رضوی

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पिछले कुछ दिनों में इंटरनेशनल मीडिया ने दुनिया के सामने ईरान की जो तस्वीर पेश की, वह खबर कम और चाहत ज़्यादा थी; यह हकीकत नहीं, बल्कि एक सपना था और वह सपना उन आँखों ने देखा था जिन्हें सच देखने की आदत नहीं थी।

लेखक: मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री

 पिछले कुछ दिनों में इंटरनेशनल मीडिया ने दुनिया के सामने ईरान की जो तस्वीर पेश की, वह खबर कम और चाहत ज़्यादा थी; यह हकीकत नहीं, बल्कि एक सपना था और वह सपना उन आँखों ने देखा था जिन्हें सच देखने की आदत नहीं थी। असली सच्चाई यह है कि पूरे ईरान में दंगाइयों की संख्या दो हज़ार से भी कम थी, जबकि इसी दौरान ईरान के अलग-अलग शहरों में लाखों लोग सरकार के समर्थन में सड़कों पर उतर आए थे। माहौल अमेरिका मुर्दाबाद और इज़राइल मुर्दाबाद के नारों से गूंज रहा था, और ये प्रदर्शन जनता की चेतना, राजनीतिक प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का साफ़ ऐलान थे। लेकिन ये सारे नज़ारे इंटरनेशनल मीडिया की नज़रों से छिपे रहे; ये भीड़, ये आवाज़ें, ये चेहरे कहीं नहीं दिख रहे थे—जैसे ये सब हुआ ही न हो। इस तरह सच को छिपाना नासमझी नहीं बल्कि जान-बूझकर किया गया फैसला है।

उसी समय, देश भर में करीब 1.5 मिलियन नौजवान एतिकाफ़ में हिस्सा ले रहे थे। चुप, वज़ू किए, सिर झुकाए, दिल जागे हुए और विचार ज़िंदा, ये नौजवान ईरान के असली मूड को दिखाते हैं। यह फ़र्क सिर्फ़ संख्या का नहीं बल्कि सोच, दिशा और चेतना का है—शोर और आस्था के बीच खींची गई एक साफ़ लाइन।

लेकिन विदेशी मीडिया ने जानबूझकर इस पूरी तस्वीर को तोड़-मरोड़कर पेश किया। लाखों धर्मनिष्ठ, क्रांतिकारी और इज्ज़तदार ईरानियों को पूरी चुप्पी में सीन से हटा दिया गया, और कुछ सौ गुस्से वाले चेहरों, कुछ दर्जन नारों और कुछ पलों की अफ़रा-तफ़री को “देश की आवाज़” के तौर पर पेश किया गया। यह जर्नलिज़्म नहीं बल्कि दिमागी धोखा है, यह एनालिसिस नहीं बल्कि साइकोलॉजिकल हमला है। कुरान ने पहले ही चेतावनी दी है कि अगर शोर मचाने वालों का पीछा किया जाए, तो वे इंसान को सच्चाई के रास्ते से भटका देते हैं।

यह वही मीडिया है जो फ़िलिस्तीन की लाशों पर चुप रहती है, लेकिन ईरान में जलते कूड़ेदान या टूटे शीशे पर सैकड़ों एनालिसिस और आर्टिकल लिखती है। यह वही मीडिया है जिसे नमाज़ पढ़ते लाखों नौजवान नहीं दिखते, बल्कि कुछ घंटों के हंगामे में क्रांति दिख जाती है।

अगर इस मीडिया प्रोपेगैंडा में ज़रा भी सच्चाई होती, तो ईरान में इस्लामिक डेमोक्रेटिक सिस्टम बहुत पहले ही खत्म हो गया होता; लेकिन धोखे के सौदागर अब भी इस सच्चाई को मानने को तैयार नहीं हैं।

सच तो यह है कि देश सोशल मीडिया के कुछ समय के ट्रेंड से नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत और सोच की बुनियाद से चलते हैं। एक सिस्टम जो अल्लाह के दीन, पैगंबर की सुन्नत और अली (अ) के इंसाफ़ के उसूलों पर आधारित हो, जो इबादत, व्यवस्था और साफ़ सोच से जुड़ा हो, वह कुछ नारों, अफवाहों और कुछ समय के हंगामों से खत्म नहीं होता। ईरान की ज़्यादातर आबादी आज भी जानती है कि देशद्रोह हमेशा शोर मचाता है, लेकिन ईमान चुपचाप इतिहास का रुख मोड़ देता है। इसीलिए गुलाम और शैतानी ताकतें बार-बार यह सपना देखती हैं, लेकिन वह सपना कभी पूरा नहीं हो पाता।

और बेशर्मी की हद तो तब होती है जब यह तथाकथित एनालिस्ट और दलाल-मीडिया, जिसने चंद सिक्कों के लिए अपनी इज्ज़त, अपना ज़मीर और अपनी इज़्ज़त बेच दी है, इन बातों को मानने से ज़िद करके मना कर देता है। उन्हें न तो सच में कोई दिलचस्पी है, न ही लोगों में; उनका क़िबला अपना फ़ायदा है और उनका धर्म विज्ञापन है। इसलिए, वे ऐसी मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ते हैं जिनमें लोग पनाह लेते हैं—कहानियाँ, अंदाज़े और ज़हरीली कहानियाँ, जिनका मकसद जानकारी देना नहीं बल्कि दिमाग़ में ज़हर घोलना होता है।

