ज़ुहूर में शीघ्रता के लिए इंतज़ार करने वालों के सामाजिक पक्ष

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ज़ुहूर में शीघ्रता के लिए इंतज़ार करने वालों के सामाजिक पक्ष

महदवियत के विशेषज्ञ और शोधकर्ता ने इमाम ज़माना (अ) के इंतज़ार करने वालों के उन सामाजिक पहलुओं पर प्रकाश डाला जो ज़ुहूर की तैयारी करने वाले समाज से संबंधित हैं।

महदवियत के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन फ़ल्लाह ने हौज़ा न्यूज़ एजेंसी से बातचीत में कहा कि इंतज़ार के सामाजिक महत्व को समझने के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यदि हम यह मान लें कि "इंतज़ार" के सामाजिक आयाम भी हैं, तो अहले बैत (अ) के अनुयायियों के पूरे समाज को इस संबंध में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं करनी चाहिए। यदि वे अपना सामूहिक दायित्व पूरा नहीं करेंगे, तो न केवल वे अपने कर्तव्य को पूर्ण रूप से निभाने से वंचित रहेंगे, बल्कि उसके परिणाम और फल अर्थात अल्लाह के वली, इमाम महदी (अ) के हाथों स्थापित होने वाली वैश्विक न्यायपूर्ण सरकार के लाभ से भी वंचित रह जाएंगे।

उन्होंने आगे कहा कि नमाज़ ऐसी इबादत है जिसके व्यक्तिगत पक्ष के साथ-साथ सामाजिक पक्ष भी हैं। जिस प्रकार मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया गया है, उसी प्रकार समाज में नमाज़ को स्थापित करने का भी आदेश दिया गया है। यदि कोई व्यक्ति नमाज़ पढ़ लेता है, तो उसने अपना व्यक्तिगत कर्तव्य निभा दिया और उसके व्यक्तिगत लाभ भी प्राप्त कर लिए। लेकिन केवल व्यक्तिगत रूप से नमाज़ पढ़ना समाज में नमाज़ की स्थापना नहीं कहलाता। जो व्यक्ति नमाज़ की संस्कृति को समाज में फैलाने और उसे प्रोत्साहित करने का प्रयास नहीं करता, उसने वास्तव में नमाज़ के उस सामाजिक दायित्व को पूरा नहीं किया, जो समाज में उसे स्थापित करना था। परिणामस्वरूप वह नमाज़ के सामाजिक प्रभावों से भी वंचित रह जाता है।

हुज्जतुल इस्लाम फ़ल्लाह ने कहा कि जैसे खेल के मैदान में फ़ुटबॉल एक सामूहिक खेल है। यदि रक्षात्मक पंक्ति में खड़ा खिलाड़ी अपना काम बहुत अच्छे ढंग से करे, लेकिन पूरी टीम सामूहिक जिम्मेदारियों में लापरवाही करे, तो संभव है कि टीम गोल न खाए, लेकिन जीत भी हासिल नहीं कर सकेगी। व्यक्तिगत रूप से अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी की प्रशंसा हो सकती है, लेकिन पूरी टीम की सराहना नहीं होगी।

हौज़ा इल्मिया के इस शिक्षक ने कहा कि इंतज़ार के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपना व्यक्तिगत कर्तव्य सर्वोत्तम ढंग से निभा ले, तो वह व्यक्तिगत रूप से पुरस्कार का अधिकारी बन सकता है, लेकिन यदि पूरा शिया समाज सामूहिक रूप से अपने दायित्वों का पालन नहीं करेगा, तो वह उस सामूहिक परिणाम और प्रतिफल का अधिकारी नहीं बन सकता।

इंतज़ार के सामूहिक पक्ष की व्याख्या

उन्होंने कहा कि "इंतज़ार" से संबंधित रिवायतों पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि आइम्मा-ए-दीन (अ.) अपने अनुयायियों को "इंतज़ार" की प्रेरणा एक कर्म और प्रयास के रूप में देते थे। लेकिन यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यह किस प्रकार का कर्म है? क्या यह केवल व्यक्तिगत कर्म है? या सामूहिक कर्म है? या फिर नमाज़ की तरह ऐसा कर्म है जिसमें व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों पहलू मौजूद हैं?

