तारीख गवाह है कि ज़ालिम हुक्मरान हमेशा कर्बला को ज़ुल्म और इस्तिबदाद के खिलाफ बेदारी, हक़गोई, आज़ादी और मुज़ाहिमत का मरकज़ समझते रहे। इसी लिए उन्होंने हर दौर में ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की राह में रुकावटें खड़ी कीं, लेकिन इन तमाम मज़ालिम, पाबंदियों और सफ़ाकियों के बावजूद वे अपने मक़सद में कभी कामयाब न हो सके।
लेखक: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी
तारीख गवाह है कि ज़ालिम हुक्मरान हमेशा कर्बला को ज़ुल्म और इस्तिबदाद के खिलाफ बेदारी, हक़गोई, आज़ादी और मुज़ाहिमत का मरकज़ समझते रहे। इसी लिए उन्होंने हर दौर में ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की राह में रुकावटें खड़ी कीं, लेकिन इन तमाम मज़ालिम, पाबंदियों और सफ़ाकियों के बावजूद वे अपने मक़सद में कभी कामयाब न हो सके। अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के जान-निसार हर ज़माने में जान, माल, आज़ादी बल्कि अपने आज़ा-ए-बदन तक की क़ुर्बानी देकर कर्बला पहुँचते रहे और इश्क़-ए-हुसैनी की ऐसी लाज़वाल दास्तानें रचीं जो तारीख के माथे का झूमर बन गईं।
आइम्मा-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के मज़ारात की ज़ियारत शिया मकतब-ए-फिक्र के अहम तरीन शआइर में शुमार होती है। अहल-ए-तशय्यो अपने आइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम से क़ल्बी वाबस्तगी और वालिहाना मुहब्बत के बाइस उनकी ज़ियारत को अपनी दीनी और रूहानी ज़िंदगी का लाज़िमी हिस्सा समझते हैं। तमाम मुक़द्दस ज़ियारतगाहों में कर्बला-ए-मुआल्ला को एक मुनफ़रिद और मरकज़ी मुकाम हासिल है। हरम-ए-मुतहहर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सदियों से अहल-ए-ईमान के लिए मरकज़-ए-अक़ीदत, सरचश्मा-ए-हिदायत, दरसगाह-ए-हुर्रियत और मज़लूमों की जाए-पनाह रहा है।
वाक़िया-ए-आशूरा के बाद से ही ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सिर्फ एक इबादत नहीं रही बल्कि ज़ुल्म के खिलाफ एहतिजाज, हक़ की हिमायत, अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम से वफ़ादारी और दीनी शिनाख्त की अलामत बन गई। यही वजह थी कि उमवी, अब्बासी, वहाबी और बअसी हुक्मरान हमेशा इस नूर को बुझाने की नाकाम कोशिश करते रहे, मगर हर दौर में आशिक़ान-ए-हुसैन ने साबित किया कि इश्क़-ए-हुसैन को न तलवारें खत्म कर सकती हैं, न ज़िंदान और न ही ज़ुल्म-ओ-जबर।
बनू उमय्या के दौर में ज़ाइरिन-ए-कर्बला पर पाबंदियाँ
सन 61 हिजरी में वाक़िया-ए-कर्बला के बाद से लेकर 132 हिजरी में बनू उमय्या के ज़वाल तक, ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मुसलसल हुकूमती ज़ुल्म-ओ-सितम, निगरानी और सख्त पाबंदियों का सामना करते रहे।
जो लोग रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़ियारत के लिए कर्बला पहुँचते थे, वे इस अज़ीम सान्हे को याद करके बनू उमय्या के ज़ुल्म-ओ-सितम की हक़ीक़त को और गहराई से महसूस करते थे। अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की मज़लूमियत उनके दिलों को झिंझोड़ देती, उन्हें हक़-ओ-बातिल की पहचान अता करती और खानदान-ए-रिसालत की हक़ानियत से रूशनास कराती थी। इसी बिना पर ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम एक रूहानी इबादत के साथ-साथ एक फिक्री, इस्लाही और इंक़िलाबी तहरीक भी बन गई, जो उम्मत में शऊर, बेदारी और ज़ुल्म के खिलाफ मुज़ाहिमत का जज़्बा पैदा करती थी।
