लोकतंत्र का बदलता चेहरा और मुसलमानों के लिए सिमटती ज़मीन!

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लोकतंत्र का बदलता चेहरा और मुसलमानों के लिए सिमटती ज़मीन!

भारत की लोकतांत्रिक पहचान उसके संविधान, बहुलतावाद और धार्मिक विविधता पर आधारित रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद इस लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियादें कमजोर होती दिखाई देने लगीं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर सवाल उठे, क्योंकि अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों के लिए संवैधानिक समानता केवल एक सैद्धांतिक दावा बनकर रह गई।

लेखक: आदिल फ़राज़

भारत की लोकतांत्रिक पहचान उसके संविधान, बहुलतावाद और धार्मिक विविधता पर आधारित रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी के शासनकाल में इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव हिलती हुई दिखाई दी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर सवाल खड़े हुए, क्योंकि अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के लिए संविधान द्वारा दी गई समानता व्यवहार में कमज़ोर पड़ती नज़र आई।

सत्ताधारी दल के नेताओं के भड़काऊ भाषण, मुसलमानों के बहिष्कार और उनके खिलाफ हिंसा की अपीलें, श्मशान और कब्रिस्तान की राजनीति, "कपड़ों से पहचानने" जैसे नारे, विरोध की आवाज़ों को दबाने की परंपरा, बुलडोज़र संस्कृति, धार्मिक और सामाजिक पहचान पर हमले तथा मुसलमानों को हाशिए पर धकेलने की नीति ने भारत की लोकतांत्रिक और संवैधानिक छवि को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने के लिए गुजरात राज्य में तैयार की गई "स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP)" को देखा जा सकता है। यह केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि मुसलमानों की धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रता को सीमित करने की दिशा में उठाया गया एक और कदम बताया जा रहा है। जबकि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों और उसके बाद या पिछले एक दशक में देश के अन्य हिस्सों में सामने आई हिंदू उग्रवाद की घटनाओं का इसमें कहीं उल्लेख नहीं किया गया।

15 जून को गुजरात स्टेट पुलिस सर्विस (SPS) के पुलिस अधीक्षक (इंटेलिजेंस) प्रफुल वाणिया ने एक नोटिस जारी कर नई एंटी रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) के गठन की घोषणा की। इस नोटिस में विस्तार से बताया गया कि पुलिस किस प्रकार कथित उग्रवाद की पहचान करेगी, उसकी निगरानी करेगी, हस्तक्षेप करेगी और सामाजिक व्यवस्था बहाल करने का प्रयास करेगी।

इस संबंध में सबसे पहले "द वायर" ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 के अपने घोषणा पत्र में एंटी रेडिकलाइजेशन सेल बनाने का वादा किया था, जिसे अब लागू किया गया है। पहले राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, राज्य एंटी टेररिज्म स्क्वाड, क्राइम ब्रांच और अहमदाबाद सेंट्रल जेल के अधिकारियों की एक टास्क फोर्स बनाई गई थी, लेकिन धन की कमी के कारण यह योजना शुरू नहीं हो सकी। वर्ष 2023 में गुजरात सरकार ने इस पर दोबारा काम शुरू किया और अप्रैल 2026 में एआरसी को आधिकारिक मंजूरी दे दी। गृह विभाग ने इसके लिए 139 नई नियुक्तियों की स्वीकृति भी दी। 15 जून को एसओपी का मसौदा सभी जिलों और कमिश्नरेट कार्यालयों को भेज दिया गया, जिसके बाद इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू हुई।

एसओपी में दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, एतिकाफ करना, मध्य-पूर्व की यात्रा करना, सिग्नल (Signal) ऐप का उपयोग करना तथा सोशल मीडिया पर मुसलमानों के अधिकारों का समर्थन करना जैसी बातों को संदेहास्पद गतिविधियों में शामिल किया गया है। आलोचकों का कहना है कि यह दस्तावेज़ आम मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है, जबकि गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा करने वाले समूहों और हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा मुसलमानों के बहिष्कार या हत्या की खुली अपीलों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है।

इस एसओपी में अरबी भाषा के शब्दों का अधिक प्रयोग भी संदेह का आधार बताया गया है। इससे आगे के संभावित खतरों का अनुमान लगाया जा सकता है।

दस्तावेज़ के अनुसार उग्रवाद की कथित पहचान के कुछ संकेत इस प्रकार बताए गए हैं—

  • अरबी भाषा के शब्दों का अधिक प्रयोग करना।
  • दोस्तों और परिवार से अचानक दूरी बना लेना।
  • दुनिया में मुसलमानों के साथ होने वाली घटनाओं पर दुख या विरोध प्रकट करना।
  • आतंकवादियों की प्रशंसा करना।
  • अफगानिस्तान या मध्य-पूर्व की यात्रा के बाद व्यवहार में बदलाव आना।

दस्तावेज़ में यह भी कहा गया है कि ऐसे लोगों पर विशेष नज़र रखी जाए जो मदरसों में अधिक आते-जाते हों, एतिकाफ करते हों, धार्मिक कर्तव्य का हवाला देकर अचानक पढ़ाई या नौकरी छोड़ दें या जेल से रिहा होने के बाद कथित कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं से संपर्क करें।

