दीन की तब्लीग़ अंबिया का रास्ता है

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दीन की तब्लीग़ अंबिया का रास्ता है

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नज़री मनफ़रिद ने दौर-ए-ग़ैबत में उलेमा के मक़ाम पर तअकीद करते हुए कहा कि उनकी बुनियादी ज़िम्मेदारी समाज की फ़िक्री और एतिक़ादी रहनुमाई, दीन का आलिमाना दिफ़ा और लोगों को शुब्हात व शैतान के जालों से निजात दिलाना है।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नज़री मनफ़रिद ने चौथे सालाना मजलिस में फरमाया, इंसान की उम्र बहुत तेज़ी से गुज़र जाने वाली है अगर इंसान इस इलाही सरमाए से दुरुस्त तौर पर फ़ायदा न उठाए तो आख़िर-ए-सफ़र में हसरत और पशेमानी उसका मुक़द्दर होगा।

उन्होंने मौत की हक़ीक़त और इंसानी उम्र की कोताही की तरफ़ इशारा करते हुए कहा,दुनिया की ज़ाहिरी चमक-दमक इंसान को हक़ीक़तों से ग़ाफ़िल न कर दे। ख़ुदा-ए-मुतआल की तरफ़ तवज्जोह और मौत की याद, दीन की क़तई तालीमात में से है।

हम से पहले लोग भी कुछ रोज़ इस दुनिया में रहे और चले गए, और हम भी उनसे जा मिलेंगे; न हम पहले हैं और न आख़िरी। बचपन, नौजवानी, जवानी और मियान-साली की मोहलत बहुत जल्द ख़त्म हो जाती है और कोई नहीं जानता कि वह कब तक इस दुनिया में रहेगा।

क़ुम हौज़ा ए इल्मिया के उस्ताद ने अमीरुल-मोमिनीन हज़रत अली(अ) के एक ख़ुत्बे का हवाला देते हुए कहा,जब तक ज़िंदगी का सिलसिला जारी है, आमालनामा खुला है और तौबा का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ, उस वक़्त को ग़नीमत समझो; इससे पहले कि मौत के साथ अमल का चराग़ बुझ जाए, मोहलत ख़त्म हो जाए और तौबा का दर बंद हो जाए।

उन्होंने माह-ए-शाबान के आख़िरी दिनों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, अब हम माह-ए-मुबारक रमज़ान की दहलीज़ पर हैं; हमें देखना चाहिए कि हमने इस महीने की बरकतों से कितना फ़ायदा उठाया।

उन्होंने कहा,हमें ख़ुदा से दुआ करनी चाहिए कि वह हमें रमज़ान में ऐसी बात ज़बान पर लाने की तौफ़ीक़ दे जो लोगों के लिए मुफ़ीद हो और हम ख़ुद भी उस पर अमल करने वाले हों; क्योंकि जो बात दिल से निकलती है, वह दिल पर असर करती है।

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