एक और दुख की बात यह है कि कुछ लोग हर हंगामे के साथ शैतान बन जाते हैं, और कुछ सीधे-सादे लोग हर अफ़वाह के साथ बेवजह के डर का शिकार हो जाते हैं। दोनों के लिए मैसेज एक ही है: खबरों के शोर में नहीं, बल्कि सच की रोशनी में; वीडियो के हंगामे में नहीं, बल्कि ज़्यादातर लोगों के कामों में; देश की दिशा में फ़ैसले को पहचानो, नारों में नहीं। कुरान में साफ-साफ कहा गया है कि जब कोई शक वाली खबर आए, तो जांच-पड़ताल ज़रूरी है।

आखिर में, सच तो यह है कि ईरान की पहचान दंगों से नहीं, बल्कि एतिकाफ और जुमे जैसे रूहानी नज़ारों और यूनिवर्सिटी में होने वाली दूसरी सभाओं से होती है। यह देश नारों से नहीं, बल्कि सजदों से अपनी पहचान बनाता है। जो मीडिया इस बात को छिपाता है, वह खुद को बेनकाब करता है, ईरान को नहीं। यह समय खुश रहने का नहीं, बल्कि समझ का है, अफवाहों का नहीं, बल्कि होश को परखने का है। इतिहास गवाह है कि शोर मचाने वाले थक जाते हैं, लेकिन आखिर में फैसला वही चुप रहने वाली मेजोरिटी लिखती है।

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अली नज़री मुनफ़रिद ने कहा है कि अक़्ल और नक़्ल दोनों इस हक़ीक़त पर दलील पेश करते हैं कि हर दौर में ख़ुदा की जानिब से एक हुज्जत का मौजूद होना लाज़िमी है, और ज़मीन कभी भी इमाम व रहबर-ए-इलाही से ख़ाली नहीं रहती।

हौज़ा ए इल्मिया के उस्ताद हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन अली नज़री मुनफ़रिद ने महदवियत के बुनियादी बहसों में से एक अहम मौज़ू यानी हर ज़माने में इमाम-ए-मासूम की ज़रूरत पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि अगरचे रसूल-ए-अकरम स.स.व. के ज़रिये दीन मुकम्मल हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद हिदायत, दीन की सही तफ़सीर, इख़्तिलाफ़ात के हल और वह़्य के तहफ़्फ़ुज़ के लिए हर दौर में एक मासूम रहनुमा की ज़रूरत बाक़ी रहती है।

उन्होंने वाज़ेह किया कि अक़्ली एतिबार से इंसानी मुआशरा ऐसे इलाही रहबर से बे-नियाज़ नहीं हो सकता जो हक़ व बातिल में तमीज़ करे; क्योंकि अगर ज़मीन इस नूर-ए-हिदायत से ख़ाली हो जाए तो गुमराही और इनहिराफ़ लाज़िमी हो जाते हैं।

नक़्ली दलीलों की वज़ाहत करते हुए उन्होंने क़ुरआन-ए-करीम की आयात का हवाला दिया, जिनमें हर उम्मत के लिए हादी और रहनुमा के तसलसुल का ज़िक्र मिलता है, और इस बात की तरफ़ इशारा किया गया है कि क़ियामत के दिन हर क़ौम को उसके इमाम के साथ बुलाया जाएगा।

उन्होंने मुतअद्दिद अहादीस का भी ज़िक्र किया, जिनमें यह बात सराहत से बयान हुई है कि अगर एक लम्हे के लिए भी हुज्जत-ए-ख़ुदा ज़मीन से उठा ली जाए तो ज़मीन अपने बाशिंदों समेत तबाह हो जाएगी।

इसी तरह यह हदीस कि जो शख़्स अपने ज़माने के इमाम को पहचाने बग़ैर मर जाए, उसकी मौत जाहिलियत की मौत है इमाम की मआरिफ़त की अहमियत को वाज़ेह करती है।

उस्ताद-ए-हौज़ा ने बारह इमामों (अ.स.) से मुतअल्लिक़ मशहूर हदीस का हवाला देते हुए कहा कि यह रिवायत अहले-सुन्नत की मोअतबर किताबों में भी मौजूद है, और इसका सही मिसदाक़ सिर्फ़ अहले-बैत (अ.स.) के बारह इमाम ही हैं।

आख़िर में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हज़रत महदी (अ.स.) का वुजूद और उनका ज़ुहूर इस्लामी रिवायात में एक मुसल्लम हक़ीक़त है, और इसका इंकार दरअसल सुन्नत-ए-नबवी स.ल.व. के एक क़तई हिस्से का इंकार है।

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अकबर सब्र आमेज़ ने हज़रत अमीरुल-मोमिनीन अली अ.स.की एक हदीस की रौशनी में उन 6 गिरोहों का ज़िक्र किया है, जिनके लिए जन्नत में दाख़िले की क़तई ज़मानत बयान की गई है उन्होंने आमाल की क़द्र व क़ीमत में नियत की बुनियादी अहमियत पर ज़ोर दिया।

हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन अकबर सब्र-आमेज़ ने अमीरुल-मोमिनीन अली (अ.स.) की एक हदीस के हवाले से बताया कि कुछ ख़ास आमाल और ख़ास नियत रखने वालों के लिए जन्नत की यक़ीनी बशारत दी गई है।

हुज्जतुल इस्लाम सब्र-आमेज़ ने हौज़ा न्यूज़ एजेंसी से गुफ़्तगू करते हुए कहा कि यह हदीस मोअतबर किताब «मन ला यह़ज़ुरुहुल फ़क़ीह» (शैख़ सदूक़) में नक़्ल हुई है, जिसमें हज़रत अली (अ.) फ़रमाते हैं,मैं 6 गिरोहों के लिए जन्नत का ज़ामिन हूँ।

