رضوی
साइंस की निगाह में रोज़े रखने के जिस्मानी फायदे
आज हम लोग रमज़ान के मुबारक महीने मे एक दीनी कर्तव्य समझ कर रोज़े रखते हैं जो सही भी है लेकिन दीनी कर्तव्य और सवाब के अलावा भी रोज़े के बहुत से फ़ायदे हैं जिनमे से कुछ फ़ायदे हमारी सेहत व स्वास्थ से सम्बन्धित हैं।
आज हम लोग रमज़ान के मुबारक महीने मे एक दीनी कर्तव्य समझ कर रोज़े रखते हैं जो सही भी है लेकिन दीनी कर्तव्य और सवाब के अलावा भी रोज़े के बहुत से फ़ायदे हैं जिनमे से कुछ फ़ायदे हमारी सेहत व स्वास्थ से सम्बन्धित हैं, लेकिन हम में से बहुत से लोग यह नही जानते कि रोज़ा हमारी सेहत के लिए कितना ज़रूरी है।
अगर रोज़ा सही तरीक़े से रखा जाए और सेहत के नियमों का पालन किया जाए तो यह हमारे लिए आख़ेरत के साथ ही दुनिया मे भी बहुत फ़ायदा पहुंचा सकता है। रोज़ा हमारे जिस्म से ज़हरीली और हानिकारक चीज़ों और टाक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करता है, ब्लड सुगर को कम करता है, यह हमारी खाने पीने की आदतों मे सुधार करता है और हमारी इम्यूनिटी को बढ़ाता है तथा हमारे जिस्म की बीमारियों से लड़ने की ताक़त मे बढ़ोत्तरी करता है।
हम अपने खाने पीने के दौरान बहुत से ज़हरीले पदार्थ या टाक्सिन्स लेते हैं, जैसे डिब्बा बन्द खाने पीने की चीज़ें, जिनको सड़ने या ख़राब होने से बचाने के लिए ऐसी चीज़ें मिलाई जाती हैं जो ज़हरीली होती हैं इसके अलावा आजकल अनाज,फल व सब्ज़ियां उगाने मे ज़हरीली दवाओं का इस्तेमाल होता है, साथ ही हमारे जिस्म मे मेटाबोलिज़्म के दौरान बहुत से ज़हरीले पदार्थ या टाक्सिन्स निकलते हैं, जिनका बड़ा हिस्सा पेशाब,पाख़ाना और पसीने द्वारा हमारे जिस्म के बाहर निकाल दिया जाता है,
फिर भी इन टाक्सिन्स की बड़ी मात्रा हमारे जिस्म के अन्दर ही रह जाती है जो हमारे जिस्म में मौजूद चर्बी या फ़ैट के अन्दर इकट्ठा होती रहती है। जब हम रोज़ा रखते हैं (ख़ासतौर से लम्बे समय तक, जैसे-रमज़ान के मुबारक महीने मे एक महीने तक लगातार) तो हमारे जिस्म मे जमी हुइ चर्बी या फ़ैट गलने लगता है और ज़हरीले पदार्थ या टाक्सिन्स बाहर निकलने लगते हैं जो जिगर व किडनी की मदद से जिस्म के बाहर निकाल दिये जाते हैं इस प्रॉसेस को डिटाक्सीफ़िकेशन कहते हैं। (यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम रोज़े के दौरान फ़ैट वाली व तली हुइ चीज़ों से परहेज़ करें तभी रोज़ा रखने का पूरा फ़ायदा उठा सकेंगे और अपने जिस्म को सेहतमन्द रख सकेंगे)।
रोज़े का सकारात्मक असर हमारे हाज़्मे या डाइजेशन पर भी पड़ता है, रोज़े के दौरान हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम को आराम करने का मौक़ा मिल जाता है, रोज़े के दौरान डाइजेस्टिव एन्ज़ाइम्स का बनना या निकलना बन्द नही होता बल्कि धीमा हो जाता है जिससे हमारी बाडी के लिक्विड्स के बैलेंस मे मदद मिलती है, साथ ही हमारा डाइजेस्टिव सिस्टम धीरे-धीरे काम करता रहता है,
इस लिए इफ़्तार या सहरी मे लिया गया फ़ूड लगातार छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटता रहता है और डाइजेस्टिव इन्ज़ाइम्स की मदद से डाइजेस्ट होता रहता है जिसके नतीजे मे हमे एनर्जी मिलती है और हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम को खाना डाइजेस्ट करने के लिए दिन भर का समय मिल जाता है जिससे उस पर अधिक बोझ नही पड़ता और हमारा हाज़्मा दुरूस्त रहता है। क्योंकि रोज़े मे एसिड्स का बनना पूरी तरह बन्द नही होता इस लिए जिन लोगों को एसिडिटी की बीमारी हो या पेट मे अल्सर हों उन्हें डाक्टर की सलाह से रोज़ा रखना चाहिए।
नई खोजों से पता चला है कि रोज़ा इन्फ़्लामेशन या सूजन वाली बीमारियों में फ़ायदेमन्द है और कुछ स्टडीज़ बताती हैं कि यह एलर्जी को ठीक करने मे भी मददगार है। जिन बीमारियों मे रोज़े से फ़ायदा होने का पता चला है उनमे रुयूमैटायड अर्थरायटिस (जोड़ों की सूजन), सोरिएसिस (चमड़ी की बीमारी), कोलाईटिस (आन्तों की सूजन), और आन्तों के अल्सर आदि की बीमारियां शामिल हैं।
रोज़े का रोल सुगर की बीमारी या डायबिटीज़ मे भी काफ़ी इम्पार्टेंट पाया गया है। रोज़ा हमारे जिस्म मे इकट्ठा ग्लूकोज़ को छोटे-छोटे टुकड़ों मे तोड़ देता है जो एनर्जी मे बदल जाता है नतीजे मे हमारी बॉडी का सुगर लेवेल कम हो जाता है और डायबिटीज़ के मरीज़ को राहत देता है, साथ ही पैंक्रियाज़ को भी आराम मिल जाता है।
रोज़े के नतीजे मे हमारे जिस्म मे इकट्ठा फ़ैट टुकड़ों मे टूटकर एनर्जी मे बदल जाता है या अगर हम दूसरे शब्दों मे कहें तो हमारे जिस्म की चर्बी गल जाती है इस प्रकार मोटे लोगों को और उन लोगों को कि जिनका पेट निकल आया है स्लिम करने मे रोज़ा मदद करता है।
रोज़ा रखना ब्लड प्रेशर के मरीज़ों को भी फ़ायदा पहुंचाता है। स्टडीज़ बताती हैं कि रोज़ा दवा के बाद ब्लडप्रेशर कम करने का सबसे बड़ा साधन है। रोज़ा अथीरोस्क्लेरोसिस के ख़तरे को कम करता है ( अथीरोस्क्लेरोसिस नसों की ऐसी बीमारी है जिसमे नसों के अन्दर फ़ैट जम जाता है जिसके नतीजे मे दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा रहता है)। रोज़े मे फ़ैट टुकड़ों मे बंटकर एनर्जी मे बदल जाता है, इस प्रकार इस बीमारी से बचाव करता है।
रोज़ा हमे हेल्दी लाइफ़स्टाइल अपनाने मे मदद करता है। यह हमे अपने ऊपर कन्ट्रोल करने मे सहायक है, रोज़ा हमे दिनभर नशे व सेहत के लिए हानिकारक चीज़ों से बचाता है, ऐसा देखा गया है कि रोज़े मे नशे की तलब या तो कम हो जाती है या ख़त्म हो जाती है।
