رضوی

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हिजरी क़मरी वर्ष के रजब महीने के तीसरी तारीख़ आ गई है। यह तारीख़ पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत की तारीख़ है। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की विख्यात उपाधि हादी अर्थात मार्गदर्शक है। निश्चित रूप से पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन ईश्वरीय ज्ञान वहि के संरक्षक हैं तथा ईश्वरीय ज्ञान और अलौकिक तथ्यों से सुसज्जित हैं। इसी लिए पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के अनुयायी यह प्रयास करते हैं कि अपने जीवन को इन्हीं मार्गदर्शकों के जीवन के रंग में ढालें और उनकी शिक्षाओं पर चलें। हम इस महान हस्ती के शहादत दिवस पर हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं और इसी उपलक्ष्य में अपनी इस चर्चा में इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की जीवनी से कुछ मार्गदर्शक शिक्षाएं प्राप्त करने का प्रयास करेंगे।

सबका सलाम हो महान मार्गदर्शक पर, सबका सलाम हो इस ईश्वरीय ज्योति पर, सलाम हो धर्म के महान स्तंभ और रक्षक पर जहां सबको पनाह मिलती है।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का जन्म वर्ष 212 हिजरी क़मरी के बारवहें महीने ज़िलहिज्जा में मदीना नगर के निकट स्थित सरबा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम थे और मां हज़रत समाना थीं जो इतिहास की बहुत महान महिला हैं। पिता की शहादत के बाद इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम इमाम बने और 33 साल तक यह ईश्वरीय दायित्व निभाते रहे।
 
इमामत का एक महत्वपूर्ण आयाम ज्ञान है जिसके आधार पर इमाम इंसानियत को विनाश से मुक्ति दिलाता है। इमामत का दायित्व संभालने से पहले ही इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का व्यक्तित्व निखर चुका था। ज्ञान की सभाओं और वाद-प्रतिवाद की बैठकों में उनकी कुशलता, ज्ञान संबंधी कठिन प्रश्नों के उत्तर देना और गुत्थियों को हल करना तथा महान शिष्यों का प्रशिक्षण इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण पहलू थे। इन विशेषताओं के कारण बड़ी संख्या में लोग उनके क़रीब आए और इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने इस्लामी सिद्धांतों और शिक्षाओं के अनुसार उनका प्रशिक्षण किया तथा समाज की आवश्यकता के अनुसार उन्हें अनेक ज्ञानों से सुसज्जित किया।
 तत्कालीन ख़लीफ़ा की ओर से भारी दबाव और कड़ी निगरानी के कारण इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के लिए अपने दायित्वों का निर्वाह बहुत कठिन था तथा बहुत से लोग इसी कारण इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम तक नहीं पहुंच पाते थे लेकिन फिर भी उनका अभियान जारी रहा। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम से विभिन्न इस्लामी ज्ञान सीखने वालों और उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों की संख्या 185 से अधिक है जिनमें महान धर्मगुरू शामिल हैं। इन्हीं हस्तियों में से एक अब्दुल अज़ीज़ हसनी हैं जिन्होंने इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम से ज्ञान अर्जित किया। वह इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम से पत्राचार रखते थे और अपने पत्रों में धर्मशास्त्र सहित अनेक विषयों के बारे में प्रश्न पूछा करते थे। वह ईरान के लोगों की समस्याओं से इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को अवगत करवाते थे। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने सैयद अब्दुल अज़ीज़ हसनी को अपना प्रतिनिधि घोषित किया था।

 इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की इमामत के काल में छह अब्बासी शासक गुज़रे। इनमें मोअतसिम, वासिक़, मुतवक्किल, मुंतसिर, मुसतईन और मोतज़्ज़ शामिल हैं। जैसा की आप जानते हैं महान धार्मिक हस्तियों का जीवन अनेक प्रकार की कठिनाइयों और प्रतिकूल परिस्थितियों से घिरा रहता था जो उस समय के शासन उत्पन्न करते थे किंतु इनमें से कोई भी कठिनाई कभी भी इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को उनके दायित्वों के निर्वाह से नहीं रोक सकी। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का पूरा जीवन ईश्वर के समक्ष समर्पण तथा कठिनाइयों के सामने संघर्ष का दर्पण है।

जब मुतवक्किल को शासन मिला तो उसे हेजाज़ से बार बार यह ख़त मिले कि मक्के और मदीने के लोगों का इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की ओर झुकाव बढ़ रहा है। मुतवक्किल को यह डर सताने लगा कि कहीं इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम उसकी अत्याचारी सरकार के विरुद्ध विद्रोह न शुरू कर दें। उसने इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को सामर्रा नगर बुलाया जिसे उसने अपनी राजधानी बनाया था। मुतवक्किल चाहता था कि इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम पर कड़ी नज़र रखे और जब चाहे उन पर दबाव डाले। इस प्रकार विवशतः इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम सामर्रा गए। अब्बासी शासक इस प्रकार इमाम को उनके समर्थकों और श्रद्धालुओं से दूर कर देना चाहता था। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को सामर्रा में सिपाहियों के क्षेत्र में रखा गया किंतु इसके बावजूद उन पर सरकारी कारिंदों की कड़ी निगरानी रहती थी लेकिन इस सब के बाद भी इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही और उनके श्रद्धालुओं की का दायरा बहुत व्यापक हो गया।
 इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के काल में इस्लामी समाज में अनेक दिगभ्रमित मत फैल गए थे। इस बीच इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम इस्लाम धर्म के विचारों और शिक्षाओं की व्याख्या करते थे। उस समय इस्लामी हल्क़ों में भ्रामक विचार फैल रहे थे। अतः इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने कठिन प्रयास करके इन विचारों की त्रुटियों को बयान किया और इस्लाम के नाम पर फैलाई जाने वाली इन ग़लत बातों के बारे में लोगों को बताया। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम समाज में इस्लाम धर्म की शिक्षाओं को शुद्ध रूप में पेश करते थे। और यह सारी गतिविधियां एसी स्थिति में होती थीं कि इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के सिर पर अब्बासी शासक की तलवार लटकी रहती थी और यह शासक कदापि नहीं चाहते थे कि इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में कोई काम करें।
 ईश्वर का स्मरण और उसके अस्तित्व का ज्ञान पैग़म्बरे इस्लाम के ख़ानदान और उनके परिजनों की विशेषता है। हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार ईश्वर को पहचानता और उसके अस्तित्व का ज्ञान रखता है लेकिन जब पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन ईश्वर के बारे में कुछ बयान करते हैं तो उसकी मिठास और उसकी गहराई बिल्कुल अलग होती है। क्योंकि वे सबसे महान और सबसे विश्वस्नीय ज्ञान स्रोत अर्थात वहि से जुड़े होते हैं।

