رضوی
नोबेल शांति पुरस्कार, मक़सद से इंहेराफ़ तक
आयतुल्लाह काबी ने नोबेल शांति पुरस्कार के मक़सद से इंहेराफ़ की ओर इशारा करते हुए वैश्विक स्तर पर शहीद नसरुल्लाह एवार्ड स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है।
जामेअ मुदर्रेसीन हौज़ा ए इल्मिया क़ुम उप-प्रमुख आयतुल्लाह अब्बास काबी ने नोबेल शांति पुरुस्कार के मक़सद से इंहेराफ़ और प्रतिरोध गठबंधन के खिलाफ इस इंहेराफ़ के जवाब में, तथा "अल-अक़्सा तूफान" के दौरान अल्लाह के वादे की पूर्ति के सिलसिले में, वैश्विक स्तर पर शहीद नसरुल्लाह एवार्ड स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है।
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम
ग़ज़्ज़ा की जनता और इस्लामी फिलिस्तीनी प्रतिरोध द्वारा यहूदी राज्य पर विजय और दो साल के युद्ध अपराधों, नरसंहार और अमानवीयता के बाद आक्रमण को बंद करने के लिए मजबूर किए जाने के अवसर पर एक बड़ी सच्चाई स्पष्ट हुई है:
इस्लामी क्रांति के महान नेता के ऐतिहासिक विश्लेषण की पुष्टि हुई है। यहूदी राज्य "अल-अक़्सा तूफान" के भारी जानकारी, राजनीतिक, सैन्य, सुरक्षा और पराजय के बावजूद अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर सका। आज हमास पहले की तुलना में सुरक्षा और सैन्य दृष्टि से कहीं अधिक मजबूत, जीवित और प्रभावशाली है।
कब्जा करने वाला राज्य बेमिसाल अपराधों के बावजूद बंधकों को मुक्त नहीं करा सका और उसे मजबूरन प्रतिरोध धुरी के साथ बातचीत करनी पड़ी। ग़ज़्ज़ा जनता और जिहादी दृढ़ संकल्प के साथ पुनर्निर्माण के मार्ग पर अग्रसर होगा और यहूदी राज्य रणनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकटों से ग्रस्त है। यह एक घायल भेड़िये के समान है जो मृत्यु से डर रहा है और अपने अस्तित्व के लिए अपराध कर रहा है।
नोबेल शांति पुरुस्कार, जिसे कभी अल्फ्रेड नोबेल ने शांति के लिए प्रयासों की सराहना के लिए स्थापित किया था, अब तक 105 से अधिक पुरुस्कार दे चुका है और यह साबित कर चुका है कि यह न्याय के मार्ग से इंहेराफ वैश्विक अहंकारी व्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय ज़योनवाद के लिए प्रचार का साधन बन गया है।
यह पुरुस्कार उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने कभी मज़लूमों के खिलाफ युद्ध, कब्जा, नाकाबंदी या जबरदस्ती में सीधे भूमिका निभाई है। हेनरी किसिंजर से लेकर शिमोन पेरेस तक, बराक ओबामा से लेकर यूरोपीय संघ तक, और आंग सान सू की तक, जो म्यांमार में नस्लीय सफाई में शामिल रही, नोबेल शांति की सूची में ऐसे नाम शामिल हैं जिनमें से हर एक कम से कम एक युद्ध या कब्जे में शामिल रहा है।
हालांकि इस साल यहूदी राज्य के अपराधों का समर्थक और साथी ट्रम्प नोबेल पुरस्कार से वंचित रहा, लेकिन यह पुरुस्कार उन लोगों को दिया गया जो कब्जा और राष्ट्रों के उखाड़ फेंकने को औचित्य प्रदान करते हैं। इस साल मारिया कोरिना मचादो, एक ज़योनवाद-समर्थक वेनेजुएला की राजनेत्री, जो अपनी कानूनी सरकार की विरोधी है, ने जीत हासिल की है। यह चयन शांति की सराहना नहीं, बल्कि राज्य के उखाड़ फेंकने की योजना, राष्ट्रों की अपमान और कब्जे को औचित्य देने की घोषणा थी।
इस स्पष्ट इंहेराफ के जवाब में, वैश्विक स्तर पर शहीद नसरुल्लाह अवार्ड स्थापित करने का प्रस्ताव रखा जाता है। यह पुरस्कार उन लोगों के लिए होगा:
- वे मुजाहिद जो युद्ध के मैदान में अत्याचारियों को पीछे धकेलते हैं।
- मीडिया के वे कर्मचारी जो मलबे के नीचे से सच्चाई बयान करते हैं।
- वे माताएं जो अपने शहीद बच्चों को गर्व के साथ विदा करती हैं।
- वे युवा जो विश्वविद्यालयों, सड़कों और वैश्विक नेटवर्क पर सिद्दीक़-ए-शुहदा (अलैहिस्सलाम) के झंडे को ऊंचा रखते हैं।
- वे बुद्धिजीवी जो कलम के जरिए प्रतिरोध की कहानी को वैश्विक बनाते हैं।
- और वैश्विक धैर्य के कारवां के वे सक्रिय सदस्य जो विभिन्न मोर्चों पर सांस्कृतिक और मीडिया जिहाद को आगे बढ़ाते हैं।
वैश्विक शहीद नसरुल्लाह अवार्ड केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, मीडिया और ईमानी जिहाद के मार्ग में एक आंदोलन है।
अब सवाल यह है कि यह पुरस्कार किसे दिया जाएगा?
यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाएगा जो वैश्विक तानाशाही धुरी के विरोध में, सांस्कृतिक जिहाद के माध्यम से हर पहलू से मज़लूमों और वंचितों की मानवीय सहायता करते हैं।
इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता के नोबेल पुरस्कार के बारे में फ़रमान के अनुसार:
(म्यांमार): इस (बर्मी) सरकार की प्रमुख भी एक महिला (आंग सान सू की) है जिसने (शांति) का नोबेल (पुरस्कार) लिया है। उन्होंने इस पुरस्कार के साथ ही गोया (शांति के) नोबेल पुरस्कार और नोबेल की फातेहा पढ़ दी है। इतने निर्दयी इंसान को शांति का नोबेल पुरस्कार देना! महिला होकर और इतनी निर्दयी! इंसान वाकई उस स्थिति पर हैरान होता है जिसमें दुनिया की मानवता आज डूबी हुई है। 12/09/2017 ई
وَفَضَّلَ اللَّهُ الْمُجَاهِدِینَ عَلَی الْقَاعِدِینَ أَجْرًا عَظِیمًا (۹۵) دَرَجَاتٍ مِنْهُ وَمَغْفِرَةً وَرَحْمَةً وَکَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِیمًا
(النساء: ۹۶)
وَالْحَافِظُونَ لِحُدُودِ اللَّهِ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِینَ
(التوبة: ۱۱۲)
अब्बास काबी
10 अक्टूबर 2025 ईस्वी
प्रतिरोध के हथियार; वार्ता मे अस्वीकार्य है : हमास आंदोलन
फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध आंदोलन हमास के बीच हाल ही में हुए समझौते के मसौदे में ट्रम्प की योजना में शामिल कुछ बिंदुओं का उल्लेख नहीं है, जिसमें हमास का निरस्त्रीकरण और गाजा पर शासन करने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प की अध्यक्षता में एक अंतरिम अंतर्राष्ट्रीय प्रशासन की स्थापना शामिल है।।
फिलिस्तीनी प्रतिरोध आंदोलन हमास के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि निरस्त्रीकरण का अनुरोध, जो ग़ज़ज़ा में युद्ध समाप्त करने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की योजना में शामिल है, पर वार्ता में चर्चा नहीं की गई।
उन्होंने अपनी पहचान प्रकट न करते हुए समाचार एजेंसी "एएफपी" को बताया कि हथियारों के हस्तांतरण के मुद्दे पर बातचीत अस्वीकार्य है।
यह ध्यान देने योग्य है कि ये बयान ग़ज़्ज़ा में जारी दो साल के युद्ध को समाप्त करने के लिए इजरायल और इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हमास के बीच हुई युद्ध विराम वार्ता के दूसरे दिन सामने आए हैं।
यह याद रखना चाहिए कि इजरायल और हमास ने पिछले गुरुवार को मिस्र के शर्म अल-शेख में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे; जिसने ग़ज़्ज़ा पट्टी पर जारी दो साल के युद्ध को समाप्त करने का रास्ता प्रशस्त किया।
इस समझौते में युद्ध विराम और इजरायली कैदियों के बदले फिलिस्तीनी कैदियों की रिहाई शामिल है; हालांकि समझौते के मसौदे में ट्रम्प की योजना में शामिल कुछ बिंदुओं का कोई उल्लेख नहीं है, जिनमें हमास को निरस्त्र करना और ग़ज़्ज़ा पर शासन के लिए डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में एक अंतरिम अंतर्राष्ट्रीय प्रशासन की स्थापना शामिल थी।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने पहले ही कहा था कि शांति योजना के दूसरे चरण में, हमास के हथियारों के हस्तांतरण के मुद्दे पर विचार किया जाएगा, लेकिन हमास ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि प्रतिरोध के हथियारों का मुद्दा बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं है और जब तक इजरायल का कब्जा बना रहेगा वे अपने हथियार जमीन पर नहीं रखेंगे।
रहमतुल आलामीन (स) के खिलाफ गुस्ताखी बर्दाश्त से बाहर है
हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स) की महान शान में गुस्ताखी करने वाले गोशल महल के एमएलए और बीजेपी नेता टी. राजा सिंह की तेलंगाना सरकार से तुरंत और सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन डॉ. सैयद निसार हुसैन हैदर आगा ने इसकी कड़ी निंदा की है।