अब हमारे उपर है कि हम इस अवसर का कितना फ़ायदा उठा पाते हैं, निश्चित रूप से हमे चाहिए कि हम अपने उपर कन्ट्रोल करें और अपनी सेहत के दुश्मन न बनें और रमज़ान का मुबारक महीना गुज़रने के बाद अपनी खाने पीने या नशे की बुरी आदतों पर नियन्त्रण रखकर इन चीज़ों से दूर हो चुके हों।
एपस्टीन फाइल ने पश्चिमी सभ्यता का असली और भ्रष्ट चेहरा उजागर कर दिया
हुज्जतुल इस्लाम गफूरी ने एपस्टीन द्वीप के घोटाले का जिक्र करते हुए कहा, इस केस ने पश्चिमी सभ्यता का असली और भ्रष्ट चेहरा बेनकाब कर दिया और दिखा दिया कि जो संस्कृति मानवाधिकारों की दावेदार है, वह व्यवहार में जंगलीपन, अश्लीलता और मानवीय गरिमा, खासकर महिलाओं और बच्चों की गरिमा को रौंदने में लिप्त है।
माहान के इमाम जुमआ हुज्जतुल-इस्लाम गफूरी ने इस शहर में जुमआ की नमाज़ के खुत्बे में कुरआन के बहार (रमजान) के आगमन का जिक्र करते हुए कहा: रमजान का महीना लोगों की ओर आया है और इसके दिन और रातें सबसे श्रेष्ठ समय हैं।
उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर खुलेआम रोजा तोड़ना (रोजा ख्वारी) को खुदा के महीने का अपमान बताया और व्यापारियों से कहा कि वे पर्दे लगाकर और उचित व्यवस्था बनाकर यात्रियों और बीमार लोगों को जरूरी सेवाएं प्रदान करें। उन्होंने याद दिलाया कि शरिया में जो चीज हराम है, वह सार्वजनिक दृष्टि में रोजा तोड़ना है।
हुज्जतुल इस्लाम गफूरी ने तबरेज़ के लोगों के साथ हालिया मुलाकात में रहबरे मोअज्जम के बयानों का हवाला देते हुए कहा: रहबरे इंकिलाब का पैगाम देश में शांति, सरकार और राष्ट्र के बीच समझौता और सामाजिक स्थिरता वापस लेकर आया और दुश्मनों की गणना को बेकार कर दिया। इस्लामी ईरान इज्जत और पसंद के आधार पर बातचीत करता है और वह कभी भी यह अनुमति नहीं देगा कि धमकी और दबाव कौम की किस्मत बदल दें।
उन्होंने वार्ता की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा, अमेरिका मुश्किल से निकलने और लागत कम करने की कोशिश में है और उसके लिए ईरान के साथ समझौता सबसे कम लागत वाला रास्ता माना जाता है। इसके विपरीत, ईरान ने अपनी रक्षात्मक क्षमता और 'खुर्रमशहर' मिसाइल का अनावरण करके अपनी शक्ति का परिचय दिया है। वार्ता जारी है और प्रचलित राय समझौते तक पहुंचने की है।
माहान के इमाम जुमा ने एपस्टीन द्वीप के मामले का जिक्र करते हुए समझाया: इस घोटाले ने पश्चिमी सभ्यता का असली चेहरा उजागर कर दिया, वह सभ्यता जिसमें नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार किया जाता है, उनके शरीर के अंग काटकर बेचे जाते हैं और अंततः उन्हें मार दिया जाता है। ये व्यवहार पश्चिमी सभ्यता की जंगलीपन और अश्लीलता का प्रतीक हैं। इस संस्कृति में इंसान की कोई गरिमा नहीं है।
माहान के इमाम जुमा ने सभी मस्जिदों में कुरआन के सामूहिक पाठ (जमाअत-ख्वानी) के सत्र आयोजित करने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा: माहान की जामा मस्जिद को कुरआन के सबसे भव्य सामूहिक पाठ सत्र आयोजित करने चाहिए ताकि यह इस शहर की कुरआनी पहचान का परिचायक हो।
क़ुरआन, इंसान को सेरात ए मुस्तक़ीम और कामयाबी की तरफ़ रहनुमाई करने वाली किताब है
हौज़ा ए इल्मिया के उस्ताद ने क़ुरआन-ए-करीम की हमागीर हिदायतगिरी पर ज़ोर देते हुए कहा कि क़ुरआन तमाम इंसानों के लिए एक आसमानी दावत है और ख़ुदाए मुतआल अपने बंदों को इसी किताब-ए-इलाही के ज़रिये मुख़्तलिफ़ ज़ुल्मात से निकाल कर नूर, अम्न, सलामती और सिरात-ए-मुस्तक़ीम की तरफ़ हिदायत करता है।
हौज़ा ए इल्मिया के उस्ताद ग़ुलाम हुसैन कुमैली ने कहां, क़ुरआन की एक नुमायां ख़ुसूसियत उसकी हिदायतगिरी है, जिसका तज़किरा कई आयात में हुआ है। यह हिदायत आम और फ़रागीर है; यानी ख़ुदा तमाम बंदों से चाहता है कि वह इस आसमानी दसतरख्वान पर बैठें और इसकी बरकात से फ़ायदा उठाएँ।
उन्होंने सूरह माएदा की आयत 16 का हवाला देते हुए कहा:
«يَهْدِي بِهِ اللَّهُ مَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَهُ سُبُلَ السَّلَامِ»
अल्लाह उसी क़ुरआन के ज़रिये उन लोगों को, जो उसकी रज़ा के तालिब हैं, सलामती और अम्न के रास्तों की तरफ़ हिदायत करता है।
इसी तरह आयत «وَيُخْرِجُهُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ بِإِذْنِهِ» का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ख़ुदावंद उनको मुख़्तलिफ़ तारीकियों से निकाल कर नूर की तरफ़ ले जाता है और आख़िरकार सिरात-ए-मुस्तक़ीम तक पहुँचा देता है; वह रास्ता जिसका अंजाम जन्नत और रज़वान-ए-इलाही है।
उन्होंने सूरह इसरा की आयत 9 का भी ज़िक्र किया:
«إِنَّ هَذَا الْقُرْآنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ»
यक़ीनन यह क़ुरआन सबसे मुस्तहकम और बेहतरीन रास्ते की तरफ़ हिदायत करता है ऐसा रास्ता जो बेहतरीन मंज़िल, बेहतरीन रहबर और खुश-अंजाम नतीजे तक पहुँचाता है। और इसी आयत में अहले-ईमान व अमल-ए-सालेह करने वालों को अज्र-ए-अज़ीम की बशारत दी गई है।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन कुमैली ने माह-ए-मुबारक रमज़ान में क़ुरआन से उन्सियत की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि रमज़ान, उन्स-ए-क़ुरआन का महीना है। मोमिनीन को चाहिए कि वह महाफ़िल-ए-क़ुरआनी में शरीक हों, तिलावत करें, आयात में तदब्बुर करें और उनके तर्जुमा व मफ़ाहिम पर तवज्जोह दें।