इससे यह बात वाज़ेह होती है कि ख़ालिस नियत के साथ किसी नेक अमल की तरफ़ क़दम बढ़ाना चाहे वह अमल मुकम्मल न भी हो सके इंसान को अज़ीम अज्र का मुस्तहक़ बना देता है।
उन्होंने उन 6 गिरोहों की तफ़सील बयान करते हुए कहा:
अव्वाल वह शख़्स जो सदक़ा देने की नियत से घर से निकले और रास्ते में उसका इंतिक़ाल हो जाए।

दुव्वम: वह इंसान जो मरीज़ की इयादत के लिए जाए, मगर मंज़िल तक पहुँचने से पहले उसकी वफ़ात हो जाए।
सुव्वम: वह जो राह-ए-ख़ुदा में जिहाद (चाहे नफ़्सानी हो, फ़िक्री हो या अमली) की नियत से निकले और रास्ते में जान दे दे।

चहारुम: बैतुल्लाहुल हराम की ज़ियारत के लिए रवाना होने वाला हाजी, जो सफ़र के दौरान दुनिया से रुख़्सत हो जाए।
पंजुम: नमाज़-ए-जुमआ अदा करने के लिए निकलने वाला मोमिन, जो रास्ते में वफ़ात पा जाए।

शशुम: वह शख़्स जो किसी मोमिन के जनाज़े में शिरकत के लिए जाए और उसी हालत में उसका इंतिक़ाल हो जाए।

उस्ताद-ए-हौज़ा-ए-इल्मिया ने कहा कि इन तमाम आमाल का मुश्तरक नुक़्ता ख़ालिस नियत है। इस्लाम की निगाह में असल क़ीमत अमल की नहीं, बल्कि नियत की है। अगर नियत ख़ुदाई हो तो रास्ता ख़ुद मंज़िल बन जाता है और इंसान क़ुर्ब-ए-इलाही हासिल कर लेता है।

हौज़ा ए इल्मिया के प्रबंधन केंद्र ने घोषणा की है कि हौज़ा ए इल्मिया महान ईरानी राष्ट्र के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पूरी सतर्कता के साथ शत्रु की नई उभरती साज़िशों और संयुक्त युद्धों पर नज़र रखे हुए हैं और शत्रु को राष्ट्र की एकजुट पंक्तियों में विभाजन पैदा करने की किसी भी स्थिति में अनुमति नहीं देंगा।

हौज़ा ए इल्मिया के प्रबंधन केंद्र ने क़ुम के 19 दी आंदोलन की अड़तालीसवीं वर्षगांठ के अवसर पर एक वक्तव्य जारी किया है। वक्तव्य का पाठ इस प्रकार है:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

19 दी केवल पंचांग की एक तिथि नहीं है, बल्कि यह उस जन-स्वाभिमान, पवित्र भावना और क्रांतिकारी उत्साह का नाम है जिसने पहलवी निरंकुशता के सबसे अंधकारमय दौर में धार्मिक नेतृत्व और ईश्वरीय शासन की पवित्रता की रक्षा के लिए गोलियों के सामने अपना सीना अड़ा दिया। 19 दी 1356 हिजरी शम्सी (9 जनवरी 1978) का आंदोलन समकालीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ और उस क्रांति की शुरुआत था जिसने ढाई हज़ार वर्षों की राजशाही अत्याचार का अंत कर दिया।

उस निर्णायक दिन, जब देशद्रोही शाह के प्रत्यक्ष आदेश पर पहलवी शासन के निर्दयी कर्मियों ने हज़रत इमाम ख़ुमैनी (रह.) के सम्मान का अपमान किया, तो क़ुम नगर के धर्मपरायण और क्रांतिकारी नागरिकों ने जागरूक धर्मगुरुओं के नेतृत्व में आंदोलन किया, ताकि “अल्लाहु अकबर” के नारों के साथ राष्ट्र और धार्मिक नेतृत्व के अटूट संबंध को संसार के सामने प्रकट किया जा सके और यह सिद्ध हो कि जनता का विश्वास सांस्कृतिक और राजनीतिक आक्रमणों के सामने एक अभेद्य दीवार है।

आज जब हम इस महान घटना की अड़तालीसवीं वर्षगांठ मना रहे हैं, वही जागरूकता की चिंगारियाँ ग़ज़्ज़ा, लेबनान और प्रतिरोधी मोर्चे के हर क्षेत्र में प्रज्वलित हो रही हैं।

19 दी के शहीदों का रक्त जिस प्रकार नयावरान महल की काँपती नींवों को ध्वस्त कर गया था, आज भी वही आंदोलन अंतरराष्ट्रीय ज़ायोनिज़्म और पतनशील पश्चिमी वर्चस्व की खोखली बुनियादों को हिला रहा है।

हौज़ा ए इल्मिया का प्रबंधन केंद्र 19 दी के आंदोलन के महान शहीदों और सम्मान व स्वाभिमान के मार्ग के सभी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए घोषणा करता है कि हौज़ा इल्मिया महान ईरानी राष्ट्र के साथ पूर्ण जागरूकता के साथ शत्रु की नई साज़िशों और संयुक्त युद्धों पर निरंतर निगरानी रखेंगे और राष्ट्र की एकजुट पंक्तियों में विभाजन डालने की किसी भी कोशिश को सफल नहीं होने देंगे।