इसके अलावा पुलिस को निर्देश दिया गया है कि मदरसों में पढ़ाने वाले उलेमा की सूची तैयार की जाए और यह जानकारी जुटाई जाए कि उनका किसी उग्रवादी संगठन से संबंध तो नहीं है।

इन बिंदुओं से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल मुसलमानों की निगरानी बढ़ाना और उनके सामाजिक दायरे को सीमित करना है। जबकि भारत में अनेक ऐसे गैर-मुस्लिम उग्रवादी संगठन भी सक्रिय हैं जो मुसलमानों और दलितों के खिलाफ काम करते हैं, लेकिन उनके विरुद्ध शायद ही कोई कठोर कार्रवाई होती है।

भाजपा सरकार के कार्यकाल में यह पहला अवसर नहीं है जब मुसलमानों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे को सीमित करने की बात सामने आई हो। पिछले एक दशक से उनके घरों पर बुलडोज़र चलाए जाने, अदालतों की टिप्पणियों की अनदेखी, धार्मिक जुलूसों में हिंसक नारे, सांप्रदायिक दंगों के बाद एकतरफा प्रशासनिक कार्रवाई, वक्फ कानून में बदलाव और वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण के प्रयास जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे हैं।

वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किए जाने को भी कई लोगों ने मुस्लिम धार्मिक स्वायत्तता पर प्रभाव डालने वाला कदम माना। कभी नागरिकता कानून के माध्यम से, कभी जनगणना और मतदाता सूची के मुद्दों के जरिए तथा कभी धार्मिक पहचान के आधार पर रोजगार, व्यापार और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करने वाले माहौल के कारण मुसलमानों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

यदि इन सभी घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि मुसलमानों के लिए सार्वजनिक जीवन का दायरा धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है। इस रणनीति के तहत किसी नागरिक से सीधे उसके संवैधानिक अधिकार नहीं छीने जाते, बल्कि ऐसा वातावरण बनाया जाता है जिसमें वह स्वयं को असुरक्षित, अनिश्चित और लगातार रक्षात्मक स्थिति में महसूस करे। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि पूरी एक समुदाय अपनी ऊर्जा शिक्षा, आर्थिक प्रगति और विकास के बजाय अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा में लगाने लगती है।

सांप्रदायिक संगठनों की राजनीति ने भारत के बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष समाज को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। लोगों के बीच यह धारणा बनाई गई कि विभाजन के बाद भारत में मुसलमानों की मौजूदगी और उनकी बढ़ती आबादी से बहुसंख्यक समाज के अधिकार प्रभावित हुए हैं। युवाओं के बीच वैचारिक प्रशिक्षण और धार्मिक घृणा फैलाने के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ चलाई गईं। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत पृष्ठभूमि से दूर होकर प्रचार आधारित सोच का शिकार होती गई।

हालाँकि इसकी पूरी जिम्मेदारी केवल सांप्रदायिक संगठनों पर नहीं डाली जा सकती। इसमें मुसलमानों की अपनी रणनीतिक कमज़ोरियों और लापरवाही का भी योगदान रहा। आज़ादी के बाद उन्होंने शिक्षा और व्यापार पर पर्याप्त ध्यान देने के बजाय धार्मिक संस्थाओं—मदरसों, मस्जिदों, इमामबाड़ों और खानकाहों—के निर्माण पर अधिक ज़ोर दिया, जबकि स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और आर्थिक विकास की दिशा में अपेक्षित प्रयास नहीं किए।

गैर-मुस्लिम समाज के साथ व्यापक संवाद स्थापित नहीं किया गया और उनके मन में मौजूद गलतफहमियों को दूर करने के बजाय कई बार श्रेष्ठता की भावना भी दिखाई दी। आवश्यकता थी कि संवाद का सकारात्मक वातावरण बनाया जाता।

भारत में आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो सांप्रदायिक संगठनों की विचारधारा से अलग सोच रखते हैं। इसलिए मुस्लिम नेतृत्व और बुद्धिजीवियों को स्वतंत्र रूप से ऐसे लोगों के साथ संवाद स्थापित कर समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करनी चाहिए।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मुस्लिम सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं के समाधान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उससे जुड़े संगठनों की विशेष रुचि नहीं दिखाई देती। इसलिए केवल उनके इर्द-गिर्द घूमने या व्यक्तिगत लाभ के बजाय उदार विचार रखने वाले गैर-मुस्लिम नागरिकों से संपर्क बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय हित में सकारात्मक वातावरण तैयार हो सके। इसके लिए मुसलमानों को स्वयं भी उदार, संवादशील और प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाना होगा।

इसके साथ ही इस एसओपी को न्यायालय में भी चुनौती दी जानी चाहिए, ताकि इतिहास यह दर्ज करे कि मुसलमान अपने अधिकारों और कथित राज्यीय अन्याय के विरुद्ध कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से आवाज़ उठाने से पीछे नहीं हटे।

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