رضوی

رضوی

हमारा अक़ीदह है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम तमाम सहाबा से अफ़ज़ल थे और पैग़म्बरे इस्लाम के बाद उम्मते इस्लामी में उनको औलवियत हासिल थी। लेकिन इन सब के बावुजूद उन

के बारे में हर तरह के ग़ुलू को हराम मानते हैं। हमारा अक़ीदह है कि जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ख़ुदाई या इस से मुशाबेह किसी दूसरी चीज़ के क़ाइल हैं

वह काफ़िर हैं और इस्लाम से ख़ारिज हैं और हम उन के अक़ीदे से बेज़ार हैं। अफ़सोस है कि उन का नाम शियों के नाम के साथ लिया जाता है जिस से

बहुत सी ग़लत फ़हमियाँ पैदा हो गई हैं। जबकि उलमा-ए-शिया इमामियह ने अपनी किताबों में इस गिरोह को ख़ारिज अज़ इस्लाम ऐलान किया है।

वसीये रसूल, ज़ोजे बतूल, इमामे अव्वल, पिदरे आइम्मा, मोलूदे काबा हज़रत अली अलैहिस्सलाम की तारीख़े विलादत बा सआदत, तेरह रजब के मौक़े पर हम शियायाने अहलेबैत अलैहिमु अस्सलाम और तमाम मुसलमानों को मुबारकबाद पेश करते हैं। हमें उम्मीद है कि एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब तक़वे व अदालत के मुजस्समे, आज़ादी के अलमबरदार इमाम अली अलैहिस्सलाम की तमन्नाएं, आपके अज़ीम बेटे हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़रिये पूरी होंगी, उस वक़्त इंसान इमाम अली अलैहिस्सलाम के ज़रिये बयान किये गये कमालात के मतलब को अच्छी समझेगा।

चूँकि इस अज़ीम शख़्सियत के किरदार को एक मक़ाले में बयान करना ना मुमकिन है, लिहाज़ा इस पुर मसर्रत मौक़े हम सिर्फ़ ख़ाना -ए- काबा में आपकी विलादत के वाक़िये को मोलूदे काबा के उनवान से इस मक़ाले में आप हज़रात की ख़िदमत में पेश कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि हमारी यह कोशिश रब्बे काबा की बारगाह में क़बूल होगी।

हमारे ज़हन और ज़मीर में बहुत से ऐसे सवाल छुपे हुए है जो किसी मुनासिब वक़्त और मौके पर ही ज़ाहिर होते हैं। उन्हीं सवालों में से एक यह है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम काबे में क्यों पैदा हुए ? जब हज के मौक़े पर मस्जिदुल हराम में दाख़िल होने पर ख़ाना -ए- काबा को देखते है और उसके गिर्द तवाफ़ करते हैं तो दिल व दिमाग में यह सवाल उभरता है कि क्या हज़रत अली अलैहिस्सलाम हक़ीक़तन काबे में पैदा हुए हैं या यह सिर्फ़ ख़तीबों व शाइरों के ज़हन की उपज है ? अगर आपकी विलादत का वाक़िया सच है तो आपकी विलादत काबे में किस तरह हुई ? क्या शियों व सुन्नियों की पुरानी किताबों में इस वाकिये का ज़िक्र मिलता है ? यह मक़ाला इसी सवाल का जवाब है।
शेख सदूक़ का नज़रिया

शेख़ सदूक़ ने अपनी तीन किताबों में मुत्तसिल सनद के साथ सईद बिन जुबैर से नक़्ल किया है कि उन्होने कहा कि मैने यज़ीद बिन क़ानब को यह कहते सुना कि मैं अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब और बनी अब्दुल उज़्ज़ा के कुछ लोगों के साथ ख़ाना-ए- काबा के सामने बैठा हुआ था कि अचानक फ़ातिमा बिन्ते असद (मादरे हज़रत अली अलैहिस्सलाम) ख़ाना-ए-काबा की तरफ़ आईं। वह नौ माह के हमल से थीं और उनके दर्दे ज़ेह हो रहा था। उन्होंने अपने हाथों को दुआ के लिए उठाया और कहा कि ऐ अल्लाह ! मैं तुझ पर, तेरे नबियों पर और तेरी तरफ़ से नाज़िल होने वाली किताबों पर ईमान रखती हूँ। मैं अपने जद इब्राहीम अलैहिस्सलाम की बातों की तसदीक़ करती हूँ और यह भी तसदीक़ करती हूँ कि इस मुक़द्दस घर की बुनियाद उन्होंने रखी है। बस इस घर की बुनियाद रखने वाले के वास्ते से और इस बच्चे के वास्ते से जो मेरे शिकम है, मेरे लिए इस पैदाइश को आसान फ़रमा।

यज़ीद बिन क़ानब कहता है कि हमने देखा कि ख़ाना -ए- काबा में पुश्त की तरफ़ दरार पैदा हुई। फ़ातिमा बिन्ते असद उसमें दाख़िल होकर हमारी नज़रों से छुप गईं और दीवार फिर से आपस में मिल गई। हमने इस वाक़िये की हक़ीक़त जानने के लिए ख़ाना-ए- काबा का ताला खोलना चाहा, मगर वह न खुल सका, तब हमने समझा कि यह अम्रे इलाही है।

चार दिन के बाद फ़ातिमा बिन्ते असद अली को गोद में लिए हुए ख़ाना-ए-काबा से बाहर आईं और कहा कि मुझे पिछली तमाम औरतों पर फ़ज़ीलत दी गई है। क्योंकि आसिया बिन्ते मज़ाहिम (फ़िरऔन की बीवी) ने अल्लाह की इबादत छुप कर वहाँ की जहाँ उसे पसंद नही है (मगर यह कि ऐसी जगह सिर्फ़ मजबूरी की हालत में इबादत की जाये।) मरियम बिन्ते इमरान (मादरे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम) ने ख़जूर के पेड़ को हिलाया ताकि उससे ताज़ी खजूरें खा सकें। लेकिन मैं वोह हूँ जो बैतुल्लाह में दाखिल हुई और जन्नत के फल और खाने खाये। जब मैंने बाहर आना चाहा तो हातिफ़ ने मुझसे कहा कि ऐ फ़ातिमा ! अपने इस बच्चे का नाम अली रखना। क्योंकि वह अली है और ख़ुदा-ए अलीयो आला फ़रमाता है कि मैंने इसका नाम अपने नाम से मुश्तक़ किया है, इसे अपने एहतेराम से एहतेराम दिया है और अपने इल्मे ग़ैब से आगाह किया है। यह बच्चा वह है जो मेरे घर से बुतों को बाहर निकालेगा, मेरे घर की छत से अज़ान कहेगा और मेरी तक़दीस व तमजीद करेगा। ख़ुशनसीब हैं वह लोग जो इससे मुहब्बत करते हुए इसकी इताअत करें और बदबख़्त हैं वह लोग जो इससे दुश्मनी रखे और गुनाह करें।
शेख़ तूसी का नज़रिया

शेख तूसी ने अपनी आमाली में मुत्तसिल सनद के साथ इब्ने शाज़ान से नक़्ल किया है कि उन्होंने कहा कि इब्राहीम बिन अली ने अपनी सनद के साथ इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से और उन्होंने अपने आबा व अजदाद के हवाले से नक़्ल किया है कि अब्बास बिन मुत्तलिब व यज़ीद बिन क़ानब कुछ बनी हाशिम व बनी अब्दुल उज़्ज़ा के के साथ ख़ाना-ए- काबा के पास बैठे हुए थे। अचानक फ़ातिमा बिन्ते असद (मादरे हज़रत अली अलैहिस्सलाम) ख़ाना-ए काबा की तरफ़ आईं। वह नौ महीने की हामेला थीं और उन्हें दर्दे ज़ेह उठ रहा था। वह ख़ाना-ए- काबा के बराबर में खड़ी हुईं और आसमान की तरफ़ रुख़ करके कहा कि ऐ अल्ला! मैं तुझ पर, तेरे नबियों पर और तेरी तरफ़ से नाज़िल होने वाली तमाम किताबों पर ईमान रखती हूँ। मैं अपने जद इब्राहीम अलैहिस्सलाम के कलाम की और इस बात की तसदीक़ करती हूँ कि इस घर की बुनियाद उन्होंने रखी। बस इस घर, इसके मेमार और इस बच्चे के वास्ते से जो मेरे शिकम में है और मुझसे बाते करता है, जो कलाम के ज़रिये मेरा अनीस है और जिसके बारे में मुझे यक़ीन है कि यह तेरी निशानियों में से एक है, इस पैदाइश को मेरे लिए आसान फ़रमा।

अब्बास बिन अबदुल मुत्तलिब और यज़ीद बिन क़ानब कहते हैं कि जब फ़ातिमा बिन्ते असद ने यह दुआ की तो ख़ाना-ए- काबा की पुश्त की दीवार फ़टी और फ़ातिमा बिन्ते असद उसमें दाख़िल हो कर हमारी नज़रों से गायब हो गईं और दीवार फिर से आपस में मिल गई। हमने काबे के दरवाज़े को खोलने की कोशिश की ताकि हमारी कुछ औरतें उनके पास जायें, लेकिन दर न खुल सका, उस वक़्त हमने समझा कि यह अम्रे इलाही है। फ़ातिमा तीन दिन तक ख़ाना-ए-काबा में रहीं। यह बात इतनी मशहूर हुई कि मक्के के तमाम मर्द व औरत गली कूचों में हर जगह इसी के बारे में बात चीत करते नज़र आते थे। तीन दिन बाद दीवार फिर उसी जगह से फ़टी और फ़ातिमा बिन्ते असद अली अलैहिस्सलाम को गोद में लिए हुए बाहर तशरीफ़ लाईं और आपने फ़रमाया कि