हौज़ा के विद्यार्थी एक बार फिर इमाम ज़माना (अ.ज.) के सत्य प्रतिनिधि, आयतुल्लाहिल उज़्मा इमाम ख़ामेनेई से अपनी निष्ठा का नवीनीकरण करते हैं और घोषणा करते हैं कि अल्लाह के वचन की सर्वोच्चता और इस्लामी सभ्यता की स्थापना के लिए अपने रक्त की अंतिम बूँद तक दृढ़ रहेंगे।

हौज़ा इल्मिया का प्रबंधन केंद्र
उल्लेखनीय है कि 9 जनवरी 1978 का रक्तरंजित आंदोलन, दैनिक समाचार पत्र इत्तिलाआत में प्रकाशित लेख “ईरान और लाल व काले उपनिवेशवाद” के विरोध में हुआ था, जिसमें इमाम ख़ुमैनी (रह.) के विरुद्ध अपमानजनक सामग्री प्रकाशित की गई थी।

यह विरोध 18 दी से आरंभ होकर 20 दी तक चला, किंतु 19 दी को अपने चरम पर पहुँचा, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस के साथ टकराव हुआ और अनेक लोग शहीद व घायल हुए। इस आंदोलन को पहलवी शासन के विरुद्ध बाद के आंदोलनों की आधारशिला माना जाता है, जिसने अंततः ईरान की इस्लामी क्रांति का मार्ग प्रशस्त हैं।

मोसाद के लिए जासूसी के अपराध में शामिल "अली अर्दस्तानी बिन अहमद" की मौत की सजा पर अमल कर दिया गया। यह सजा बुधवार सुबह 17 रजब 1447 हिजरी को सुप्रीम कोर्ट से पुष्टि के बाद सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने पर लागू की गई।

 मोसाद के लिए जासूसी के अपराध में शामिल "अली अर्दस्तानी बिन अहमद" की मौत की सजा पर अमल कर दिया गया। यह सजा बुधवार सुबह 17 रजब 1447 हिजरी को सुप्रीम कोर्ट से पुष्टि के बाद सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने पर लागू की गई।

न्यायिक दस्तावेजों के मुताबिक अली अर्दस्तानी को सोशल मीडिया के जरिए इजरायली गुप्त और आतंकवादी संगठन मोसाद ने भर्ती किया था। उसने तय रकम और झूठे वादों के बदले मोसाद के लिए कई मिशन अंजाम दिए। सबूतों और आरोपी के स्पष्ट स्वीकारोक्ति के मुताबिक वह मोसाद अधिकारियों के निर्देश पर संवेदनशील स्थानों की तस्वीरें, विशिष्ट लक्ष्यों से जुड़ी जानकारी और अन्य सामग्री मुहैया कराता रहा, जिसके बदले हर मिशन के खत्म होने पर डिजिटल मुद्रा के रूप में रकम प्राप्त करता था।

जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी की मोसाद अधिकारियों से सिर्फ ऑनलाइन ही नहीं बल्कि देश के अंदर जायोनी सरकार से जुड़े तत्वों से सीधी मुलाकातें भी होती रहीं। वह अलग-अलग जगहों पर एक निश्चित पहचान रखने वाले व्यक्ति से आमने-सामने मिलकर इकट्ठा की गई जानकारी, तस्वीरें और वीडियो उसके हवाले करता और बाद में नए निर्देश प्राप्त करता था।

अली अर्दस्तानी को उस समय गिरफ्तार किया गया जब वह इजरायली सरकार के लिए एक मिशन अंजाम दे रहा था। जांच और पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसने देश से गद्दारी का उद्देश्य दस लाख डॉलर का इनाम और ब्रिटेन का वीजा हासिल करना बताया। उसने यह भी माना कि उसे मोसाद से अपने संपर्क और दुश्मन के लिए कीमती जानकारी मुहैया कराने का पूरा अहसास था।

ईरान में मोसाद के लिए जासूसी करने वाले अपराधी को फांसी

जांच पूरी होने और आरोप सिद्ध होने के बाद, सभी कानूनी जरूरतों के मुताबिक मुकदमा अदालत में चलाया गया। न्यायिक सुनवाई के दौरान भी आरोपी ने अपने अपराधों को कबूल करते हुए मोसाद के साथ सहयोग की जानकारी दी। अदालत ने सबूतों, जांच रिपोर्ट और स्पष्ट स्वीकारोक्ति के आधार पर अली अर्दस्तानी को जायोनी सरकार के फायदे के लिए जासूसी और विध्वंसक गतिविधियों का अपराधी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई।

फैसले में कहा गया कि आरोपी की सुरक्षा विरोधी गतिविधियां दुश्मन की योजनाओं की पूर्ति में प्रभावी और निर्विवाद थीं। बाद में मुकदमा सुप्रीम कोर्ट भेजा गया जहां न्यायाधीशों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को कानूनी सिद्धांतों के मुताबिक बताते हुए अपील खारिज कर दी और आदेश की पुष्टि कर दी।

आखिरकार बुधवार सुबह 17 रजब 1447 हिजरी को सभी कानूनी जरूरतें पूरी होने के बाद मोसाद के जासूस अली अर्दस्तानी की मौत की सजा पर अमल कर दिया गया।

यह बात निश्चित है कि जितना कोई विश्वास सच्चाई के करीब होता है और लोगों के दिलों में जगह बना लेता है, उतना ही अधिक स्वार्थी लोग उसका गलत फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। “महदीवाद” की शिक्षा भी अपनी खास और आकर्षक विशेषताओं के कारण, और क्योंकि यह लोगों के दिलों में गहराई तक असर करती है, बहुत बार अयोग्य लोगों द्वारा गलत तरीक़े से इस्तेमाल की गई है।