ईश्वर के बारे में इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम कहते हैं कि यक़ीनन ईश्वर एसा है कि जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती उसके बारे में केवल वही कहा जा सकता है जो स्वयं ईश्वर ने बयान किया है। उस हस्ती का कोई क्या व्याख्यान करे कि जो इंद्रियों के दायरे से बहुत ऊपर है। कल्पना वहां तक पहुंचने में अक्षम है, विवेक उसकी हस्ती की वस्तविकता को समझ नहीं सकते, आंखों में इतनी गुंजाइश नहीं कि वह उनमें समा सके। वह क़रीब होते हुए भी बहुत दूर और बहुत दूर होते हुए भी बहुत क़रीब है। उसने स्थान की रचना की जबकि वह स्वयं किसी स्थान तक सीमित नहीं है। वह अनन्य है उसका वैभव और उसकी गरिमा महान है और उसके नाम पवित्र हैं।
 इस्लाम की महान संस्कृति में ईश्वर की पहचान प्राप्त करने और उस पर आस्था रखने के बाद इंसान के लिए दूसरी सबसे महान चीज़ है ईश्वर की उपासना है। इससे अधिक महान स्थान इंसान को प्राप्त नहीं हो सकता। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम बंदगी की महानता को बयान करते हुए कहते हैं कि जो ईश्वर की अवज्ञा से बचता है लोग उसकी अवज्ञा नहीं करते और जो ईश्वर का आज्ञाकारी होता है लोग उसके आज्ञाकारी बन जाते हैं, जो भी ईश्वर के आदेशों का पालन करता है उसे किसी अन्य के क्रोध का कोई भय नहीं होगा और जो ईश्वर को क्रोधित करे उसे जान लेना चाहिए कि वह लोगों के आक्रोश से सुरक्षित नहीं रहेगा।

 इस महान स्थान की व्याख्या में इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम एक महत्वपूर्ण बिंदु की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि अगर इंसान ईश्वर की उपासना को अपने जीवन का ध्रुव बना ले उसे एसी सुरक्षा प्राप्त होगी कि जिसकी छत्रछाया में वह निश्चिंत होकर दूसरे इंसानों के साथ घनिष्ठ सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकता है। ईश्वर ने जिन चीज़ों का आदेश दिया उनका पालन करना और जिन चीज़ों से रोका है उनसे दूर रहना इंसान को सच्ची बंदगी की डगर पर पहुंचा देता है। इस प्रकार देखा जाए तो एक ईश्वर की उपासना इंसान के जीवन का एजेंडा तैयार कर देती है। इस एजेंडे में ईश्वरीय इच्छा सबसे केन्द्रीय बिंदु है और इंसान का लोक परलोक में कल्याण सुनिश्चित हो जाता है। बंदगी का महत्व इतना अधिक है कि इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ईश्वर का बंदा होने और उसकी उपासना करने पर गर्व करते हैं। उनका कथन है कि हे ईश्वर मेरे लिए यही गौरव बहुत है कि मैं तेरा बंदा रहूं और मेरे लिए सबसे बड़े गर्व की बात यह है कि तू मेरा पालनहार है। तू वैसा ही जैसा मैं चाहता हूं तो तू मुझे वैसा बना दे जैसा तू पसंद करता है।
 
इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने लोगों के प्रशिक्षण और बुराइयों को दूर करने के संदर्भ में स्वार्थ और आत्म मुग्धता के कारणों को चिन्हित करते हुए कहते हैं कि ईश्वर के कड़े हिसाब किताब से जो ख़ुद को सुरक्षित समझता है वह घमंड करता है। लेकिन जो इंसान अपने ईश्वर से ज्योति प्राप्त कर लेता है दुनिया की कठिनाइयां उसकी नज़र में आसान हो जाती हैं।

इस मूल्यवान शिक्षा के अनुसार हर इंसान के लिए आवश्यक है कि महान स्थानों की ओर अपनी प्रगति के दौरान ईश्वर की ओर से किए जाने वाले हिसाब किताब से निश्चेत न हो। ईश्वर और क़यामत की उपेक्षा इंसान को अनेक बुराइयों में उलझा देती है और ईश्वर को भूल जाने के परिणाम स्वरूप इंसान अपने आप को भी भूल जाता है तथा वह अपने जीवन का लक्ष्य भी गवां बैठता है।

हसन बिन मसऊद इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के श्रद्धालु थे। वह बताते हैं कि मैं एक बार इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के सेवा में पहुंचा। उस दिन मेरे लिए कई कटु घटनाएं घटी थीं। मेरी उंगली में चोट लग गई थी और अपने घोड़े से टकरा जाने के कारण मेरे कंधे में भी दर्द था। इसी लिए मैंने इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम से कहा कि आज का दिन मेरे लिए बड़ा मनहूस दिन था। ईश्वर इस दिन की बुराइयों को मुझ से दूर करे। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने उत्तर में कहा कि दिनों का क्या दोष है। दिनों की क्या ग़लती है? आप लोग जब अपनी ग़लतियों के नतीजे का सामना करते हैं तो दिनों को दोष देते हैं। यह ईश्वर है जो सज़ा और पारितोषिक देता है तथा दुनिया में किए गए कर्मों का बदला देता है।

 

बुधवार, 24 दिसम्बर 2025 06:25

इमाम अली नक़ी (अ.स.) के करामात

इमाम अली नक़ी (अ.स.) तक़रीबन 29 साल मदीना मुनव्वरा क़याम पज़ीर रहे। आपने इस मुद्दते उमर में कई बादशाहों का ज़माना देखा। तक़रीबन हर एक ने आपकी तरफ़ रूख़ करने से ऐहतिराज़ किया। यही वजह है कि आप उमूरे इमामत को अन्जाम देने में कामयाब रहे।

आप चूंकि अपने आबाओ अजदाद की तरह इल्मे बातिन और इल्मे ग़ैब भी रखते थे। इसी लिए आप अपने मानने वालों को होने वाले वाकि़यात से बा ख़बर फ़रमा दिया करते थे और कोशिश फ़रमाते थे कि मक़दूरात के अलावा कोई गज़न्द न पहुंचने पाए इस सिलसिले में आपके करामात बे शुमार हैं जिनमें से हम इस मक़ाम पर किताब कशफ़ुल ग़ुम्मा से चन्द करामात तहरीर करते हैं।


  1. मौहम्मद इब्ने फरज रहजी का बयान है कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने मुझे तहरीर फ़रमाया कि तुम अपने तमाम उमूर व मामलात को रास्त और निज़ामे ख़ाना को दुरूस्त कर लो और अपने असलहों को सम्भाल लो। मैंने उनके हुक्म से तमाम काम दुरूस्त कर लिया लेकिन यह न समझ सका यह हुक्म आपने क्यों दिया लेकिन चन्द दिनो के बाद मिस्र की पुलिस मेरे यहां आई और मुझे गिरफतार कर के ले गई और मेरे पास जो कुछ था, सब ले लिया और मुझे क़ैद खाने में बन्द कर दिया। मैं आठ साल इस क़ैद खाने में पडा रहा। एक दिन इमाम (अ.स.) का खत पहुंचा , जिसमें मरक़ूम था कि ऐ मौहम्मद बिन फ़जऱ् , तुम उस रास्ते की तरफ़ न जाना जो मग़रिब की तरफ़ वाक़े है। ख़त पाते ही मेरी हैरानी की कोई हद न रही। मै सोचता रहा कि मैं तो क़ैद खाने में हूं मेरा तो उधर जाना मुम्किन ही नहीं फिर इमाम ने क्यों यह कुछ तहरीर फ़रमाया?

