अली इमामे मन्असतो मनम ग़ुलामे अली

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अली इमामे मन्असतो मनम ग़ुलामे अली

अली मेरे इमाम हैं और मैं अली का ग़ुलाम हूँ यह सिर्फ़ शब्दो का संग्रह नहीं है, न ही किसी आरज़ी जज़्बे की बाज़गश्त, बल्कि यह एक ज़िंदा फ़िक्री अहद है, जो इंसान के बातिन में जन्म लेता है और आहिस्ता-आहिस्ता उसके अक़ीदे, अमल और पूरी ज़िंदगी की सिम्त तय कर देता है।

अली इमाम मेरा हैं और मैं अली का ग़ुलाम हूँ यह सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का मजमूआ नहीं है, न ही किसी आरज़ी जज़्बे की बाज़गश्त, बल्कि यह एक ज़िंदा फ़िक्री अहद है, जो इंसान के बातिन में जन्म लेता है और आहिस्ता-आहिस्ता उसके अक़ीदे, अमल और पूरी ज़िंदगी की सिम्त तय कर देता है।

यह ऐसा जुमला है जो ज़बान से अदा होने से पहले दिल में उतरता है, और जब दिल में जगह बना लेता है, तो ज़िंदगी के हर मोड़ पर अपना मफ़हूम ख़ुद बयान करता है।

यह कह देने की बात नहीं, बल्कि जीने की हक़ीक़त है ऐसी हक़ीक़त जो इंसान के सोचने के अंदाज़, चलने के रास्ते और हक़ व बातिल के दरमियान उसके इंतिख़ाब को वाज़ेह कर देती है।

अली इमाम-ए-मेरा हैं” कहना दरअसल इस हक़ीक़त को क़बूल करना है कि हिदायत सिर्फ़ किताबों के औराक़ तक महदूद नहीं, बल्कि एक ज़िंदा, चलता-फिरता, साँस लेता नमूना-ए-अमल भी है; और “मैं अली का ग़ुलाम हूँ” कहना उसी हिदायत के सामने अपने नफ़्स को झुका देने, अपनी अना को तोड़ देने और हक़ के हाथ में हाथ दे देने का नाम है।

अली की इमामत का तसव्वुर किसी तख़्त-ओ-ताज, किसी सियासी इक्तिदार या किसी वक़्ती ग़लबे से कहीं बुलंद है।

यह इमामत इल्म की है जो जहालत के अंधेरों को चीर देती है; यह इमामत अद्ल की है जो ताक़त के ग़ुरूर को लरज़ा देती है; यह इमामत तक़वा की है जो दिलों को ज़िंदा करती है और यह इमामत इंसानियत की है जो इंसान को इंसान बनाती है।

अली वह चिराग़ हैं जिनकी रौशनी में अक़्ल को सिम्त मिलती है और ज़मीर को क़रार। वह मेहराब-ए-इबादत में आँसुओं की ख़ामोश ज़बान भी हैं और मैदान-ए-अमल में हक़ की ललकार भी।

उनकी ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि दीन सिर्फ़ मस्जिद की चारदीवारी तक महदूद नहीं; वह बाज़ार में भी ज़िंदा है, अदालत में भी बोलता है और घर की दहलीज़ पर भी साँस लेता है।

ग़ुलामी-ए-अली का मफ़हूम अक्सर सतही तौर पर समझ लिया जाता है, हालाँकि यह ग़ुलामी किसी इंसान की नहीं, बल्कि उन अक़दार की है जिनकी कामिल तजस्सुम अली की ज़ात में हुई। ग़ुलामी-ए-अली का मतलब है ज़ुल्म के सामने डट जाना, कमज़ोर के लिए ढाल बन जाना, और ताक़त को अमानत समझ कर इस्तेमाल करना।

यह ग़ुलामी इंसान को पस्त नहीं करती, बल्कि उसे ख़ुद्दार बनाती है; यह इंसान को ग़ुलाम नहीं बनाती, बल्कि उसे ख़ुदा के हुज़ूर जवाबदेह और बंदों का ख़ादिम बनाती है।

अली का इल्म एक ऐसा समंदर है जिसमें उतरने वाला कभी तिश्ना वापस नहीं आता। उनका हर क़ौल हिकमत का चिराग़ है और उनका हर अमल हक़ की तफ़्सीर।

वह सवाल करने वालों के लिए मुअल्लिम हैं और अमल की राह पर चलने वालों के लिए रहबर। उनकी अदालत में दोस्त-दुश्मन के नाम मिट जाते हैं और मीज़ान-ए-हक़ सिर्फ़ हक़ को तोलती है। इसी लिए अली की इमामत किसी एक गिरोह, किसी एक नस्ल या किसी एक ज़माने तक महदूद नहीं; वह हर उस दिल के इमाम हैं जो सच की तलाश में बेचैन है और अद्ल की ख़ुशबू पहचानता है।

जब हम कहते हैं अली इमाम-ए-मेरा हैं” तो दरअसल हम अपने लिए एक मयार तय करते हैं:
इल्म में दियानत,इबादत में ख़ुलूस,इक्तिदार में इंसाफ़,और मुआशरत में रहमत।

और जब कहते हैं मैं अली का ग़ुलाम हूँ तो हम अपनी अना, अपनी ख़्वाहिश और अपनी ख़ुदसाख़्ता बढ़ाई अली के दर पर रख देते हैं, ताकि हमें इंसान बनने का सलीक़ा आ जाए, हक़ पर क़ायम रहने का हौसला मिले और बातिल से टकराने की ताक़त पैदा हो।

यही अली की इमामत का कमाल है कि वह इंसान को बुलंद भी करती है और झुकना भी सिखाती है; वह बोलना भी सिखाती है और वक़्त पर ख़ामोश रहना भी। अली के दर का ग़ुलाम होना दरअसल ख़ुदा के दर का बाअज़्म मुसाफ़िर होना है ऐसा मुसाफ़िर जो रास्ते की ठोकरों से नहीं घबराता, क्योंकि उसके सामने एक रौशन चिराग़ है।

आख़िर में बस इतना कहना काफ़ी है कि अगर ज़िंदगी में कोई एक सिम्त चुननी हो तो वह अली की सिम्त हो; और अगर कोई एक पहचान हो तो वह यही हो—ऐसी पहचान जिस पर फ़ख़्र भी हो और जवाबदेही का एहसास भी:अली इमाम-ए-मेरा हैं और मैं पूरे शऊर, पूरे यक़ीन और पूरे फ़ख़्र के साथ कहता हूँ,

मैं अली का ग़ुलाम हूँ।

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