअसल एक फ़िक्र, एक किरदार और एक ज़िम्मेदारी का नाम है; ऐसा किरदार जो ज़माने के बदलते हालात में भी अपने ज़मीर, अपने उसूलों और अपनी अक़दार से वफ़ादार रहे।

सलाम बर मीसम ए विलायत

सलाम हो उस मर्द ए हक़ पर जिसने मौत के सामने मुस्कुरा कर हक़ का एलान किया।

सलाम हो उस आशिक़े अली (अ.स.) पर जिसने दार को मिंबर बना दिया।

सलाम हो उस आरिफ़ पर जिसने फ़ना में बक़ा तलाश कर ली।

सलाम हो उस मुजाहिदे सदाक़त पर जिसने इस्तिक़ामत का ऐसा दर्स दिया जो सदियों बाद भी ज़िन्दा है।

सलाम हो उस शहीद पर जिसकी कटी हुई ज़बान आज भी अहले ईमान के दिलों में बोल रही है।

और सलाम हो उस सूली पर जो तारीख़ की अज़ीम तरीन दर्सगाह बन गई; क्योंकि वहाँ एक इंसान नहीं लटका था, वहाँ विलायत का एक सूरज तुलूअ हो रहा था।

 ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पिजेश्कियान ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर संदेश जारी कर कहा कि देश की ताकतवर सशस्त्र सेनाएँ और उनकी सरकार ईरानी जनता के अधिकारों की पूरी शक्ति से रक्षा करेंगी और किसी भी धमकी के आगे नहीं झुकेंगी।

ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पिजेश्कियान ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर संदेश जारी कर कहा कि देश की ताकतवर सशस्त्र सेनाएँ और उनकी सरकार ईरानी जनता के अधिकारों की पूरी शक्ति से रक्षा करेंगी और किसी भी धमकी के आगे नहीं झुकेंगी।

उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और ईरानी लोगों की शांति सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और ईरान किसी दबाव या धमकी के आगे पीछे नहीं हटेगा।

राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने यह भी कहा कि कूटनीति और रक्षा राष्ट्रीय शक्ति के दो मुख्य स्तंभ हैं और देश दोनों मोर्चों पर संतुलित रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया,हमने न तो युद्ध का मैदान छोड़ा है और न ही वार्ता की मेज को त्यागा है।

यह बयान ऐसे समय में आए हैं जब ईरान के खतमुल-अंबिया सेंट्रल मुख्यालय ने इज़राइल के खिलाफ जारी सैन्य अभियानों की समाप्ति की घोषणा करते हुए चेतावनी दी है कि यदि आक्रमण जारी रहा तो उसका जवाब पहले से कहीं अधिक कड़ा और शक्तिशाली दिया जाएगा।

 डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी ने आज तड़के ईरान के विभिन्न क्षेत्रों पर इज़रायली हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने ही सहयोगी देश को नियंत्रित करने में असमर्थ हैं।

डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी ने आज तड़के ईरान के विभिन्न क्षेत्रों पर इज़रायली हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने ही सहयोगी देश को नियंत्रित करने में असमर्थ हैं।

मर्फी ने आगे कहा,जब ट्रंप यह घोषणा करते हैं कि वह नेतन्याहू को फोन करके उनसे जवाबी कार्रवाई न करने का अनुरोध करेंगे और उसके कुछ ही घंटों बाद नेतन्याहू प्रतिशोधात्मक हमला कर देता हैं, तो यह ट्रंप के लिए और भी बड़ी बेइज्जती बन जाती है।

वरिष्ठ सीनेटर ने इस स्थिति को केवल अवज्ञा का मामला न बताते हुए कहा,यह युद्ध ट्रंप और व्यापक रूप से अमेरिका की शक्ति और प्रतिष्ठा के लिए अपमानजनक साबित हुआ है। ट्रंप काफी समय पहले ही इस युद्ध के प्रबंधन पर अपना नियंत्रण पूरी तरह खो चुके हैं।

व्हाइट हाउस द्वारा यह दावा किए जाने के बावजूद कि आज तड़के ईरान के भीतर हुए इज़रायली हमले में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी, इज़रायली अख़बार इज़रायल ह्योम ने एक जानकार स्रोत के हवाले से रिपोर्ट दी है कि इज़रायल ने अपने हमले की योजना और कार्रवाई अमेरिका के साथ समन्वय करके की थी।

इस रिपोर्ट ने व्हाइट हाउस के आधिकारिक रुख पर सवाल खड़े कर दिए हैं और ईरान पर हुए हमले में अमेरिका की वास्तविक भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।