 महदीवाद पर चर्चाओं का कलेक्शन, जिसका टाइटल "आदर्श समाज की ओर" है, आप सभी के लिए पेश है, जिसका मकसद इस समय के इमाम से जुड़ी शिक्षाओं और ज्ञान को फैलाना है।

"महदीवाद" और उसकी शिक्षाओं का इंसान और समाज पर कितना असर होता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। यह साफ़ और पक्का है कि मुसलमानों - खासकर शियो - का इस बुनियादी बात पर पक्का यकीन है और वे इसे अपने बुनियादी विश्वासों में से एक मानते हैं।

निसंदेह, विश्वास जितना गहरा होगा, वह सच के उतना ही करीब होगा, और दिलों में जितनी गहराई से जड़ें जमाएगा, उतना ही ज़्यादा फ़ायदा चाहने वाले लोग उससे ग़लत फ़ायदे उठाने की कोशिश करेंगे।

महदीवाद धर्म की शिक्षाएँ, अपनी अनोखी और आकर्षक खूबियों की वजह से, और इस बात की वजह से कि वे हमेशा लोगों के दिलों में गहराई तक पहुँची हैं, ज़्यादातर गलत लोगों ने उनका गलत इस्तेमाल किया है। इस फील्ड में जो भटकाव आए हैं, खासकर महदीवाद के अंदर के भटके हुए पंथ, जो इस्लाम की पहली सदियों से चले आ रहे हैं, इस दावे का साफ सबूत हैं। इन भटकावों और उनके उभरने की वजहों की जाँच करना लोगों को दोबारा इन गलतियों में पड़ने से रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है।

इमाम के उत्तराधिकारी होने के झूठे दावेदार, बड़े बदलावों की शुरुआत

इमाम अस्करी (अ) की शहादत और ग़ैबत सुग़रा (लघु गुप्त काल) की शुरुआत के बाद जब लोगों और मासूम के बीच संपर्क टूट गया, तो "खास प्रतिनिधि" ने लोगों को एक खास तरीके से गाइड करने के लिए बड़े पैमाने पर कोशिशें शुरू कीं। उन्होंने अहले बैत (अ) स्कूल के फॉलोअर्स को बिखरने से रोका और शियो की लीडरशिप संभाली।

इस बीच, कमजोर ईमान और गलत सोच वाले लोगों ने कई मकसद पूरे करने के लिए इमाम का प्रतिनिधि होने का झूठा दावा किया।

झूठे दावों के कुछ कारण इस तरह बताए:

1. ईमान की कमजोरी

ऐसे झूठे दावों में एक अहम वजह धार्मिक विश्वासों की कमजोरी है; क्योंकि जिनका ईमान मजबूत होता है, वे मासूम इमाम की मर्ज़ी के खिलाफ - अपने प्रतिनिधि के पीछे चलने में - कभी भटकते नहीं हैं।

ईमान की कमज़ोरी की वजह से झूठे दावे करने वालों में से एक शल्मग़ानी थे। वह इमाम हसन अस्करी (अ) के साथियों में से और बगदाद में अपने समय के विद्वानों, लेखकों और परंपरावादियों में से एक थे। उनकी कई किताबें थीं जिनमें अहले-बैत (अ) की बातें बहुत थीं। (रिजाल अन नज्जाशी, भाग 2, पेज 239)

जब उन्होंने विचलन और रिएक्शन का रास्ता अपनाया और सोच, विश्वास और व्यवहार में बदलाव किया, तो उन्होंने रिवायतों में भी बदलाव किए; उन्होंने उनमें जो चाहा जोड़ा और जो चाहा घटाया। नज्जाशी ने अपने रिजाल में इस भटकाव का ज़िक्र किया है। (शेख तूसी, अल-फ़हरिस्त, पेज 305; रिजाल अन-नज्जाशी, भाग 2, पेज 294)

2. इमाम के माल मे लालच

ग़ैबत सुग़रा के दौरान, कुछ लोगों ने इमाम (अ) के वारिस और उत्तराधिकारी होने का दावा किया ताकि वे माले इमाम (अ) उनके असली नुमाइंदे और प्रतिनिधि को न सौंप सकें।

"अबू ताहिर मुहम्मद बिन अली बिन बिलाल" उन लोगों में से एक है जिन्होंने दौलत जमा करने के लिए खुद को बाबियत का दावा किया था। अपने करियर की शुरुआत में, वह इमाम अस्करी (अ) के भरोसेमंद आदमी थे और उनसे रिवायतें सुनाते थे; लेकिन धीरे-धीरे, अपनी ख़ाहिशात के पीछे चलने की वजह से, उन्होंने गलत रास्ता अपनाया और खानदान ए वही ने उनकी निंदा की। उन्होंने हज़रत महदी (अ) का प्रतिनिधि होने का दावा किया। उन्होंने इमाम के दूसरे प्रतिनिधि के पद से इनकार किया और हज़रत महदी (अ) को देने के लिए अपने पास जमा की गई दौलत मे खयानत की। (किताब अल ग़ैबा, पेज 400)

3. प्रसिद्धि के लिए

शोहरत की चाहत भी अंधविश्वासों और मनगढ़ंत धर्मों के उभरने में एक बहुत ज़रूरी वजह है। बड़ाई और दिखावा करने की चाहत नैतिक रूप से बुरी आदतें हैं जो किसी इंसान को खतरनाक कामों की ओर ले जाती हैं।