आपके ख़त आने को अभी दो चार ही दिन गुज़रे थे कि मेरी रेहाई का हुक्म आ गया और मैं उनके हुक्म के मुताबिक उस तरफ नही गया कि जिसको आपने मना किया था। क़ैद ख़ाने से रेहाई के बाद मैने इमाम (अ.स.) को लिखा कि हुज़ूर मैं क़ैद से छूट कर घर आ गया हूं। अब आप खुदा से दुआ फ़रमाऐं कि मेरा माल मग़सूबा वापस करा दें। आपने उसके जवाब में तहरीर फ़रमाया कि अन्क़रीब तुम्हारा सारा माल तुम्हें वापस मिल जाएगा चुनांचे ऐसा ही हुआ।


  1. एक दिन इमाम अली नक़ी (अ.स.) और अली बिन हसीब नामी शख़्स दोनों साथ ही रास्ता चल रहे थे। अली बिन हसीब आपसे चन्द गाम आगे बढ़ कर बोले , आप भी क़दम बढ़ा कर जल्द आजाएं हज़रत ने फ़रमाया कि ऐ इब्ने हसीब तुम्हें पहले जाना है। तुम जाओ इस वाकि़ए के चार दिन बाद इब्ने हसीब फ़ौत हो गए।
  2. एक शख़्स मौहम्मद बिन फ़ज़ल बग़दादी नामी का बयान है कि मैंने हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को लिखा कि मेरे पास एक दुकान है मैं उसे बेचना चाहता हूं आपने उसका जवाब न दिया। जवाब न मिलने पर मुझे अफ़सोस हुआ। लेकिन जब मैं बग़दाद वापस पहुंचा तो वह आग लग जाने की वजह से जल चुकी थी।
  3. एक शख्स अबू अय्यूब नामी ने इमाम (अ.स.) को लिखा कि मेरी ज़ौजा हामेला है , आप दुआ फ़रमाएं कि लड़का पैदा हो। आप ने फ़रमाया इन्शा अल्लाह उसके लड़का ही पैदा होगा और जब पैदा हो तो उसका नाम मौहम्मद रखना। चुनांचे लड़का ही पैदा हुआ , और उसका नाम मौहम्मद ही पैदा रखा गया।
  4. यहिया बिन ज़करिया का बयान है कि मैंने इमाम अली नक़ी (अ.स.) को लिखा कि मेरी बीवी हामेला है आप दुआ फ़रमाऐ कि लड़का पैदा हो। आपने जवाब में तहरीर फ़रमाया कि बाज़ लड़कियां लड़कों से बेहतर होती हैं , चुनांचे लड़की पैदा हुई।
  5. अबू हाशिम का बयान है कि मैं 227 हिजरी में एक दिन हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र था कि किसी ने आकर कहा कि तुर्को की फ़ौज गुज़र रही है। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ अबू हाशिम चलो इन से मुलाक़ात करें। मैं हज़रत के हमराह हो कर लश्करियों तक पहुचा। हज़रत ने एक ग़ुलाम तुर्की से इसकी ज़बान में गुफ़्तगू शुरू फ़रमाई और देर तक बातें करते रहे। उस तुर्की सिपाही ने आपके क़दमों का बोसा दिया। मैंने उस से पूछा कि वह कौन सी चीज़ है जिसने तुझे इमाम का गिरवीदा बना दिया ? उसने कहाः इमाम ने मुझे उस नाम से पुकारा जिसका जानने वाला मेरे बाप के अलावा कोई न था।
  6. अबू हाशिम कहते हैं कि मैं एक दिन हज़रत की खि़दमत में हाजि़र हुआ तो आपने मुझ से हिन्दी ज़बान में गुफ़तगू की जिसका मैं जवाब न दे सका , तो आपने फ़रमाया कि मैं अभी अभी तुम्हें तमाम ज़बानों का जानने वाला बनाए देता हूं। यह कह कर आपने एक संग रेज़ा उठाया और उसे अपने मुहं में रख लिया उसके बाद उस संग रेज़े को मुझे देते हुए फ़रमाया कि इसे चुसो। मैने मुँह में रख कर उसे अच्छी तरह चूसा , उसका नतीजा यह हुआ कि मैं तेहत्तर ज़बानों का आलिम बन गया। जिनमें हिन्दी भी शामिल थी। इसके बाद से फिर मुझे किसी ज़बान के समझने और बोलने में दिक़्कत न हुई। सफ़ा 122 से 125
  7. आइम्माए ताहेरीन के उलील अम्र होने पर क़ुरान मजीद की नस सरीह मौजूद है। इनके हाथों और ज़बान में खुदा वन्दे आलम ने यह ताक़त दी है कि वह जो कहे हो जाए , जो इरादा करें उसकी तकमील हो जाए। अबू हाशिम का बयान है कि एक दिन मैनें इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खिदमत में अपनी तंग दस्ती की शिकायत की। आपने फ़रमाया बड़ी मामूली बात है तुम्हारी तक्लीफ़ दूर हो जाएगी। उसके बाद आपने रमल यानी रेत की एके मुठ्ठी ज़मीन से उठा कर मेरे दामन में ड़ाल दी और फ़रमाया इसे ग़ौर से देखो और इसे फ़रोख्त कर के काम निकालो।

अबू हाशिम कहते हैं कि ख़ुदा की क़सम जब मैने उसे देखा तो वह बेहतरीन सोना था , मैंने उसे बाज़ार ले जा कर फ़रोख्त कर दिया।

(मुनाकि़ब इब्ने शहर आशोब जिल्द 6 सफ़ा 119)

  1. हज़रत सुक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी उसूले काफ़ी में लिखते हैं कि इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने फ़रमाया , इस्म अल्लाहुल आज़म 73 हुरूफ़ में इनमें से सिर्फ़ एक हरफ़ आसिफ़ बरखि़या वसी सुलेमान को दिया गया था जिसके ज़रिए से उन्होंने चश्मे ज़दन में मुल्के सबा के तख्ते बिलक़ीस मंगवा लिया था और इस मंगवाने में यह हुआ था कि ज़मीन सिमट कर तख्त को क़रीब ले आई थी , ऐ नौफ़ली रावी ख़ुदा वन्दे आलम ने हमें इस्मे आज़म के 72 हुरूफ़ दिये हैं और अपने लिये सिर्फ़ एक हरफ़ महफ़ूज़ रखा है जो इल्मे ग़ैब से मुताअल्लिक़ है।

मसूदी का कहना है कि इसके बाद इमाम ने फ़रमाया कि ख़ुदा वन्दे आलम ने अपनी क़ुदरत और अपने इज़्ने इल्म से हमें वह चीज़े अता कि हैं जो हैरत अंगेज़ और ताज्जुब ख़ैज़ हैं। मतलब यह है कि इमाम जो चाहें कर सकते हैं। उनके लिए कोई रूकावट नहीं हो सकती।

(उसूले काफ़ी - मुनाकि़ब इब्ने शहर आशोब जिल्द 5 सफ़ा 118 व दमतुस् साकेबा सफ़ा 126)


  1. शेख़ अबू जाफ़र तूसी किताब मिसबाह में लिखते हैं कि इस्हाक़ बिन अब्दुल्लाह अलवी अरीज़ी हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खि़दमत में बा मुक़ाम सरय्या मदीना हाजि़र हुए। इमाम (अ.स.) ने उन्हें देख कर फ़रमाया , मैं जानता हूं कि तुम्हारे बाप और तुम्हारे चचा के दरमियान यह अमर ज़ेर बहस है कि साल के वह कौन से रोज़े है कि जिनका रखना बहुत ज़्यादा सवाब रखता है और तुम इसी के मुताल्लिक़ मुझ से सवाल करने आए हो। उसने कहा ऐ मौला बस यही बात है कि आपने फ़रमाया सुनो वह चार रोज़े हैं जिनके रखने की ताकीद है।
  2. यौमे विलादत हज़रत पैग़म्बरे इस्लाम स. 17 रबीउल अव्वल।
  3. यौमे बैसत व मेराज 27 रजबुल मुरज्जब।
  4. यौमे दहवुल अर्ज़ यानी जिस दिन काबे के नीचे से ज़मीन बिछाई गई और सफ़ीना ए नूह कोह जूदी पर ठहरा जिसकी तारीख़ 25 ज़ीक़ाद है।
  5. यानी यौमें अल ग़दीर जिस दिन हज़रत रसूले ख़ुदा स. ने हज़रत अली (अ.स.) को अपने जानशीन होने का ऐलान आम फ़रमाया जिसकी तारीख़ 18 जि़ल हिज है।