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन फ़ल्लाह ने कहा कि रिवायतों के अनुसार, दीन के मार्गदर्शकों ने कभी "इंतज़ार" को व्यक्तिगत कर्म के रूप में और कभी सामूहिक कर्म के रूप में प्रस्तुत किया है।

उन्होंने कहा कि आइम्मा (अ.) की शिक्षाओं का अध्ययन करने से पता चलता है कि कुछ स्थानों पर "इंतज़ार" को प्रत्येक अनुयायी का व्यक्तिगत दायित्व बताया गया है।

इसी संदर्भ में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) से यह कथन वर्णित है: أَفْضَلُ عَمَلِ الْمُؤْمِنِ انْتِظَارُ الْفَرَجِ

अनुवाद: मोमिन का सबसे श्रेष्ठ कर्म फ़रज (इमाम के प्रकट होने) का इंतज़ार करना है।

उन्होंने कहा कि इस हदीस में हज़रत अली (अ.) ने "इंतज़ार" को मोमिन का सबसे श्रेष्ठ "कर्म" बताया है। इस वाक्य में दो शब्द आए हैं—"कर्म" और "मोमिन"—और दोनों का प्रयोग एकवचन में किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ व्यक्तिगत आचरण की बात हो रही है। अर्थात प्रत्येक मोमिन को इंतज़ार के संबंध में ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे वह उसका सर्वोत्तम कर्म बन जाए।

इमाम सज्जाद (अ.) ने भी फ़रमाया: مَنْ ثَبَتَ عَلَی مُوَالاتِنَا فِی غَیْبَةِ قَائِمِنَا أَعْطَاهُ اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ أَجْرَ أَلْفِ شَهِیدٍ مِنْ شُهَدَاءِ بَدْرٍ وَ أُحُدٍ

अनुवाद: जो व्यक्ति हमारे क़ाइम (अ.) की ग़ैबत के समय हमारी विलायत पर दृढ़ बना रहेगा, अल्लाह उसे बद्र और उहुद के एक हज़ार शहीदों के बराबर सवाब प्रदान करेगा।

उन्होंने कहा कि इस हदीस में इमाम सज्जाद (अ.) ने ग़ैबत के दौर में अहले बैत (अ.) की विलायत पर दृढ़ रहने को एक व्यक्ति का दायित्व बताया है। "मन सबत" शब्द उसी व्यक्ति की ओर संकेत करता है जो इस विलायत पर स्थिर रहता है। इसलिए वह व्यक्तिगत पुरस्कार का अधिकारी बनता है और उसका पुरस्कार बद्र और उहुद के एक हज़ार शहीदों के बराबर सवाब है।

इंतज़ार और सामाजिक प्रयास

उन्होंने कहा कि पहले उल्लेखित रिवायतों के अतिरिक्त यदि आइम्मा (अ.) के अन्य कथनों पर भी विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि कुछ स्थानों पर "इंतज़ार" केवल व्यक्तिगत कर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके लिए सामाजिक प्रयासों की भी सिफ़ारिश की गई है।

इमाम हसन अस्करी (अ.) ने पैग़म्बर-ए-अकरम (स.) से यह रिवायत बयान की है:  أَفْضَلُ أَعْمَالِ أُمَّتِی انْتِظَارُ الْفَرَجِ

अनुवाद: मेरी उम्मत के सबसे श्रेष्ठ कर्मों में से एक फ़रज का इंतज़ार करना है।

हुज्जतुल इस्लाम फ़ल्लाह ने कहा कि यदि इस रिवायत की तुलना हज़रत अली (अ.) से वर्णित पूर्व रिवायत से की जाए, तो स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। यहाँ रसूलुल्लाह (स.) ने "मेरी उम्मत के कर्म" शब्द का प्रयोग किया है।