कुल हिंद मुस्लिम उलेमा और ज़ाकेरीन हैदराबाद के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन डॉ. सैयद निसार हुसैन हैदर आगा ने गोशल महल के एमएलए और बीजेपी नेता टी. राजा सिंह की ओर से हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स) की महान शान में की गई गुस्ताखी की कड़ी निंदा करते हुए तेलंगाना सरकार से मांग की है कि उनके खिलाफ तुरंत और सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
बयान में कहा गया है कि टी. राजा सिंह के इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ नफरत भरे भाषण और उकसाऊ बयान कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने रसूल-ए-रहमत (स) के खिलाफ ऐसे अनुचित और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है जिससे सभी मुसलमानों और न्यायप्रिय लोगों के दिलों को गहरा झटका लगा है।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन डॉ. सैयद निसार हुसैन हैदर आगा ने कहा कि सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों के खिलाफ मिसाल कायम करे ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस महान व्यक्तित्व की महान शान में गुस्ताखी करने की हिम्मत न करे और तेलंगाना में शांति व सौहार्द्र का माहौल बना रहे।
अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला मुस्लिम उम्मा को एकता और जागरूकता दे और रसूल (स) के गुस्ताखों के बुराई से उन्हें सुरक्षित रखे।
हिजाब औरत के लिए प्रतिबंध नहीं, बल्कि खुदा का हक़ है
कुछ लोगों का यह ख्याल है कि हिजाब औरत के लिए एक क़ैद और कमजोरी का प्रतीक है, जबकि कुरान के नजरिए से हिजाब न तो महिला का व्यक्तिगत अधिकार है, न पुरुष या परिवार से जुड़ा कोई मामला। बल्कि हिजाब एक "इलाही हक़" है, जिसका पालन करना महिला की इज्जत और सम्मान की रक्षा तथा खुदा के हुक्म की इताअत का प्रतीक है।
आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमोली ने अपनी एक रचना मे "हिजाब: एक इलाही हक़" शीर्षक के तहत एक महत्वपूर्ण बिंदु प्रस्तुत किया है, जिसका सारांश निम्नलिखित है:
शुबाह
कुछ लोगों का मानना है कि हिजाब महिला के लिए एक क़ैद है, एक ऐसी दीवार जो परिवार या पति ने उस पर थोप दी है, इसलिए वे इसे महिला की कमजोरी और सीमितता का प्रतीक मानते हैं।
जवाब
कुरान पाक के नजरिए से यह सोच पूरी तरह गलत है।
महिला को यह सच्चाई समझनी चाहिए कि:
उसका हिजाब केवल व्यक्तिगत इच्छा का मामला नहीं है कि वह कहे: "मैं अपने अधिकार से दस्तबरदार होती हूँ।"
यह पुरुष का अधिकार भी नहीं है कि वह अनुमति दे या सहमत हो जाए।
यह परिवार का अधिकार भी नहीं है कि वह सामूहिक रूप से फैसला करे।
बल्कि, हिजाब एक "इलाही हक़" है। यह खुदा का आदेश और उसकी अमानत (जिम्मेदारी) है, जिसका पालन सभी पर वाजिब (अनिवार्य) है।
स्रोत: किताब "ज़न दर आइने जलाल व जमाल", पेज 437, आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमोली
इस्लामी देश होशियार रहे,इजरायली हुकूमत दोबारा गज़्ज़ा पर हमला न करें
जामिया मुदर्रेसीन हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के प्रमुख आयतुल्लाह सैयद हाशिम हुसैनी बुशहरी ने जुमआ की नमाज़ के खुत्बे में इस्लामी देशों को आगाह करते हुए कहा है कि सियोनिस्ट सरकार पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता, वह युद्धविराम के नाम पर भी गज़्ज़ा और फिलिस्तीन पर हमले जारी रखेगा। हमास के फैसले पूरी तरह से स्वतंत्र हैं और उम्मत ए इस्लामिया का समर्थन का हक़दार हैं।
जामिया मुदर्रेसीन हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के प्रमुख आयतुल्लाह सैयद हाशिम हुसैनी बुशहरी ने अपने जुमआ के ख़ुतबे में कहा कि फिलिस्तीनी मुजाहिदीन के फ़ैसले स्वतंत्र हैं और इस्लामी दुनिया को उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भले ही हमास और सायोनी हुकूमत के बीच युद्धविराम की बातें हो रही हैं, लेकिन अब भी रोज़ाना ग़ाज़ा और फ़िलिस्तीन में निर्दोष लोग शहीद हो रहे हैं। उन्होंने इस्लामी मुल्कों से अपील की कि वे ऐसे किसी भी समझौते के बाद इज़राइल को फिर से ग़ाज़ा पर हमला करने की इजाज़त न दें।