ऐ लोगो! अल्लाह ने अपनी मख़लूक़ात में से मुझे चुन लिया है और गुज़िश्ता तमाम औरतों पर मुझे फज़ीलत दी है। पिछले ज़माने में अल्लाह ने आसिया बिन्ते मज़ाहिम को चुना और उन्होंने छुप कर, उसकी उस जगह (फ़िरऔन के घर में) इबादत की जहाँ पर मजबूरी की हालत के अलावा उसे अपनी इबादत पसंद नही है। उसने मरियम बिन्ते इमरान को चुना और उन पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की विलादत को आसान किया। उन्होंने बयाबान में खजूर के सूखे दरख़्त को हिलाया और उससे उनके लिए ताज़ी ख़जूरी टपकीं। उनके बाद अल्लाह ने मुझे चुना और उन दोनों व तमाम ग़ुज़िश्ता औरतों पर मुझे फ़ज़ीलत दी क्योंकि मेनें ख़ाना-ए- ख़ुदा में बच्चे को जन्म दिया, तीन दिन तक वहाँ रही और जन्नत के फल व खाने खाती रही। जब मैंनें बच्चे को लेकर वहाँ से निकलना चाहा तो हातिफ़े ग़ैबी ने आवाज़ दी, ऐ फ़ातिमा ! मैं अलीयो आला हूँ। इस बच्चे का नाम अली रखना। मैंने इसे अपनी क़ुदरत, इज़्ज़त और अदालत के साथ पैदा किया है। मैंने इसका नाम अपने नाम से मुश्तक़ किया है और अपने एहतेराम से इसे एहतेराम दिया है। मैंने इसे इख़्तियार दिये हैं और अपने इल्मे ग़ैब से भी आगाह किया है। मेरे घर में पैदा होने वाला यह बच्चा सबसे पहले मेरे घर की छत से अज़ान कहेगा, बुतों को बाहर निकाल फेंकेगा, मेरी अज़मत, मज्द और तौहीद का क़ायल होगा। यह मेरे पैग़म्बर व हबीब, मुहम्मद के बाद उनका वसी है। ख़ुश नसीब हैं वोह लोग जो इससे मुहब्बत करते हुए इसकी मदद करे और धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो इसकी नाफ़रमानी करते हुए इसके हक़ से इंकार कर दे।
नुक्ता

कुछ किताबों में यह सराहत के साथ मिलता है कि हमने देखा कि काबा पुश्त की तरफ़ से ख़िला और फ़ातिमा बिन्ते असद उसमें दाख़िल हो गईं। इससे यह सवाल पैदा होता है कि पुश्ते काबा कहाँ है ?

बहुतसी रिवायतों में वजहे काबा (काबे के फ़्रंट) का ज़िक्र हुआ है और इससे मुराद वह हिस्सा है जिसमें काबे का दरवाज़ा लगा हुआ है और बराबर में मक़ामें इब्राहीम अलैहिस्सलाम है। लिहाज़ा इस बुनियाद पर पुश्ते काबा वह मक़ाम है जो रुक्ने यमानी व रुक्ने ग़रबी के बीच वाक़े है।

जब सैलाब से ख़ाना-ए-काबा की इमारत को नुक़्सान पहुंचा तो क़ुरैश ने उसे गिरा कर नई तामीर की थी। इससे कुछ लोगों के ज़हन में यह बात पैदा हो सकती है कि शायद अली अलैहिस्सलाम की विलादत ख़ाना-ए-काबा में उस वक़्त हुई हो जब उसकी दीवारें मौजूद नही थी, लिहाज़ा यह उनके लिए कोई फ़ज़ीलत की बात नही है। लेकिन यह शुबाह सही नही है।
क्योंकि
इब्ने मग़ाज़ली का नज़रिया

ऊपर हम दो शिया उलमा का नज़रिया बयान कर चुके हैं। अब हम यहाँ पाँचवीं सदी के सुन्नी आलिम इब्ने मग़ाज़ली का नज़रिया बयान कर रहे हैं।

इब्ने मग़ाज़ली मुत्तसिल सनद के साथ मूसा बिन जाफ़र से वह अपने बाबा इमाम सादिक़ से वह अपने बाबा इमाम मुहम्मद बाक़िर से और उन्होंने अपने बाबा इमाम सज्जाद अलैहिमु अस्सलाम से नक़्ल किया है कि आपने फ़रमाया कि मैं और मेरे बाबा इमाम (हुसैन अलैहिस्सलाम) जद्दे बुज़ुर्गवार (पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिए गये थे। वहाँ पर बहुतसी औरतें जमा थीं, उनमें से एक हमारे पास आई। मैंने उससे पूछा ख़ुदा तुझ पर रहमत करे ! तू कौन है ?

उसने कहा मैं ज़ैदा बिन्ते क़रीबा बिन अजलान क़बीला-ए बनी साएदा से हूँ।

मैंने उससे कहा कि क्या तू कुछ कहना चाहती है?

उसने जवाब दिया हाँ! ख़ुदा की क़सम मेरी माँ उम्मे अमारा बिन्ते इबादा बिन नज़ला बिन मालिक बिन अजलाने साइदी ने मुझसे नक़्ल किया है कि मैं कुछ अरब औरतों के साथ बैठी हुई थी कि अबूतालिब ग़मगीन हालत में हमारे पास आये। मैने उनसे पूछा कि ऐ अबूतालिब! आपके क्या हाल है ? अबूतालिब ने मुझसे कहा कि फ़ातिमा बिन्ते असद दर्दे ज़ेह से तड़प रही हैं। यह कह कर उन्होने अपना हाथ माथे पर रखा ही था कि अचानक मुहम्मद (स.) वहाँ पर तशरीफ़ लाये और पूछा कि चचा आपके क्या हाल हैं ? अबूतालिब ने जवाब दिया कि फ़ातिमा बिन्ते असद दर्दे ज़ेह से परेशान हैं। पैग़म्बर (स.) ने अबूतालिब का हाथ पकड़ा और वह दोनो फ़ातिमा बिन्ते असद के साथ काबे पहुँचे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उन्हें काबे के दरवाज़े के पास बैठाया और कहा कि अल्लाह के नाम से बैठ जाओ।

फ़ातिमा बिन्ते असद ने काबे के दरवाज़े पर नाफ़ कटे हुए एक बच्चे को जन्म दिया। उस जैसा ख़ूबसूरत बच्चा मैंने आज तक नही देखा। अबूतालिब ने उस बच्चे का नाम अली रखा और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) उन्हें घर लेकर आये।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने उम्मे अमारा की इस रिवायत को सुनने के बाद कहा कि मैंने इतनी अच्छी बात कभी नही सुनी।

इब्ने मग़ाज़ली की इस रिवायत में ऊपर बयान की गई दोनों शिया रिवायतों से फ़र्क़ पाया जाता है, लेकिन यह रिवायत हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत पर दलालत करती है।
दूसरे आलिमों का नज़रिया

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के सिलसिले में हम अब तक आपके सामने तीन तफ़सीली रिवायतें बयान कर चुके हैं। इन रिवायतों के अलावा बहुत से शिया व सुन्नी उलमा ने मुख़तसर तौर पर भी इस रिवायत को बयान किया है। यानी काबे में विलादत को तो बयान किया है मगर उसके जुज़ियात को बयान नही किया है।

अल्लामा अमीनी (मरहूम) ने अपनी किताब अल-ग़दीर में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के वाक़िये को अहले सुन्नत की 16 और शियों की 50 अहम किताबों के हवाले से नक़्ल किया है। दूसरी सदी हिजरी से किताब लिखे जाने तक के 41 शाइरों के नाम लिखे हैं जिन्होंने इस वाक़िये को नज़्म किया है और कुछ के शेर भी नक़्ल किये हैं।

अल्लामा मज़लिसी (मरहूम) ने बिहारुल अनवार में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के वाकिये को 18 शिया किताबों से नक़्ल किया है।

आयतुल्लाहिल उज़मा मरअशी नजफ़ी (मरहूम) ने एहक़ाक़ुल हक़ की शरह की सातवीं जिल्द में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के वाक़िये को अहले सुन्नत की 12 किताबों के हवालों से नक़्ल किया है।

और सतरहवीं जिल्द में इस वाक़िये को अहले सुन्नत की 21 किताबों से नक़्ल किया है। इसके बाद अल्लामा आक़ा महदी साहिब क़िबला की किताब अली वल काबा के हवाले से अहले सुन्नत के उन 83 उलमा के नाम लिखे है, जिन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विलादत को काबे में तस्लीम किया है।

नोटः शिया व सुन्नी किताबों की तादाद में इख़्तेलाफ़ का सबब यह है कि कुछ उलमा का बहुत ज़्यादा तहक़ीक़ का इरादा नही था। बस उनके पास जितनी किताबें थीं या उन्होंने जितनी किताबों में पढ़ा था उन्ही के नाम लिखे हैं। या इमकानात कमी की वजह से वह तमाम किताबों को नही देख सके। कुछ उलमा का पूरी तहक़ीक़ का इरादा था और उनके पास इमकानात भी मौजूद थे, लिहाज़ा उन्होने ज़्यादा किताबों के हवालों से लिखा। चूँकि आज वसाइल और किताबें मौजूद है लिहाज़ा अगर अब कोई इस बारे में तहक़ीक़ करना चाहे तो उसे ऐसी बहुतसी किताबें और उलमा मिल जायेंगे जिन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विलादत को काबे में तस्लीम किया है।

आपका नाम अली व आपके अलक़ाब अमीरुल मोमेनीन, हैदर, कर्रार, कुल्ले ईमान, सिद्दीक़,फ़ारूक़, अत्यादि हैं।

माता पिता

आपके पिता हज़रतअबुतालिब पुत्र हज़रत अब्दुल मुत्तलिब व आपकी माता आदरनीय फ़तिमा पुत्री हज़रतअसद थीं।

जन्म तिथि व जन्म स्थान

आप का जन्म रजब मास की 13वी तारीख को हिजरत से 23वर्ष पूर्व मक्का शहर के विश्व विख्यात व अतिपवित्र स्थान काबे मे हुआ था। आप अपने माता पिता के चौथे पुत्र थे।

पालन पोषण

आप (6) वर्ष की आयु तक अपने माता पिता के साथ रहे। बाद मे आदरनीय पैगम्बर हज़रतअली को अपने घर ले गये।

हज़रत अली सर्वप्रथम मुसलमान के रूप मे

जब आदरनीय मुहम्मद (स0)ने अपने पैगमबर होने की घोषणा की तो हज़रतअली वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने आपके पैगम्बर होने को स्वीकार किया तथा आप पर ईमान लाए।

 हज़रत अली पैगम्बर के उत्तराधिकारी के रूप मे

हज़रत पैगम्बर ने अपने स्वर्गवास से तीन मास पूर्व हज से लौटते समय ग़दीरे ख़ुम नामक स्थान पर अल्लाह के आदेश से सन् 10 हिजरी मे ज़िलहिज्जा मास की 18वी तिथि को हज़रतअली को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

अपने पाँच वर्षीय शासन काल मे विभिन्न युद्धों, विद्रोहों, षड़यन्त्रों, कठिनाईयों व समाज मे फैली विमुख्ताओं का सामना किया। इमाम अली राजकोष का विशेष ध्यान रखते थे, वह किसी को भी उसके हक़ से अधिक नही देते थे। वह राजकोष को सार्वजनिक सम्पत्ति मानते थे। एक बार आप रात्री के समय राजकोष के कार्यों मे वयस्त थे। उसी समय आपका एक मित्र भेंट के लिए आया जब वह बैठ गया और बातें करने लगा तो आपने जलते हुए चिराग़ (दिआ) को बुझा दिया। और अंधेरे मे बैठकर बाते करने लगे। आपके मित्र ने चिराग़ बुझाने का कारण पूछा तो आपने उत्तर दिया कि यह चिराग़ राजकोष का है।और आपसे बातचीत मेरा व्यक्तिगत कार्य है अतः इसको मैं अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए प्रयोग नही कर सकता।

