رضوی

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ईरान के प्रसिद्ध धर्मगुरु और ख़तीब हुज्जतुल-इस्लाम वल मुस्लिमीन अली रज़ा पनाहियान ने एतेकाफ को एक वैचारिक और सामूहिक इबादत बताते हुए कहा है कि जिस अंदाज़ से ईरान में एतेकाफ किया जाता है उसकी मिसाल दुनिया के किसी हिस्सों में नहीं मिलती।

,हुज्जतुल.इस्लाम पनाहियान ने ए‘तेकाफ की आध्यात्मिक गहराई और रूहानी सुंदरता पर ज़ोर देते हुए कहा कि इस इबादत के प्रचार-प्रसार की और ज़रूरत है। हालांकि, सच्चाई यह है कि कई केंद्रीय मस्जिदें अपनी सीमित क्षमता के कारण अधिक संख्या में ए‘तेकाफ करने वालों को स्वीकार नहीं कर पातीं।

उन्होंने सुझाव दिया कि जिन लोगों ने पिछले वर्षों में ए‘तेकाफ किया है, उन्हें बहुत अधिक भीड़ वाली मस्जिदों में पंजीकरण से बचना चाहिए, ताकि नए लोगों को यह अवसर मिल सके।
हुज्जतुल-इस्लाम पनाहियान ने कहा कि कुछ मस्जिदों में ए‘तेकाफ का पंजीकरण बहुत कम समय में पूरा हो जाता है, जो इस बात का संकेत है कि आम लोगों, विशेषकर युवाओं में इस इबादत के प्रति असाधारण उत्साह पाया जाता है।

उन्होंने इस प्रवृत्ति को सराहनीय बताया।उन्होंने ए‘तेकाफ की वास्तविकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ए‘तेकाफ केवल एक औपचारिक इबादत नहीं है, बल्कि यह एक “वैचारिक इबादत” है, जो इंसान को चिंतन, आत्म-निर्माण और सामूहिक चेतना की ओर ले जाती है। उनके अनुसार, इस स्तर की इबादत हमारी क़ौम की शान के अनुरूप है और इसे एक बड़ी नेमत समझना चाहिए।

हुज्जतुल-इस्लाम पनाहियान ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ए‘तेकाफ के बाद उसके व्यावहारिक और सामाजिक प्रभाव मज़बूत होने चाहिए। उन्होंने कहा कि ए‘तेकाफ करने वालों को चाहिए कि वे इस दौरान प्राप्त आध्यात्मिक अनुभवों और सीखे गए संस्कारों को मस्जिदी जीवन में स्थानांतरित करें, ताकि मस्जिदों का रूहानी माहौल और अधिक सुदृढ़ हो, युवाओं की भागीदारी बढ़े और मस्जिद मोहल्ले की सामाजिक समस्याओं के समाधान में प्रभावी भूमिका निभा सके।

उन्होंने स्पष्ट किया कि ए‘तेकाफ केवल व्यक्ति और ईश्वर के बीच संबंध को बेहतर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सामूहिक जीवन को भी सशक्त बनाना है। इसी कारण इस्लाम ने इ‘तिकाफ के लिए जामे मस्जिद को प्राथमिकता दी है, ताकि इंसान समाज के भीतर रहते हुए ईश्वर के निकटता प्राप्त करे और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना भी जागृत हो।

 आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमोली ने ख़ानदानी निज़ाम के तनाज़ुर में इंसान की ज़िम्मेदारियों पर रौशनी डालते हुए फ़रमाया है कि इंसान माज़ी और मुस्तक़बिल के दरमियान खड़ा है। इस लिए उस पर लाज़िम है कि वह न सिर्फ़ अपने वालिदैन और बुज़ुर्गों के हुक़ूक़ को फ़रामोश न करे, बल्कि आने वाली नस्ल की सही तरबियत और रहनुमाई की भी फ़िक्र करे।

 आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमोली ने कहा कि इंसान की ज़िम्मेदारी दो जानिब होती है एक जानिब माज़ी की तरफ़ और दूसरी जानिब मुस्तक़बिल की तरफ़।
आपने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सीरत की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया कि नेक और सालेह औलाद, जैसे हज़रत इस्माईल और हज़रत इस्हाक अलैहिमस्सलाम, ख़ुदा की अज़ीम नेमत हैं।