जब उमवी हुक्मरानों ने महसूस किया कि कर्बला अवामी बेदारी का मरकज़ बनती जा रही है तो उन्होंने ज़ाइरिन की आमद रोकने के लिए कर्बला के अतराफ में मुतअद्दिद फौजी चौकियाँ क़ायम कर दीं। इन चौकियों पर तायनात सिपाही निहायत सख्तगीर और ज़ालिम थे, जो ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को हरासाँ करते, उन पर तशद्दुद करते और उन्हें ज़ियारत से रोकने की हर मुमकिन कोशिश करते थे। (तारीख-ए-कर्बला व हाएर-ए-हुसैन, सफ़ा 60-61)
इन तमाम रुकावटों के बावजूद आशिक़ान-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ज़ियारत का सिलसिला तर्क न किया। वे हुकूमती निगरानी से बचने के लिए ग़ाज़िरिया और नैनवा जैसे क़रीबी देहात का रुख करते, बज़ाहिर इन्हीं मुक़ामात को अपनी मंज़िल ज़ाहिर करते, वहाँ कुछ देर क़ियाम के बाद ख़ामोशी से रौज़ा-ए-अक़दस की तरफ़ रवाना हो जाते। अगर हुकूमती अहलकारों के हाथ आ जाते तो उन्हें क़ैद, तशद्दुद और सख्त सज़ाओं का सामना करना पड़ता, मगर मुहब्बत-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम में सरशार ये क़ाफिले कभी अपने मक़सद से पीछे न हटे। वे रात की तारीकी में, पैदल, ख़ामोशी से और जान की परवाह किए बगैर कर्बला पहुँचते थे।
अब्बासी दौर का आग़ाज़ और मन्सूर दवानीक़ी का ज़ुल्म
बनू उमय्या के ज़वाल के बाद अब्बासियों ने अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की मुहब्बत और उनके ख़ून-ए-नाहक़ का बदला लेने के नारों के साथ इक़्तिदार हासिल किया, लेकिन हुकूमत मुस्तहकम होते ही उनकी पालिसियाँ भी बनू उमय्या से मुख़्तलिफ़ साबित न हुईं। उन्होंने भी रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बेहुरमती, उसकी तख़रीब और ज़ाइरिन पर ज़ुल्म-ओ-सितम का सिलसिला जारी रखा।
तारीखी रिवायात के मुताबिक, रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के खिलाफ इस नौअ की कार्रवाई करने वाला पहला अब्बासी ख़लीफ़ा मन्सूर दवानीक़ी था। वह अहल-ए-बैत-ए-अतहार अलैहिमुस्सलाम, फरज़ंदान-ए-रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम और उनके मुहिब्बीन से शदीद अदावत रखता था। उसके ज़ुल्म-ओ-इस्तिबदाद की शिद्दत यहाँ तक पहुँच गई कि इस अहद के जलील-उल-क़द्र उलमा ने भी उसकी मुख़ालिफ़त की। यहाँ तक कि अहल-ए-सुन्नत के दो बड़े फ़ुक़हा, इमाम अबू हनीफ़ा और इमाम मालिक बिन अनस ने भी उसकी बैअत को शरई तौर पर लाज़िम क़रार नहीं दिया। (तारीख-ए-कर्बला व हाएर-ए-हुसैन, सफ़ा 137)
आइम्मा-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की तरग़ीब
जब ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जान-ओ-माल के लिए ख़तरा बन चुकी थी, इस वक़्त भी आइम्मा-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम ने मोमिनीन के हौसले बुलंद किए। ख़ुसूसन हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम और हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने ख़ौफ़-ओ-ख़तर के आलम में भी ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अज़ीम फ़ज़ीलत बयान फ़रमाई और शियाओं को इस इबादत पर साबित-क़दम रहने की तलक़ीन की।
ज़रारा रिवायत करते हैं कि उन्होंने हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया: "जो शख्स ख़ौफ़ की हालत में आपके वालिद गिरामी की ज़ियारत करे, उसके बारे में आप क्या फ़रमाते हैं?"