अमेरिका की यूरेनियम संवर्धन पर दोहरी नीति
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने घोषणा की कि वाशिंगटन देश के भीतर यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम फिर से शुरू करेगा। राइट ने यह बात मंगलवार, 17 फरवरी को पेरिस में एक सम्मेलन के दौरान कही।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री ने कहा कि यह कार्यक्रम कुछ हद तक फ्रांस के भागीदारों के सहयोग से आगे बढ़ेगा। ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी परमाणु ईंधन के बाहरी आपूर्तिकर्ताओं, विशेष रूप से रूस पर निर्भरता कम करना चाह रहे हैं।
पिछले महीने, फ्रांसीसी परमाणु ईंधन कंपनी ओरानो टेनेसी राज्य में यूरेनियम संवर्धन सुविधा के निर्माण में भाग लेने के लिए अमेरिकी ऊर्जा विभाग से 900 मिलियन डॉलर का फंड प्राप्त करने में सफल रही। इस परियोजना को परमाणु ईंधन चक्र में घरेलू क्षमता को मजबूत करने के वाशिंगटन के व्यापक प्रयासों का हिस्सा बताया गया है।
अमेरिका के भीतर यूरेनियम संवर्धन की घोषणा संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति में एक स्पष्ट विरोधाभास को उजागर करती है: वाशिंगटन एक ओर ईरान द्वारा यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह और बिना शर्त बंद करने की मांग करता है, लेकिन दूसरी ओर, वाणिज्यिक और रणनीतिक उद्देश्यों के लिए अपने स्वयं के संवर्धन कार्यक्रम फिर से शुरू कर रहा है। यह दोहरा दृष्टिकोण वाशिंगटन के रुख और अमेरिकी अप्रसार नीति की राजनीतिक और कानूनी नींव के बारे में गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
वास्तव में, अमेरिकी ऊर्जा मंत्री द्वारा देश में यूरेनियम संवर्धन फिर से शुरू करने की घोषणा, जबकि वाशिंगटन ईरान में इस गतिविधि को पूरी तरह से रोकने के लिए सबसे कड़ा दबाव डाल रहा है, अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में दोहरी नीति ("एक बाम व दो हवा" यानी 'एक छत और दो हवाएं' या 'दोमुंही नीति') का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह दृष्टिकोण न केवल अमेरिका की अप्रसार प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि ईरान के साथ परमाणु वार्ता को भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम के प्रति वाशिंगटन का आधिकारिक रुख ब्रिजाम समझौते (JCPOA) की सीमाओं से परे है। जहां JCPOA ईरान को 3.67 प्रतिशत तक संवर्धन की अनुमति देता था, वहीं अमेरिका का वर्तमान प्रशासन "शून्य संवर्धन" और ईरानी धरती पर इन गतिविधियों को पूरी तरह से बंद करने की मांग कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने फरवरी 2026 में ओमान में हुई हालिया वार्ता में इस मांग को अपनी मुख्य शर्त के रूप में रखा और यहां तक सुझाव दिया कि ईरान का उच्च-संवर्धित (60 प्रतिशत) यूरेनियम भंडार किसी तीसरे देश को स्थानांतरित कर दिया जाए। वाशिंगटन इस रुख को अप्रसार संबंधी चिंताओं और ईरान को परमाणु क्षमता हासिल करने से रोकने की आवश्यकता के हवाले से सही ठहराता है।
इस मांग के स्पष्ट विरोधाभास में, अमेरिकी सरकार ने देश के भीतर यूरेनियम संवर्धन गतिविधियों को विकसित करने और फिर से शुरू करने की नीति अपनाई है। इस कदम का उद्देश्य परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए ईंधन सुरक्षित करना और रूस जैसे देशों से आयात पर निर्भरता कम करना बताया गया है। यह निर्णय दर्शाता है कि वाशिंगटन संवर्धन को अपने राष्ट्रीय हितों को पूरा करने के लिए एक वैध और आवश्यक गतिविधि मानता है, लेकिन वही अधिकार ईरान को, जो परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य है, मान्यता नहीं देता। यह दोहरी नीति अमेरिकी दृष्टिकोण के विरोधाभास का मूल है: "मेरे लिए संवर्धन, तुम्हारे लिए निषेध।" इसके विपरीत, ईरान ने कहा है कि वह संवर्धन स्तरों पर लचीलापन दिखा सकता है, लेकिन किसी भी परिस्थिति में वह यूरेनियम संवर्धन जारी रखने के अपने अधिकार का त्याग नहीं करेगा।
तेहरान इस दृष्टिकोण को अमेरिकी नीयत के पाखंड और अविश्वास का स्पष्ट संकेत मानता है। ईरानी अधिकारियों ने जोर देकर कहा है कि NPT के तहत शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए संवर्धन का अधिकार ईरान सहित सभी सदस्यों के लिए एक "अननिवार्य" अधिकार है। ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास इराक़ची ने 17 फरवरी को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के यूरोपीय मुख्यालय में निरस्त्रीकरण सम्मेलन में दिए गए भाषण में जोर देकर कहा कि शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा का उपयोग करने का ईरान का अधिकार अनिवार्य है। इराक़ची ने 8 फरवरी को भी यह इंगित करते हुए कि ईरान अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम और संवर्धन को कभी नहीं छोड़ेगा, कहा कि वार्ता की सफलता के लिए शर्त 'इस अधिकार' को स्वीकार करना है।