इसी वजह से हज़रत इब्राहीम (अ.) ने बढ़ापे में यह नेमत मिलने पर बारगाह-ए-इलाही में शुकर अदा किया,
اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِي وَهَبَ لِي عَلَى الْكِبَرِ إِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ”
यह शुकरगुज़ारी उनके बुलंद मक़ाम और आला रुहानी मरतबे की अलामत है।

आयतुल्लाह जवादी आमोली ने मज़ीद फ़रमाया कि इंसान का फ़र्ज़ है कि एक तरफ़ वह अपने वालिदैन, उस्तादों और उन तमाम अफ़राद के लिए दुआ और नेक आमाल अंजाम दे, जिन्होंने उसकी तरबियत में किरदार अदा किया है, ताकि वे ख़ुदा की ख़ास रहमत से बहरेमंद हों।और दूसरी तरफ़ वह अपनी औलाद और आने वाली नस्ल की दीनी और अख़लाक़ी तरबियत के लिए संजीदा कोशिश करे।

हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने अपनी दुआओं में इसी तवाज़ुन को पेश किया। एक मक़ाम पर आपने अपने वालिदैन और तमाम अहल-ए-ईमान के लिए मग़फ़िरत तलब की,ऐ हमारे रब! मुझे, मेरे वालिदैन को और तमाम मोमिनीन को उस दिन बख़्श देना, जब हिसाब क़ायम होगा।

और दूसरी जगह अपनी नस्ल के लिए नमाज़ की पाबंदी और दुआ की क़ुबूलियत की दुआ की,ऐ मेरे रब! मुझे नमाज़ क़ायम करने वाला बना और मेरी औलाद में से भी, ऐ हमारे रब! और मेरी दुआ क़ुबूल फ़रमा।
तफ़सीर-ए-तसनीम, जिल्द 44, पेंज 164

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नमाज़ी ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम कि बे मिसाल फ़ज़ाइल पर ज़ोर देते हुए कहा कि आपؑ का अद्ल व इंसाफ़ और अवाम-दोस्ती इस्लामी निज़ाम के ज़िम्मेदारान के लिए एक नाक़ाबिल-ए-नज़रअंदाज़ और क़ाबिल ए तक़लीद नमूना है।

 मशहूर उस्ताद-ए-हौज़ा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रूहुल्लाह नमाज़ी ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अलीؑ के बुलंद-ओ-बाला मक़ाम की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि हज़रत अलीؑ की शख़्सियत इतनी अज़ीम है कि उसकी हक़ीक़ी तौसीफ़ सिर्फ़ ख़ुदावंद-ए-मुतआल और रसूल-ए-अकरम (स.ल.) ही कर सकते हैं।

क़ुरआन-ए-करीम की मुतअद्दिद आयात और उनके शान-ए-नुज़ूल में हज़रत अली की नुमायाँ मौजूदगी इस हक़ीक़त की वाज़ेह दलील है।

उन्होंने कहा कि रसूल-ए-ख़ुदा स.ल. हज़रत अलीؑ को अपनी जान क़रार देते थे, जिस पर आयत-ए-मुबाहला वाज़ेह तौर पर गवाह है। हज़रत अली वह पहले मर्द हैं जिन्होंने रसूल-ए-अकरम (स.ल.) पर ईमान लाया और बचपन ही से आप की आग़ोश-ए-तरबियत में परवान चढ़े।

उस्ताद-ए-हौज़ा ने मज़ीद कहा कि ख़ाना-ए-काबा के अंदर विलादत हज़रत अलीؑ का एक मुनफ़रिद और बे-मिसाल शरफ़ है, जो यहाँ तक कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर भी फ़ज़ीलत रखते है, क्योंकि हज़रत मरियम विलादत के वक़्त मस्जिद से बाहर गईं, जबकि हज़रत फ़ातिमा बिन्त-ए-असद ने काबा के अंदर हज़रत अली को जन्म दिया।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नमाज़ी ने कहा कि अगरचे हज़रत अलीؑ के फ़ज़ाइल की बुलंदी तक पहुँचना मुमकिन नहीं, लेकिन नहजुल बलाग़ा एक अज़ीम ख़ज़ाना है जो आपؑ के हिकमत-आमेज़ फ़रामीन का एक हिस्सा हमारे सामने पेश करता है।