स्वर्गवास

हज़रत इमाम अली सन् 40 हिजरी के रमज़ान मास की 19वी तिथि को जब सुबह की नमाज़ पढ़ने के लिए गये तो सजदा करते समय अब्दुर्रहमान पुत्र मुलजिम ने आपके ऊपर तलवार से हमला किया जिससे आप का सर बहुत अधिक घायल हो गया तथा दो दिन पश्चात रमज़ान मास की 21वी रात्री मे नमाज़े सुबह से पूर्व आपने इस संसार को त्याग दिया।

समाधि

इमाम अली की समाधि नजफ़ नामक स्थान पर है।

इमाम अली और यहूदी

एक बार अमीरूल मोमेनीन (अ .स.) का इख़्तेलाफ़ एक यहूदी से हो गया जिसके पास आपकी ज़िरह थी , उसने क़ाज़ी से फै़सला कराने पर इसरार किया।


आप यहूदी के साथ क़ाज़ूी शरीह के पास आए तो उसने आपसे गवाह तलब किये ।


आपने क़म्बर और इमाम हुसैन (अ.स) को पेश किया , काज़ी शरीह ने क़म्बर की गवाही क़ुबूल कर ली और इमाम हसन (अ 0) की गवाही फ़रज़न्द होने की बिना पर रद कर दी ।

आपने फ़रमाया के रसूले अकरम (स 0) ने उन्हें सरदारे जवानाने जन्नत क़रार दिया है और तुम उनकी गवाही को रद कर रहे हो ? काज़ी ने अपना फैसला यहूदी के हक़ मे दिया।

लेकिन इसके बावजूद इमाम ने फ़ैसले का ख़याल करते हुए ज़िरह यहूदी को दे दी।

उस यहूदी ने वाक़ेए को निहायत दरजए हैरत  से देखा और फिर कलमए शहादतैन पढ़ कर मुसलमान हो गया।

आपने ज़िरह के साथ उसे घोड़ा भी दे दिया और  900 दिरहम वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया।

वह मुस्तक़िल आपकी खि़दमत में हाज़िर रहा यहां तक के सिफ़्फ़ीन में दरजए शहादत पर फ़ाएज़ हो गया।

इस वाक़ेए से अन्दाज़ा होता है के इमाम अलैहिस्सलाम का किरदार क्या था।

अल्लाह के महान संत और पवित्र पैगंबर (स) के महान उत्तराधिकारी हज़रत मावला अली (अ) का काबा में ईश्वरीय व्यवस्था और मैनेजमेंट के तहत जन्म निश्चित रूप से एक अनोखा, विशिष्ट, बेमिसाल और बेमिसाल सम्मान और विशेषाधिकार है जो उनसे पहले किसी को नहीं मिला और न ही उनके बाद किसी को मिला।

अल्लाह के महान संत और पवित्र पैगंबर (स) के महान उत्तराधिकारी हज़रत मावला अली (अ) का काबा में ईश्वरीय व्यवस्था और मैनेजमेंट के तहत जन्म निश्चित रूप से एक अनोखा, विशिष्ट, बेमिसाल और बेमिसाल सम्मान और विशेषाधिकार है जो उनसे पहले किसी को नहीं मिला और न ही उनके बाद किसी को मिला।

काबा पहला और सबसे पवित्र घर है जिसे लोगों के लिए आशीर्वाद और दुनिया के लिए मार्गदर्शन घोषित किया गया है (1) और मौला अली (अ.स.) पहले और आखिरी काबिल इंसान हैं जिन्हें काबा के रब ने काबा की खोह में बनाया।

बेशक, हज़रत अमीर अल-मुमिनीन इमाम अली इब्न अबी तालिब (अ) का काबा की खोह में 13/रजब, 30/आम अल-फील को जन्म, इतनी बड़ी सच्चाई और सच्चाई है कि इसे शिया और सुन्नी दोनों की रिवायतों और ऐतिहासिक किताबों में "तवातिर" के साथ बताया गया है।

ज़ाहिर है, इन किताबों में लिखी सारी बातें लिखना इस आर्टिकल के दायरे से बाहर है, इसलिए यहाँ हम कुछ शिया और कुछ सुन्नी विद्वानों और इतिहासकारों की बातों से ही खुश हैं:

अ) शिया विद्वानों की बातें

  1. शेख सदूक (र) ने अपनी रिवायतों और हदीसों की किताबों, एलल उश शराए (2), मानी अल-अखबार (3) और अल-अमली (4) में यज़ीद इब्न क़नाब की एक रिवायत का ज़िक्र करते हुए बताया है कि: फ़ातिमा बिन्त असद लेबर पेन में काबा के पास थीं, और उस समय उन्होंने अल्लाह से दुआ की, “मेरे लिए यह मामला आसान कर दो।” उसी समय, काबा की दीवार पीछे से फट गई। वह काबा में घुस गईं, और दीवार फिर से बंद हो गई।

उन्होंने यज़ीद इब्न क़ानब से यह भी बताया है कि उसके बाद, हमने काबा का दरवाज़ा खोलने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला, तो हम समझ गए कि यह काम अल्लाह ने किया है। फिर, चार दिन बाद, फ़ातिमा बिन्त असद अली को गोद में लेकर काबा से बाहर आईं।

  1. अल्लामा तबरी बताते हैं कि फ़ातिमा बिन्त असद काबा का चक्कर लगा रही थीं। उस समय, उन्हें इतनी तेज़ लेबर पेन हो रहा था कि वह घर वापस नहीं जा सकती थीं। इसलिए, वह काबा की तरफ़ गईं और उसमें एक दरवाज़ा खोला गया। वह उसमें अंदर चली गईं। फिर दरवाज़ा बंद कर दिया गया। अली काबा के अंदर पैदा हुए और तीन दिन तक वहीं रहे। (5)
  2. अल्लामा मुहम्मद बाकिर मजलिसी (र) ने लिखा है कि: पवित्र पैगंबर (स) का जन्म 13 रजब को, हाथी के तीसवें साल में, काबा के अंदर हुआ था, जो शिया और सुन्नी हदीस के जानकारों और इतिहासकारों के बीच मशहूर है। (6)

ब) सुन्नी जानकारों के बयान

  1. मुहम्मद इब्न इस्हाक फकीही (मृत्यु 275 हिजरी) ने लिखा: "और काबा में बनू हाशिम से इमिग्रेंट्स में पैदा होने वाला पहला व्यक्ति अली इब्न अबी तालिब (अ) था" (7) मतलब कि काबा में बनू हाशिम और इमिग्रेंट्स से पैदा होने वाला पहला व्यक्ति अली इब्न अबी तालिब (अ) था।
  2. हाकिम नेशापुरी ने लिखा: "ऐसी रिवायतों की एक रिवायत है कि फातिमा बिन्त असद ने अली इब्न अबी तालिब को जन्म दिया, अल्लाह उनसे खुश हो, उनका चेहरा काबा में था" (8) मतलब कि ऐसी रिवायतों और हदीसों की एक रिवायत है कि फातिमा बिन्त असद ने वफ़ादार अली इब्न अबी तालिब के कमांडर को जन्म दिया, अल्लाह उनसे खुश हो, उनका चेहरा काबा में था।"
  3. अबू ज़कारिया अज़दी भी यही राय रखते हैं: "और काबा में एक पैदाइश हुई, और उसमें वफ़ादार अली इब्न अबी तालिब के अलावा कोई खलीफ़ा पैदा नहीं हुआ।" (9) यानी, पवित्र पैगंबर काबा में पैदा हुए, और काबा में अमीरुल मोमिनीन अली इब्न अबी तालिब (अ) के अलावा कोई खलीफ़ा पैदा नहीं हुआ।
  4. हाफ़िज़ गंजी शफ़ीई ने लिखा है: "वफ़ादार अली इब्न अबी तालिब के कमांडर थे उनका जन्म मक्का में अल्लाह के पवित्र घर में शुक्रवार की रात को हुआ था, जो हाथी वर्ष के तीसवें वर्ष रजब की तेरहवीं रात थी। अल्लाह के पवित्र घर में उनसे पहले या बाद में कोई पैदा नहीं हुआ, यह उनके सम्मान और उनके महान पद के सम्मान में है।" (10) यानी, कमांडर ऑफ़ द वफ़ादार अली इब्न अबी तालिब का जन्म मक्का में अल्लाह के पवित्र घर में शुक्रवार की रात, रजब की तेरहवीं रात, हाथी के साल के तीसवें साल में हुआ था, और वहाँ पैगंबर से पहले या बाद में कोई पैदा नहीं हुआ। यह उनकी खास खूबी है, जो अल्लाह ने उनके महान पद के सम्मान में उन्हें दी।
  5. आलूसी ने लिखा है: "और अमीर, सबसे मेहरबान, सबसे रहमदिल और सबसे खूबसूरत, का अल्लाह के घर में जन्म एक ऐसी बात है जो पूरी दुनिया में मशहूर है और सुन्नी और शिया दोनों पंथों की किताबों में इसका ज़िक्र है" (11)। किसी भी हाल में, इन कुछ बातों से, हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि हज़रत मौला-ए-कायनात (अ.स.) का जन्म मुबारक था। अल्लाह का पवित्र घर एक ऐसी सच्चाई है जो मुसलमानों द्वारा जानी-मानी, जानी-मानी और अक्सर बताई जाती है, और इसे झुठलाना नामुमकिन है। इसीलिए हज़रत अमीर अल-मोमिनीन (अ), जो काबा में पैदा हुए थे, के कट्टर दुश्मन भी इसे झुठला नहीं सके। हालाँकि, यह पक्का है कि इन बुरा चाहने वालों ने पवित्र पैगंबर (स) की इस अनोखी और खास नेमत को कम करने की गंदी कोशिश की है। इसीलिए उन्होंने हकीम इब्न हिज़ाम के काबा में जन्म की रिवायत गढ़ी है और दावा किया है कि: काबा में पैदा होना अली की कोई खास और खास नेमत नहीं है, क्योंकि हकीम इब्न हिज़ाम भी काबा में पैदा हुए थे।

इस रिवायत की असलियत:

यह रिवायत सबसे पहले ज़ुबैर इब्न बक्र ने मुसाब इब्न उस्मान से सुनाई थी। उनसे पहले, हदीस के किसी भी सुन्नी विद्वान ने इसे अपनी किताबों में नहीं सुनाया, और उनके बाद जिसने भी यह रिवायत सुनाई, उसने उन्हीं के हवाले से सुनाई (ज़ुबैर इब्न बकर).