आयतुल्लाह हुसैनी बुशहरी ने गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल और यूरोपीय यूनियन के हाल के बयानों को दुखद बताया और कहा कि उन्होंने ईरान के खिलाफ रुख अपनाकर दुश्मन के मोर्चे को मजबूत किया है।
उन्होंने कहा,इस्लामी मुल्कों को समझना चाहिए कि अगर वे ईरान के साथ हैं, तो ईरान की रक्षा शक्ति उनके सुरक्षा का जरिया बनेगी नुकसान का नहीं।
उन्होंने कहा कि कुछ मुल्कों ने तेल की दौलत से अपने देशों को हथियारखाना तो बना लिया है, लेकिन उनके पास उन हथियारों के इस्तेमाल की इजाज़त तक नहीं है।
क़ुम के इमाम जुमआ ने अपने ख़ुतबे के एक हिस्से में उम्मत-ए-मुस्लिमा के इत्तेहाद पर जोर देते हुए कहा कि क़ुरआन मजीद के मुताबिक़, इत्तेफ़ाक़ न होना और दिलों की बीमारियाँ नज़रअंदाज़ी की सबसे बड़ी बाधा हैं।
उन्होंने कहा,ये वही लोग हैं जो कभी ग़ाज़ा के लिए नौका भेजते हैं और कभी इज़राइल को ईंधन मुहैया कराते हैं। ऐसे दोहरे रवैये उम्मत की ताक़त को खत्म कर देते हैं।
उन्होंने युवाओं, माता-पिता और शिक्षकों से अपील की कि वे नमाज़, ईमान और नैतिक शिक्षा को समाज में फैलाएं ताकि दुश्मन के सांस्कृतिक हमलों का मुकाबला किया जा सके।
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में बौद्धिक व नैतिक नेतृत्व हौज़ा ए इल्मिया के हाथों में होना चाहिए
क़ुम मुक़द्देसा में डिजिटल युग के इस्लामी व मानवीय उलूम पर आयोजित पहली राष्ट्रीय कांफ्रेंस में धार्मिक व बौद्धिक हस्तियों ने इस बात पर जोर दिया कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंसस (Artificial Intelligence) के बढ़ते प्रभाव के सामने बौद्धिक व नैतिक नेतृत्व केवल हौज़ा ए इल्मिया व इस्लामी केंद्र ही निभा सकते हैं। मुक़र्रेरीन ने कहा कि मानवीय रचनात्मकता व इज्तेहादी दूरदृष्टि का कोई कृत्रिम विकल्प संभव नहीं है।
क़ुम मुक़द्देसा में डिजिटल युग के इस्लामी व मानवीय उलूम पर आयोजित पहली राष्ट्रीय कांफ्रेंस में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मुर्तज़ा जवादी आमोली, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन अहमद वाएज़ी और हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन बहरामी ने बौद्धिक केंद्रों की ज़िम्मेदारियों व चुनौतियों पर प्रकाश डाला।
बैतुल-इसरा अंतर्राष्ट्रीय फाउंडेशन के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मुर्तज़ा जवादी आमोली ने अपने भाषण में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्रांति को इतिहास की औद्योगिक व संचार क्रांतियों से कहीं अधिक व्यापक बताते हुए कहा कि यह बदलाव शिक्षा, संस्कृति, ज्ञान व उद्योग की मूल संरचना को प्रभावित कर रहा है। उनके अनुसार, इस तेज गति वाले बदलाव के दौर में हौज़ा ए इल्मिया की ज़िम्मेदारी है कि वह इस्लामी विचार को बनाए रखे और जिहाद जैसी पवित्र अवधारणाओं को विकृति से बचाते हुए उनकी मानवीय व नैतिक आयाम को दुनिया के सामने प्रस्तुत करे।
उन्होंने कहा कि इस्लामी बौद्धिक केंद्रों को वैश्विक स्तर पर विचार व ज्ञान की नई दिशा निर्धारित करने की आवश्यकता है ताकि इस्लामी फ़लसफ़ा व शऊर अपनी वास्तविक क्षमता के साथ दुनिया में उभर सके।
मरकज़े तहक़ीक़ात कंप्यूटरी उलूम इस्लामी (नूर) के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन बहरामी ने इस अवसर पर कहा कि ईरान के शैक्षणिक संस्थानों को "सृजनशील" बनना चाहिए। उनके अनुसार, पश्चिमी दुनिया ने डिजिटल ह्यूमैनिटीज के क्षेत्र में विभिन्न केंद्रों के माध्यम से मजबूत बुनियादी ढांचा बना लिया है, इसलिए हौज़ा व विश्वविद्यालय को भी अपनी इस्लामी संरचना तैयार करनी चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि नूर जल्द ही "आर्टिफ़िशियाल इंटेलीजेंस" के लिए एक अकादमी की स्थापना पर काम शुरू करेगा ताकि आने वाली पीढ़ी के छात्र आधुनिक तकनीक से सीधे परिचित हो सकें।