ऐसा प्रतीत होता है कि यूरेनियम संवर्धन पर वाशिंगटन की दोहरी नीति अमेरिकी "अधिकतम" दृष्टिकोण में निहित है, जो परमाणु मुद्दे से परे ईरान के समग्र व्यवहार में बदलाव की मांग करता है, जिसमें उसका मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय नीति शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये अधिकतम मांगें, जो ईरान के चारों ओर व्यापक सैन्य तैनाती, विशेष रूप से अब्राहम लिंकन विमान वाहक समूह की तैनाती और गेराल्ड फोर्ड विमान वाहक समूह की भेज और सैन्य कार्रवाई की धमकी के साथ हैं, मुख्य रूप से वार्ता में दबाव बनाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं और प्राप्त करने योग्य नहीं हैं।
बड़ी समस्या यह है कि वाशिंगटन इन मांगों को सौदेबाजी के शुरुआती बिंदु के रूप में नहीं, बल्कि अपने अंतिम लक्ष्य के रूप में आगे बढ़ा सकता है। इस दृष्टिकोण ने न केवल ईरान को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है, बल्कि तेहरान को "कूटनीति और मैदान" की रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है, जिसके तहत वह वार्ता के साथ-साथ अपनी रक्षा क्षमताओं को भी मजबूत कर रहा है और फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य सहित क्षेत्र में युद्धाभ्यास आयोजित करके संयुक्त राज्य के किसी भी संभावित आक्रमण का गंभीरता से मुकाबला करने का अपना दृढ़ संकल्प प्रदर्शित कर रहा है।
कुल मिलाकर, यूरेनियम संवर्धन के मामले में अमेरिका की दोहरी नीति ने अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता और प्रतिबंध हटाने को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। जब तक वाशिंगटन इस विश्वास में रहेगा कि वह एक ओर अपने लिए संवर्धन का अधिकार सुरक्षित रख सकता है और दूसरी ओर वही अधिकार ईरान को नहीं दे सकता, तब तक एक स्थायी समझौते तक पहुंचना दूर की कौड़ी होगी। यह विरोधाभास NPT संधि की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, जो सदस्य देशों के लिए संवर्धन सहित शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियों को मान्यता देती है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अविश्वास को गहरा करता है।
दंगाईयों और उनके समर्थकों को उनके किए की सजा जरूर मिलेगी
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की क़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर इस्माइल क़ाआनी ने दंगाईयों और आतंकवादी तत्वों का समर्थन करने वालों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि ऐसे लोग अपराधी हैं और उन्हें अपने अपराधों की सजा जरूर मिलेगी।
प्राप्त विवरण के अनुसार, जनवरी की घटनाओं में मारे गए लोगों के चेहलुम के अवसर पर पत्रकारों से बात करते हुए, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिन लोगों ने दंगाईयों, बदमाशों और आतंकवादियों की पीठ थपथपाई, उन्होंने वास्तव में अपराध किया है और वे अपने कार्यों के परिणामों से नहीं बच पाएंगे।
जनरल क़ाआनी ने कहा कि ईरानी राष्ट्र पहले से कहीं अधिक एकता, स्थिरता और एकजुटता का प्रदर्शन करेगा और दुश्मनों को करारा जवाब देगा। बाहरी ताकतों द्वारा समर्थित अशांति फैलाने की योजनाएँ जनता की समझदारी और राष्ट्रीय सद्भाव के सामने विफल हो जाएँगी।
इजरायली सेना द्वारा दक्षिणी सीरिया मैं बेगुनाहों की गिरफ्तारी जारी
दक्षिण-पश्चिमी सीरिया के क़ुनेइत्रा प्रांत में इजरायली सेना द्वारा नागरिकों के घरों पर छापे मारने और बे गुनाहों की गिरफ्तारी का सिलसिला जारी है
दक्षिण-पश्चिमी सीरिया के क़ुनेइत्रा प्रांत में स्थानीय सूत्रों ने बताया है कि इजरायली सेना ने इस प्रांत के दक्षिणी उपनगरों में स्थित गाँव 'ऐन अल-ज़ैवान' में प्रवेश करके इलाके में एक चेक पोस्ट स्थापित कर दी।
रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारियों ने गाँव में घुसकर सीरियाई नागरिकों के घरों पर छापे मारे और घरों की तलाशी भी ली और कई लोगों को गिरफ्तार किया।
खबरों में कहा गया है कि सीरिया में बशर अल-असद की सरकार के पतन के बाद से इजरायली सरकार ने विभिन्न बहानों के तहत इस देश पर सैकड़ों हवाई और ज़मीनी हमले किए हैं और सीरियाई नागरिकों को भी हिरासत में लिया जा रहा है।
यह बात भी उल्लेखनीय है कि नए सीरियाई नेतृत्व द्वारा अब तक इन इजरायली कार्रवाइयों के खिलाफ कोई व्यावहारिक कदम नहीं उठाया गया है।
रमज़ान अल मुबारक मोमनीन के लिए बेमिसाल बरकतों का महीना है
जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि रमज़ान का महीना क़ुरान और इलाही शिक्षाओं पर विशेष ध्यान देने की सलाह देता है, तो हमें यह एहसास होता है कि रमज़ान जीवन के मार्ग की समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन करने का एक अच्छा समय है।
जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि रमज़ान का महीना क़ुरान और इलाही शिक्षाओं पर विशेष ध्यान देने की सलाह देता है, तो हमें यह एहसास होता है कि रमज़ान जीवन के मार्ग की समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन करने का एक अच्छा समय है।
रमज़ान और रोज़े का महीना न केवल शारीरिक शुद्धता का सबब बनता है, बल्कि यह रूह की शुद्धि और संयम आदत डालने के लिए भी एक अवसर प्रदान करता है। इसलिए, यह महीना आत्मा और मन को सांसारिक अशुद्धियों से मुक्त करने और इंसान और उसके परवरदिगार के बीच के संबंध को मज़बूत करने का सबसे अच्छा अवसर माना जाता है।