4. राजनीतिक मकसद

बाबिय्यत के दावेदारों के उभरने में एक और वजह राजनीतिक मकसद है। दुश्मन, कभी सीधे तौर पर तो कभी परोक्ष रूप से—शिया आस्था को कमज़ोर करने और उनमें फूट डालने के लिए—कुछ लोगों को बाबिय्यत का दावा करने के लिए उकसाते हैं।

इस तरह, उन्होंने कुछ लोगों को अपनी पसंद के हिसाब से ट्रेनिंग दी, उन्हें बाबिज़्म का दावा करने का आदेश दिया, और इस रास्ते में हर मुमकिन तरीके से उनकी मदद की। उदाहरण के लिए, हम "सय्यद अली मुहम्मद शिराज़ी (1235 हिजरी-1266 हिजरी) का ज़िक्र कर सकते हैं, जो बाबी धर्म के फाउंडर थे, जिन्हें उनके फॉलोअर्स बाब के नाम से जानते हैं।"

श्रृंखला जारी है ---

इक़्तेबास : "दर्स नामा महदवियत"  नामक पुस्तक से से मामूली परिवर्तन के साथ लिया गया है, लेखक: खुदामुराद सुलैमियान

कर्बला ए मुअल्ला में आयोजित ग्यारहवाँ अंतरराष्ट्रीय अरबईन अवॉर्ड चुने हुए फ़नकारों और मीडिया नुमाइंदों को एज़ाज़ देने के साथ सम्पन्न हो गया। इस मौक़े पर पैग़ाम-ए-आशूरा को आलमी सतह पर पहुँचाने में फ़न और ज़राए-ए-इबलाग़ की अहम और बुनियादी भूमिका पर ज़ोर दिया गया।

 कर्बला ए मुअल्ला में आयोजित इस अवॉर्ड की इख़्तितामी तक़रीब में फ़न और मीडिया से वाबस्ता शख़्सियतों को सम्मानित किया गया और इस बात को रौशन किया गया कि अरबईन का पैग़ाम दुनिया तक पहुँचाने में रचनात्मक अभिव्यक्ति और मीडिया कितना असरदार ज़रिया है।

ग्यारहवें अंतरराष्ट्रीय अरबईन अवॉर्ड की इख़्तितामी तक़रीब सोमवार की शाम 15 रजब 1447 हिजरी को कर्बला में इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान के कौंसुलेट में मुनक़िद हुई। तक़रीब में ईरान, इराक़ और दीगर ममालिक से ताल्लुक़ रखने वाले उलमा, दानिशवर, फ़न और मीडिया की शख़्सियतों के साथ आला हुक्काम ने शिरकत की।

तक़रीब से ख़िताब करते हुए इराक़ में रहबर-ए-मोअज़्ज़म के नुमाइंदे आयतुल्लाह सैयद मुजतबा हुसैनी ने हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की वफ़ात पर ताज़ियत पेश की और कहा कि विलायत से वाबस्तगी का हक़ीक़ी दर्स हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की सीरत से हासिल होता है।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अरबईन अवॉर्ड को फ़न और मीडिया के ज़रिये अरबईन के पैग़ाम को दुनिया तक पहुँचाने की एक मोअस्सिर कोशिश क़रार दिया।

ईरान के सफ़ीर मोहम्मद काज़िम आल-सादिक़ ने ईरान और इराक़ के दरमियान गहरे तारीख़ी और सक़ाफ़ती ताल्लुक़ात का ज़िक्र करते हुए कहा कि अरबईन के अय्याम इस बरादराना रिश्ते के इज़हार का सबसे रौशन मौक़ा हैं। कर्बला के गवर्नर नसीफ़ अल-ख़त्ताबी ने अरबईन को एक अज़ीम, आलमी और इंसानी पैग़ाम का हामिल इज्तिमा क़रार दिया, जो तमाम आज़ाद इंसानों के लिए पैग़ाम रखता है।

तक़रीब में बताया गया कि इस साल 47 ममालिक से 35 हज़ार से ज़्यादा तख़्लीक़ात वसूल हुईं, जो आलमी सतह पर अरबईन के बढ़ते हुए असर-ओ-नुफ़ूज़ की वाज़ेह अलामत हैं। आख़िर में बारहवें अंतरराष्ट्रीय अरबईन अवॉर्ड के पोस्टर की रू-नुमाई भी की गई।

 इटली के उत्तरी शहर रोवीगो में मुसलमानों के अधिकारों से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ की नगर पालिका ने इस्लामी तरीके से दफ़न के लिए अलग क़ब्रिस्तान बनाने की मुस्लिम बिरादरी की दरख़्वास्त को ठुकरा दिया।

इटली के उत्तरी शहर रोवीगो में मुसलमानों के अधिकारों से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ की नगर पालिका ने इस्लामी तरीके से दफ़न के लिए अलग क़ब्रिस्तान बनाने की मुस्लिम बिरादरी की दरख़्वास्त को ठुकरा दिया।मुस्लिम कम्युनिटी पूरी तरह तैयार थी कि वह इस प्रोजेक्ट का सारा खर्च जमीन खरीद, डिज़ाइन, निर्माण और देखरेख खुद उठाएगी।

कोरिएरे दैल वेनीतो की रिपोर्ट के अनुसार, मुस्लिम नुमाइंदों ने कहा कि इससे नगर पालिका पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद इसे नामंज़ूर करना धार्मिक आज़ादी, इंसानियत की इज्ज़त और समानता के बड़े सवाल खड़े करता है।

