हुज्जतुल इस्लाम असदुल्लाह रिज़वानी ने कहा कि आज ईरान की इस्लामी व्यवस्था की ताकत जनता की सक्रिय भागीदारी की वजह से है। जनता ने मैदान नहीं छोड़ा और सशस्त्र बलों का साथ देने में कोई कमी नहीं की।
हुज्जतुल इस्लाम असदुल्लाह रिज़वानी ने कहा कि दुश्मनों ने ईरान, इस्लाम और इस्लामी शासन को कमज़ोर करने के उद्देश्य से मैदान में कदम रखा था, लेकिन ईरानी जनता ने अपनी स्वदेशी रक्षा क्षमता और सशस्त्र बलों की ताकत पर भरोसा करते हुए उनका डटकर मुकाबला किया और दुश्मनों को अपने उद्देश्यों में सफल नहीं होने दिया।
उन्होंने कहा कि दुश्मनों ने इस्लामी गणराज्य ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन ईरानी सशस्त्र बलों की मिसाइलें और ड्रोन आखिरी समय तक पूरी ताकत के साथ दुश्मनों की ओर दागे जाते रहे।
इमामे जुमआ ने आगे कहा कि इस युद्ध में हमने कई शहीदों और अपने प्रिय लोगों को खोया है, लेकिन ईरान की महान जनता और सशस्त्र बलों ने पूरी ताकत के साथ देश की सुरक्षा और स्वतंत्रता की रक्षा की है।
उन्होंने कहा कि ईरानी जनता एक संस्कारी और संस्कृति से जुड़ी हुई कौम है। उसकी संस्कृति की जड़ें हज़रत अबा अब्दुल्लाह इमाम हुसैन (अ.स.) के ऐतिहासिक आंदोलन में हैं। यह कौम अपने विश्वासों और धार्मिक मान्यताओं की रक्षा के लिए आखिरी सांस तक खड़ी रहती है।
हुज्जतुल इस्लाम रिज़वानी ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि दुश्मनों ने कोई भी गलती की तो उन्हें ईरान के सशस्त्र बलों की ओर से निर्णायक, करारा और ऐसा जवाब दिया जाएगा, जिससे उन्हें अपने कदम पर पछताना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि आज हमें किसी भी दुश्मन से डर नहीं है, क्योंकि हमारा भरोसा ईश्वर की असीम शक्ति पर है। सशस्त्र बल पूरी ताकत और दृढ़ता के साथ मैदान में डटे हुए हैं और उनकी तैयारी पहले से कहीं अधिक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे मूल्य आज भी वही हैं, जो इस्लामी क्रांति के मूल्य हैं। हमारा नारा आज भी 'स्वतंत्रता, आज़ादी और इस्लामी गणराज्य' है। जब तक हम जीवित हैं, इस्लामी क्रांति के मूल्यों से पीछे नहीं हटेंगे।
अंत में उन्होंने कहा कि हम सभी का कर्तव्य है कि मैदान न छोड़ें और अंतिम विजय प्राप्त होने तक ईमान, एकता और प्रतिरोध की भावना के साथ मजबूती से डटे रहें। उन्होंने 'जाने-फ़िदा' सैन्य अभ्यास के आयोजन के संबंध में भी अपने विचार व्यक्त किए।