इस महीने में मोमिन इबादतों पर ध्यान केंद्रित करता है और सांसारिक इच्छाओं से दूर रहकर अपने अंदर की शुद्धता और पवित्रता प्राप्त करने की कोशिश करता है। जब हम इस बात को ध्यान में रखते हैं कि यह महीना क़ुरान और इलाही शिक्षाओं पर विशेष ध्यान देने की सलाह देता है, तो हमें यह एहसास होता है कि रमज़ान जीवन के मार्ग की समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन करने का एक उपयुक्त मौक़ा है।
इस पवित्र महीने में लोग अपनी नैतिक शिक्षा पर अधिक ध्यान देते हैं और उन कार्यों से बचने की कोशिश करते हैं जो दूसरों या ख़ुद को नुक़सान पहुंचाते हैं। ज़बान और गुस्से पर नियंत्रण रखना, ग़ीबत से बचना, और अच्छे कर्मों और दूसरों की मदद करने का महत्व जैसे कार्य न केवल व्यक्ति के विकास में मददगार होते हैं, बल्कि यह एक संतुलित और नैतिक समाज के निर्माण का साधन भी बनते हैं।
इस तरह, रमज़ान समाज में सामाजिक संबंधों और मानवीय रिश्तों की बहाली के लिए एक अवसर के रूप में काम करता है और आत्मा को एकता और सकारात्मक संवाद की ओर निर्देशित करता है।
अगर हम रमज़ान की नेमत को एक और दृष्टिकोण से देखें, तो इसमें गहरा आध्यात्मिक प्रभाव है जो अल्लाह ने इस महीने को प्रदान किया है और जो लोगों के आध्यात्मिक सफ़र को आसान बनाता है। इस तरह, लोग अल्लाह की ओर अधिक ध्यान देते हैं, पापों और ग़लतियों से दूर रहते हैं, और अपने ऊपर अधिक नियंत्रण रखते हैं।
इस नज़रिए से, रमज़ान एक स्वर्णिम अवसर माना जाता है। पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम) ने फरमाया: "रमज़ान का महीना अल्लाह का महीना है और यह वह महीना है जिसमें अल्लाह नेकियों को बढ़ाता है और गुनाहों को मिटाता है। यह बरकतों का महीना है।" (बिहारुल अनवार, जिल्द 96, पृष्ठ 340, हदीस 5)
रमज़ान में नेकियों और अच्छे कर्मों का सवाब (पुण्य) कई गुना बढ़ जाता है, जिसका मतलब है कि इस महीने में किए गए हर अच्छे काम का पुण्य अन्य समय की तुलना में कहीं अधिक होता है। यह विशेषता रमज़ान को अल्लाह के करीब आने और पुण्य कमाने का एक अद्वितीय अवसर बनाती है। नमाज़, रोज़ा, क़ुरान की तिलावत, दान और दूसरों की मदद जैसे कार्य इस महीने में विशेष महत्व रखते हैं।
इसके अलावा, अगर कोई व्यक्ति दृढ़ निश्चय और तौबा के साथ अल्लाह की ओर लौटता है, तो अल्लाह उसके गुनाहों को माफ़ कर देता है और उन्हें मिटा देता है। यह विशेषता रमज़ान को आत्मा और मन की शुद्धि के लिए एक विशेष अवसर बनाती है। रोज़ेदार तौबा और इस्तेग़फार (माफी मांगने) के ज़रिए अल्लाह की रहमत का फायदा उठा सकते हैं और अपने आप को गुनाहों के बोझ से मुक्त कर सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस हदीस में रमज़ान को "बरकतों का महीना" कहा गया है। बरकत का मतलब है जीवन में अच्छाई और नेकी की वृद्धि। इस महीने में समय, कर्म और यहां तक कि इंसान की रोज़ी (आजीविका) में भी बरकत होती है। यह बरकत केवल भौतिक चीज़ों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक बरकत, मानसिक शांति और ईमान की मज़बूती भी शामिल है। रमज़ान आध्यात्मिक विकास, जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने और अल्लाह की नेमतों का फ़ायदा उठाने का एक अवसर है।
रमज़ान के महीने की बरकतें
पैग़म्बर मुहम्मद (स) ने एक रिवायत में रमज़ान के मुबारक महीने की बरकतो के बारे में बताया है।
निम्नलिखित रिवायत "बिहार अल-अनवार" किताब से ली गई है। इस रिवायत का पाठ इस तरह है:
قال رسول الله صلی الله علیه وآله:
إنَّ أبوابَ السَّماءِ تُفتَحُ فی أوَّلِ لَیلَةٍ مِن شَهرِ رَمَضانَ ولا تُغلَقُ إلی آخِرِ لَیلَةٍ مِنه
पैग़म्बर (स) ने फ़रमाया:
रमज़ान के मुबारक महीने की पहली रात को जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और वे उसकी आखिरी रात तक बंद नहीं होते।
बिहार अल-अनवार, भाग 96, पेज 344
रमज़ान का महीना; क़ुरआन का सफ़र शब्दों से कर्म तक
रमज़ान सिर्फ़ एक महीना नहीं है, बल्कि इंसान के अंदर की सच्चाई और उसकी रूह के सफ़र का एक टेस्ट है। यह वह महीना है जिसमें अल्लाह तआला अपने बंदों को काम करने के लिए बुलाता है। कुरान सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए उतारा गया ताकि यह हमारी सोच, हमारे फ़ैसलों और हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाए।
लेखक: मुज़म्मिल अब्बास इंक़लाबी
रमज़ान का महीना "अल्लाह का शहर" है, यानी अल्लाह का महीना। इस महीने में अल्लाह की तरफ़ से रहमत, रहमत और माफ़ी नाज़िल होती है। यह वह महीना है जिसमें अल्लाह तआला अपने बंदों को रूहानी रहमतों से फ़ायदा उठाने और उनसे फ़ायदा उठाने के लिए खुले तौर पर बुलाता है।
अल्लाह पर ध्यान, नेक कामों की तरफ़ झुकाव और रोज़े की फ़र्ज़ की वजह से, यह महीना रूह की सफ़ाई और तंदुरुस्ती और गुनाहों से आज़ादी और मुक्ति का महीना है।
हदीसों और रिवायतों में, इस महीने को कुरान का बसंत कहा गया है। इस महीने में लोग कुरान की तरफ रुख करते हैं। रमज़ान के महीने में साल के किसी भी दूसरे दिन से ज़्यादा कुरान की तिलावत की जाती है।
फिर, इस महीने में रोज़ा फ़र्ज़ करके, अल्लाह तआला ने इस महीने को और खास बनाया है और दूसरे कारणों के साथ-साथ खुद को साफ़ करने, रूहानी रोशनी और रूहानी पवित्रता के लिए रोज़े के रूप में एक और पूरा तरीका दिया है।
रमज़ान के महीने की अवधारणा और मतलब:
अरबी कोशकारों के मतलब के अनुसार, रमज़ान शब्द “रमज़” से बना है और उन्होंने “रमज़” का मतलब समझाते हुए दो मतलब बताए हैं।
