हर्मुज़ स्ट्रेट: असली विवाद क्या है?

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हर्मुज़ स्ट्रेट: असली विवाद क्या है?

अमेरिका और उसके समर्थक मीडिया लगातार यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान ने कुछ व्यापारिक जहाज़ों को निशाना बनाया, जिसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हमला किया। यानी समझौते का उल्लंघन पहले ईरान ने किया और अमेरिकी हमले केवल जवाबी कार्रवाई थे।

लेखक: मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री

 अमेरिका और उसके समर्थक मीडिया लगातार यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान ने कुछ व्यापारिक जहाज़ों को निशाना बनाया, जिसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हमला किया। यानी समझौते का उल्लंघन पहले ईरान ने किया और अमेरिकी हमले केवल जवाबी कार्रवाई थे।

लेकिन ईरान के अनुसार वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। उसके अनुसार समझौते का पहला उल्लंघन अमेरिका ने किया, जबकि ईरान की कार्रवाई उसी उल्लंघन की प्रतिक्रिया थी।

समझौते में स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि हर्मुज़ स्ट्रेट से गुजरने वाली व्यापारिक आवाजाही ईरान के साथ पूर्ण संपर्क और आपसी समन्वय के तहत होगी। इसके बावजूद अमेरिका ने ओमान की ओर एक नया समुद्री गलियारा बनाकर व्यापारिक जहाज़ों को उस मार्ग से ले जाने की कोशिश की। ईरान ने मध्यस्थ देशों और कूटनीतिक माध्यमों से कई बार चेतावनी दी कि यह कदम समझौते का स्पष्ट उल्लंघन है और इसके परिणाम होंगे, लेकिन अमेरिका अपने रुख पर कायम रहा। अंततः ईरान ने उसी ओमानी गलियारे से गुजरने वाले जहाज़ों को निशाना बनाया।

वास्तव में यह विवाद कुछ जहाज़ों का नहीं, बल्कि हर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण, प्रबंधन और सामरिक बढ़त का है। अमेरिका इस वैकल्पिक समुद्री गलियारे के माध्यम से इस जलमार्ग पर ईरान की प्रभावी पकड़ को कमजोर करना चाहता है, जबकि ईरान का कहना है कि इस संवेदनशील जलमार्ग का प्रबंधन क्षेत्रीय देशों, विशेष रूप से ओमान, के सहयोग से और बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त होकर होना चाहिए।

इस समय हर्मुज़ स्ट्रेट ईरान के हाथ में एक निर्णायक सामरिक साधन है। तेहरान अच्छी तरह जानता है कि युद्ध के मैदान में हासिल की गई बढ़त यदि वार्ता की मेज़ पर खो दी जाए तो सैन्य सफलता का महत्व कम हो जाता है। इसलिए ईरान इस बढ़त को खोना नहीं चाहता, बल्कि इसे और मजबूत करना चाहता है। इस संबंध में उठाए गए सभी कदम किसी एक व्यक्ति या संस्था के निर्णय नहीं, बल्कि पूरे शासन तंत्र का सामूहिक, सर्वसम्मत और गहराई से विचार किया गया निर्णय हैं। ईरान को इस मार्ग के महत्व का पूरा अंदाज़ा है और वह इसकी कीमत चुकाने के लिए भी तैयार दिखाई देता है।

अमेरिकी हमलों से ईरान को भारी जनहानि, आर्थिक और वित्तीय नुकसान हुआ है, लेकिन ईरान के अनुसार युद्ध का परिणाम अब भी उसके पक्ष में है। इसलिए वह इस संघर्ष से खाली हाथ लौटना नहीं चाहता, बल्कि दशकों से अपनाई गई जलमार्ग प्रबंधन की अपनी नीति को एक ऐसी वास्तविकता बनाना चाहता है जिसे बदला न जा सके।

ईरान इस मुद्दे को केवल सैन्य या राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखता, बल्कि इसे अपनी हजारों वर्ष पुरानी सभ्यतागत पहचान का हिस्सा मानता है। ईरानी दृष्टिकोण के अनुसार ये जलमार्ग सदियों तक ईरान के स्वामित्व और प्रशासन में रहे, जहाँ से दुनिया ने शांति के साथ व्यापार किया, लेकिन किसी बाहरी शक्ति को कभी यह अधिकार नहीं दिया गया कि वह इन्हें अपने राजनीतिक दबाव या सैन्य महत्वाकांक्षाओं का साधन बनाए। ईरान आज भी इसी ऐतिहासिक और सभ्यतागत सोच को बनाए रखना चाहता है। इसी कारण वह जलमार्गों से संबंधित वर्तमान अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को भी अपने ऐतिहासिक दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं मानता, जिस पर पहले भी विस्तार से चर्चा की जा चुकी है।

इसी संदर्भ में यदि फिर से पूर्ण युद्ध छिड़ता है, तो दुनिया जानती है कि इसकी जिम्मेदारी ईरान पर नहीं, बल्कि अमेरिका द्वारा समझौते का पालन न करने, इज़राइल की लगातार युद्ध की इच्छा और अमेरिका तथा इज़राइल की हालिया पराजयों से उत्पन्न बेचैनी पर होगी। यदि अमेरिका समझौते की सभी शर्तों का ईमानदारी से पालन करे, तो ईरान भी इस विवाद को बुनियादी ढाँचे की व्यापक तबाही वाले युद्ध में बदलना नहीं चाहेगा।

ईरान इस तथ्य से पूरी तरह परिचित है कि अमेरिका उसके बुनियादी ढाँचे को गंभीर क्षति पहुँचाने की क्षमता रखता है। लेकिन अमेरिका भी जानता है कि ईरान पूरे क्षेत्र को ऐसे व्यापक युद्ध में धकेलने की क्षमता रखता है, जिसकी आग से कोई भी सुरक्षित नहीं रह सकेगा। इसलिए पूरे क्षेत्र की तबाही न ईरान के हित में है, न अमेरिका के, न इज़राइल के और न ही अन्य क्षेत्रीय देशों के।

हालाँकि अब एक बात पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गई है कि ईरान विनाश के भय से झुकने या आत्मसमर्पण करने वाला देश नहीं है। युद्ध के पहले चरण में जिस असाधारण धैर्य, संगठित प्रतिरोध और सैन्य क्षमता का उसने प्रदर्शन किया, उससे यह संदेश गया कि ईरान अपनी प्राप्त सामरिक बढ़त, अपने रणनीतिक हितों और अपने राष्ट्रीय रुख की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार है। यही कारण है कि तेहरान की वर्तमान रणनीति पीछे हटने की नहीं, बल्कि अपनी उपलब्धियों को सुरक्षित, मजबूत और स्थायी बनाने पर केंद्रित दिखाई देती है।

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