रिजेक्शन और इनवैलिडेशन

इस रिवायत को इन तर्कों के आधार पर रिजेक्ट और इनवैलिड किया जाता है:

  1. यह रिवायत असली और लगातार चलने वाली परंपराओं के खिलाफ है।
  2. हकीम इब्न हिज़ाम एक मुशरिक थे, जिन्होंने मक्का की फ़तह के दिन इस्लाम अपना लिया था और उन्हें मुवालिफ़ाह अल-क़ुलूब (अल्लाह के दिल में रहने वाले) में गिना जाता था। (12) इसलिए, यह नामुमकिन है कि वह अल्लाह के इंतज़ाम के तहत काबा में पैदा हुए हों।
  3. ज़ुबैर इब्न बक्र ने यह रिवायत मुसाब इब्न उथमान से सुनाई है, और वह एक अनजान इंसान हैं जिनका ज़िक्र किसी भी सुन्नी रिवायत की किताब में नहीं है।
  4. यह रिवायत मुर्सला है, क्योंकि मुसाब इब्न उथमान इस घटना के दस साल बाद पैदा हुए थे, तो वह इस घटना की रिपोर्ट कैसे कर सकते थे?

सुन्नियों की नज़र में मुर्सला रिवायत का दर्जा:

सुन्नी विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि मुर्सला रिवायत का दर्जा कम है। इसके सबूत के तौर पर कई सुन्नी विद्वानों के बयान पेश किए जा सकते हैं, लेकिन जगह की कमी के कारण, सिर्फ़ दो ज़रूरी बयानों को उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है:

अ) अल-नवावी ने लिखा है: "ज़्यादातर हदीस विद्वानों के अनुसार भेजी गई हदीस कमज़ोर मानी जाती है" (13)।

ब) मुस्लिम निशापुरी ने साफ़-साफ़ कहा है: "और भेजी गई हदीस हमारी असली राय में रिवायतों और रिवायतों और कहानियों के जानकारों की राय से है, यह सबूत नहीं है" (14)। यानी, भेजी गई हदीस एक रिवायत है जो हमारी राय और रिवायतों और कहानियों के जानकारों की राय के अनुसार सबूत नहीं है।

  1. यह हदीस ज़ुबैर के परिवार ने बनाई है और उन्हें अमीरुल मोमेनीन (अ) की मुबारक शख़्सियत से बहुत नफ़रत और दुश्मनी थी, इसलिए उन्होंने यह हदीस और ऐसी कई दूसरी चीज़ें बनाईं ताकि नबी (स) की अच्छाइयों और खूबियों को छोटा दिखाया जा सके।

इसलिए, यह पक्के और साफ़ सबूतों से साबित और साफ़ है कि जौफ़े काबा मे अमीरुल मोमेनीन क जन्म नबी (स) की एक अनोखी और खास नेमत है जो अल्लाह तआला ने सिर्फ़ उन्हीं को दी है, और विरोधियों की इसे छोटा दिखाने की गंदी कोशिशें बहुत ही घटिया, झूठी और नामंज़ूर हैं।

संदर्भ

  1. إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَمُبَارَكًا وَهُدًى لِلْعَالَمِينَ बेशक, पहला घर इंसानों के लिए उसी ने एक मुबारक जगह और दुनिया के लिए रास्ता दिखाने के लिए बनाया था। पवित्र कुरान, हिस्सा 4, सूरह अल-इमरान, आयत 96।
  2. एलल उश शराए, 1385 हिजरी, भाग 1, पेज 135.
  3. मानी अल-अखबार, 1403 हिजरी, पेज 62.
  4. अल-अमाली, 1376 हिजरी, पेज 132.
  5. तोहफतुल अबरार, 1376 हिजरी, पेज 164, 165.
  6. जला’ अल-अय्यून मजलिसी, पेज 80.
  7. अखबर मक्का फकीही, भाग 3, पेज 226.
  8. अल-मुस्तद्रक अली अल-सहीहीन, भाग 3, पेज 550.
  9. तारीख मोसुल, किताब XIII, पेज 13. 58.
  10. किफ़य्याह अल-तालिब, पेज 405, 406.
  11. सरह अल-खुरिदा अल-ग़ैबियाह इन शरह अल-क़सैदा अल-ऐनिया, पेज 3 और 15.
  12. असद अल-ग़बाह इब्न अथिर, वॉल्यूम 1, पेज 522.
  13. अल-तक़रीब वल-तैसिर ला मारीफ़त सुनान अल-बशीर अल-नाधीर, वॉल्यूम 1, पेज 35.
  14. सहीह मुस्लिम, वॉल्यूम 1, चैप्टर 6, पेज 30.

लेखक: ज़हूर महदी मौलाई

अली (अ) एक ऐसी हस्ती हैं जो सिर्फ़ एक इंसान, लीडर या शासक नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अल्लाह का तोहफ़ा हैं; पूरी इंसानियत उनकी महानता के आगे सिर झुकाती है, सिवाय उन लोगों के जो सच्चाई से अनजान हैं और समझ से दूर हैं, इसीलिए आपको अमीर-हज़रत अली (अ) के चाहने वालों में सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं दिखेंगे, बल्कि ईसाई और दूसरे धर्मों को मानने वाले भी उनकी तारीफ़ करते नज़र आते हैं।

जब दुनिया बनाने वाले ने इंसान को धरती पर अपना खलीफ़ा बनाना चाहा, तो इंसान बिना गाइडेंस और ट्रेनिंग के अल्लाह का खलीफ़ा नहीं बन सकता था, इसलिए अल्लाह ने इंसान की गाइडेंस, ट्रेनिंग और इंसानियत की परफेक्शन के लिए एक किताब भेजी। सिर्फ़ यह किताब काफ़ी नहीं थी, बल्कि किताब के साथ-साथ असल गाइडेंस की भी ज़रूरत थी। अल्लाह तआला ने इसे नबियों और इमामों को दिया। इस इलाही मार्गदर्शन प्रणाली का सबसे उज्ज्वल उदाहरण हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली बिन अबी तालिब (अ) हैं। दुनिया के रब ने उनके जन्म का भी अनोखा प्रबंध किया। 13 रजब, 30 आमुल-फिल को, जब उनका जन्म निकट आया, तो हज़रत फातिमा बिन्त असद बिना किसी से कुछ कहे अल्लाह के घर चली गईं। उनके पास काबा का ताला खोलने और काबा में प्रवेश करने के लिए काबा की चाबी नहीं थी, लेकिन जब वह काबा के पास आईं, तो वह दीवार से लिपट गईं, यानी काबा की दीवार टूट गई। उनका जन्म काबा में हुआ। अली (अ) का काबा में जन्म अली (अ.स.) की पुण्यता नहीं है, बल्कि काबा की पुण्यता में वृद्धि है। मौला अब्बास (अ) अपने खुतबे में सलाम कहते हैं: उन्होंने (अ) यह खुतबा इमाम हुसैन (अ) के मक्का से कर्बला जाने के मौके पर 8 ज़िल-हिज्जा 60 हिजरी को दिया था, काबा की छत पर खड़े होकर कहा: (तारीफ़ है उस अल्लाह की जिसने काबा को मेरे मालिक इमाम हुसैन के पिता अली के पैरों से नवाज़ा, जो कल तक पत्थरों का बना कमरा था, उनके जन्म के साथ क़िबला बन गया।)

आप (अ) सिर्फ़ एक इंसान, एक लीडर या एक शासक नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया की इंसानियत के लिए अल्लाह का तोहफ़ा हैं। सारी इंसानियत आपकी महानता के आगे झुकती है, सिवाय उन लोगों के जो सच्चाई से अनजान हैं और समझ से दूर हैं। यही वजह है कि आपको अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) के चाहने वालों में सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं दिखेंगे, बल्कि ईसाई और दूसरे धर्मों के मानने वाले भी उनकी तारीफ़ करते दिखेंगे। सिर्फ़ शिया ही नहीं हैं जो हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) का क़सीदा नहीं पढ़ते। सुन्नी भी दुनिया के कोने-कोने में ऐसे लोग पाएँगे जो हज़रत अली (अ) के प्रति ख़ास श्रद्धा रखते हैं। इसका क्या कारण है? कारण है इस सार्वभौमिक व्यक्तित्व की महानता, वह महानता जिसे उनके जीवन के दौरान और उनकी शहादत के बाद कई शताब्दियों तक छिपाने की कोशिश की गई। लेकिन क्या सूरज की रोशनी छिप सकती है? सूरज तो सूरज है, वह चमकता है, वह पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित करता है। क्या इससे इनकार करना भी संभव है?

यहाँ तक कि उनके दुश्मनों ने भी यह स्वीकार किया है। मुअविया के दरबार में किसी ने अमीर अल-मोमिनीन हज़रत अली (अ) के बारे में कुछ अनुचित कहा। मुअविया को गुस्सा आया और उन्होंने अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की प्रशंसा में एक वाक्य कहा। उनकी शहादत के बाद जब भी मुअविया अपने साथियों को देखते तो उनसे अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) के बारे में बात करने को कहते। बताया जाता है कि कभी-कभी मुआविया रो पड़ता था। हज़रत अमीरुल मोमेनीन (अ) की कमाल की खूबियां ऐसी हैं कि मुआविया की उनसे दुश्मनी सबको पता है, चाहे वो प्राइवेट हो या पब्लिक।

इल्म में बराबरी

मौला अली का होना एक तोहफ़ा है जो खुदा ने इंसानियत को उस समय दिया जब इंसानियत नाइंसाफ़ी, अज्ञानता और मतलबीपन के अंधेरे से घिरी हुई थी।

खुदा के रसूल की इस मुबारक हदीस से यह साफ़ है कि पूरी इंसानियत को मौला अली (अ) के इल्म से फ़ायदा हुआ।

मैं इल्म का शहर हूँ और मैं ही उसका दरवाज़ा हूँ

यह हदीस इस बात को ज़ाहिर करती है कि अली को देना असल में इंसानियत को इल्म, होश और रास्ता दिखाने का दरवाज़ा देना है। इमाम अली का इंसाफ़ किसी खास देश, फिरके या ज़माने तक सीमित नहीं है।