ऐ अरीज़ी जो इन दिनों में से किसी दिन भी रोज़ा रखे। उसके साठ और सत्तर साला गुनाह बख़शे जाते हैं।

(किताब मुनाकि़ब जिल्द 5 सफ़ा 123 व दम ए साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 123)

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आज 3 रजब, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पौत्र इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत का दिन है। रजब की तीसरी तारीख़ को इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत हुई थी।

वे ऐसे महान व्यक्ति थे जिन्होंने एक विशेष कालखण्ड में बड़ी ही सूझबूझ और दूरदर्शिता से पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों की विचारधारा और उनकी संस्कृति को फेरबदल से बचाया तथा उसके सही रूप को सुरक्षित रखने के लिए प्रयासरत रहे।

१५ ज़िलहिज सन २१२ हिजरी क़मरी को इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का जन्म पवित्र नगर मदीना के निकट हुआ था। जब वर्ष २२० में उनके पिता इमाम जवाद अलैहिस्सलाम की शहादत हुई तो इमामत अर्थात ईश्वरीय मार्गदर्शन जैसे महान कार्य का दायित्व उनके कांधों पर आ गया।

इमाम अली नक़ी (अ) ने ३३ वर्षों तक जनता का मार्गदर्शन किया। इमाम अली नक़ी (अ) के ईश्वरीय मार्गदर्शन के काल में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों पर बहुत कड़ाई होती व दबाव डाला जाता था। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के काल में जो ६ अब्बासी शासक गुज़रे हैं उन छह अब्बासी शासको में एक मुतवक्किल भी था जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के साथ शत्रुता एवं द्वेष के लिए प्रसिद्ध था। मुतवक्किल ने लगभग १५ वर्षों तक शासन किया। यही कारण है कि अन्य अब्बासी शासकों की तुलना में मुतवक्किल ने इमाम अली नक़ी (अ) के काल में अधिक समय व्यतीत किया। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने प्रचारिक, सांस्कृतिक और प्रशिक्षण संबन्धी कार्यक्रम बनाकर अब्बासी शासकों के विरुद्ध परोक्ष रूप में संषर्घ आरंभ किया था।

अब्बासी शासकों के मुक़ाबले में इमाम अली नक़ी की ओर से अपनाई गई नीतियां इस वास्तविकता को स्पष्ट करती हैं कि संघर्ष का मार्ग केवल सशस्त्र संघर्ष और सैनिक कार्यवाही ही नहीं है बल्कि वास्तव में संघर्ष का अर्थ एसी शैली अपनाना है कि जिससे शत्रु को अधिक से अधिक क्षति पहुंचे और वह शत्रु को उसके लक्ष्यों तक पहुंचने में विफल बनाए।

दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि तत्कालीन अत्याचारी शासकों का मुक़ाबला करने में इमाम अली नक़ी की शैली एक प्रकार का नर्म युद्ध थी।

इमाम अली नक़ी (अ) ने अपने काल में संघर्ष की सर्वोत्तम शैली अपनाई थी जो बहुत से अवसरों पर शत्रु को प्रभावित तथा हतप्रभ कर देती थी।

संभवतः यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन जो सदैव ही बनी अब्बास और बनी उमय्या के परिवेष्टन में रहते थे, सुदृढ़ तर्कों, दृढ दृष्टिकोणों और आस्था संबन्धी मज़बूत विचारों के स्वामी थे और वे विभिन्न शैलियों से उन दृष्टिकोणों का प्रचार किया करते थे।

जब भी इस्लाम के बारे में कोई भी भ्रांति उत्पन्न होती तो उसका संतोषजनक उत्तर केवल पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों की ही ओर से दिया जाता था। पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की ओर से इस प्रकार की तार्किक प्रतिक्रिया ने इस्लाम की वैचारिक योजना का मार्ग प्रशस्त किया। इमाम अली नक़ी (अ) के काल में पाया जाने वाला घुटन भरा वातावरण, और वैचारिक तथा आस्था से संबन्धित शंकाओं को समाज में फैलाना दो एसी महत्वपूर्ण बुराइयां थीं कि यदि इमाम अली नक़ी की दूरदर्शिता और उनकी दूरदर्शी शैलियां न होतीं तो इस्लाम की मौलिक विचारधारा और आस्था संबन्धित मूलभूत विषयों के लिए बहुत ही ख़तरनाक समस्याएं आ सकती थीं।

इससे पहले कि इमाम अली नक़ी (अ) को अब्बासी शासन के कारिंदों द्वारा सामर्रा लाया जाता वे पवित्र नगर मदीना में जीवन व्यतीत करते थे जो इस्लामी जगत का शैक्षिक एवं धार्मिक केन्द्र माना जाता था। मदीने में इमाम अली नक़ी की गतिविधियों ने अत्याचारी अब्बासी शासकों को चिन्तित कर दिया था। इसीलिए उन्होंने इमाम अली नक़ी (अ) को सामर्रा जाने पर विवश किया। इमाम अली नक़ी (अ) ने अपने जीवन के अन्तिम दस वर्ष सामर्रा में सरकार की निगरानी में व्यतीत किये। तत्कालीन शासकों की ओर से इमाम पर कड़ी दृष्टि रखने से आम लोगों तक उनकी पहुंच कठिन हो गई थी। इसलिए समाज में इमाम की अनुपस्थिति, आस्था संबन्धी बहुत सी समस्याओं की भूमिका बन सकती थी, और इसका परिणाम यह निकलता कि समाज में विभिन्न प्रकार के वैचारिक गुट अस्तित्व में आते तथा समाज में अनुचित विचारधाराएं प्रचलित हो जातीं। इन्हीं बातों के दृष्टिगत उस समय इस्लाम के लिए गंभीर ख़तरे उत्पन्न हो गए थे।

इमाम की दूरदर्शिता और इस प्रकार की समस्याओं के समाधान हेतु उनकी ओर से अपनाई जाने वाली शैलियां और साथ ही इस्लामी जगत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले अपने अनुयाइयों के मध्य एकता उत्पन्न करने के लिए इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने अपने कुछ प्रतिनिध नियुक्त किये थे जो जनता से संपर्क करते और वे जनता तथा इमाम के बीच संपर्क का काम किया करते थे। यह लोग छिपकर लोगों से मिलते और उनकी समस्याओं के समाधान के प्रयास करते।विगत में भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के माध्यम से इस प्रकार की व्यवस्था मौजूद थी किंतु इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के काल में राजनीतिक, वैचारिक तथा ज्ञान संबन्धी इस व्यवस्था ने विशेष महत्व प्राप्त किया और यह अधिक विस्तृत एवं व्यापक हुई।

वास्तव में यह व्यवस्था इमाम और जनता के मध्य संपर्क तथा संबन्धों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से तत्कालीन संकटग्रस्त परिस्थितियों में इमाम अली नक़ी (अ) की ओर से एक पहल थी।इस कालखण्ड में, बाद में आने वाले कठिन संकटों से मुक्ति पाने के बारे में इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का नेतृत्व बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावी सिद्ध हुआ। क्योंकि उनके काल में राजनीतिक स्थिति कुछ इस प्रकार से आगे बढ़ रही थी कि उनके बाद वाले इमाम अर्थात इमाम असकरी अलैहिस्सलाम के काल में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों को अधिक दबाव एवं घुटन के वातावरण में रहना पड़ता।

पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के अनुयाइयों के बीच ज्ञान संबन्धी सामाजिक एवं सुरक्षा व्यवस्था बनाने में इस व्यवस्था की महत्वूपर्ण भूमिका रही है। इस व्यवस्था के माध्यम से इमाम के संदेश बहुत ही तेज़ तथा सुव्यवस्थित ढंग से विश्वसनीय चैनेल के माध्यम से उनके अनुयाइयों तक इस प्रकार पहुंचते थे कि सुरक्षा की दृष्टि से उनके लिए कोई समस्या न आए और न ही किसी अन्य को उनके स्थान का पता चल सके। यह व्यवस्था लोगों के धार्मिक एवं ज्ञान संबन्धी प्रश्नों के उत्तर के लिए मुख्य स्रोत उपलब्ध करवाती थी ताकि वैचारिक एवं आस्था संबन्धी भ्रांतियों का निवारण किया जा सके। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों की विचारधारा को सुदृढ़ करने के लिए इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की एक अन्य कार्यवाही, इमामत के महत्व को समझाना था।

इमामत को पहचनवाने का एक मार्ग, ज़ियारते जामे कबीरा का परिचय है जो इमाम की पहचान का महत्वपूर्ण स्रोत है। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम इस ज़ियारत के आरंभ में १०० बार अल्लाहो अकबर कहने को आवश्यक समझते हैं क्योंकि यह एकेश्वरवाद का तर्क है। इसके पश्चात वे इमामत का दावा करने वालों के दावों को रद्द करने के लिए दुआ के रूप में पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के वास्तविक महत्व को स्पष्ट करते हैं। ज़्यारते जामे कबीरा में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों को ज्ञान का स्रोत बताना, विभिन्न पंथों की आस्था को रद्द करने के अर्थ में है जो उमवी शासकों तथा अन्य को इमाम मानते थे। तत्कालीन तथा समकालीन इस्लामी समाज की वैचारिक सोच को उचित स्वरूप देने के लिए सर्वोत्तम प्रमाण ज़्यारते जामे नामक दुआ है जो पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के अनुयाइयों के बीच वैचारिक सुदृढ़ता तथा दिगभ्रमित न होने के लिए एक दीप के समान है।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की ओर से इस प्रकार की कार्यवाही के दो आयाम थे। एक तो पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों के सामाजिक एवं मार्गदर्शन के महत्व की सुरक्षा तथा इमाम और लोगों के बीच संपर्क स्थापित करना।

दूसरे उन लोगों के विचारों को रद्द करना जो इमामत अर्थात ईश्वरीय मार्गदर्शन और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के बारे में अतिश्योक्ति करते थे।इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम उचित अवसरों से लाभ उठाकर लोगों को अब्बासियों के अवैध शासन होने के बारे में बताते और मुसलमानों को उनके साथ हर प्रकार की सहकारिता करने से दूर रहने की नसीहत करते थे।

इस प्रकार वे अब्बासी शासकों की छवि को जनता के लिए स्पष्ट करते थे। उन्होंने अत्याचारी शासकों के विरुद्ध संघर्ष करके लोगों को इस वास्तविकता से अवगत करवाया कि वे अपनी आकांक्षाओं को क्षणिक आनंद की बलि न चढ़ने दें और साथ ही इस बात को समझ लें कि अत्याचार के साथ सांठ-गांठ से एसी आग लगेगी जो उन्हें भी अपनी चपेट में ले लेगी।

अब्बासी शासन के एक कर्मचारी ने, जिनका नाम अली बिन ईसा था इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को पत्र भेजकर अब्बासी शासन के लिए काम करने और उसके बदले पैसे लेने के बारे में प्रश्न किया। उसके उत्तर में इमाम ने इस प्रकार लिखा था कि उस सीमा तक सहकारिता करने में कोई बुराई नहीं है जो विवश होकर करनी पड़ती हो किंतु उसके अतिरिक्त सहकारिता, करना उचित नहीं है। यदि वहां पर काम करने के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है तो फिर अधिक की तुलना में कम काम उचित है। यह व्यक्ति पुनः पत्र लिखकर इमाम से पूछता है कि शासन के साथ सहकारिता से उसका उद्देश्य, इस शासन को क्षति पहुंचाने के लिए अवसर की तलाश है। इसके उत्तर में इमाम लिखते हैं कि एसी स्थिति में उनके साथ सहकारिता न केवल हराम नहीं है बल्कि अच्छी है।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने अपनी इस सिफ़ारिश से संघर्ष की शैली निर्धारित की और स्षष्ट किया कि शासन को किसी भी प्रकार की वैधता प्राप्त नहीं है।अंततः इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम जैसे महान व्यक्ति को सहन करना अत्याचारी शासकों के लिए कठिन होता जा रहा था, इसीलिए उन्होंने इमाम को अपने रास्ते से हटाने का निर्णय लिया।

तत्कालीन अब्बासी शासक मोतज़ के आदेश पर एक षडयंत्र के अन्तर्गत ३ रजब २५४ हिजरी क़मरी को इमाम को शहीद कर दिया गया। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत के समाचार ने अत्याचारग्रस्त जनता को बहुत दुखी किया।

उनकी शहादत का समाचार मिलते ही बड़ी संख्या में लोग उनके घर पर एकत्रित हुए और पूरा नगर उनकी शहादत के शोक में डूब गया। श्रोताओ इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत के दुखद अवसर पर आपकी सेवा में हार्दिक संवेदना प्रकट करते हुए कार्यक्रम का अंत उन्हीं के एक कथन से करते हैं। आप कहते हैं कि धनवान होने का अर्थ यह है कि अपनी इच्छाओं को सीमित करो और जो कुछ आपके लिए पर्याप्त है उसपर सहमत रहो।

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मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक दिन मुतावक्किल के पास एक मशहूर हिन्दी जादूगर आया और उसने बहुत से करतब दिखलाए।

 मुतावक्किल ने उससे कहा मेरे दरबार में एक निहायत शरीफ़ शख़्स अनक़रीब आने वाला है अगर तू अपने करतब से उसे शर्मिन्दा कर दे तो मैं तुझे एक हज़ार अशरफ़ी इनाम दूगां।

 उसने कहा ऐ बादशाह जब वह आ जाए तो खाने का बन्दोबस्त कर और मुझे पहलू में बिठा दे मैं ऐसा करूंगा कि सख्त शर्मिन्दा होगा। यह सुन कर मुतावक्किल ख़ुश हो गया।

 जब आप तशरीफ़ लाए तो खाना लाया गया और सब खाने के लिये बैठे। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने ज्यों ही लुक़मा उठाया और तनावुल फ़रमाना चाहा उसने जादू के ज़ोर से उड़ाना दिया।

 इसी तरह उसने तीन मरतबा ऐसा किया आखि़र यह सारा मजमा हंस पड़ा।

 हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) यह देख कर उस क़ालीन की तरफ़ मुतावज्जा हुए जो दीवार में लगा हुआ था और उस पर शेर की तस्वीर बनी हुई थी।

 आपने शेरे क़ालीन को हुक्म दिया कि मुज्जसम हो कर इस काफि़रे अज़ली को निगल ले। शेर मुज्जसम हुआ और उसने बढ़ कर काफि़रे हिन्दी को मुसल्लम निगल लिया।