1. अल-ऐन नाम की अरबी डिक्शनरी के लेखक खलील बिन अहमद के अनुसार: “रमज़” का मतलब पतझड़ के मौसम में होने वाली बारिश है, जो धरती की सतह से धूल और गंदगी को धो देती है।
इस आधार पर, इस महीने को रमज़ान कहने का कारण यह है कि यह इंसान की रूह और आत्मा को गंदगी और अशुद्धियों से साफ़ और पवित्र करता है।
2. “मजमा अल-बहरीन” में तुरीही और “मिस्बाह अल-मुनीर” में अहमद बिन मुहम्मद ने बताया है कि रमज़ान शब्द “रमज़” और “रमाधा” से बना है। जिसका मतलब है गर्म और जलती हुई रेत और पत्थर जो सूरज की सीधी गर्मी से चमकने लगते हैं।
अल-तुराही ने मजमा अल-बहरीन में कहा है: “उसके पैर गर्मी से झुलस गए, उसके पैर गर्मी से झुलस गए, मतलब उसके पैर जल गए।”
इसलिए, इस मुबारक महीने को रमज़ान कहने का कारण यह है कि यह महीना अपनी खासियतों के कारण गुनाह और गलती की वजहों को दूर करता है, और इंसान के रास्ते से रुकावटों को दूर करता है, और उसके अच्छे कामों और पवित्रता को बेहतर बनाने के मौके देता है।
ज़मखशरी कहते हैं: इस महीने को रमज़ान इसलिए कहा गया है क्योंकि इस महीने में गुनाह जलकर खत्म हो जाते हैं। (तफ़सीर कश्शाफ़, सूर ए बकरा, आयत 158)
कई दूसरी हदीसों में, रमज़ान के महीने को “अल्लाह का शहर” भी कहा गया है।
इस तरह, यह नतीजा निकलता है कि दूसरे महीनों के मुकाबले इसकी खास बाहरी और अंदरूनी बेहतरी की वजह से इसका नाम रमज़ान रखा गया है। यह महीना गुनाहों की वजहों और वजहों को खत्म करने और उनसे छुटकारा पाने का महीना है। इससे भी ज़्यादा, यह "अल्लाह के शहर" अल्लाह का महीना है। वह महीना जिसे अल्लाह तआला ने खुद को खास माना है और इसे अपना नाम दिया है।
हदीसों की रोशनी में रमज़ान के महीने की फ़ज़ीलत:
रमज़ान के महीने की महानता और अच्छाई को इस्लाम के पैगंबर और बेदाग इमामों ने अलग-अलग मतलबों के ज़रिए बताया है। इनमें से हर मतलब दूसरे महीनों के मुकाबले इस महीने की महानता को दिखाता है।
1. शाबान महीने के आखिरी शुक्रवार को, जब रमज़ान का महीना करीब आ रहा था, पैगंबर-ए-इस्लाम ने मस्जिद-ए-पैगंबर में महीने की खूबियों और शान पर एक खुत्बा दिया। इस खुत्बे का हर हिस्सा रमज़ान महीने की किसी न किसी खूबी के बारे में बताता है। चूंकि यह काफी लंबा खुत्बा है, इसलिए मैं यहां इसका सिर्फ शुरुआती हिस्सा ही बता रहा हूं।
أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّهُ قَدْ أَقْبَلَ إِلَيْكُمُ شَهْرُ اللَّهِ بِالْبَرَكَةِ وَالرَّحْمَةِ وَالْمَغْفِرَةِ شَهْرٌ هُوَ عِنْدَ اللَّهِ أَفْضَلُ الشُّهُورِ أَيَّامُهُ أَفْضَلُ الأَيَّامِ ولياليهِ أَفْضَلُ اللَّيالي و ساعاتُهُ أَفْضَلُ السَّاعَاتِ هُوَ شَهْرُ دُعِيتُمْ فِيهِ إِلَى ضِيَافَةِ اللَّهِ وَ جُعِلْتُمْ فِيهِ مَنْ أَهْلِ كَرَامَةِ اللَّهِ الْفَاسُكُمْ فِيهِ تَسْبِيحٌ، وَنَوْمُكُمْ فِيهِ عِبَادَةً وَ عَمَلُكُمْ فِيهِ مَقْبُولٌ وَ دُعَاؤُكُمْ فِيهِ مُسْتَجَابٍ
ऐ लोगों! बेशक, अल्लाह का महीना (रमज़ान का महीना) अपनी रहमतों और मगफिरत के साथ तुम्हारे पास आ रहा है। यह महीना अल्लाह की नज़र में सबसे अच्छा महीना है। इसके दिन सबसे अच्छे दिन हैं, इसकी रातें सबसे अच्छी रातें हैं, और इसके घंटे सबसे अच्छे घंटे हैं। यह वह महीना है जिसमें आपको अल्लाह की मौजूदगी में दावत पर बुलाया गया है, और आप इस महीने में अल्लाह के सम्मान के लायक बन गए हैं।
इस महीने में, आपकी सांसें महिमा का इनाम हैं, और आपकी नींद इबादत का इनाम है, इस महीने में, आपके काम अल्लाह की मौजूदगी में कबूल किए जाते हैं और आपकी दुआएं कबूल की जाती हैं। (ओयून अख़बार अल-रज़ा - भाग 1, पेज 295)
खुतबे के इस हिस्से में ध्यान देने वाली बात यह है कि रमज़ान के महीने में एक मोमिन की सांस लेने का भी अल्लाह की महिमा का इनाम है। हालांकि, सांस लेने के ज़रिए इंसान के शरीर के अंदर की गंदी हवा बाहर निकल जाती है। अगर यह हवा बाहर नहीं निकलती है, तो इंसान का दम घुट जाएगा और वह मर जाएगा। इसके बावजूद, इसी सांस लेने का रमज़ान के महीने में अल्लाह की महिमा का इनाम है। इस तरह, यहां, इस महीने में इंसान की नींद को भी इबादत बताया गया है। जबकि सच तो यह है कि इबादत के लिए इरादा और होश ज़रूरी है, और इसे अपनी मर्ज़ी से किया जाना चाहिए, नींद की हालत में इरादा, होश और मर्ज़ी और मर्ज़ी का सवाल ही नहीं उठता, फिर भी रमज़ान के महीने में यह नींद अल्लाह की मौजूदगी में इबादत मानी जाती है।
2. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने अपने एक संबोधन में कहा:
مُحَمَّدٌ في عِبَادِ اللَّهِ كَشَهْرِ رَمَضَانَ فِي الشُّهُورِ
अल्लाह के बंदों में मुहम्मद का दर्जा वैसा ही है जैसा महीनों में रमज़ान के महीने का है।” (बिहार उल अनवार, भाग 37, पेज 53)
3. पवित्र पैगंबर ने खुद भी कहा:
"إِنَّ اللَّهَ إِخْتارُ مِنَ الأَيَّامِ الْجُمُعَةَ وَ مِنَ الشُّهُورِ شَهْرَ رَمَضَانَ وَ مِنَ اللَّيَالِي لَيْلَةَ الْقَدْرِ"
सच में अल्लाह ने दिनों में से शुक्रवार को, महीनों में से रमज़ान को और रातों में से क़द्र की रात को चुना है।” (बिहार अनवर वॉल्यूम 35 - पेज 372 और 296)
4. हज़रत सलमान फ़ारसी कहते हैं: इस्लाम के पैगंबर ने अपनी एक बातचीत के दौरान कहा:
जिब्रील मेरे पास उतरे और कहा कि अल्लाह तआला कहते हैं:
"شَهْرُ رَمَضانَ سَيِّدُ الشُّهُورِ وَ لَيْلَةُ الْقَدْرِ سَيِّدَةُ اللَّيَالِي وَالْفِرْدَوْسُ سَيِّدُ الْجَنانَ" ....