Solidale Senza Frontiere संगठन के अध्यक्ष अब्दुलकबीर लूज़ना का कहना है कि यह केवल धार्मिक मांग नहीं है, बल्कि इंसानी इज्ज़त, धार्मिक आज़ादी और आधुनिक इतालवी समाज में सांस्कृतिक विविधता की पहचान से जुड़ा मामला है। इस्लामी क़ब्रिस्तान बनना मुसलमानों की धार्मिक परंपराओं और विश्वासों का सम्मान करने के लिए ज़रूरी है।

इस्लाम में मैय्यत की सीधे दफ़न और क़ब्र का क़िब्ला-रुख़ होना जरूरी है, जो सामान्य क़ब्रिस्तानों में अक्सर मुमकिन नहीं होता। साथ ही, अपने देश में मय्यत भेजना कई परिवारों के लिए महँगा या असंभव होता है, खासकर उन मुसलमानों के लिए जो सालों से इटली में रहते हैं और यहीं अपने अज़ीज़ों को दफ़न करना चाहते हैं।

हालाँकि वेनीटो प्रांत के कुछ शहरों में इस्लामी दफ़न के लिए खास हिस्से हैं, लेकिन रोवीगो में ऐसी सुविधा नहीं है। नज़दीकी शहर आद्रिया का एकमात्र मुस्लिम क़ब्रिस्तान भी सिर्फ़ स्थानीय लोगों तक ही सीमित है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह फ़ैसला इटली में मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते भेदभावपूर्ण रुख का हिस्सा है, जो धार्मिक विविधता की जगह सीमित नीतियों को बढ़ावा दे रहा है।

 कर्बला के वाक़िये के बाद जब अहले बैत अ.स. को क़ैदी बना कर कूफ़ा लाया गया और दरबार-ए-इब्ने ज़्याद सजा तो ज़ालिम यह समझ रहा था कि उसने हक़ की आवाज़ को हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया है। मगर वह नहीं जानता था कि इस दरबार में एक ऐसी अज़ीम खातून मौजूद हैं, जिनकी ज़बान तलवार से ज़्यादा तेज़ और जिनका हौसला पहाड़ों से ज़्यादा मज़बूत है और वह हैं हज़रत ज़ैनब बिन्ते अली स.अ. थी जिसने अपने खुत्बे के जरिए दरबार हिला दिया।

,मुहर्रम की दस तारीख़ को कर्बला में पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों को शहीद कर दिया गया और इमाम हुसैन के कारवां के शेष बचे लोगों को क़ैदी बना लिया गया।

दो दिन बाद 12 मुहर्रम को  यज़ीदी सेना इमाम हुसैन के कारवां के बचे हुए लोगों को साथ लेकर कूफ़ा नगर पहुंची जहां यज़ीद के गवर्नर उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद शासन कर रहा था। 12 मुहर्रम को इमाम हुसैन के कारवां के लोगों को क़ैदियों के रूप में कूफ़ा नगर की गलियों में फिराया गया और 13 मुहर्रम को इब्ने ज़्याद के सामने पेश किया गया।

जब इमाम हुसैन की बहन हज़रत ज़ैनब और बेटे इमाम सज्जाद सहित सारे क़ैदी इब्ने ज़्याद के दरबार में पेश किए गए तो इब्ने ज़्याद के सामने एक थाल में इमाम हुसैन का कटा हुआ सर रखा था।

इब्ने ज़्याद की मां का नाम मरजाना था जो अपनी चरित्रहीनता के लिए बहुत बदनाम थी इसलिए वह कभी भी अपने लिए मरजाना का बेटा का शब्द नहीं सुनना चाहता था।

इब्ने ज़्याद ने दरबार में हज़रत ज़ैनब से कहा कि सारी तारीफ़ें उस पालनहार के लिए जिसने तुम्हारे ख़ानदान को अपमानित और क़त्ल किया और साबित कर दिया कि तुम लोग जो कहते थे वह झूठ था।

हज़रत ज़ैनब ने जवाब दिया सारी तारीफें ईश्वर के लिए जिसने पैग़म्बरे इस्लाम से जिनका संबंध हमारे ख़ानदान से है हमें सम्मानित किया और हर बुराई से पवित्र रखा। अपमानित पापी होता है और झूठ कुकर्मी बोलता है और कुकर्मी हम नहीं दूसरे लोग हैं। हज़रत ज़ैनब का इशारा ख़ुद उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद की तरफ़ था।

इब्ने ज़्याद ने कहा कि तुमने देखा कि ईश्वर ने तुम्हारे ख़ानदान के साथ क्या किया? हज़रत ज़ैनब ने उत्तर दिया हमने अच्छाई के अलावा कुछ नहीं देखा। हमारे लोग वह थे जिनके लिए ईश्वर ने शहादत लिखी थी और वह ईश्वर के आदेश पर अमल करते हुए अपनी अमर मंज़िल की ओर चले गए बहुत जल्द ईश्वर तुझे उनसे रूबरू कराएगा। वह ईश्वर की बारगाह में तेरी शिकायत और इंसाफ़ की मांग करेंगे तो तू देखना कि उस दिन कौन विजयी होता है। तू मौत के मुंह में चला जाए हे मरजाना के बेटे!

इस बहस से इब्ने ज़्याद ग़ुस्से से पागल हो गया और वह दरबार में हज़रत ज़ैनब की हत्या कर देना चाहता था मगर दरबार के लोगों ने उसे डराया कि इस तरह हालात बिगड़ जाएंगे। इब्ने ज़्याद ने क़ैदियों को जेल में भिजवा दिया जहां वह सात दिन रहे और फिर क़ैदियों को दमिश्क़ की ओर रवाना कर दिया गया.....