 इस वाकि़ये से दरबार में हलचल मच गई। मुतावक्किल सर निगूं हो गया और इमाम (अ.स.) से दरख्वास्त करने लगा कि इस शेरे क़ालीन को जो फिर अपनी हालत पर आ गया है। हुक्म दीजिए कि इस काफि़रे हिन्दी को उगल दे।

 आपने फ़रमाया यह हरगिज़ न होगा और उठ कर चले गए। एक रिवायत की बिना पर आपने जवाब दिया कि अपर मूसा के अज़दहे ने फि़रऔन के सांपों को निगल लेने के बाद उगल दिया होता तो यह शेर भी उगल देता। चूंकि उसने नहीं उगला था , इस लिए यह भी नहीं उगलेगा।

मंगलवार, 23 दिसम्बर 2025 11:00

इमाम नक़ी अलैहिस्सलाम

नाम व अलक़ाब (उपाधियाँ)

हज़रत इमाम नक़ी अलैहिस्सलाम का नाम अली व आपकी मुख्य उपाधियाँ हादी व नक़ी हैं।

 माता पिता

आपके पिता हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम व आपकी माता हज़रत समाना थीं।

 जन्म तिथि व जन्म स्थान

हज़रत इमाम नक़ी अलैहिस्सलाम का जन्म सन् 212 हिजरी क़मरी मे ज़िल- हिज्जाह मास की (15) वी तिथि को पवित्र शहर मदीने मे हुआ था।

 

शहादत (स्वर्गवास)

हज़रत इमाम नक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत सन् 254 हिजरी क़मरी मे रजब मास की तीसरी तिथी को हुई। शहादत का कारण अब्बासी शासक मोतज़ का शत्रुता पूर्ण व्यवहार था । उसने मोतमद अब्बासी के द्वारा आपको विष खिलवाया था।

 

समाधि

हज़रत इमाम नक़ी अलैहिस्सलाम की समाधि बग़दाद के समीप सामर्रा नामक स्थान पर है। जहाँ लाखो श्रद्धालु आपकी समाधि के दर्शन कर आपको सलाम करते हैं।

मंगलवार, 23 दिसम्बर 2025 10:59

हज़रत इमाम नक़ी (अ.स.) की इमामत

मामून रशीद के इन्तेक़ाल के बाद जब मोतासिम बिल्लाह ख़लीफ़ा हुआ तो उसने भी अपने अबाई किरदार को सराहा और ख़ानदानी रवये का इत्तेबा किया। उसके दिल में भी आले मौहम्मद की तरफ़ से वही जज़बात उभरे जो उसके आबाओ अजदाद के दिलों में उभर चुके थे।

 उसने भी चाहा कि आले मौहम्मद स. की कोई फ़र्द ज़मीन पर बाक़ी न रहे। चुनाचे उसने तख़्त नशीं हाते ही हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) को मदीने से बग़दाद तलब कर के नज़र बन्द कर दिया।

 इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) जो अपने आबाओ अजदाद की तरह क़यामत तक के हालात से वाकि़फ़ थे। मदीने से चलते वक़्त अपने फ़रज़न्द को अपना जां नशीन मुक़र्रर कर दिया और वह तमाम तबर्रूकात जो इमाम के पास हुआ करते हैं आपने इमाम नक़ी (अ.स.) के सिपुर्द कर दिए।

 मदीने मुनव्वरा से रवाना हो कर आप 9 मोहर्रमुल हराम 220 हिजरी को वारिदे बग़दाद हुए। बग़दाद मे आपको एक साल भी न गुज़रा था कि मोतसिम अब्बासी ने आपको ब तारीख़ 29 जि़क़ाद 220 हिजरी मे ज़हर से शहीद कर दिया।

(नूरूल अबसार सफ़ा 147)

 उसूले काफ़ी में है कि जब इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) को पहली बार मदीने से बग़दाद तलब किया गया तो रावीये ख़बर इस्माइल बिन महरान ने आपकी खि़दमत में हाजि़र हो कर कहाः मौला। आपको बुलाने वाला दुश्मने आले मौहम्मद है। कहीं ऐसा न हो कि हम बे इमाम हों जायें। आपने फ़रमाया कि हमको इल्म है तुम घबराओ नहीं इस सफ़र में ऐसा न होगा।

इस्माईल का बयान है कि जब दोबारा आपको मोतसिम ने बुलाया तो फिर मैं हाजि़र हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ कि मौला यह सफ़र कैसा रहेगा? इस सवाल का जवाब आपने आसुओें के तार से दिया और ब चश्में नम कहा कि ऐ इस्माईल मेरे बाद अली नक़ी को अपना इमाम जानना और सब्र ज़ब्त से काम लेना।

(तज़किरातुल मासूमीन सफ़ा 217)