अली का इंसाफ़ इंसानियत के लिए सबसे बड़ा तोहफ़ा है

जिस समाज में इंसाफ़ नहीं होता, वहां इंसान सिर्फ़ एक ज़िंदा लाश बन जाता है। इमाम अली ने दिखाया कि इंसाफ़ सिर्फ़ एक नारा नहीं बल्कि एक प्रैक्टिकल सिस्टम है। यह हज़रत अली (अ) की भी ज़िम्मेदारी थी, क्योंकि वे पैगम्बरे इस्लाम (स) के वारिस और खलीफ़ा थे और उन्होंने एक पल के लिए भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। पुराने दोस्त नाराज़ हो गए, बड़े फ़ायदे की उम्मीद रखने वाले लोग उठ खड़े हुए और उनके ख़िलाफ़ जंग की तैयारी कर ली। जो लोग कल तक उनकी तारीफ़ करते थे, जब उन्होंने उनका इंसाफ़ और इंसाफ़ देखा, तो वे आपके दुश्मन बन गए।

लेकिन इल्ज़ाम लगाने वालों की बुराई का हज़रत अमीरूल मोमेनीन (अ) पर कोई असर नहीं हुआ। वे पूरी लगन से अपना फ़र्ज़ निभाते रहे और इसी रास्ते पर शहीद हुए। वे इंसाफ़ की सख़्ती की वजह से शहीद हुए।

दरबार में मुसलमान और गैर-मुस्लिम में कोई फ़र्क नहीं था।

खिलाफ़त के दौरान, अली ने अपने भाई अकील को खजाने का बराबर बँटवारा करने से मना कर दिया और जज के सामने एक आम नागरिक की तरह पेश हुए। ये सब इस बात के सबूत हैं कि अली का इंसाफ़ दुनियावी इंसाफ़ का ही रूप था।

बिना भेदभाव के लोगों की सेवा करना

आप (अ) लोगों की सेवा करने में कभी शर्म महसूस नहीं की, बल्कि हमेशा लोगों की सेवा के लिए तैयार और मौजूद रहते थे, यतीमों के सिर पर हाथ रखते थे, विधवाओं के दरवाज़े तक राशन पहुँचाते थे और अंधेरी रातों में ज़रूरतमंदों के घर जाते थे। मशहूर घटना यह है कि जब इमाम शहीद हुए, तो इमाम को दफ़नाने के बाद इमाम हसन और हुसैन अपने घरों की ओर जा रहे थे।

किसी के रोने की आवाज़ आई। जब इमाम हसन और हुसैन ने रोते हुए इंसान से पूछा, तो उसने कहा, "मैं तीन दिन से भूखा हूँ। अल्लाह के इस बंदे ने मुझे रोज़ खाना खिलाया, मेरी सेवा की, मुझे दिलासा दिया, मेरी हिम्मत बढ़ाई। आज, अल्लाह का वह बंदा तीन दिन से नहीं आया है। इमाम हसन ने पूछा कि वह कौन है। उसने कहा, "मुझे उसका नाम नहीं पता। क्या कोई निशानी है?" उसने कहा, "हाँ।" जब वह आता था, तो दरवाज़े और दीवारें भी उसके साथ उसकी बड़ाई करती थीं।" इमाम हसन ने कहा, "वह मेरे पिता, इमाम अली (अ) हैं।

आखिर में, मुझे यह कहना होगा कि अगर अल्लाह किसी इंसान को अंधेरे से बाहर निकालना चाहता है, तो वह उसे अली जैसा चिराग देता है।

अगर वह किसी इंसान को इंसाफ सिखाना चाहता है, तो वह उसे अली जैसा शासक देता है।

अगर वह किसी इंसान को जागरूकता देना चाहता है, तो वह उसे अली जैसा शिक्षक देता है।

बिना किसी शक के, दुनिया का मालिक इंसानियत की दुनिया के लिए एक दिव्य तोहफ़ा है।

लेखक: मुहम्मद शोएब सुबहानी

हज़रत अली (अ) पवित्र पैगंबर (स) के बाद इंसानियत की सबसे बड़ी और परफ़ेक्ट पर्सनैलिटी हैं। उनकी महानता को इतिहास में छिपाया नहीं गया है और क़यामत के दिन तक छिपाया नहीं जा सकेगा। काबा का जन्म होने के नाते, इस आर्टिकल का मकसद 13 रजब अल-मुरजब के मौके पर हज़रत अली (अ) की पॉलिटिकल ज़िंदगी के कुछ अच्छे पहलुओं को पेश करना है।

एक अच्छे पॉलिटिशियन की बेसिक खासियतों में शामिल हैं: इंसाफ़, भरोसा, नेकदिली, अच्छे संस्कार, ज्ञान और समझ, सच्चाई, ज़िम्मेदारी का एहसास, सलाह-मशविरा, विनम्रता, लोगों से दोस्ती, गरीबों की देखभाल, कानून का पालन, अपने फ़ायदे से ज़्यादा सबके फ़ायदे को पहले रखना, सस्ता और तुरंत इंसाफ़, सहनशीलता, वादों के प्रति वफ़ादारी, मज़बूत इच्छाशक्ति, समय पर और सही फ़ैसले लेना और लीडरशिप की काबिलियत। अगर इंसानी इतिहास में ये सारी खूबियां किसी एक पर्सनैलिटी में मिलती हैं, तो वह बेशक हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) की नेक पर्सनैलिटी है।

हज़रत अली (अ) पवित्र पैगंबर (स) के बाद इंसानियत की सबसे बड़ी और परफ़ेक्ट पर्सनैलिटी हैं। उनकी महानता इतिहास में छिपी नहीं है और क़यामत के दिन तक छिपी नहीं रह पाएगी। काबा के बेटे होने के नाते, इस लिखने का मकसद 13 रजब अल-मुरजब के मौके पर हज़रत अली (अ) की पॉलिटिकल ज़िंदगी के कुछ शानदार पहलुओं को पेश करना है।

इंसाफ़ और निष्पक्षता में, वह "इंसानी इंसाफ़ की आवाज़" हैं, ज्ञान और समझ में, "मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली दरवाज़ा हैं, मैं समझदारी का घर हूँ और अली दरवाज़ा हैं"।

वह अपनी सहनशीलता में बेमिसाल थे। खिलाफ़त का उनका हक़ छीन लिए जाने और उनके पवित्र स्थान को आग लगा दिए जाने के बावजूद, उन्होंने पच्चीस साल तक एक कोने में रहना चुना और कभी अपना सब्र नहीं छोड़ा। यह व्यवहार पॉलिटिकल सहनशीलता का एक बड़ा उदाहरण है।

अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर वे बेमिसाल थे। जब उनके पास खाना लाया जाता, तो वे कहते, "मैं जी भरकर कैसे खा सकता हूँ? शायद हिजाज़ और यमामा में कोई एक निवाले के लिए तरस रहा हो।"

गरीबी हटाने की अपनी कोशिशों में, वे हर रात अपनी पीठ पर खाना लादकर गरीबों, ज़रूरतमंदों और विधवाओं के घरों तक पहुँचाते थे। पैगंबरी हदीस के मुताबिक, "अली लोगों के सबसे अच्छे जज हैं।"

हज़रत अली (अ) की भरोसेमंदी के बारे में इतना कहना ही काफी है कि रात में वे दीया जलाकर सरकारी काम निपटाते थे, जब कोई उनसे मिलने आता, तो वे उस दीये को जलाकर अपना दीया जला लेते थे।

वे अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर इतने जागरूक थे कि वे कूफ़ा की सड़कों पर गुमनाम घूमते रहते थे, ताकि वहाँ के गरीबों, ज़रूरतमंदों और विधवाओं की मदद हो सके। सरकारी कामों में उनकी महारत ऐसी थी कि जब मिस्र के हालात खराब हुए, तो उन्होंने हज़रत मलिक अश्तर को वहाँ का गवर्नर बना दिया। उन्हें एक चिट्ठी दी गई जो बाद में मलिक अश्तर के वसीयतनामे के नाम से मशहूर हुई। इस चिट्ठी का एक वाक्य है: अपने दिल में लोगों के लिए प्यार बढ़ाओ क्योंकि वे या तो तुम्हारे धार्मिक भाई हैं या तुम इंसान हो।

वह अपनी सादी ज़िंदगी के लिए जाने जाते थे क्योंकि वह पुराने, साफ़, पैबंद लगे कपड़े पहनते थे। किसी ने कहा, "हे मालिक, अगर आप नए कपड़े पहनेंगे, तो यह आपकी पर्सनैलिटी पर जंचेगा।" उन्होंने कहा: "यह कपड़ा दिल को नरम करता है, घमंड से बचाता है, और नेक लोगों के लिए काफ़ी है।"

हालांकि वह सबसे समझदार और बुद्धिमान थे, फिर भी वह अक्सर सरकारी मामलों में लोगों से सलाह लेते थे। एक बार, सरकारी काम के लिए एक खास पद के लिए लोगों को चुनने से पहले, उन्होंने कुछ अनुभवी लोगों को बुलाया और वहां के लोगों की भरोसे की काबिलियत और सरकारी मामलों में उनके काम के बारे में पूछा। उनकी राय लेने के बाद, उन्होंने कहा: "जो कोई भी बिना किसी सलाह के कोई ज़िम्मेदारी लेता है, वह खुद को बर्बादी के कगार पर ले आता है।"

बराबरी के इस जानकार का अंदाज़ा यह था कि एक बार वह मस्जिद से बाहर निकले और उन्होंने एक बूढ़े भिखारी को लोगों से कुछ भीख मांगते देखा। लोगों ने नफ़रत भरे लहज़े में कहा, “मालिक! यह आदमी ईसाई है।” इमाम (अ.स.) उनकी बातों से बहुत नाराज़ हुए और बोले, “जब वह जवान था, तो तुमने उसकी ताकत का इस्तेमाल किया। जब वह कमज़ोर हो गया, तो तुमने उसे छोड़ दिया।” यह कहकर उन्होंने हुक्म दिया कि उसका खर्च खजाने से दिया जाए।