ख़ुसूसन अहदनामा-ए-मालिक अश्तर इस्लामी हुकमरानी के लिए एक जामे, अमली और मुकम्मल दस्तूर है। अगर निज़ाम के ज़िम्मेदारान इन हिदायात पर अमल करें तो हक़ीक़ी मआनों में इस्लामी निज़ाम क़ायम हो सकता है।

उन्होंने वज़ाहत की कि हज़रत अलीؑ अपने दौर-ए-हुकूमत में हमेशा अवाम के दरमियान रहे और आपकी ज़िंदगी आम लोगों के औसत मयार से भी ज़्यादा सादा थी। आपकी बुनियादी तवज्जो अद्ल के क़याम और बैतुल-माल के तहफ़्फ़ुज़ पर थी, यहाँ तक कि अद्ल की ख़ातिर अपने भाई अकील को भी महरूम करने पर आमादा थे और अगर ज़रूरत पड़ती तो अपनी बेटी पर भी हद जारी करने से दरीग़ नहीं करते।

उस्ताद-ए-हौज़ा के मुताबिक़ यही सख़्त और ग़ैर-मुसलिहत-पसंद अद्ल था जिसने दुश्मनों को इस हद तक बे-चैन किया कि बिलआख़िर हज़रत अलीؑ को मिहराब-ए-इबादत में शहीद कर दिया गया। दौलतमंद और ग़रीब, सियाह व सफ़ेद, अरब व अजम के दरमियान कामिल मुसावात ही अलवी सीरत का हक़ीक़ी जौहर है।

उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि हमें महज़ हज़रत अलीؑ से मुहब्बत के मरहले पर इक़्तिफ़ा नहीं करना चाहिए, बल्कि आपके अहकाम और तालीमात की अमली पैरवी की मंज़िल तक पहुँचना होगा, क्योंकि क़ुरआन-ए-करीम साफ़ अल्फ़ाज़ में हुक्म देता है
«أَطِیعُوا اللَّهَ وَأَطِیعُوا الرَّسُولَ وَأُولِی الْأَمْرِ مِنْکُمْ»
यानी: अल्लाह की इताअत करो, रसूल की इताअत करो और साहिबान-ए-अम्र की इताअत करो।

 हरम ए मुतह्हर ए अलवी अ.स.में अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) के हफ्ता-ए-विलादत-ए-बासआदत के आग़ाज़ के साथ ही सहन-ए-मुतह्हर ए हैदरी में “वलीदुल काबा का परचम लहराया गया।

 वलीदुल काबा का परचम लहराने की तक़रीब इतवार, 8 रजब 1447 हिजरी, मुताबिक़ 28 दिसंबर 2025 की सुबह, आस्तान-ए-मुक़द्दस-ए-अलवी के सहन-ए-मुतह्हर-ए-हैदरी में “अली हुब्बे अली” के शिआर के साथ मुनअक़िद हुई।

हजरत अली अलैहिस्सलाम की विलादत के मौके पर गुंबदे इमामे अली अ.ल. पर परचम लगाया गया

यह तक़रीब अमीरुल-मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) की विलादत-ए-बासआदत की आमद के मौक़े पर “हफ्ता-ए-वलीदुल-काबा” के प्रोग्रामों का बक़ायदा आग़ाज़ है।

इस तक़रीब में आस्तान ए मुक़द्दस-ए-अलवी के मुदीर-ए-आला सैयद ईसा अलख़ुरासान अपने नायब, बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ के अराकीन, मुख़्तलिफ़ शोबाजात के सरबराहों और मुम्ताज़ उलेमा, इल्मी और समाजी शख़्सियात के हमराह शरीक हुए।

हजरत अली अलैहिस्सलाम की विलादत के मौके पर गुंबदे इमामे अली अ.ल. पर परचम लगाया गया