इस्लामी प्रचार विभाग के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन अहमद वाएज़ी ने अपने भाषण में कहा कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हालांकि जानकारी व विश्लेषण के स्तर पर इंसान की मदद कर सकता है, लेकिन जिन विज्ञानों की नींव मानवीय रचनात्मकता, चिंतन व इज्तेहाद पर है, वहाँ यह कभी भी इंसान की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक व मानवीय विज्ञान के "क्रांतिकारी" पहलू, जैसे नैतिकता, फ़िक़्ह व फ़लसफ़ा, मानवीय चेतना व अंतरात्मा से जुड़े हैं जिन्हें कोई मशीन नकल नहीं कर सकती।
अहले बैत (अ) की सीरत पर अमल करने वाला इंसान जाहिरी व बातिनी लिहाज से खूबसूरत होता है
मरकज़ी जामिया मस्जिद स्कर्दू बल्तिस्तान में आयोजित होने वाली नैतिकता की लगातार पढ़ाई की महफिल में अंजुमन-ए-इमामिया बल्तिस्तान के उपाध्यक्ष ने कहा कि क़ुरआन-ए-क़रीम हमें बार-बार सुनने, समझने और फिर सुनकर अच्छी बातों पर अमल करने की ताकीद करता है; सिर्फ सुन लेना ही काफी नहीं होता, बल्कि अमल ही मोमिन की असल पहचान है।
मरकज़ी जामिया मस्जिद स्कर्दू बल्तिस्तान में आयोजित होने वाली नैतिकता की लगातार पढ़ाई की इस हफ्ते की महफिल में अंजुमन-ए-इमामिया बल्तिस्तान के उपाध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम शैख ज़ाहिद हुसैन ज़ाहिदी ने कहा कि क़ुरआन-ए-क़रीम हमें बार-बार सुनने, समझने और फिर सुनकर अच्छी बातों पर अमल करने की ताकीद करता है; सिर्फ सुन लेना ही काफी नहीं होता, बल्कि अमल ही मोमिन की असल पहचान है।
उन्होंने आगे कहा कि इंसान के आसपास हर पल अलग-अलग आवाजें गूंजती हैं। बाजार, गली-कूचों या सफर के दौरान कभी गानों की आवाजें सुनाई देती हैं, कभी बेकार बातें; लेकिन मोमिन की शान यह है कि वह इन बातिल आवाजों से दिल व दिमाग को सुरक्षित रखता है। मोमिन की नजर अगर अचानक नामहरम पर पड़ जाए तो वह तुरंत नजर फेर लेता है, अपने कानों को हराम से बचाता है, अपनी आँखों को नापाक नजारों से सुरक्षित रखता है।
उन्होंने कहा कि हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ) फरमाते हैं: मोमिन इंफ़ाक़ करने वाला होता है, भले ही खुद के पास कुछ न हो, लेकिन वह दूसरों की जरूरत का ख्याल रखता है। यही इंफ़ाक़ होने की निशानी है। अल्लाह ने जिस चीज से रोका है उससे रुक जाना और जिस काम का हुक्म दिया है उसे अंजाम देना; यही असली इताअत है। मोमिन हराम से बचता है, फराइज को अंजाम देता है और अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) के क़दमों पर चलने को अपना गौरव समझता है।
उन्होंने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम (स) और अइम्मा-ए-मअसूमीन (अ) हमारे लिए पूर्ण नमूना-ए-अमल हैं, उनकी सीरत और क़िरदार ही वह आईना हैं जिसमें हम अपनी ज़िंदगी का प्रतिबिंब देख सकते हैं।
शैख ज़ाहिद हुसैन ज़ाहिदी ने यह कहते हुए कि इंसान की पहचान दो पहलुओं से होती है, कहा कि पहली पहचान जाहिरी है; उसकी शक्ल-सूरत, बोलने का अंदाज, शारीरिक बनावट और व्यक्तित्व के जाहिरी पहलू, ये सब अल्लाह की दी हुई नेमतें हैं, इंसान का व्यक्तिगत कमाल नहीं। खालिक-ए-काइनात ने क़ुरआन में फरमाया: "लक़द ख़लक़नल इंसान फ़ी अहसने तक़वीम" (सूरह तीन, आयत 4) "बेशक हमने इंसान को सबसे अच्छी सूरत में पैदा किया।"
और एक अन्य जगह फरमाया: "व नफ़ख़तु फीहे मिन रूही" (सूरह साद, आयत 72) "मैंने उसमें अपनी रूह से फूंक दी।" यह दर्शाता है कि इंसान की खलकत में अल्लाह ने अपनी क़ुदरत और करम का प्रतिबिम्ब रखा है।