रमज़ान का महीना महीनों का मालिक है, लैलत अल-क़द्र रातों का मालिक है, और फ़िरदौस जन्नत के बाग़ों का मालिक है... (बिहार उल अनवार, भाग 40, पेज 54)
एक और बातचीत में, उन्होंने कहा:
शुक्रवार दिनों का मालिक है, रमज़ान महीनों का मालिक है, इसराइल फ़रिश्तों का मालिक है, आदम लोगों का मालिक है, मैं नबियों का मालिक हूँ, और अली वारिसों का मालिक है।
(बिहार अल-अनवार, भाग 40, पेज 47)
5. इस्लाम के पैगंबर, अल्लाह उन पर रहम करे और उन्हें शांति दे, ने रमज़ान के पवित्र महीने के सम्मान में शबानियाह खुतबे के एक हिस्से में कहा:
أَنْ أَبْوابَ الْجَنانِ في هَذَا الشَّهْرِ مُفَتِّحَةً فَاسْتَلُوا رَبَّكُمْ أَنْ لَا يُغْلِقَها عَلَيْكُمْ وَأَبْوابَ التيرانِ مُغَلَقَةٌ فَاسْتَلُوا رَبَّكُمْ أَن لا يَفْتَحَهَا عَلَيْكُمْ وَالشَّيَاطِينَ مَغْلُولَةٌ فَاسْتَلُوا رَبَّكُمْ أَنْ لَا يُسَلِّطَهَا عَلَيْكُمْ .
"बे।" शक इस महीने में जन्नत के दरवाज़े खुले हैं, इसलिए भगवान से दुआ करो कि वह उन्हें तुम्हारे लिए बंद न करे। और इस महीने में जहन्नम के दरवाज़े बंद हैं, इसलिए भगवान से दुआ करो कि वह उन्हें तुम्हारे लिए न खोले। और शैतान ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं, इसलिए भगवान से दुआ करो कि वह उन्हें तुम पर हावी न होने दे। (ओयून अख़बार अल-रज़ा, भाग 1, पेज 295)
रमज़ान के महीने में कुरान की रोशनी की चमक:
रमज़ान का महीना कुरान के नाज़िल होने का महीना है, खुदा का महीना है, और रूह की सफाई और तंदुरुस्ती का महीना है, और कुरान इसी महीने में ताकत की रात को पैगंबर के दिल पर नाज़िल हुआ था। इसलिए, यह नतीजा निकाला गया है कि रमजान का महीना कुरान की रोशनी की चमक और पवित्र कुरान के साथ करीबी और प्यार का महीना है।
रोज़ेदार इस महीने में खुदा के मेहमान होते हैं और पवित्र कुरान की मुबारक मेज़ के चारों ओर बैठते हैं। इसलिए, उन्हें इस महीने में पवित्र कुरान की तिलावत के लिए खास प्यार दिखाना चाहिए और कुरान की आयतों पर सोच-विचार और कुरान की बातों का दिमागी और प्रैक्टिकल इस्तेमाल करके अपनी रूहानी तरक्की और परफेक्शन को बढ़ाना चाहिए।
कुरान असल में तीन बुनियादों से बना है। ये बुनियादें इस तरह हैं:
▪️1. कुरान की आयतें पढ़ना।
▪️2. कुरान को समझना और उस पर सोच-विचार करना।
▪️3. कुरान के हुक्मों और आदेशों पर चलना।
वजूद;
हर चीज़ के चार वजूद होते हैं: दिमागी वजूद, बोलकर वजूद, लिखा हुआ वजूद, और बाहरी वजूद।
मिसाल के तौर पर, अगर किसी इंसान को प्यास लगी है, तो वह अपनी ज़बान से कितना भी पानी, पानी, पानी कहे, उसे प्यास नहीं लगेगी। और वह कितना भी पानी, पानी लिखता रहे, उसकी प्यास वैसी ही रहेगी। और चाहे वह ठंडे और मीठे पानी का ख्याल कितना भी अपने मन में लाए, वह प्यासा ही रहेगा। उसकी प्यास तभी बुझेगी, उसकी प्यास तभी बुझेगी जब वह सच में पानी ढूंढेगा और उसका गिलास उठाकर पीएगा।
इसी तरह, पवित्र कुरान के शब्दों, लिखावट और आयतों को रटने से मुक्ति और सफलता नहीं मिल सकती, सिर्फ़ यह काम इंसान की रूहानी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकता। बल्कि, मुक्ति कुरान से सच्चा लगाव ही दिलाएगा। यानी, अपनी ज़िंदगी को कुरान की शिक्षाओं के साँचे में ढालना, कुरान के मुताबिक अपने काम करना, और ज़िंदगी के हर हिस्से में कुरान के हुक्मों और आदेशों पर अमल करना। पहले तीन वजूद (मानसिक, मौखिक और लिखित) तब कीमती होते हैं जब वे कुरान से जान-पहचान और उस पर अमल करने का मामला हों।
उदाहरण के लिए, एक वेटलिफ्टर को ध्यान में रखें। वह शुरुआत में सिर्फ़ बीस किलोग्राम वज़न उठा सकता है। लेकिन लगातार प्रैक्टिस और बार-बार प्रैक्टिस के नतीजे में, वह दो सौ किलोग्राम तक उठाने की काबिलियत हासिल कर लेता है। हाँ, प्रैक्टिस से इंसान में ऐसी ताकत आती है।
उम्म अकील का किस्सा;
इतिहास में उम्म अकील नाम की एक बेडौइन औरत का ज़िक्र है। इस औरत ने दिल की गहराइयों से इस्लाम कबूल किया और सच्चे ईमान के साथ उस पर अमल किया। एक दिन, उसके घर दो मेहमान आए। मेहमानों की मेहमान-नवाज़ी करते हुए, उसे अचानक पता चला कि उसका बच्चा ऊँटों के पास खेल रहा था और ऊँटों ने उसे कुचलकर मार डाला। मेहमानों को इस हादसे के बारे में बताए बिना, उम्म अकील ने उस आदमी से, जो इस हादसे की खबर लाया था, मेहमानों की देखभाल करने में मदद करने को कहा। खाना बनने के बाद, जब मेहमानों ने खाना खत्म कर लिया, तो उन्हें उम्म अकील के बेटे की मौत की खबर मिली। वे इस औरत के सब्र, हिम्मत और ऊंचे हौसले को देखकर बहुत हैरान हुए। मेहमानों के जाने के बाद, कुछ मुसलमान उम्म अकील के पास अपनी हमदर्दी ज़ाहिर करने आए। उम्म अकील ने उनसे कहा: क्या तुममें से कोई ऐसा है जो कुरान की आयतें जानता हो और कुरान पढ़कर मेरे दिल को सुकून दे सके? वहाँ मौजूद लोगों में से एक ने कहा: हाँ, मैं हूँ। और फिर उसने ये आयतें पढ़ीं:
"وَبَشِّرِ الصَّبِرِينَ الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُمْ مُّصِيبَةٌ قَالُوْا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُوْنَ أُولَئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَاتٌ مِّنْ رَّبِّهِمْ وَ رَحْمَةٌ وَ أُولَئِكَ هُمُ الْمُهْتَدُونَ".