इमाम ने फ़रमाया: "क़यामत के दिन, जब हर तरफ ख़ौफ़-ओ-हरास होगा, अल्लाह तआला ऐसे शख्स को अमन अता फ़रमाएगा, और फ़रिश्ते उसे बशारत देते हुए कहेंगे: न ख़ौफ़ करो और न ग़मगीन हो, आज का दिन तुम्हारे लिए कामयाबी और निजात का दिन है।" (कामिल अज़-ज़ियारात, सफ़ा 125)
यही वो तालीमात थीं जिन्होंने ज़ुल्म-ओ-जबर के अंधेरों में भी अहल-ए-ईमान के दिलों में ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शमा रौशन रखी, और हर दौर में ज़ाइरिन को ख़तरात के बावजूद कर्बला की जानिब रवाना होने का हौसला अता किया।
मुतवक्किल अब्बासी के दौर में रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तख़रीब और ज़ाइरिन पर मज़ालिम
मन्सूर दवानीक़ी की वफ़ात और हारून-उर-रशीद के बरसर-ए-इक़्तिदार आने के दरमियानी तक़रीबन सात साला अरसे (158 ता 165 हिजरी) में अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के चाहने वालों को निस्बतन ज़्यादा आज़ादी मयस्सर रही, चुनाँचे वे पहले की निस्बत ज़्यादा इत्मीनान के साथ हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़ियारत के लिए कर्बला जाते रहे।
ताहम हारून-उर-रशीद ने अपने दौर-ए-हुकूमत के आख़िरी अय्याम में जब देखा कि अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम से अवाम की मुहब्बत रोज़-ब-रोज़ बढ़ रही है और कर्बला में ज़ाइरिन की तादाद में मुसलसल इज़ाफ़ा हो रहा है, तो उसने रौज़ा-ए-मुतहहर-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आसार-ओ-निशानात मिटाने का हुक्म दे दिया। उसके हुक्म पर रौज़ा-ए-अक़दस के अतराफ की इमारतें मुनहद्दम की गईं और ज़ाइरिन की आमद-ओ-रफ़्त मुतहद्दिद करने की कोशिश की गई, लेकिन ये इक़दामात भी ज़ियारत के जज़्बे को कम न कर सके।
सन 232 हिजरी में मुतवक्किल अब्बासी के बरसर-ए-इक़्तिदार आते ही अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम से दुश्मनी अपने उरूज पर पहुँच गई। मुतवक्किल ने न सिर्फ़ ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर बे-पनाह मज़ालिम ढाए बल्कि रौज़ा-ए-मुतहहर की बेहुरमती और तख़रीब को अपनी बाक़ायदा हुकूमती पालिसी बना लिया। रिवायात के मुताबिक उसने अपने दौर-ए-ख़िलाफ़त में चार मरतबा हाएर-ए-हुसैनी को मुनहद्दिम करने का हुक्म दिया।
इन्हीं इक़दामात में से एक मौक़े पर उसने इब्राहीम दीज़ज को, जो एक यहूदी था, रौज़ा-ए-मुबारक की तख़रीब पर मामूर किया। वह अपने करिंदों के साथ कर्बला पहुँचा और हाएर-ए-हुसैनी में पानी छोड़ दिया ताकि इस मुक़द्दस मुकाम को ज़ेर-ए-आब लाकर उसकी शिनाख़्त मिटा दी जाए और वहाँ खेती-बाड़ी की जा सके।
उसके बाद ज़मीन पर हल चलाने के लिए बैल लाए गए, लेकिन एक हैरत-अंगेज़ वाक़िया पेश आया। जब भी बैलों को रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तरफ हाँका जाता, वे आगे बढ़ने से इनकार कर देते, हालाँकि दूसरी सिम्तों में ब-आसानी चलते थे। यूँ दुश्मनों की तमाम कोशिशें नाकाम हो गईं और अल्लाह तआला ने अपने वली-ए-बरहक़ के मज़ार-ए-अक़दस की हुरमत को नुमायाँ फ़रमा दिया। (बिहारुल अनवार, जिल्द 45, सफ़ा 394)
ज़ियारत पर पाबंदियाँ और ज़ाइरिन की गिरफ़्तारियाँ
जब मुतवक्किल को मालूम हुआ कि रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उसकी हुकूमत के खिलाफ बेदारी और मुज़ाहिमत का मरकज़ बनता जा रहा है और लोग रात की तारीकी में भी ज़ियारत के लिए कर्बला पहुँचते हैं, तो उसने शहर-ए-कर्बला के अतराफ में फौजी चौकियाँ और निगरानी के मराकिज़ क़ायम कर दिए। सिपाहियों को हुक्म दिया गया कि जो शख्स भी ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इरादे से आता दिखाई दे, उसे फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया जाए। (बिहारुल अनवार, जिल्द 45, सफ़ा 404)