इसलिए, हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) की शख़्सियत सिर्फ़ एक धार्मिक या ऐतिहासिक शख़्सियत नहीं है, बल्कि वह इंसानी इतिहास में समझदारी वाली सियासत का एक अनोखा उदाहरण हैं। उनकी सियासत सत्ता हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि सच, इंसाफ़, नैतिकता और इंसानियत को कायम करने के लिए थी। हज़रत अली (अ) की सियासत का मुख्य आधार उसूल था, फ़ायदेमंदी नहीं। उनका मानना ​​था कि सियासत अगर उसूलों से खाली हो, तो धोखा बन जाती है। उन्होंने कभी फ़ायदेमंदी के लिए सच को कुर्बान नहीं किया। यही वजह है कि उन्होंने मुआविया जैसी चालाकी भरी सियासत का सहारा नहीं लिया क्योंकि वह जानते थे कि इस तरह की सियासत कुछ समय के लिए कामयाब हो सकती है। उनका मशहूर कथन है: अगर धार्मिक उसूल रुकावट न होते, तो मैं सबसे बड़ा पॉलिटिशियन होता। यह वाक्य हज़रत अली (अ) की समझदारी भरी पॉलिटिक्स का साफ़ सबूत है। हज़रत अली (अ) के लिए सरकार कोई लूट का माल नहीं, कोई निजी हक़ नहीं, कोई खानदानी विरासत नहीं, बल्कि एक खुदा की अमानत है। इसीलिए, खिलाफत कबूल करते हुए उन्होंने कहा: अगर सच की स्थापना और झूठ का खात्मा मुझ पर ज़रूरी न होता, तो मैं सरकार कबूल नहीं करता। यह सोच मॉडर्न पॉलिटिकल फिलॉसफी में पब्लिक ट्रस्ट थ्योरी के हिसाब से लगती है। हज़रत अली (अ) की पॉलिटिक्स का सेंटर पूरा इंसाफ़ था। ऐसा इंसाफ़ जिसमें खलीफ़ा और आम नागरिक बराबर हों, मुसलमान और गैर-मुसलमान कानून के सामने बराबर हों, अमीर और गरीब में कोई फ़र्क न हो। यही वजह है कि उनकी खिलाफत के दौरान, एक यहूदी का कवच पहने हुए केस काज़ी शूरा के पास पहुँचा। गवाहों की कमी के कारण जज नेफैसला यहूदी के पक्ष में था, लेकिन अली (अ) ने इस फैसले पर कोई आपत्ति नहीं की। इससे प्रभावित होकर यहूदी ने उनकी खिलाफत को ईश्वरीय खिलाफत घोषित कर दिया और उनके कवच उन्हें वापस कर दिए। यह रवैया उन्हें कानून के शासन का संस्थापक साबित करता है। हज़रत अली (अ) ने तलवार या सेना से नहीं, बल्कि नैतिक अधिकार से शक्ति प्राप्त की। उनके अनुसार, उत्पीड़न अस्थायी रूप से शक्तिशाली होता है, लेकिन न्याय में स्थायी शक्ति होती है। इसीलिए वह कहते थे: सरकार अविश्वास के साथ रह सकती है, लेकिन उत्पीड़न के साथ नहीं। यह वाक्य राजनीतिक ज्ञान की उत्कृष्ट कृति है। हज़रत अली (अ.) की राजनीतिक ईमानदारी का सबसे बड़ा उदाहरण हज़रत अकील (अ) की घटना है। अपने भाई होने के बावजूद, उन्होंने बैतुल माल से अधिक देने से इनकार कर दिया। उन्होंने उन्हें जलती हुई छड़ पकड़ने का आदेश दिया। यह घटना साबित करती है कि रिश्ते कानून से ऊपर नहीं हैं, राजनीति में भाई-भतीजावाद के लिए कोई जगह नहीं है हज़रत अली (अ) अमीरों की पॉलिटिक्स के सख्त खिलाफ थे। उनकी पॉलिटिक्स लोगों की भलाई वाली, गरीबों की हिमायती और कमज़ोर तबके की हिफ़ाज़त करने वाली थी। वह खुद रात में अनाज उठाकर अनाथों और विधवाओं के घर पहुंचाते थे। यह सिर्फ़ हमदर्दी नहीं थी, बल्कि सोशल जस्टिस पॉलिसी थी। हज़रत अली का मलिक अश्तर को लिखा खत दुनिया का एक बड़ा पॉलिटिकल और एडमिनिस्ट्रेटिव मैनिफेस्टो है। इसमें ह्यूमन राइट्स, गवर्नेंस, ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी, मिलिट्री एथिक्स, पब्लिक वेलफेयर जैसी हर चीज़ शामिल है। आज भी यूनाइटेड नेशंस और मॉडर्न पॉलिटिकल थिंकर्स इसे आइडियल गवर्नेंस चार्टर मानते हैं। हज़रत अली ने जंग भी उसूलों के हिसाब से लड़ीं। उन्होंने अकेले जंग शुरू नहीं कीं। उन्होंने घायलों पर हमला नहीं किया। उन्होंने भाग रहे लोगों का पीछा नहीं किया। उन्होंने औरतों और बच्चों को नुकसान नहीं पहुंचाया। इसीलिए उनकी पॉलिटिक्स को एथिकल पॉलिटिक्स कहा जाता है। मस्जिद में हज़रत अली की शहादत इस बात का सबूत है कि सच्ची पॉलिटिक्स अक्सर ज़ुल्म में खत्म होती है, लेकिन इतिहास में हमेशा ज़िंदा रहती है। इसीलिए गैर-मुस्लिम विचारक जॉर्ज जर्दाक ने कहा: “क़तल अली लशदत अदला” (इंसाफ़ के लिए अली को मारना) उनके ज़बरदस्त इंसाफ़ की वजह से मारा गया। इसलिए, हज़रत अली (अ) सिर्फ़ एक पॉलिटिशियन ही नहीं, बल्कि पॉलिटिक्स के टीचर भी हैं। उनकी पॉलिटिक्स हमें सिखाती है कि पावर कोई गोल नहीं, बल्कि एक ज़रिया है। उसूल कामयाबी से ज़्यादा कीमती होते हैं। इंसाफ़ पॉलिटिक्स की रूह है। अगर आज की दुनिया हज़रत अली (अ) की पॉलिटिक्स से बस कुछ उसूल अपना ले, तो ज़ुल्म खत्म हो सकता है, इंसाफ़ और इंसाफ़ कायम हो सकता है, और इंसानियत बच सकती है।

लेखक: एस एम शाह

हज़रत अमीरूल मोमेनीन अली बिन अबी तालिब (अ) का जन्म रजब महीने के मुबारक दिनों में मुस्लिम उम्माह के लिए एक बड़ा और मतलब वाला मौका है। यह दिन न सिर्फ़ मानने वालों के लिए खुशी का पैगाम है, बल्कि दुनिया के सभी दबे-कुचले, आज़ाद और इंसाफ़ चाहने वाले लोगों के लिए उम्मीद और रोशनी की निशानी भी है।

हज़रत अमीरूल मोमेनीन अली बिन अबी तालिब (अ) की जयंती रजब महीने के मुबारक दिनों में मुस्लिम उम्माह के लिए एक बड़ा और मतलब वाला मौका है। यह दिन न सिर्फ़ मानने वालों के लिए खुशी का पैगाम है, बल्कि दुनिया के सभी दबे-कुचले, आज़ाद और इंसाफ़ चाहने वाले लोगों के लिए उम्मीद और रोशनी की निशानी भी है।

हज़रत अली (अ) की शख़्सियत इंसानियत की तारीख़ में इतनी शान से खड़ी है कि सभी इस्लामी फिरके उनकी महानता पर राज़ी हैं, और यहाँ तक कि गैर-मुस्लिम सोच वाले भी उनके इंसाफ़ और किरदार को मानते हैं।

हज़रत अमीरूल मोमेनीन (अ) की सबसे बड़ी खासियत उनका पवित्र ईमान है, जो बचपन से लेकर आख़िरी साँस तक पवित्र पैगंबर (स) की पूरी इताअत में ज़ाहिर हुआ। उनकी पूरी ज़िंदगी जिहाद, कुर्बानी, सब्र और इस्लाम की हिफ़ाज़त में गुज़री। वह एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने कभी सच से मुँह नहीं मोड़ा और न ही दुनियावी फ़ायदों को उसूलों से ज़्यादा अहमियत दी।

यह एक पक्की बात है कि हज़रत अली (अ) की महानता किसी एक फिरके तक सीमित नहीं है। वह सभी मुसलमानों की साझी दौलत हैं। इसीलिए आज के ज़माने में, जब मुस्लिम उम्मत मतभेदों और बँटवारे से जूझ रही है, हज़रत अली (अ) की शख़्सियत उम्मत के लिए एकता का एक मज़बूत सेंटर बन सकती है। इस्लाम के दुश्मन अलग-अलग चालों से मुसलमानों में नफ़रत और फूट डालना चाहते हैं, लेकिन अली (अ) वो आम बात हैं जिस पर हर कोई अपना सिर झुका सकता है।

अली (अ) के लिए प्यार एक बड़ी नेमत है, लेकिन सिर्फ़ प्यार काफ़ी नहीं है। सच्चे प्यार के लिए आज्ञाकारिता और साथ देना ज़रूरी है। शिया होने का मतलब है कि इंसान हज़रत अली (अ) के मकसद, रास्ते और उसूलों पर चले, हालाँकि उनके लेवल तक पहुँचना मुमकिन नहीं है, लेकिन इस तरफ़ सफ़र ज़रूरी है।

हज़रत अली (अ) की ज़िंदगी की सबसे शानदार बात इंसाफ़ और इंसाफ़ है। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी नाइंसाफ़ी से समझौता नहीं किया। वे कहते हैं कि अगर मुझे काँटों पर चलाया जाए या ज़ंजीरों से बाँधा जाए, तो भी यह मेरे लिए एक भी इंसान पर ज़ुल्म करके अल्लाह से मिलने से ज़्यादा प्यारा होगा। उनकी नज़र में दुनिया की सारी ऐशो-आराम बेकार थी। उन्होंने दुनिया को संबोधित करते हुए कहा: “किसी और को धोखा दो, लेकिन तुम अली को धोखा नहीं दे सकते।”

आज के इस्लामी समाज में सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी इंसाफ़ की स्थापना है। इंसाफ़ किसी खास देश या तबके की नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत की कुदरती चाहत है। सच्चा इंसाफ़ सिर्फ़ वही कर सकता है जिसका दिल दुनिया की मोहब्बत से आज़ाद हो, जिसे अल्लाह पर पूरा भरोसा हो और जिसमें हिम्मत हो।

इंसाफ़ के इस रास्ते पर चलने के लिए रूहानी ताकत बहुत ज़रूरी है। इसीलिए रजब, शाबान और रमज़ान के महीनों को इबादत, दुआ, तौबा और अल्लाह से नज़दीकी का महीना बताया गया है। हज़रत अली (अ) जैसे बहादुर इंसान, जो जंग के मैदान में अल्लाह के शेर थे, उन्हें इबादत के मेहराब में अल्लाह के सामने रोते और तड़पते हुए देखा गया। इससे हमें यह सीख मिलती है कि ताकत की असली बुनियाद अल्लाह के साथ मज़बूत रिश्ता है।

हज़रत अली (अ) का पैगाम आज भी ज़िंदा है: अल्लाह के साथ मज़बूत रिश्ता, इंसाफ़ पर कायम रहना और आपस में एकता ही इज़्ज़त और कामयाबी के रास्ते हैं।