उन्होंने इंसान की दूसरी पहचान को इंसान की सीरत और क़िरदार बताया और कहा कि इंसान की सीरत व क़िरदार वास्तव में इंसान की असल पहचान है। अल्लाह के नजदीक शक्ल-सूरत की उतनी अहमियत नहीं जितनी अख़लाक, तक़वा और क़िरदार की है। जैसा कि क़ुरआन में फरमाया गया: "इन्ना अक्रमकुम इंदल्लाह अतक़ाकुम" (सूरह हुजरात, आयत 13) "बेशक तुममें सबसे ज्यादा इज्जत वाला वह है जो सबसे ज्यादा परहेजगार है।"
उन्होंने आगे कहा कि हम सब पर अल्लाह का यह एहसान है कि हमारे दिल मुहम्मद व आले मुहम्मद (अ) के प्यार से मुनव्वर हैं। यही प्यार हमें क़िरदार, सहनशीलता, सब्र और इत्तिफाक का सबक देता है। जब हम अपनी ज़िंदगी को अहले- बैत (अ) की सीरत के आईने में देखते हैं तो हमें अपनी कमियाँ और कमजोरियाँ साफ नजर आती हैं; यह प्यार सिर्फ जज़्बात नहीं, बल्कि अमली तरबियत का जरिया है।
शैख ज़ाहिद हुसैन ज़ाहिदी ने कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ) की तालीमात हमें सिखाती हैं कि: मोमिन अपनी ख्वाहिशात पर काबू पाता है, दूसरों के लिए इत्तिफाक करता है और अपने क़िरदार से दीन का प्रतिनिधि बनता है। जो शख्स सीरत-ए-अहले-बैत (अ) को अपना आईना बनाएगा उसका जाहिर भी खूबसूरत होगा और बातिन भी खूबसूरत होगा और ऐसा इंसान अल्लाह के नजदीक महबूब और बंदों के लिए रहमत का कारण बनता है।
इमाम ऐ ज़माना (अ.स) के ज़हूर ना होने की एक वजह ये भी है
इमाम ऐ ज़माना (अ.स) के ज़हूर की दुआ बिना तैयारी के कोई मायने नहीं रखती और तैयारी ऐसी हो की हमारा मकसद समाज में अच्छाइयों को बढ़ाना और बुराइयों से लोगों को रोकना होना चाहिए और इन सबका मकसद अल्लाह के दीं की हिफाज़त करना और उसे बढ़ाना हो |
इमाम सादिक़ अ. के ज़माने के बादशाहों के विरुद्ध होने वाले अक्सर आंदोलनों में इमाम सादिक़ अ. की मर्ज़ी शामिल नहीं थी। और आप अहलेबैत अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं को प्रचलित करने को प्राथमिकता देते थे। इसलिए चूँकि वह लोग जो बनी हाशिम को आंदोलन के लिए उकसाते थे और उनकी मदद का वादा करते थे सबके सब या उनमें से अधिकतर समय के हाकिमों की हुकूमत को पसन्द नहीं करते थे या हुकूमत को अपने हाथ में लेना चाहते थे और हरगिज़ बिदअत को मिटाना और अल्लाह के दीन को प्रचलित करना या पैग़म्बरे इस्लाम के अहलेबैत की सहायता उनका उद्देश्य नहीं था।
लेकिन कभी कभी सच्चाई यहाँ तक कि इमाम के ख़ास शियों के लिए भी संदिग्ध हो जाती थी और इमाम सादिक़ अ. से आंदोलन में शामिल होने की अपील करने लगते थे|
कुलैनी र.अ. ने सुदैरे सहरफ़ी के हवाले से लिखा है: मैं इमाम सादिक़ अ. के पास गया और उनसे कहा ख़ुदा की क़सम जाएज़ नहीं है कि आप आंदोलन न करें! क्यों? इसलिए कि आपके दोस्त शिया और मददगार बहुत ज़्यादा हैं। अल्लाह की क़सम अगर अली अ. के शियों और दोस्तों की संख्या इतनी ज़्यादा होती तो कभी भी उनके हक़ को न छीना जाता। इमाम अ. ने पूछा सुदैर उनकी संख्या कितनी है? सुदैर ने जवाब दिया एक लाख। इमाम ने फ़रमाया एक लाख? सुदैर ने कहा जी बल्कि दो लाख। इमाम ने आश्चर्य से पूछा दो लाख? सुदैर ने कहा जी दो लाख बल्कि आधी दुनिया आपके साथ है।
इमाम ख़ामोश हो गए सुदैर कहते हैं कि इमाम उठ खड़े हुए मैं भी उनके साथ चल पड़ा रास्ते में बकरी के एक झुँड के बग़ल से गुज़र हुआ इमाम सादिक़ अ. ने फ़रमाया :-
ऐ सुदैर अल्लाह की क़सम अगर इन बकरियों भर भी हमारे शिया होते तो आंदोलन न करना मेरे लिए जाएज़ नहीं था फिर हमने वहीं पर नमाज़ पढ़ी और नमाज़ के बाद हमने बकरियों को गिना तो उनकी संख्या 17 से ज़्यादा नहीं थी। (यानी सच्चे शियों और इमाम सादिक़ अ. के जमाने के हबीब इब्ने मज़ाहिर जैसे दोस्तों की संख्या 17 भी नहीं थी।) अल -काफ़ी जिल्द 2 पेज 243
इसलिए अम्र बिल मारूफ व नहया अनिल मुनकर करते रहे और इमाम ऐ ज़माना (अ.स) के ज़हूर की दुआ करें दिल से | इंशाल्लाह जल्द से जल्द ज़हूर होगा और हमारी परेशानियां ख़त्म होंगी |
ज़बान से ही जन्नत और जहन्नम है
इमाम अली (अ.स.)
