इमाम हसन अस्करी (अ) की इमामत, जीवन, संघर्ष और शियो के मार्गदर्शन से जुड़े 4 सवाल

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इमाम हसन अस्करी (अ) की इमामत, जीवन, संघर्ष और शियो के मार्गदर्शन से जुड़े 4 सवाल

इमाम हसन अस्करी (अ) ने अब्बासी शासन के कड़े पहरे और लगातार दबाव के बीच इमामत की जिम्मेदारी संभाली। सरकार की सख्त निगरानी के बावजूद उन्होंने अपने विश्वसनीय प्रतिनिधियों के माध्यम से शिया समुदाय से संपर्क बनाए रखा और उन्हें धार्मिक मार्गदर्शन दिया। उन्होंने शियाओं को ऐसे दौर के लिए भी तैयार किया, जब इमाम से प्रत्यक्ष संपर्क संभव नहीं रहेगा।

 इमाम हसन अस्करी (अ) के जन्म दिन के अवसर पर उनके जीवन और इमामत से जुड़े चार महत्वपूर्ण सवालों के जवाब प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इन सवालों के माध्यम से उनके जीवन, पारिवारिक स्थिति, शियो से संपर्क और हज़रत नरजिस ख़ातून (स) से विवाह से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को समझा जा सकता है।

इमाम हसन अस्करी (अ) को सामर्रा में क्यों रहना पड़ा?

इमाम हसन अस्करी (अ) को बचपन में ही अपने पिता इमाम अली नक़ी (अ) के साथ अब्बासी शासकों के आदेश पर सामर्रा जाना पड़ा। उस समय सामर्रा अब्बासी शासन की प्रमुख सैन्य राजधानी थी। शासकों का उद्देश्य इमामों को अपने नियंत्रण में रखना, उनके लोगों से संपर्क को सीमित करना और उनकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखना था।

अब्बासी सरकार को इस बात की भी चिंता थी कि इमाम अस्करी (अ) के वंश में उस महदी के जन्म की भविष्यवाणी की गई थी, जो आगे चलकर इंसाफ और सत्य की स्थापना करेंगे। इसके अलावा, इमाम के बढ़ते सामाजिक और धार्मिक प्रभाव तथा अलवी आंदोलनों को लेकर भी सरकार चिंतित थी।

इसी वजह से इमाम अस्करी (अ) पर कड़ी पाबंदियाँ लगाई गईं और उन्हें सामर्रा की सैन्य छावनी के वातावरण में रहना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपने विश्वसनीय और गुप्त प्रतिनिधियों के माध्यम से शियाओं का मार्गदर्शन जारी रखा और इमाम महदी (अ) के अस्तित्व की रक्षा की।

इमाम हसन अस्करी (अ) की कितनी संतान थीं?

कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में इमाम हसन अस्करी (अ) की एक से अधिक संतानों का उल्लेख मिलता है, लेकिन अधिकांश शिया विद्वानों का प्रसिद्ध मत है कि उनकी केवल एक संतान थी और वह इमाम महदी (अ) हैं। उनकी माता हज़रत नरजिस ख़ातून (स) थीं।

शेख़ मुफ़ीद ने अपनी पुस्तकों में स्पष्ट किया है कि इमाम अस्करी (अ) की इमाम महदी (अ) के अलावा कोई दूसरी संतान नहीं थी। शेख़ कुलैनी ने ‘अल-काफ़ी’, शेख़ तबरसी ने ‘आलामुल वरा’ और अन्य प्रमुख विद्वानों ने भी इसी मत को स्वीकार किया है। अल्लामा मजलिसी ने ‘बिहारुल अनवार’ में अन्य संतानों से संबंधित कुछ रिवायतों को विश्वसनीय नहीं माना है।

ऐतिहासिक घटनाओं से भी इस मत को समर्थन मिलता है। इमाम अस्करी (अ) की शहादत के बाद उनकी विरासत को उनकी माता और भाई के बीच बाँटने की प्रक्रिया शुरू की गई, क्योंकि तत्कालीन शासन उनकी संतान के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करना चाहता था। इन परिस्थितियों के बावजूद शिया विद्वानों के अनुसार इमाम महदी (अ) ही इमाम हसन अस्करी (अ) की एकमात्र संतान थे।

नज़रबंदी के दौरान इमाम अस्करी (अ) शियो से कैसे संपर्क करते थे?