लेखक: मौलाना सैयद मुहम्मद अली नक़वी

अली मेरे इमाम हैं और मैं अली का ग़ुलाम हूँ यह सिर्फ़ शब्दो का संग्रह नहीं है, न ही किसी आरज़ी जज़्बे की बाज़गश्त, बल्कि यह एक ज़िंदा फ़िक्री अहद है, जो इंसान के बातिन में जन्म लेता है और आहिस्ता-आहिस्ता उसके अक़ीदे, अमल और पूरी ज़िंदगी की सिम्त तय कर देता है।

अली इमाम मेरा हैं और मैं अली का ग़ुलाम हूँ यह सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का मजमूआ नहीं है, न ही किसी आरज़ी जज़्बे की बाज़गश्त, बल्कि यह एक ज़िंदा फ़िक्री अहद है, जो इंसान के बातिन में जन्म लेता है और आहिस्ता-आहिस्ता उसके अक़ीदे, अमल और पूरी ज़िंदगी की सिम्त तय कर देता है।

यह ऐसा जुमला है जो ज़बान से अदा होने से पहले दिल में उतरता है, और जब दिल में जगह बना लेता है, तो ज़िंदगी के हर मोड़ पर अपना मफ़हूम ख़ुद बयान करता है।

यह कह देने की बात नहीं, बल्कि जीने की हक़ीक़त है ऐसी हक़ीक़त जो इंसान के सोचने के अंदाज़, चलने के रास्ते और हक़ व बातिल के दरमियान उसके इंतिख़ाब को वाज़ेह कर देती है।

अली इमाम-ए-मेरा हैं” कहना दरअसल इस हक़ीक़त को क़बूल करना है कि हिदायत सिर्फ़ किताबों के औराक़ तक महदूद नहीं, बल्कि एक ज़िंदा, चलता-फिरता, साँस लेता नमूना-ए-अमल भी है; और “मैं अली का ग़ुलाम हूँ” कहना उसी हिदायत के सामने अपने नफ़्स को झुका देने, अपनी अना को तोड़ देने और हक़ के हाथ में हाथ दे देने का नाम है।

अली की इमामत का तसव्वुर किसी तख़्त-ओ-ताज, किसी सियासी इक्तिदार या किसी वक़्ती ग़लबे से कहीं बुलंद है।

यह इमामत इल्म की है जो जहालत के अंधेरों को चीर देती है; यह इमामत अद्ल की है जो ताक़त के ग़ुरूर को लरज़ा देती है; यह इमामत तक़वा की है जो दिलों को ज़िंदा करती है और यह इमामत इंसानियत की है जो इंसान को इंसान बनाती है।

अली वह चिराग़ हैं जिनकी रौशनी में अक़्ल को सिम्त मिलती है और ज़मीर को क़रार। वह मेहराब-ए-इबादत में आँसुओं की ख़ामोश ज़बान भी हैं और मैदान-ए-अमल में हक़ की ललकार भी।

उनकी ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि दीन सिर्फ़ मस्जिद की चारदीवारी तक महदूद नहीं; वह बाज़ार में भी ज़िंदा है, अदालत में भी बोलता है और घर की दहलीज़ पर भी साँस लेता है।

ग़ुलामी-ए-अली का मफ़हूम अक्सर सतही तौर पर समझ लिया जाता है, हालाँकि यह ग़ुलामी किसी इंसान की नहीं, बल्कि उन अक़दार की है जिनकी कामिल तजस्सुम अली की ज़ात में हुई। ग़ुलामी-ए-अली का मतलब है ज़ुल्म के सामने डट जाना, कमज़ोर के लिए ढाल बन जाना, और ताक़त को अमानत समझ कर इस्तेमाल करना।

यह ग़ुलामी इंसान को पस्त नहीं करती, बल्कि उसे ख़ुद्दार बनाती है; यह इंसान को ग़ुलाम नहीं बनाती, बल्कि उसे ख़ुदा के हुज़ूर जवाबदेह और बंदों का ख़ादिम बनाती है।

अली का इल्म एक ऐसा समंदर है जिसमें उतरने वाला कभी तिश्ना वापस नहीं आता। उनका हर क़ौल हिकमत का चिराग़ है और उनका हर अमल हक़ की तफ़्सीर।

वह सवाल करने वालों के लिए मुअल्लिम हैं और अमल की राह पर चलने वालों के लिए रहबर। उनकी अदालत में दोस्त-दुश्मन के नाम मिट जाते हैं और मीज़ान-ए-हक़ सिर्फ़ हक़ को तोलती है। इसी लिए अली की इमामत किसी एक गिरोह, किसी एक नस्ल या किसी एक ज़माने तक महदूद नहीं; वह हर उस दिल के इमाम हैं जो सच की तलाश में बेचैन है और अद्ल की ख़ुशबू पहचानता है।

जब हम कहते हैं अली इमाम-ए-मेरा हैं” तो दरअसल हम अपने लिए एक मयार तय करते हैं:
इल्म में दियानत,इबादत में ख़ुलूस,इक्तिदार में इंसाफ़,और मुआशरत में रहमत।

और जब कहते हैं मैं अली का ग़ुलाम हूँ तो हम अपनी अना, अपनी ख़्वाहिश और अपनी ख़ुदसाख़्ता बढ़ाई अली के दर पर रख देते हैं, ताकि हमें इंसान बनने का सलीक़ा आ जाए, हक़ पर क़ायम रहने का हौसला मिले और बातिल से टकराने की ताक़त पैदा हो।

यही अली की इमामत का कमाल है कि वह इंसान को बुलंद भी करती है और झुकना भी सिखाती है; वह बोलना भी सिखाती है और वक़्त पर ख़ामोश रहना भी। अली के दर का ग़ुलाम होना दरअसल ख़ुदा के दर का बाअज़्म मुसाफ़िर होना है ऐसा मुसाफ़िर जो रास्ते की ठोकरों से नहीं घबराता, क्योंकि उसके सामने एक रौशन चिराग़ है।

आख़िर में बस इतना कहना काफ़ी है कि अगर ज़िंदगी में कोई एक सिम्त चुननी हो तो वह अली की सिम्त हो; और अगर कोई एक पहचान हो तो वह यही हो—ऐसी पहचान जिस पर फ़ख़्र भी हो और जवाबदेही का एहसास भी:अली इमाम-ए-मेरा हैं और मैं पूरे शऊर, पूरे यक़ीन और पूरे फ़ख़्र के साथ कहता हूँ,

मैं अली का ग़ुलाम हूँ।

आयतुल्लाह अली रज़ा आराफ़ी ने ईरानी ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन के हेड के साथ एक मीटिंग के दौरान रजब महीने के आध्यात्मिक महत्व पर ज़ोर दिया और धार्मिक ज्ञान के असरदार प्रसार के लिए मदरसों और मीडिया के बीच आपसी सहयोग को समय की एक अहम ज़रूरत बताया।

क़ोम अल-मकदिसा/होली सी के मदरसे के डायरेक्टर आयतुल्लाह अली रज़ा आराफ़ी ने कहा है कि रजब का महीना बहुत ही मुबारक और आध्यात्मिक महीना है जो इंसान को शाबान और रमज़ान के महीनों की तैयारी कराता है, और अगर इस महीने की आध्यात्मिक खासियतों को सही भाषा में और असरदार तरीके से पेश किया जाए, तो इसका समाज, खासकर युवा पीढ़ी पर गहरा असर पड़ सकता है।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने यह बात ईरानी ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन के हेड डॉ. जबाली के साथ एक मीटिंग के दौरान कही। उन्होंने रजब के महीने को इबादत, हज और खुद को बेहतर बनाने का महीना बताया और कहा कि इस महीने में इंसान के दिल और दिमाग को खुदा के करीब लाने और रूहानी तैयारी पैदा करने की ताकत होती है।

इस्लामी इतिहास के अलग-अलग दौर का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हर दौर में विद्वानों और धार्मिक संस्थाओं ने सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर अहम भूमिका निभाई है, लेकिन इमाम खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामी क्रांति एक ऐतिहासिक मोड़ थी जिसने इस्लाम को दुनिया के सामने सिर्फ़ एक सोच के बजाय ज़िंदगी के एक बड़े सिस्टम के तौर पर पेश किया।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने आगे कहा कि इमाम खुमैनी ने इस्लाम की एक संतुलित और बड़ी व्याख्या पेश की जो न तो कट्टरपंथ पर आधारित थी और न ही पश्चिमी सोच में घुली हुई थी, बल्कि यह एक लगातार चलने वाली इस्लामी सोच थी, जिसने पश्चिमी सभ्यता की सोच के लिए एक बौद्धिक और सभ्यतागत चुनौती खड़ी की।

उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर गंभीर बौद्धिक, सांस्कृतिक और मीडिया चुनौतियों का दौर है, जहाँ सही और गलत में फ़र्क करना मुश्किल हो गया है और मॉडर्न टेक्नोलॉजी, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सामाजिक और बौद्धिक क्षेत्रों पर असर डाल रही है। ऐसे हालात में, धार्मिक संदेश का समझदारी और असरदार तरीके से पहुँचाना बहुत ज़रूरी हो गया है।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने धार्मिक स्कूलों और मीडिया के बीच आपसी सहयोग को आज की एक बड़ी ज़रूरत बताया और कहा कि मीडिया नई पीढ़ी तक धार्मिक ज्ञान पहुँचाने का एक असरदार ज़रिया है, बशर्ते ज्ञान को आज के ज़माने की भाषा में और आज की ज़रूरतों के हिसाब से पेश किया जाए।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि धार्मिक संस्थाओं की सभी गतिविधियों का मीडिया से जुड़ा नज़रिया होना चाहिए ताकि इस्लामी ज्ञान, बौद्धिक संदेश और सामाजिक मूल्यों को लोगों तक असरदार तरीके से पहुँचाया जा सके।

आखिर में, आयतुल्लाह आराफ़ी ने कहा कि प्लानिंग, मैनपावर की ट्रेनिंग और मीडिया के साथ लगातार सहयोग से, धार्मिक ज्ञान को दुनिया भर में ज़्यादा असरदार और बड़े पैमाने पर पेश किया जा सकता है।

आज के ज़माने में, यह सोचना आम हो गया है कि धार्मिक शिक्षा और मॉडर्न साइंस एक-दूसरे से अलग हैं, और एक-दूसरे से टकराते भी हैं। मदरसों और यूनिवर्सिटी को अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया गया है; एक को धार्मिक और दूसरे को सेक्युलर कहा जाता है। इस बँटवारे ने इस्लामी सोच में एक बनावटी दोहरापन पैदा कर दिया है, जिसके नतीजे में धार्मिक वर्ग मॉडर्न साइंस से दूर होता जा रहा है और मॉडर्न पढ़ा-लिखा वर्ग धार्मिक चेतना से दूर होता जा रहा है।