तक़रीब का आग़ाज़ तिलावत ए आयात ए क़ुरआन-ए-करीम से हुआ, इसके बाद बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ के रुक्न हैदर अल-ईसावी ने तजदीद-ए-अहद और वफ़ादारी के मौज़ू पर ख़िताब किया, जबकि मज़हबी तराने भी पेश किए गए।

रिपोर्ट के मुताबिक, हफ्ता-ए-वलीदुल-काबा” के दौरान मुख़्तलिफ़ मज़हबी और सक़ाफ़ती प्रोग्रामों के साथ-साथ अवामी जश्न मुनअक़िद किए जाएंगे, और इसी अरसे में सूबा-ए-नजफ़-ए-अशरफ़ में कई ख़िदमाती मंसूबों का इफ्तिताह भी किया जाएगा।

हजरत अली अलैहिस्सलाम की विलादत के मौके पर गुंबदे इमामे अली अ.ल. पर परचम लगाया गया

 इज़राइल सरकार द्वारा सोमालीलैंड को मान्यता देने के फैसले पर अरब लीग और संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने आपात बैठक बुलाने का फैसला किया है।

 इज़राइल सरकार के इस विवादित फैसले के बाद अरब लीग और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस मुद्दे पर तुरंत बैठक करने की घोषणा की है।

अरब लीग के सचिवालय ने कहा है कि इस मामले पर एक आपात बैठक होगी, ताकि इज़राइल के इस विवादित फैसले पर चर्चा की जा सके।

इसी तरह, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी घोषणा की है कि सोमालिया के अनुरोध पर सोमवार को एक बैठक आयोजित की जाएगी।

सोमालीलैंड को मान्यता देने के इस फैसले पर अरब और इस्लामी देशों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी आलोचना हुई है।कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों और सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का गंभीर उल्लंघन बताया है।

पिछले दो दिनों में इटली के बड़े शहरों में देश-व्यापी स्तर पर बड़े पैमाने पर हड़ताल और प्रदर्शन देखने को मिले। ये विरोध प्रदर्शन ग़ज़्ज़ा के लोगों के साथ एकजुटता दिखाने और इटली की आंतरिक तथा विदेश नीति के ख़िलाफ़ जनता के ग़ुस्से को व्यक्त करने के लिए किए गए।

इटली के कई बड़े क्षेत्रों द्वारा की गई 24 घंटे की हड़ताल के कारण सार्वजनिक परिवहन, रेलवे, विमान सेवाएं, सरकारी सेवाएं और शिक्षा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुए।

विभिन्न यूनियनों द्वारा जारी बयान में कहा गया कि इटली सरकार की आर्थिक और सामाजिक नीतियाँ अनुचित रूप से कम आय वाले परिवारों और मज़दूर वर्ग पर बोझ डाल रही हैं, जिससे जनता में गहरी निराशा फैल गई है।

हालाँकि, ये हड़तालें केवल आर्थिक असंतोष तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि जल्द ही उन्होंने एक मज़बूत राजनीतिक और मानवीय रूप ले लिया। इस बार देश के अलग-अलग शहरों में हज़ारों छात्र और मानवाधिकार कार्यकर्ता फ़िलिस्तीन के झंडों के साथ मार्च में शामिल हुए।

प्रदर्शनकारियों ने ग़ज़्ज़ा में जारी युद्ध को तुरंत समाप्त करने, नाकाबंदी हटाने और ग़ज़्ज़ा तथा पश्चिमी तट में आम नागरिकों की सुरक्षा की माँग की।इन प्रदर्शनों के आयोजकों ने कहा कि यह युद्ध और नरसंहार मानव गरिमा और सामाजिक अधिकारों पर बातचीत को असंभव बना चुका है, जबकि ग़ज़्ज़ा में हर दिन महिलाएँ और बच्चे मारे जा रहे हैं।

यह विरोध प्रदर्शन और हड़ताल हाल के हफ्तों में फ़िलिस्तीन के समर्थन में इतालवी यूनियनों की ओर से दूसरा बड़ा जन-आंदोलन है, जो फ़िलिस्तीनी अधिकारों के लिए बढ़ते जनसमर्थन और यूरोप में जारी युद्ध के ख़िलाफ़ बढ़ती नाराज़गी को साफ़ तौर पर दर्शाता है।