और सब्र करने वालों को खुशखबरी दो, जो मुसीबत में पड़ने के बाद कहते हैं: हम अल्लाह के हैं और उसी की तरफ़ लौटेंगे। जो लोग जाने वाले हैं, वे खुशनसीब हैं और उन पर उनके रब की दया है, और यही लोग रास्ते पर चलने वाले हैं। (सूर ए बक़रा, आयत 155-157)
इन मुसलमानों को विदा करने के बाद, उम्म अकील ने वज़ू किया और दुआ में हाथ उठाकर अल्लाह से दुआ की। ऐ अल्लाह! मैंने सब्र का जो हुक्म तूने मुझे दिया था, उसे पूरा कर दिया है, तो अब अपना वादा (सब्र के इनाम के तौर पर) पूरा कर। इस तरह, इस औरत ने कुरान से सबक सीखा और सबसे मुश्किल हालात में उस पर अमल किया, जिसके नतीजे में उसे शांति और सुकून मिला।
नतीजा
असल में, रमज़ान सिर्फ़ एक महीना नहीं है, बल्कि इंसान के अंदर की आत्मा का टेस्ट और उसकी रूह का सफ़र है। यह वह महीना है जिसमें अल्लाह तआला अपने बंदों को काम करने के लिए बुलाता है। कुरान सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए उतारा गया ताकि यह हमारे विचारों, हमारे फैसलों और हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन सके। अगर हम रमज़ान को सिर्फ़ रोज़ा रखने, रोज़ा तोड़ने और कुछ खास इबादत करने तक ही सीमित रखते हैं, तो हम इस महीने के असली संदेश को पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं। रमज़ान हमें सिखाता है कि रूह की इच्छाओं पर काबू रखकर इंसान अपने अंदर तक़वा की रोशनी पैदा कर सकता है। यह महीना हमें याद दिलाता है कि क़ुरान के शब्द तब तक ज़िंदा नहीं होते जब तक वे हमारे किरदार में न दिखें। तिलावत पहला कदम है, सोच-विचार दूसरा और काम उसका असली फल है। जब तक क़ुरान हमारी ज़बान से निकलकर हमारे कामों तक नहीं पहुँचता, तब तक हमारा सफ़र अधूरा रहता है। इसलिए, यह ज़रूरी है कि हम इस मुबारक महीने को खुद को सुधारने, अपने अंदर की सफ़ाई करने और अपनी ज़िंदगी को क़ुरान के साँचे में ढालने का मौका समझें। अगर रमज़ान के आखिर में हमारे अंदर पहले से ज़्यादा सब्र, तक़वा, सच्चाई और अल्लाह से नज़दीकी पैदा हो जाए, तो यही इस महीने की असली कामयाबी है। वरना, समय बीत जाएगा, दिन बदल जाएँगे, लेकिन हम वहीं रहेंगे जहाँ हैं।
रोज़े के अहकाम | रोज़े की नीयत के बारे में ज़रूरी नियम
शरई अहकाम के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन सय्यद मुहम्मद तकी मुहम्मदी ने रमज़ान के रोज़े, क़ज़ा रोज़े और मुस्तहब रोज़ों के बारे में सवालों के जवाब दिए।
रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान, हम हर दिन "रमज़ान गाइडलाइन" नाम से आपकी सेवा में हैं, जिसमें रमज़ान के बारे में शरई अहकाम और मराजे इकराम के विचार शामिल हैं।
नीयत के अहकाम
रोज़े के नियमों में एक ज़रूरी सवाल नीयत के समय से जुड़ा है। असल में रोज़े तीन तरह के होते हैं:
1. रमज़ान के वाजिब रोज़े
2. क़ज़ा रोज़े
3. रिकमेंडेड रोज़े
हर एक के लिए नीयत का समय खास होता है।
1. रमज़ान का रोज़ा
रमज़ान के दौरान रोज़े की नीयत फज्र से पहले करनी चाहिए। जिस पर फ़र्ज़ है, वह पूरे रमज़ान के लिए एक आम नीयत कर सकता है या हर दिन के लिए अलग-अलग नीयत कर सकता है। हालाँकि, इसमें दो छूट हैं:
पहला: कोई यात्री जो अपने वतन लौट रहा हो, जैसे कोई व्यक्ति तेहरान से क़ुम लौट रहा हो और सुबह 10 बजे अपने शहर पहुँचे। अगर उसने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे रोज़ा टूट जाए, तो वह उस समय नीयत कर सकता है और उसका रोज़ा सही होगा।
दूसरा: कोई बीमार व्यक्ति जो दिन में ठीक हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति दोपहर से पहले ठीक हो जाता है, तो वह उस समय नीयत करके रोज़ा रख सकता है।
2. क़ज़ा रोज़े
छूटे हुए रोज़े की क़ज़ा का समय फ़ज्र के बाद रहता है, यानी अगर व्यक्ति ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे रोज़ा टूट जाए, तो वह दोपहर से पहले तक नीयत कर सकता है और रोज़ा सही होगा।
3. मुस्तहब रोज़े
मुस्तहब रोज़े की क़ज़ा का समय सबसे बड़ा होता है। रोज़ा रखने वाला इंसान दिन के आखिर तक नीयत कर सकता है, बशर्ते उसने ऐसा कुछ न किया हो जिससे रोज़ा टूट जाए।
ज़रूरी बातें
जिन लोगों पर छूटे हुए रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी है, वे मुस्तहब रोज़े की नीयत नहीं कर सकते।
अगर किसी पर रमज़ान से एक दिन पहले छूटा हुआ रोज़ा क़ज़ा करना ज़रूरी है, तो उसे पहले छूटे हुए रोज़े क़ज़ा करने चाहिए।
अगर किसी पर छूटा हुआ रोज़ा क़ज़ा करना ज़रूरी है और रमज़ान में अभी भी कई दिन बाकी हैं, तो भी उसे पहले छूटे हुए रोज़े क़ज़ा करने चाहिए, और फिर वह मुस्तहब रोज़ा रख सकता है।
अतः पहले छूटे हुए रोज़े क़ज़ा करना ज़रूरी है, और फिर वह मुस्तहब रोज़ा रख सकता है।