यहाँ कर्म को किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों से नहीं, बल्कि पूरी उम्मत से जोड़ा गया है। अर्थात वह कार्य जो संपूर्ण इस्लामी समाज द्वारा किया जाना चाहिए। यह शब्द सामूहिक प्रयास और सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर संकेत करता है।

उन्होंने बताया कि शब्दकोशों में "उम्मत" की परिभाषा यह दी गई है कि वह प्रत्येक समूह या समुदाय है जिसे कोई साझा उद्देश्य एक साथ जोड़ता हो, चाहे वह धर्म हो, एक ही समय का होना हो, या एक ही स्थान का होना हो; चाहे यह एकता स्वैच्छिक हो या अनैच्छिक।

उन्होंने कहा कि अब प्रश्न यह उठता है कि यदि रसूलुल्लाह (स.) की उम्मत का श्रेष्ठ कर्म कुछ लोग अलग-अलग करें, लेकिन उसमें सामूहिक स्वरूप न हो, तो क्या उसे "उम्मत का कर्म" कहा जा सकता है?

मेरे विचार में शिया समाज तभी रसूलुल्लाह (स.) की इस सिफ़ारिश पर वास्तविक रूप से अमल कर सकता है, जब वह सामूहिक रूप से इमाम महदी (अ.) की वैश्विक न्यायपूर्ण सरकार की स्थापना के लिए वातावरण तैयार करने में जुट जाए।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन फ़ल्लाह ने आगे कहा कि यदि किसी ऐसे कार्य का उदाहरण देना हो जो सामूहिक हो और जिसकी अपेक्षा अहले बैत (अ.) ने की हो, तो इस रिवायत की ओर संकेत किया जा सकता है: وَ لَوْ أَنَّ أَشْیَاعَنَا [وَفَّقَهُمُ اللَّهُ لِطَاعَتِهِ] عَلَی اجْتِمَاعِ الْقُلُوبِ فِی الْوَفَاءِ بِالْعَهْدِ عَلَیْهِم لَمَا تَأَخَّرَ عَنْهُمُ الْیُمْنُ بِلِقَائِنَا

अनुवाद: यदि हमारे अनुयायी, जिन्हें अल्लाह अपनी आज्ञाकारिता की तौफ़ीक़ दे, अपने ऊपर लिए गए वचन को निभाने के लिए दिलों से एकजुट हो जाएँ, तो हमारे दीदार की सौभाग्यपूर्ण घड़ी उनसे विलंबित न होती।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इस रिवायत में अल्लाह के वली से किए गए वचन को निभाने के लिए "दिलों की एकता" की जिम्मेदारी पूरे शिया समाज को सौंपी गई है। इसलिए यहाँ "हमारे अनुयायी" कहा गया है, न कि "जो व्यक्ति अपने वचन को निभाए"। इसी प्रकार यहाँ जो प्रतिफल बताया गया है, वह भी सामूहिक है, अर्थात इमाम महदी (अ.) के दीदार और उनके ज़ुहूर का सौभाग्य।

महदवियत के इस विशेषज्ञ ने कहा कि यदि केवल कुछ शिया व्यक्ति इस वचन पर दृढ़ रहें, तो उस सामूहिक परिणाम को प्राप्त नहीं किया जा सकता जिसका उल्लेख इस मुबारक तौक़ीअ में किया गया है। दूसरे शब्दों में, इमाम के ज़ुहूर का सौभाग्य और उनसे मुलाक़ात का सम्मान तभी पूरे शिया समाज को प्राप्त होगा, जब वे सभी सामूहिक रूप से इमाम ज़माना (अ.) से किए गए अपने वचन पर एकजुट होकर दृढ़ रहेंगे।

अंत में उन्होंने कहा कि ग़ैबत के दौर में प्रत्येक शिया पर यह आवश्यक है कि वह अपने "इंतज़ार" को व्यक्तिगत और सामूहिक—दोनों स्तरों पर आगे बढ़ाए। तभी वह व्यक्तिगत सीमाओं से निकलकर वैश्विक न्यायपूर्ण शासन की स्थापना के लिए वास्तविक आधार तैयार करने में अपनी भूमिका निभा सकेगा।

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