अहले बैत (अ) फाउंडेशन के उपाध्यक्ष मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकतवी ने 15 रजब को उम्मुल-मसाइब, अकीला बनी हाशिम सानी ज़हरा (स) की शहादत दिवस पर पूरी इस्लामी दुनिया के प्रति संवेदना दी और कहा: “आज के समय में, हज़रत ज़ैनब कुबरा (स) की ज़िंदगी गर्व की बात है और हमारे लिए, खासकर हमारी महिलाओं के लिए, एक आदर्श मॉडल है।”

अहले-बैत (अ) फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकतवी ने 15 रजब को उम्मुल मसाइब, अक़ीला बानी हाशिम सानी ज़हरा (स) की शहादत दिवस पर पूरी इस्लामी दुनिया के प्रति अपनी संवेदना और दुख ज़ाहिर किया।

मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकतवी ने कहा: हज़रत ज़ैनब (स) (5 या 6 हिजरी -62 हिजरी) इमाम अली (अ) और हज़रत फ़ातिमा (स) की बेटी हैं। वह अल्लाह की गुमनाम मैसेंजर हैं। वह बचपन से ही ऐसे रोशन माहौल में पली-बढ़ीं जो खुलासे और दुआओं का सेंटर था। उन्होंने अक्सर अपने नाना, रसूल अल्लाह (स), बाबा अली मुर्तज़ा (अ), माँ फ़ातिमा ज़हरा (स), और हसन (अ) और हुसैन (अ) से सीखा। धार्मिक जागरूकता, पूजा-पाठ, त्याग, पवित्रता, सहनशीलता और सहनशीलता के साथ-साथ, उन्होंने कर्तव्य और सीधे रास्ते के सिद्धांतों से भी फ़ायदा उठाया। इसलिए, उनका हर पहलू, चाहे वह माँ हो, बहन हो, पत्नी हो या बेटी हो, गर्व का विषय है और सभी महिलाओं के लिए एक अच्छी मिसाल है।

ज़ैनब बिन्त अली और फ़ातिमा (स) ने हर जायज़ रूप और रूप में महिला लिंग को सबसे अच्छी भूमिका दी है। इसलिए, हमारी महिलाओं के लिए यह ज़रूरी है कि वे ज़ैनब (स) के जीवन का अनुसरण करें ताकि परिवार व्यवस्था के टूटने और पति और ससुराल वालों के बीच आपसी झगड़ों के इस उथल-पुथल भरे दौर में अपनी ज़िंदगी को खुशहाल बना सकें।

मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकतवी ने कहा कि श्रीमती ज़ैनब कुबरी (स) ने बेटी के रूप में ऐसा रोल निभाया कि उन्हें ज़ैनब, अपने पिता का श्रंगार कहा जाने लगा। एक अच्छी बेटी होने का मतलब है अपने माता-पिता का सम्मान करना, उनकी सेवा करना, उनकी दुआएं कबूल करना, आज्ञाकारी होना और उनकी खुशियों का ख्याल रखना। यह हर अच्छी बेटी की अहम ज़िम्मेदारी है। उन्होंने बहन का रिश्ता इतनी खूबसूरती और अंदाज से निभाया कि उस समय के इमाम (हुसैन इब्न अली (अ) जैसे महान व्यक्ति उनके सम्मान और प्रशंसा में खड़े होते थे। उन्होंने अपने भाई के लिए अपने पूरे परिवार का त्याग कर दिया। निश्चित रूप से, भाई-बहन का रिश्ता एक खूबसूरत रिश्ता है जिसका प्यार अमर है। आप एक वफादार पत्नी और एक उत्कृष्ट मां के रूप में एक आदर्श हैं।

अहले बैत फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकतवी ने कहा: हज़रत ज़ैनब कुबरा (स) के जीवन से हमें पवित्रता और विनम्रता, समझ और अंतर्दृष्टि, ज्ञान और समझ, धर्म को बनाए रखना, धैर्य और सहनशीलता, बच्चों की सावधानी से परवरिश, धार्मिक मुद्दों के बारे में जागरूकता, उस समय के इमाम की बात मानना ​​और मानना, जिस पर चलकर हमारी औरतें अपनी ज़िंदगी को कामयाब और खुशहाल बना सकती हैं। अल्लाह तआला हम सबको, खासकर हमारी औरतों को शरीक-तुल-हुसैन (अ), दूसरी ज़हरा, औरतों की अकीला, बिना टीचर वाली आलिम, कर्बला की मुसीबतों की माँ, हज़रत ज़ैनब कुबरा (स), मुसीबतों की माँ, शांति उन पर हो, अता फरमाए।

यह भी बताने लायक है कि अगर ज़ैनब (स) न होतीं, तो कर्बला, कर्बला न होता! क्योंकि अगर हज़रत ज़ैनब (स) न होतीं, तो कर्बला की घटना की असली भावना और संदेश, जो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना और सच की हिफ़ाज़त करना था, शायद दुनिया तक न पहुँच पाता; वह खुद कर्बला के कैदियों के बीच एक अहम स्तंभ बन गईं, उपदेश दिए, और इमाम हुसैन (अ) के मिशन को ज़िंदा रखा, जिसने कर्बला को एक छोटा आंदोलन बनाने के बजाय हमेशा रहने वाला आंदोलन बना दिया। युद्ध. हे कर्बला की शेर दिल ख़ातून! आपके धैर्य और दृढ़ता को सलाम।