इमाम अली नक़ी अ. ने अपनी इमामत के 7 साल मोतसिम अब्बासी के दौर में गुज़ारे, इन वर्षों में इमाम की हर गतिविधि पर हुकूमत के जासूसों कि निगाहें थीं, और आपके पास आने जाने वाले लोगों पर रोक थी, यहाँ तक आपके घर के पास एक जासूस हर वक़्त मौजूद रहता, बग़दाद और सामर्रा में रहने वाले शियों पर भी हुकूमत की कड़ी निगाह थी, यही कारण है कि यह लोग तक़य्या में जीवन बिता रहे थे, और छिप कर, अपनी पहचान बदल कर एक दूसरे से मिल रहे थे। (अल-इरशाद, पेज 286)
मोतसिम की मौत के बाद वर्ष 227 हिजरी में उसके बेटे वासिक़ ने हुकूमत संभाली, उसने अब्बासी शासक मामून के रास्ते को अपनाते हुए दरबार में मुनाज़िरे (बहस) का सिलसिला शूरू किया, और आख़िरकार वर्ष 232 हिजरी में दो तुर्कों के हाथों मार डाला गया, उसके बाद उसके भाई जाफ़र (मुतवक्किल) ने हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में ली। (तारीख़े तबरी, जिल्द 7, पेज 341)
वासिक़ एक शराबी, उग्र और कट्टर इंसान था, और मोतज़ेला फ़िरक़े के मशहूर नज़रिया कि क़ुर्आन अल्लाह की किताब है इसका कट्टर विरोधी था और उन्हें काफ़िर समझता था।
मुतवक्किल कट्टरता के साथ आले अली अ. का दुश्मन था और दुश्मनी इस हद तक थी कि इमामों की क़ब्रों की ज़ियारत पर पाबंदी लगा रखी थी, और वर्ष 235 हिजरी में इमाम हुसैन अ. के रौज़े को ढ़हाने का हुक्म दिया। (तारीख़े तबरी, जिल्द 7, पेज 365)
उसके शासन में लाखों शियों को जेल में डाल कर पीड़ा दी गई और शहीद किया गया।
और आख़िरकार वर्ष 247 हिजरी में मुतवक्किल अपने ही बेटे मुन्तसिर के हुक्म पर तुर्कों के हाथों मार डाला गया। (तारीख़े तबरी, जिल्द 7, पेज 397)।
मुन्तसिर भी छः साल से ज़्यादा हुकूमत नहीं कर सका, उसके बाद मुसतईन जो कि मोतसिम के पोता था उसका उत्तराधिकारी बना।
उन दिनों शासन की बागडोर तुर्क के लीडरों के हाथों थी, चारो ओर साज़िश, बवाल, अत्याचार, फ़क़ीरी, भूखमरी, और रिश्वत जैसी बीमारी फैल रही थी, मिस्र, खुरासान और सीस्तान के इलाक़े बनी अब्बास के हाथों से निकल गए थे, और बग़दाद में विद्रोहियों ने मुसतईन की हुकूमत का तख़्ता पलट कर दिया और उसकी जगह वर्ष 252 हिजरी में मोतज़ अब्बासी को बिठा दिया, इसका शासन काल भी तुर्कों के लीडरों के आपसी झगड़े के कारण जल्द ही समाप्त हो गया, उसने वर्ष 255 हिजरी में अपनी जगह वासिक़ के बेटे मोहम्मद मोहतदी को सत्ता में बिठा दिया। (तारीख़े याक़ूबी, जिल्द 2, पेज 505)
बनी अब्बास की इस घटिया राजनिति के समय इमाम हसन असकरी अ. सामर्रा में बहुत क़रीब से यह सब देख रहे थे, क्योंकि मोतवक्किल के हुक्म पर आपको वर्ष 233 हिजरी में सामर्रा लाया गया था। (फ़िरक़ु-श-शिया, पेज 135)
उन दिनों आप पर कड़ी निगाह रखी जा रही थी, आप और आपके असहाब और चाहने वालों का एक दूसरे से मिलना जुलना कठिन हो गया था, अब्बासियों के प्रशासन द्वारा इमाम पर अनेक प्रकार के आरोप लगाए जा रहे थे, छोटी छोटी अफ़वाहों पर इमाम को दरबार में बुला कर पूछताछ की जाती, यहाँ तक मोतवक्किल को इमाम को धमकी देने में भी शर्म नहीं आती थी, हद यह हो गई कि इमाम को उस परेड में आने पर मजबूर कर दिया जिसमें इमाम और आपके चाहने वालों को जंगी तय्यारी दिखा कर डराने की व्यवस्था की थी, ताकि इमाम और आपके साथी उसके शासन के ख़िलाफ़ आंदोलन न कर सकें।
मोतवक्किल दरबार और आम जनता के सामने इमाम अली नक़ी अ. का सम्मान करता लेकिन अकेले में इमाम के विरुध्द षडयंत्र रचता और इमाम को बदनाम करने के लिए अफ़वाहें फैलाता था।
उसने इमाम को शराब वाली सभा में बुलाने का बहुत प्रयास किया लेकिन सफ़ल न हो सका, और एक दिन इमाम पर शराब पीने का दबाव डाला लेकिन इमाम ने फ़रमाया, अभी मेरा ख़ून और मेरे बदन का गोश्त शराब से दूषित नहीं हुआ है, उसने इमाम को शहीद करने के कई नाकाम प्रयास किए और आख़िरकार इमाम को शहीद करने के लिए हाजिब के हवाले कर दिया लेकिन उससे पहले ही मोतवक्किल तुर्कों के हाथों जहन्नम जा पहुँचा और इमाम को शहीद न करा सका। (तारीख़े सियासी इमाम ज़मान, पेज 89)
मोतवक्किल के हलाक होने के बाद उसके बेटे मुन्तसिर ने सत्ता संभाली और यह आले अली अ. ख़ास कर इमाम अली नक़ी अ. पर होने वाले अत्याचार के कम होने का कारण बना, यह और बात है कि अभी दूसरे शहरों में शियों पर उसी तरह अत्याचार जारी था, इमाम ने इस थोड़े से मौक़े का लाभ उठाते हुए शियों से मिलना उनकी समस्याओं को सुनना उसका समाधान बताना शुरू कर दिया, जिस शहर में भी आपके वकील को गिरफ़्तार किया जाता आप उसी समय किसी दूसरे का चयन करते ता कि शियों से संबंध न टूटे।
शेख़ कुलैनी लिखते हैं कि, इमाम अली नक़ी के वकीलों और चाहने वालों पर हुकूमत की कड़ी निगरानी और गिरफ़्तारी का नकारात्मक असर पड़ा, जैसे, मोहम्मद इब्ने हजर का शहीद होना, सैफ़ इब्ने लैस की प्रापर्टी का ज़ब्त करना, और इसी प्रकार आपके सामर्रा में चाहने वालों का गिरफ़्तार होना, और कूफ़ा में आपके वकील अय्यूब इब्ने नूह पर वहाँ के गवर्नर की कड़ी निगरानी रखना। (कश्फ़ुल ग़ुम्मह, जिल्द 2, पेज 381-394)।
आपके युग में इसी प्रकार राजनीतिक गतिविधियाँ जारी रहीं, और इमाम हर प्रकार की सहायता अपने चाहने वालों को पहुँचाते रहे और फिर जब मोतवक्किल का बेटा मोतज़ अपने भाईयों के बाद सत्ता में आया उसने अपने बाप की अत्याचार और क्रूर शैली को बाक़ी रखते हुए इमाम को शहीद कर दिया। (तारीख़े चहारदा मासूमीन, पेज 348-349)

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की विलादत सन 57 हिजरी में रजब महीने की पहली तारीख़ को पवित्र शहर मदीना में हुआ था।हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत इमाम सज्जाद ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम व आपकी माता हज़रत फ़ातिमा पुत्री हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम हैं।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की विलादत सन 57 हिजरी में रजब महीने की पहली तारीख़ को पवित्र शहर मदीना में हुआ था।हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत इमाम सज्जाद ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम व आपकी माता हज़रत फ़ातिमा पुत्री हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम हैं।

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का पालन पोषण तीन वर्षों की आयु तक आपके दादा इमाम हुसैन व आपके पिता इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की देख रेख में हुआ। जब आपकी आयु साढ़े तीन वर्ष की थी उस समय करबला की घटना घटित हुई। तथा आपको अन्य बच्चों के साथ क़ैदी बनाया गया। अर्थात आप का बचपन विपत्तियों व कठिनाईयों के मध्य गुज़रा।

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने अपनी इमामत की अवधि में शिक्षा के क्षेत्र में जो दीपक ज्वलित किए उनका प्रकाश आज तक फैला हुआ हैं।

इमाम ने फ़िक़्ह व इस्लामी सिद्धान्तों के अतिरिक्त ज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी शिक्षण किया। तथा अपने ज्ञान व प्रशिक्षण के द्वारा ज्ञानी व आदर्श शिष्यों को प्रशिक्षित कर संसार के सन्मुख उपस्थित किया। आप अपने समय में सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे। महान विद्वान मुहम्मद इब्ने मुस्लिम, ज़ुरारा इब्ने आयुन, अबू नसीर, हश्शाम इब्ने सालिम, जाबिर इब्ने यज़ीद, हिमरान इब्ने आयुन, यज़ीद अजःली आपके मुख्यः शिष्यगण हैं।

इब्ने हज्रे हैसमी नामक एक सुन्नी विद्वान इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के ज्ञान के सम्बन्ध में लिखते है कि इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने संसार को ज्ञान के छुपे हुए स्रोतों से परिचित कराया। उन्होंने ज्ञान व बुद्धिमत्ता का इस प्रकार वर्णन किया कि वर्तमान समय में उनकी महानता सब पर प्रकाशित है। ज्ञान के क्षेत्र में आपकी सेवाओं के कारण ही आपको बाक़िरूल उलूम कहा जाता है। बाक़िरूल उलूम अर्थात ज्ञान को चीर कर निकालने वाला।

अब्दुल्लाह इब्ने अता नामक एक विद्वान कहते है कि मैंने देखा कि इस्लामी विद्वान जब इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की सभा में बैठते थे तो ज्ञान के क्षेत्र में अपने आपको बहुत छोटा समझते थे। इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम अपने कथनों को सिद्ध करने के लिए क़ुरआन की आयतें प्रस्तुत करते थे। तथा कहते थे कि मैं जो कुछ भी कहूँ उसके बारे में प्रश्न करें? मैं बताऊँगा कि वह क़ुरआन में कहाँ पर है।