कुछ ही अरसे बाद मुतवक्किल ने एलान करवाया कि अगर तीन दिन के बाद किसी शख्स को क़ब्र-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अतराफ देखा गया तो उसे गिरफ़्तार करके ज़ंजीरों में जकड़ दिया जाएगा। बाज़ तारीखी रिवायात में यह भी मज़्कूर है कि अगर कोई ज़ाइर रास्ते में पकड़ा जाता तो उसे क़त्ल कर दिया जाता या इंतिहाई सख्त सज़ा दी जाती।
ज़ुल्म की इंतिहा यह थी कि मुतवक्किल ने हुक्म दिया कि रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़ियारत सिर्फ इस सूरत में मुमकिन होगी कि ज़ाइर अपना दायाँ हाथ कटवाने पर आमादा हो। लेकिन इस हौलनाक सज़ा के बावजूद भी आशिक़ान-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ज़ियारत तर्क न की, बल्कि हर क़िस्म की क़ुर्बानी देकर इस मुक़द्दस सफ़र को जारी रखा। (अज़ ज़ुहूर-ए-इस्लाम ता सुक़ूत-ए-बग़दाद)
इश्क़-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम की लाज़वाल मिसाल
मशहूर मोरक्ख़ मसूदी अपनी किताब मुरूज-उज़-ज़हब में लिखते हैं कि एक ख़ातून रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़ियारत के लिए अपना नाम दर्ज कराने आईं। सज़ा के तौर पर उन्होंने अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाया। अहलकारों ने कहा: "ज़ियारत की क़ीमत बायाँ नहीं बल्कि दायाँ हाथ है।"
इस पर उस ख़ातून ने निहायत इस्तिक़ामत से अपना पहले से कटा हुआ दायाँ हाथ दिखाते हुए कहा: "मेरा दायाँ हाथ तो तुम लोग गुज़श्ता साल ही काट चुके हो!"
यह मंज़र इस बात की रौशन दलील थी कि इश्क़-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम के सामने ज़ुल्म की हर ताक़त बेबस हो जाती है। (तारीख-ए-ख़िलाफ़त-ए-अब्बासी, अज़ आग़ाज़ ता पायान-ए-आल-ए-बूया)
मुतवक्किल के मज़ालिम में मज़ीद इज़ाफ़ा
इन तमाम सख़्तियों के बावजूद मुतवक्किल को दोबारा इत्तिला मिली कि लोग जौक़-दर-जौक़ हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़ा-ए-अक़दस की ज़ियारत के लिए जा रहे हैं। इस पर उसने अपने एक सिपहसालार को लश्कर के साथ कर्बला रवाना किया और हुक्म दिया कि लोगों में एलान किया जाए कि ज़ाइरिन-ए-क़ब्र-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बराअत इख़्तियार की जाए, अवाम को ज़ियारत से रोका जाए, और आल-ए-अबी तालिब अलैहिमुस्सलाम और उनके शियाओं का तआक़्क़ुब किया जाए।
चुनाँचे बेशुमार शियाओं को गिरफ़्तार किया गया, बड़ी तादाद में उन्हें शहीद कर दिया गया, और ज़ुल्म-ओ-सितम का एक नया बाब रक़म किया गया। (तारीख-ए-तबरी, जिल्द 14, सफ़ा 6036; अल-बिदाया वन-निहाया, जिल्द 10, सफ़ा 315; मुक़ातिल-उत-तालिबियीन, सफ़ा 395)
ज़ुल्म की शिद्दत यहाँ तक पहुँच गई कि मुतवक्किल ने हुक्म दिया: "जो शख्स सिर्फ़ ज़ियारत का इरादा भी करे, उसे क़त्ल कर दिया जाए।" इसके बावजूद ज़ियारत का सिलसिला न रुका।
चौथी मरतबा रौज़ा-ए-मुतहहर की तख़रीब
मुतवक्किल की जानिब से रौज़ा-ए-मुतहहर-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की चौथी तख़रीब नीमा-ए-शअबान के मौक़े पर की गई, जब हज़ारों आशिक़ान-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम शौक़-ओ-अक़ीदत के साथ कर्बला में हाज़िर होते थे।