इमाम हसन अस्करी (अ) पर इतनी कड़ी निगरानी थी कि शियाओं के लिए उनसे सीधे मिलना आसान नहीं था। कुछ रिवायतों के अनुसार, लोगों को कभी-कभी उस समय इमाम की एक झलक मिलती थी, जब वह सरकारी केंद्र की ओर आते-जाते थे।

शेख़ तूसी की किताब ‘अल-ग़ैबा’ में वर्णित है कि जब इमाम सरकारी केंद्र की ओर जाते थे, तो बड़ी संख्या में लोग रास्ते में जमा हो जाते थे। उनके दिखाई देने पर लोगों का शोर शांत हो जाता और वह उनके बीच से गुजरते थे।

अली इब्न जाफ़र हलबी से रिवायत है कि एक अवसर पर इमाम की ओर से उनके समर्थकों को संदेश भेजा गया:

“कोई भी मुझे सलाम न करे, मेरी ओर हाथ से इशारा न करे और कोई संकेत न दे, क्योंकि तुम अपने आपको सुरक्षित नहीं रख पाओगे।”

इससे पता चलता है कि उस समय इमाम और उनके अनुयायियों के बीच संपर्क कितना जोखिम भरा था। शिया लोग अपने सवाल और पत्र गुप्त रूप से इमाम तक पहुँचाते थे। कुछ लोग किसी काम के बहाने उनसे मिलने का प्रयास करते थे।

शियाओं और इमाम के बीच संपर्क को व्यवस्थित रखने के लिए इमाम अस्करी (अ) ने विभिन्न क्षेत्रों में भरोसेमंद प्रतिनिधियों की व्यवस्था की थी। ये प्रतिनिधि शियाओं के सवाल और समस्याएँ इमाम तक पहुँचाते तथा उनके मार्गदर्शन को लोगों तक पहुँचाते थे। बाद में यही व्यवस्था ग़ैबत के दौर में विशेष प्रतिनिधियों के माध्यम से आगे बढ़ी।

हज़रत नरजिस ख़ातून (स) से इमाम हसन अस्करी (अ) का विवाह कैसे हुआ?

शिया रिवायतों में हज़रत नरजिस ख़ातून (स) को रोमन मूल की बताया गया है। कुछ स्रोतों के अनुसार, वह पूर्वी रोमन सम्राट के पुत्र ‘येशुआ’ की पुत्री और हज़रत ईसा (अ) के शिष्य शमऊन की वंशज थीं। उन्हें मलिका और सिकल जैसे नामों से भी जाना जाता है।

रिवायतों के अनुसार, हज़रत नरजिस ख़ातून (स) ने कुछ विशेष स्वप्न देखे और उसके बाद इस्लाम स्वीकार किया। बाद में मुसलमानों और रोमनों के बीच हुए एक युद्ध के दौरान उन्हें बंदी बना लिया गया और वह सामर्रा पहुँचीं।

इमाम अली नक़ी (अ) ने उन्हें अपने परिवार में शामिल करने की व्यवस्था की और इस्लामी शिक्षाएँ देने के लिए अपनी बहन हकीमा ख़ातून के सुपुर्द किया। इसके बाद इमाम हसन अस्करी (अ) से उनका विवाह हुआ। इमाम अली नक़ी (अ) ने हज़रत नरजिस ख़ातून (स) के बारे में बताया कि वह उनके पुत्र हसन की पत्नी और क़ायम-ए-आले-मुहम्मद (अ) की माता होंगी।

हज़रत नरजिस ख़ातून (स) के जीवन और वंश से संबंधित विवरण शेख़ तूसी की ‘अल-ग़ैबा’, शेख़ सदूक़ की ‘कमालुद्दीन’ और अल्लामा मजलिसी की ‘बिहारुल अनवार’ जैसी शिया पुस्तकों में मिलता है। इन स्रोतों में उनके रोमन मूल और सामर्रा पहुँचने से संबंधित रिवायतों का भी उल्लेख किया गया है।

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