एक बार इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के साथ अमवी (बनी उमैया) बादशाह हिश्शाम बिन अब्दुल मलिक मलऊन के हुक्म पर अनचाहे तौर पर शाम (सीरिया) का सफ़र किया और वहां से वापस लौटते वक़्त रास्ते में एक जगह लोगों को जमा देखा और जब आपने उनके बारे में मालूम किया तो पता चला कि यह लोग ईसाई है कि जो हर साल यहाँ पर इस जलसे में जमा होकर अपने बड़े पादरी से सवाल जवाब करते है ताकि अपनी इल्मी मुश्किलात को हल कर सके यह सुनकर इमाम मुहम्मद बाक़िर और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिमुस्सलाम भी उस मजमे में तशरीफ़ ले गए, थोड़ा ही वक़्त गुज़रा था कि वह बुज़ुर्ग पादरी अपनी शान व शौकत के साथ जलसे में आ गया और जलसे के बीच में एक बड़ी कुर्सी पर बैठ गया और चारों तरफ़ निगाह दौड़ाने लगा तभी उसकी नज़र लोगों के बीच बैठे हुए इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम पर पड़ी कि जिनका नूरानी चेहरा उनकी बड़ी शख़्सियत की गवाही दे रहा था उसी वक़्त उस पादरी ने इमाम से पूछा कि हम ईसाईयों में से हो या मुसलमानों में से?

इमाम ने जवाब दियाः मुसलमानों में से।

पादरी ने फिर सवाल कियाः आलिमों में से हो या जाहिलों में से?

इमाम ने जवाब दियाः जाहिलों में से नहीं हूँ।

पादरी ने कहा कि मैं सवाल करूँ या आप सवाल करेंगे?

इमाम ने फ़रमाया कि अगर चाहे तो आप सवाल करें।

पादरी ने सवाल कियाः तुम मुसलमान किस दलील से कहते हो कि जन्नत में लोग खाएंगे पियेंगे लेकिन पेशाब-पाखाना नहीं करेंगे? क्या इस दुनिया में इसकी कोई दलील है?

इमाम ने फ़रमाया: हाँ! इसकी दलील माँ के पेट में मौजूद बच्चा है कि जो अपना रिज़्क़ तो हासिल करता है लेकिन पेशाब-पाखाना नहीं करता।

पादरी ने कहाः तअज्जुब है आप ने तो कहा था कि आलिमों में से नहीं हूँ।

इमाम ने फ़रमाया: मैंने ऐसा नहीं कहा था बल्कि मैंने कहा था कि जाहिलों में से नहीं हूँ।

उसके बाद पादरी ने कहाः एक और सवाल है।

इमाम (अ.स) ने फ़रमाया: बिस्मिल्लाह, सवाल करे।

पादरी ने सवाल कियाः किस दलील से कहते हो कि लोग जन्नत की नेमतों जैसे फल वग़ैरह को इस्तेमाल करेंगें लेकिन वह कम नहीं होगी और पहले जैसी हालत पर ही बाक़ी रहेंगे। क्या इसकी कोई दलील है?

इमाम ने फ़रमाया: बेशक इस दुनिया में इसका बेहतरीन नमूना और मिसाल चिराग़ की लो और रौशनी है कि तुम एक चिराग़ से हज़ारों चिराग़ जला सकते हो और पहला चिराग़ पहले की तरह रौशन रहेगा और उसमें कोई कमी नहीं होगी।

पादरी की नज़र में जितने भी मुश्किल सवाल थें सबके सब इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम से पूछ डाले और उनके बेहतरीन जवाब इमाम से हासिल किए और जब वह अपनी कम इल्मी से परेशान हो गया तो बहुत ग़ुस्से में आकर कहने लगाः ऐ लोगों! एक बड़े आलिम को कि जिसकी मज़हबी जानकारी और मालूमात मुझ से ज़ियादा है यहां ले आए हो ताकि मुझे ज़लील करो और मुसलमान जान लें कि उनके रहबर और इमाम हमसे बेहतर और आलिम हैं। ख़ुदा की क़सम! फिर कभी तुमसे बात नहीं करूंगा और अगर अगले साल तक ज़िन्दा रहा तो मुझे अपने दरमियान (इस जलसे) में नहीं देखोंगे... इस बात को कह कर वह अपनी जगह से खड़ा हुआ और अंदर चला गया।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत सन 114 हिजरी में ज़िलहिज्ज महीने की सातवीं तारीख़ को सोमवार के दिन हुई। ज़ालिम बनी उमैया के ख़लीफ़ा हिश्शाम इब्ने अब्दुल मलिक मलऊन के आदेशानुसार एक षड़यंत्र के अन्तर्गत आपको ज़हर दिया गया। शहादत के समय आपकी आयु 57 वर्ष थी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की समाधि पवित्र शहर मदीना के जन्नतुल बक़ीअ नामक क़ब्रिस्तान में है। प्रत्येक वर्ष लाखों श्रृद्धालु आपकी समाधि पर सलाम व ज़ियारत हेतू जाते हैं।

बंगलादेश में रूसी राजदूत अलेक्जेंडर जी खोज़िन ने सोमवार को बंगलादेश और भारत दोनों देशों से उनके बीच जारी तनाव को और बढ़ने से रोकने का रास्ता खोजने का आग्रह किया।

ढाका में रूसी दूतावास में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, श्री खोज़िन ने कहा कि बंगलादेश के आगामी राष्ट्रीय चुनाव से पहले एक अनुकूल वातावरण बनाया जाना चाहिए और भारत के साथ तनाव कम करना आवश्यक है।

 ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, उन्होंने आगे कहा कि जितनी जल्दी दोनों देशों के बीच तनाव कम हो जाए, उतना ही अच्छा है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि रूस बंगलादेश और भारत के द्विपक्षीय संबंधों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता लेकिन उसका मानना है कि यह सुनिश्चित करना बुद्धिमानी होगी कि तनाव अपने वर्तमान स्तर से आगे न बढ़े।

 खोज़िन ने इस बात पर बल दिया कि संबंध आपसी विश्वास और भरोसे पर आधारित होने चाहिए। राजदूत ने चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा का स्वागत करते हुए आशा व्यक्त किया कि चुनाव समय पर संपन्न होंगे।

 रूसी पर्यवेक्षकों को भेजने की संभावना पर उन्होंने कहा कि रूस चुनाव आयोग के संपर्क में है और आधिकारिक निमंत्रण की प्रतीक्षा कर रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक बार फिर ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की अपनी अपील दोहराई, जिससे डेनमार्क और यूरोपीय संघ की ओर से कड़ी आपत्ति दर्ज की गई।

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, "हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है, खनिजों के लिए नहीं।" श्री ट्रंप ने फ्लोरिडा के पाम बीच में अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में संवाददाताओं से कहा, "वे कहते हैं कि डेनमार्क इसका मालिक है। डेनमार्क ने इस पर कोई पैसा खर्च नहीं किया है और न ही कोई सैन्य सुरक्षा प्रदान की है।" डेनमार्क ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार है और द्वीप से संबंधित सैन्य क्षमताएं बनाए रखता है।

ट्रंप ने लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड के लिए विशेष दूत नियुक्त करने की घोषणा की थी।ट्रंप ने कहा, "हमें इसे (ग्रीनलैंड) हासिल करना ही होगा और वह (लैंड्री) इस अभियान का नेतृत्व करना चाहते थे।