इस मरतबा भी रौज़ा-ए-अक़दस की बेहुरमती की गई, ज़ाइरिन को गिरफ़्तार किया गया, उन पर तशद्दुद किया गया और बड़ी तादाद में उन्हें शहीद कर दिया गया। लेकिन इन तमाम मज़ालिम के बावजूद न ज़ियारत का सिलसिला रुका और न ही अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम से मुहब्बत में कोई कमी आई।
इसी घुटन भरे और ख़ौफ़नाक माहौल में हज़रत इमाम अली नक़ी हादी अलैहिस्सलाम ने मोमिनीन को ज़ियारत-ए-कर्बला की तरग़ीब देते हुए फ़रमाया: "बेशक अल्लाह तआला के लिए ज़मीन में कुछ ऐसे मुक़ामात हैं जहाँ वह पसंद करता है कि उसकी इबादत की जाए, और हाएर-ए-हुसैनी उन्हीं मुक़द्दस मुक़ामात में से एक है।" (कामिल अज़-ज़ियारात, सफ़ा 273; अल-काफ़ी, जिल्द 4, सफ़ा 567)
हज़रत इमाम अली नक़ी हादी अलैहिस्सलाम बाज़ औक़ात अपने असहाब में से किसी को अपना नाइब मुक़र्रर फ़रमाते ताकि वह आपकी जानिब से कर्बला की ज़ियारत करे और वहाँ आपके लिए दुआ करे। यह अमल इस बात का वाज़ेह सुबूत है कि सख्त तरीन हुकूमती पाबंदियों के बावजूद आइम्मा-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम ने ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अज़मत और अहमियत को हमेशा ज़िंदा रखा।
वहाबियों का हमला और रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बेहुरमती
अब्बासी हुकूमत के ख़ात्मे के कई सदियों बाद भी रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत की अदावत का मरकज़ बना रहा। 1216 हिजरी में एक निहायत दर्दनाक सान्हा पेश आया, जब वहाबियों ने अचानक कर्बला-ए-मुआल्ला पर दहशतगर्दाना हमला कर दिया।
उस वक़्त शहर के बाशिंदे इस यलग़ार से बेख़बर थे। उन्होंने अपनी हिफ़ाज़त के लिए शहर के दरवाज़े बंद कर दिए, लेकिन हमला आवरों ने दरवाज़े तोड़कर शहर में दाख़िल होने के बाद क़त्ल-ओ-ग़ारत, लूट-मार और मुक़द्दस मुक़ामात की बेहुरमती का बाज़ार गर्म कर दिया।
हमला आवरों ने हरम-ए-मुतहहर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और हरम-ए-हज़रत अबुलफ़ज़्लिल अब्बास अलैहिस्सलाम को शदीद नुक़सान पहुँचाया, रौज़ा-ए-अक़दस के क़रीब तक़रीबन पचास ज़ाइरिन को शहीद कर दिया, जबकि सहन-ए-मुतहहर में पाँच सौ से ज़ायद अफ़राद को क़त्ल किया गया। बाज़ तारीखी रिवायात के मुताबिक इस अंदोहनाक हमले में शहीद होने वालों की तादाद एक हज़ार के क़रीब थी। (रौज़ा-उस-सफ़ा-ए-नासिरी, सफ़ा 381-382)
यह हमला सिर्फ एक शहर या एक मुक़द्दस मुकाम पर नहीं था, बल्कि अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम से मुहब्बत, इस्लामी तहज़ीब और मज़हबी शआइर पर एक मुनज़्ज़म यलग़ार थी। ताहम इस ख़ूनरीज़ सान्हे के बावजूद न ज़ियारत का सिलसिला रुका और न ही इश्क़-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम की शमा मुधम हुई।
बअसी हुकूमत और सद्दाम हुसैन के मज़ालिम
गुज़श्ता सदी में, ख़ुसूसन सद्दाम हुसैन और बअसी हुकूमत के दौर-ए-इक़्तिदार में भी ज़ियारत-ए-कर्बला की राह में सख्त रुकावटें खड़ी की गईं।
1397 हिजरी में अरबईन-ए-हुसैनी के मौक़े पर इराक़ी मोमिनीन ने अपनी क़दीम रिवायत के मुताबिक दरिया-ए-फ़ुरात के किनारे वाक़े ग़ैर-सरकारी रास्तों से पैदल कर्बला का सफ़र इख़्तियार किया। यह अज़ीम पैदल मार्च रफ़्ता-रफ़्ता बअसी हुकूमत के खिलाफ अवामी मुज़ाहिमत की अलामत बन गया, जिसके नतीजे में बअसी अफ़वाज और ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के दरमियान शदीद तसादुम हुआ।
इस अलमनाक वाक़िए में बड़ी तादाद में ज़ाइरिन शहीद और ज़ख़्मी हुए, और यही सान्हा तारीख में "अरबईन-ए-ख़ूनीन" के नाम से मा'रूफ हुआ।