आज के ज़माने में, यह सोचना आम हो गया है कि धार्मिक शिक्षा और मॉडर्न (मॉडर्न) साइंस एक-दूसरे से अलग हैं, और एक-दूसरे से टकराते भी हैं। मदरसों और यूनिवर्सिटी को अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया गया है; एक को धार्मिक और दूसरे को सेक्युलर कहा जाता है। इस बँटवारे ने इस्लामी सोच में एक बनावटी दोहरापन पैदा कर दिया है, जिसके नतीजे में धार्मिक वर्ग मॉडर्न साइंस से तेज़ी से दूर होता जा रहा है और मॉडर्न पढ़ा-लिखा वर्ग धार्मिक चेतना से तेज़ी से दूर होता जा रहा है।

लेकिन इस्लामी सोच, खासकर हज़रत अमीरूल मोमेनीन अली (अ) की शिक्षाएँ, इस बँटवारे को पूरी तरह से खारिज करती हैं। इस्लाम में ज्ञान को धार्मिक और दुनियावी कैटेगरी में नहीं, बल्कि काम का और बेकार कैटेगरी के आधार पर बांटा गया है। जो ज्ञान इंसान और समाज के लिए काम का है, वह धार्मिक है, चाहे वह मदरसे में पढ़ाया जाए या यूनिवर्सिटी में। इस नियम के तहत, साइंस, मेडिसिन, इंजीनियरिंग, इकोनॉमिक्स और लॉ सभी धार्मिक साइंस के दायरे में आते हैं, क्योंकि उनका मकसद इंसान की भलाई और सामाजिक न्याय है।

हज़रत अली (अ) कहते हैं: “हर इंसान की कीमत वही है जो वह अच्छा करता है।” (नहज अल-बलागा, हिकमत 81) यह बात इस सोच को पूरी तरह से खत्म कर देती है कि सिर्फ कानून या इबादत की ही धार्मिक कीमत होती है। हज़रत अली (अ) के मुताबिक, किसी इंसान की धार्मिक कीमत उसकी पढ़ाई और प्रैक्टिकल काबिलियत से तय होती है जिससे वह समाज की सेवा करता है, चाहे वह डॉक्टर हो, इंजीनियर हो, जज हो या टीचर हो।

पवित्र कुरान स्पष्ट रूप से ज्ञान की एकता बताता है: "क्या वे लोग जो जानते हैं वे उन लोगों के बराबर हैं जो नहीं जानते" (सूरह अज़-ज़ुमर, आयत 9)।

कुरान ज्ञान को न्यायशास्त्र या इबादत तक सीमित नहीं करता है, बल्कि ब्रह्मांड, इतिहास, प्रकृति और स्वयं मनुष्य को भी ज्ञान के क्षेत्र के रूप में मानता है। इस प्रकार, ज्ञान की इस्लामी अवधारणा ज्ञान एक सार्वभौमिक अवधारणा है जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों आयामों को जोड़ती है।

हज़रत अली का कहना: "ज्ञान शक्ति है" (ग़ेरर उल हिकम) यह स्पष्ट करता है कि ज्ञान केवल एक धार्मिक गुण नहीं है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक शक्ति का स्रोत भी है। एक राष्ट्र जो ज्ञान में आगे है, वह इतिहास, अर्थव्यवस्था और राजनीति में भी अग्रणी है।

हज़रत अमीरूल मोमेनीन अली (अ) के आदेशों के प्रकाश में, समकालीन विज्ञान वे सभी क्षेत्र हैं जो मानव जीवन को बेहतर बनाते हैं अरिथमेटिक, मैथेमेटिक्स और स्टैटिस्टिक्स के रूप में साइंस, इकॉनमी और टेक्नोलॉजी को ऑर्गनाइज़ करता है; और एस्ट्रोनॉमी आज एस्ट्रोनॉमी और स्पेस साइंस के ज़रिए यूनिवर्स के नियमों को समझने का एक ज़रिया है।

इसी तरह, मॉडर्न मेडिसिन, मेडिकल साइंस के तौर पर इंसानी शरीर और इलाज से जुड़ी है, पॉलिटिकल साइंस, पॉलिटिकल साइंस और गवर्नेंस के ज़रिए राज्य और न्याय को ऑर्गनाइज़ करता है, इकोनॉमिक्स, दौलत के प्रोडक्शन और सही बंटवारे के सिद्धांत बताता है, अर्बन प्लानिंग, अर्बन प्लानिंग के रूप में इंसानी आबादी को ऑर्गनाइज़ करता है, और मॉडर्न ज्यूरिस्प्रूडेंस, कानून और ज्यूडिशियरी के ज़रिए न्याय स्थापित करता है। इन सभी साइंस को इस्लामिक सभ्यता में फायदेमंद साइंस कहा जाता था, यानी वे साइंस जो भगवान की बनाई दुनिया के लिए फायदे का ज़रिया बनती हैं, इसलिए वे असली धार्मिक साइंस हैं।

हज़रत अली (अ) ने इन साइंस को न सिर्फ़ थ्योरी के लेवल पर बल्कि प्रैक्टिस में भी धार्मिक फ़र्ज़ बनाया। उन्होंने दुनिया के बारे में सोचने को पूजा माना और नहजुल-बलागा के उपदेशों में क्रिएशन, एस्ट्रोनॉमी, नेचर और इंसानी शरीर पर साइंटिफिक तरीके से बात की। इसी तरह, उन्होंने ट्रेजरी, टैक्स, मिलिट्री सैलरी और ज्यूडिशियरी को सिस्टमैटिक अकाउंटिंग प्रिंसिपल्स (नहजुल बलागा, लेटर 53) पर बनाया, जो मॉडर्न पब्लिक फाइनेंस और एडमिनिस्ट्रेटिव अकाउंटिंग के हिसाब से है।

मलिक अल-अश्तर टेस्टामेंट में हज़रत अली (अ) द्वारा दिए गए गवर्नेंस, ज्यूडिशियरी, पुलिस और पब्लिक वेलफेयर के प्रिंसिपल्स आज के पॉलिटिकल साइंस और कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ की बुनियाद के हिसाब से हैं। इकोनॉमिक्स के फील्ड में, इंटरेस्ट, होर्डिंग और क्लास एक्सप्लॉइटेशन के खिलाफ उनका स्टैंड मॉडर्न इकोनॉमिक जस्टिस और वेलफेयर इकोनॉमिक्स की एथिकल बुनियाद की एक परफेक्ट झलक है।

ज्ञान के इस अलेवी कॉन्सेप्ट के नतीजे में, इस्लामी दुनिया में बैत अल-हिक्मा, दार अल-तर्गमा, ऑब्ज़र्वेटरी और मेडिकल यूनिवर्सिटी बनीं। बैत अल-हिक्मा एक रिसर्च यूनिवर्सिटी और थिंक टैंक थी, दार अल-तर्गमा नॉलेज ट्रांसफर सेंटर, ऑब्ज़र्वेटरी, स्पेस साइंस इंस्टिट्यूट और मेडिकल यूनिवर्सिटी मॉडर्न मेडिकल यूनिवर्सिटी की पहचान थीं। ये सभी इंस्टिट्यूट इस बात का सबूत हैं कि हज़रत अली (अ) के अनुसार, ज्ञान, चाहे वह मेडिसिन हो या एस्ट्रोनॉमी, सब धर्म का हिस्सा है।

यह आर्टिकल, हज़रत अमीरूल मोमेनीन अली (अ) की शिक्षाओं की रोशनी में, इस बात को साफ़ करता है कि ज्ञान को धार्मिक और सेक्युलर कैटेगरी में बांटना इस्लामी सोच की भावना के खिलाफ है। ज्ञान के अलवी कॉन्सेप्ट में, असली क्राइटेरिया फायदा और इंसानी भलाई है, न कि भाषा, इंस्टीट्यूशन या पढ़ाने का तरीका। वह ज्ञान जो इंसान को खुदा के ज्ञान, सामाजिक न्याय, साइंटिफिक समझ और कल्चरल तरक्की की ओर ले जाता है, वही सच्चा धार्मिक ज्ञान है, चाहे वह मदरसे में पढ़ाया जाए या यूनिवर्सिटी में।

हज़रत अली (अ) की जीवनी और हुक्म यह साबित करते हैं कि मेडिसिन, मैथ, एस्ट्रोनॉमी, पॉलिटिक्स, इकोनॉमिक्स, मैनेजमेंट और गवर्नेंस सभी इबादत के दायरे में आते हैं, क्योंकि वे इंसान और समाज की सेवा करते हैं। हाउस ऑफ़ विज़डम, ट्रांसलेशन हाउस, ऑब्ज़र्वेटरीज़ और मेडिकल यूनिवर्सिटीज़ अलेवी सोच के प्रैक्टिकल रूप थे जिन्होंने इस्लामी सभ्यता को दुनिया की सबसे बड़ी साइंटिफिक सभ्यता बनाया।

इस तरह, यह आर्टिकल इस नतीजे पर पहुँचता है कि जिसे आज मॉडर्न एजुकेशन कहा जाता है, वह असल में ज्ञान के उसी अलेवी कॉन्सेप्ट का अगला हिस्सा है, सिर्फ़ भाषा और टर्मिनोलॉजी का फ़र्क है, मकसद आज भी वही है: इंसान, ज्ञान और भगवान के बीच तालमेल। मैं हज़रत अली इब्न अबी तालिब (अ) के जन्म के मौके पर सभी इस्लाम के लोगों और सच्चाई से प्यार करने वालों को बधाई देता हूँ और अल्लाह से दुआ करता हूँ: ऐ अल्लाह, हमें उन लोगों में शामिल कर जो बात सुनते हैं और उस पर सबसे अच्छे तरीके से चलते हैं। ऐ अल्लाह! हमें उन लोगों में शामिल कर जो ज्ञान को इबादत मानते हैं, तर्क को ईमान के साथ जोड़ते हैं और रिसर्च को इंसानियत की सेवा का ज़रिया बनाते हैं। ऐ रब! हमें हज़रत अमीरूल मोमेनीन अली (अ) के ज्ञान, न्याय और बुद्धि के प्रकाश के मार्ग पर चलने की क्षमता प्रदान करें ताकि हमारी शिक्षा पूजा बन जाए और हमारी पूजा सभ्यता की नींव बन जाए। आमीन, हे दुनिया के रब।

लेखक: मौलाना सय्यद रज़ी हैदर फंदेड़वी