जो शख्स भी कोई चीज़ अपने दिल मे छुपाने की कोशिश करता है तो उसके दिल की बात उसकी जबानी ग़लतीयो और चेहरे से मालूम हो जाती है।
(नहजुल बलाग़ा, हदीस न. 25)
رسول اكرم صلى الله عليه و آله
مَنْ كانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَ الْيَوْمِ الْآخِرِ فَلْيَقُلْ خَيْراً أَوْ لِيَسْكُتْ.
- रसूले अकरम (स.अ)
जो कोई भी खुदा और आखेरत पर ईमान रखता हो उसे चाहिये कि सिर्फ अच्छी बात बोले या खामोश रहे।
(उसूले काफी, जिल्द 2 पेज न. 667)
امام باقر عليه السلام
إِنَّ هذَا اللِّسانَ مِفتاحُ كُلِّ خَيرٍ و شَرٍّ فَيَنبَغى لِلمُؤمِنِ أَن يَختِمَ عَلى لِسانِهِ كَما يَختِمُ عَلى ذَهَبِهِ وَ فِضَّتِهِ
- इमाम बाक़िर (अ.स)
बेशक जबान हर अच्छाई और बुराई की चाबी है पस मोमीन के लिऐ ज़रूरी है कि अपनी जबान की निगरानी करे जैसे अपने सोने और चांदी की निगरानी करता है।
(तोहफुल उक़ूल, पेज न. 298)
امام سجاد عليه السلام
حَقُّ اللِّسَانِ إِكْرَامُهُ عَنِ الْخَنَى وَ تَعْوِيدُهُ الْخَيْرَ وَ تَرْكُ الْفُضُولِ الَّتِي لَا فَائِدَةَ
- इमाम सज्जाद (अ.स)
जबान का हक ये है कि इसे बुरी बातो के कहने से दूर रखो और इसे अच्छी बातो की आदत डालो और उन बातो क छोड़ दो कि जिन का कोई फायदा नही है।
(मकारिमुल अखलाक़, पेज न. 419)
امام على عليه السلام
اَللِّسانُ سَبُعٌ إِن خُلِّىَ عَنهُ عَقَرَ.
- इमाम अली (अ.स)
ज़बान एक दरिन्दा है, ज़रा आजाद कर दिया जाए को काट खाएगा।
(नहजुल बलाग़ा, हदीस न. 59)
امام على عليه السلام
اِحبِس لِسانَكَ قَبلَ أَن يُطيلَ حَبسَكَ وَ يُردىَ نَفسَكَ فَلا شَىءَ أَولى بِطولِ سَجنٍ مِن لِسانٍ يَعدِلُ عَنِ الصَّوابِ و يَتَسَرَّعُ إِلَى الجَوابِ.
- इमाम अली (अ.स)
अपनी जबान को कैद कर दो इस से पहले की ये तुम्हे एक लम्बी क़ैद मे डाल दे क्योकि कोई चीज़ भी उस जबान से ज़्यादा कैद होने की हकदार नही है कि जो सही रास्ते को छोड़ दे और हमेशा जवाब देने को बेताब रहती है।
(गुरारुल हिकम, पेज न. 214, हदीस न. 4180)
رسول اكرم صلى الله عليه و آله
يُعَذِّبُ اللَّهُ اللِّسَانَ بِعَذَابٍ لَا يُعَذِّبُ بِهِ شَيْئاً مِنَ الْجَوَارِحِ فَيَقُولُ أَيْ رَبِّ عَذَّبْتَنِي بِعَذَابٍ لَمْ تُعَذِّبْ بِهِ شَيْئاً فَيُقَالُ لَهُ خَرَجَتْ مِنْكَ كَلِمَةٌ فَبَلَغَتْ مَشَارِقَ الْأَرْضِ وَ مَغَارِبَهَا فَسُفِكَ بِهَا الدَّمُ الْحَرَامُ وَ انْتُهِبَ بِهَا الْمَالُ الْحَرَامُ وَ انْتُهِكَ بِهَا الْفَرْجُ الْحَرَامُ
- रसूले अकरम (स.अ)
खुदा वंदे आलम जबान पर ऐसा अज़ाब नाज़िल करेगा कि जो बदन के किसी दूसरे हिस्से पर नाज़िल नही किया होगा तो जबान परवरदिगार से शिकवा करेगी कि बारे इलाहा। तूने (क्यो) मुझ पर ऐसा अज़ाब नाज़िल किया जो जो बदन के किसी दूसरे हिस्से पर नाज़िल नही किया तो अल्लाह उसे जवाब देगा कि तुझसे ऐसी बाते निकली है कि जो पूरब से पश्चिम तक फैल गई और उनकी वजह से (बहुत से) खूने नाहक़ बहे और बहुत से माल नाहक़ गारत हुऐ।
(उसूले काफी, जिल्द 2, पेज न.115, हदीस न. 16)
پيامبر صلى الله عليه و آله
إِنَّ لِسَانَ الْمُؤْمِنِ وَرَاءَ قَلْبِهِ فَإِذَا أَرَادَ أَنْ يَتَكَلَّمَ بِشَيْءٍ يُدَبِّرُهُ بِقَلْبِهِ ثُمَّ أَمْضَاهُ بِلِسَانِهِ وَ إِنَّ لِسَانَ الْمُنَافِقِ أَمَامَ قَلْبِهِ فَإِذَا هَمَّ بِالشَّيْءِ أَمْضَاهُ بِلِسَانِهِ وَ لَمْ يَتَدَبَّرْهُ بِقَلْبِه