चंद बरस बाद 1411 हिजरी (1991 के मशहूर इराक़ी इंतिफ़ाज़ा) के दौरान सद्दाम हुसैन ने नजफ़-ए-अशरफ़ और कर्बला-ए-मुआल्ला में निहते अवाम पर बदतरीन फौजी कार्रवाइयाँ कीं। तोपों, टैंकों और भारी हथियारों के ज़रिए हज़ारों अफ़राद को शहीद और ज़ख़्मी किया गया, जबकि हरम-ए-मुतहहर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और हरम-ए-हज़रत अबुलफ़ज़्लिल अब्बास अलैहिस्सलाम के गुंबदों और रौज़ों को भी निशाना बनाया गया।
सद्दाम ने बअसी फौज के एक जनरल को हुक्म दिया कि हरमैन-ए-शरीफ़ैन (रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम व रौज़ा-ए-हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम) में मौजूद ज़ाइरिन पर हमला कर दिया जाए। ज़ुल्म की इंतिहा यह थी कि उसने यह हुक्म भी सादिर किया कि जिन अफ़राद को सिक्योरिटी अहलकार गिरफ़्तार करें, उन्हें वहीं, जाए-गिरफ़्तारी पर ही फ़ौरन सज़ा-ए-मौत दे दी जाए।
ये तमाम मज़ालिम इस हक़ीक़त का सुबूत थे कि इस्तिबदादी हुकूमतें हमेशा कर्बला को आज़ादी, बेदारी और ज़ुल्म के खिलाफ मुज़ाहिमत की अलामत समझती रही हैं, इसी लिए वे ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपना सबसे बड़ा फिक्री ख़तरा तसव्वुर करती थीं।
ज़ियारत-ए-कर्बला: इश्क़-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम का लाज़वाल सफ़र
तारीख के मुख़्तलिफ़ अदवार पर निगाह डाली जाए तो यह हक़ीक़त रोज़-ए-रौशन की तरह अयाँ होती है कि ज़ियारत-ए-कर्बला की राह में हर ज़माने में रुकावटें खड़ी की गईं। कभी बनू उमय्या ने ज़ुल्म-ओ-जबर का बाज़ार गर्म किया, कभी अब्बासी हुक्मरानों ने रौज़ा-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को मुनहद्दिम करने की कोशिश की, कभी वहाबियों ने हरम-ए-हुसैनी पर हमला किया और कभी बअसी हुकूमत ने ज़ाइरिन का ख़ून बहाया। लेकिन ज़ुल्म-ओ-इस्तिबदाद की कोई ताक़त न ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को रोक सकी और न ही इश्क़-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम की हरारत को सर्द कर सकी।
आज भी दुनिया के मुख़्तलिफ़ मुमालिक से करोड़ों आशिक़ान-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम हर साल कर्बला-ए-मुआल्ला का रुख करते हैं। वे तवील मुसाफ़तें, माली मुश्किलात, जिस्मानी मशक़्क़त और दीगर तमाम दुशवारियाँ ख़ंदा-पेशानी से बरदाश्त करते हैं, क्योंकि उनके नज़दीक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बारगाह में हाज़िरी दुनिया की हर नेअमत से बढ़कर है।
कर्बला का पैग़ाम सिर्फ एक तारीखी वाक़िया नहीं, बल्कि हक़, अदालत, आज़ादी, वफ़ादारी और ख़ुदापरस्ती का दाइमी मंशूर है। यही वजह है कि जितना ज़ुल्म बढ़ता गया, ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जज़्बा भी उतना ही फ़रोग़ पाता गया, और आज अरबईन-ए-हुसैनी दुनिया का सबसे बड़ा सालाना पुर-अमन इंसानी इज्तिमा बन चुका है।
इसी हक़ीक़त को रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम ने निहायत जामेअ अंदाज़ में यूँ बयान फ़रमाया: "बेशक हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के सबब अहल-ए-ईमान के दिलों में एक ऐसी हरारत मौजूद है जो कभी सर्द नहीं होगी।" (मुस्तदरक-उल-वसाइल व मुस्तनबत-उल-मसाइल, जिल्द 10, सफ़ा 318)
यही वो अबदी हरारत है जिसने हर दौर में ज़ुल्म के ईवानों को लरज़ाया, अहल-ए-ईमान को इस्तिक़ामत अता की, और कर्बला को रहती दुनिया तक हक़-ओ-बातिल के दरमियान इम्तियाज़ की रौशन अलामत बना दिया।