- रसूले अकरम (स.अ)
मोमीन की जबान उसके दिल के पीछे है वो पहले सोचता है फिर बोलता है लेकिन मुनाफिक की जबान उसके दिल के आगे है जब भी बोलना चाहता है बोल देता है उसके बारे मे सोचता नही है।
(तंबीहुल खवातिर, जिल्द न. 1, पेज न. 106)
امام على علیه السلام
وَرَعُ الْمُنَافِقِ لَا يَظْهَرُ إِلَّا عَلَى لِسَانِه
- इमाम अली (अ.स)
मुनाफिक़ की परहेज़गारी सिर्फ उसकी ज़बान से जाहिर होती है।
(गुरारुल हिकम, पेज न. 459, हदीस न. 10509)
امام على علیه السلام
عِلمُ المُنافِقِ في لِسانِهِ وَ عِلمُ المُؤمِنِ في عَمَلِهِ
- इमाम अली (अ.स)
मुनाफिक़ का इल्म उसकी ज़बान पर और मोमीन का इल्म उसके किरदार मे दिखाई देता है।
امام على عليه السلام
عَوِّدْ لِسَانَكَ لِينَ الْكَلَامِ وَ بَذْلَ السَّلَامِ يَكْثُرْ مُحِبُّوكَ وَ يَقِلَّ مُبْغِضُوك
- इमाम अली (अ.स)
अपनी ज़बान को मीठी बातो और सलाम करने की आदत डालो ताकि तुम्हारे दोस्त ज़्यादा और दुश्मन कम हो।
(गुरारुल हिकम, पेज न. 435, हदीस न. 9946)
پيامبر صلی الله علیه و آله
مَن دَفَعَ غَضَبَهُ دَفَعَ اللّهُ عَنهُ عَذابَهُ وَ مَن حَفِظَ لِسانَهُ سَتَرَ اللّهُ عَورَتَهُ
- रसूले अकरम (स.अ)
जो अपने गुस्से को कंट्रोल कर लेता है खुदा उससे अजाब को हटा लेता है और जो अपनी ज़बान को कंट्रोल कर लेता है खुदा उसके ऐबो को छुपा लेता है।
(नहजुल फसाहा, पेज न. 767, हदीस न. 3004)
امام باقر عليه السلام
لا یَسلَمُ أحَدٌ مِنَ الذُّنوبِ حَتَّی یَخزُنَ لِسانَهُ
- इमाम बाक़िर (अ.स)
जब तक इंसान अपनी ज़बान पर कंट्रोल नही कर लेता, गुनाहो से नही बच सकता।
(तोहफुल उक़ूल, पेज न. 298)
امام صادق عليه السلام
إِنَّ أَبْغَضَ خَلْقِ اللَّهِ عَبْدٌ اتَّقَى النَّاسُ لِسَانَه
- इमाम सादिक़ (अ.स)
बेशक खुदा वंदे आलम उस बंदे से सबसे ज़्यादा नफरत करता है जिसके ज़बान के शर से लोग उससे बचते हो।
(उसूले काफी, जिल्द 2, पेज न. 323)
امام علی عليه السلام
لا تَقُل ما لا تُحِبُّ أن يُقالَ لَكَ
- इमाम अली (अ.स)
किसी को ऐसी बात मत कहो कि जो तुम अपने बारे मे सुनना नही चाहते।
(तोहफुल उक़ूल, पेज न. 74)
गज़्ज़ा में युद्धविराम; ईरान का शुक्रिया अदा करते हैं।हमास
हमास के वरिष्ठ नेता ने गाज़ा युद्धविराम पर सहमति के बाद ईरान समर्थक देशों का आभार जताया
हमास और इजरायली सरकार के बीच गाज़ा पट्टी में युद्धविराम पर सहमति बनने के बाद हमास ने ईरान सहित सभी समर्थक देशों का आभार जताया है।
हमास के वरिष्ठ वार्ताकार खालिद मिशअल ने कहा कि गाज़ा के लोगों ने "अद्वितीय साहस" का प्रदर्शन किया और संघर्ष विराम के लिए उनकी ओर से पूर्ण प्रयास किए गए।
समझौते के तहत मानवीय सहायता की आपूर्ति राफाह चौकी को पुनः खोलने और कैदियों के आदान-प्रदान पर सहमति बनी है। इसके तहत 1700 फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा किया जाएगा, जिनमें 250 उम्रकैद कैदी शामिल हैं।
अमेरिका और मध्यस्थ देशों ने युद्ध की समाप्ति की पूर्ण गारंटी दी है। संघर्ष विराम की घोषणा "ऑपरेशन अलअक्सा तूफान" की पहली वर्षगांठ के अवसर पर की गई है।