आयतुल्लाह मुहम्मद बाक़िर तहरीरी ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम के ख़ास सहाबी रुमैला रह. की रिवायत बयान करते हुए इमाम ए मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की अपने शियाओं के साथ बेमिसाल रहमत, हमदर्दी और दिली लगाव को उजागर किया। उन्होंने कहा कि मशरिक़ से मग़रिब तक मौजूद कोई भी मोमिन, अहले-बैत अ.स.की तवज्जोह, दुआओं और हमदर्दी से महरूम नहीं है।

 आयतुल्लाह मुहम्मद बाक़िर तहरीरी ने अपनी एक तक़रीर में इमाम ए मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की शफ़क़त व मेहरबानी के विषय पर बात करते हुए, अमीरुल-मोमिनीन अलैहिस्सलाम के क़रीबी सहाबी रुमैला रह. की रिवायत बयान की।

रुमैला रह. बयान करते हैं:मैं अमीरुल-मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज़माने में सख़्त बीमार हो गया था, यहाँ तक कि एक जुमे के दिन मुझे कुछ आराम महसूस हुआ। मैंने सोचा कि ग़ुस्ल करके मस्जिद जाऊँ और अमीरुल-मोमिनीन ؑ की इमामत में नमाज़ अदा करूँ।

मैं मस्जिद पहुँचा, लेकिन जब हज़रत मिम्बर पर तशरीफ़ लाए तो मेरी हालत फिर बिगड़ गई। नमाज़ के बाद, जब अमीरुल-मोमिनीन ؑ मस्जिद से निकलकर दारुल-हुकूमत तशरीफ़ ले गए, तो मैं भी उनके साथ अंदर गया।

हज़रत ने फ़रमाया,ऐ रुमैला! मैंने देखा कि तुम तकलीफ़ में थे।मैंने अर्ज़ किया: जी हाँ, और अपनी बीमारी व नमाज़ में शरीक होने की वजह बयान की।इस पर अमीरुल-मोमिनीन ؑने फ़रमाया:
‘ऐ रुमैला! कोई मोमिन बीमार नहीं होता मगर यह कि हम भी उसकी बीमारी में शरीक हो जाते हैं, कोई मोमिन ग़मगीन नहीं होता मगर यह कि हम भी उसके ग़म में ग़मगीन हो जाते हैं; कोई दुआ नहीं करता मगर यह कि हम उसकी दुआ पर आमीन कहते हैं; और अगर वह ख़ामोश भी रहे, तो हम उसके लिए दुआ करते हैं।

मैंने अर्ज़ किया,ऐ अमीरुल-मोमिनीन! यह बात शायद उन मोमिनों के बारे में हो जो यहाँ आपके सामने मौजूद हैं, लेकिन जो लोग ज़मीन के दूसरे हिस्सों में हैं, उनके बारे में क्या?

इस पर इमाम अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया,
ऐ रुमैला! मशरिक़ और मग़रिब में कोई भी मोमिन हमसे ओझल नहीं है।

आयतुल्लाह तहरीरी ने कहा कि यह रिवायत इमामे अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की वह सर्वोच्च शफ़क़त और मेहरबानी बयान करती है जो एक इंसान दूसरे इंसान के लिए रख सकता है बल्कि हक़ीक़त में यह अल्लाह तआला की रहमत और मेहरबानी का मुकम्मल मज़हर है।

दक्षिणी कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन में एक बार फिर फ़िलिस्तीनी कबीलों और इज़राईली सुरक्षा बलों के बीच तनाव देखा गया। इस दौरान फ़िलिस्तीनी निवासियों ने ज़ायोनी सरकार के आंतरिक सुरक्षा मंत्री इतामार बेनगेयर के दौरे के समय उस पर पथराव किया।

दक्षिणी कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन में फ़िलिस्तीनी कबीलों और ज़ायोनी बलों के बीच हालात फिर से बिगड़ गए, जहां फ़िलिस्तीनी लोगों ने ज़ायोनी मंत्री बेन ग्वीर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए पत्थर फेंके।
ज़ायोनी सूत्रों ने रविवार को बताया कि दक्षिणी कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन के बद्दू (कबीलाई) गांव तराबीन में बेनगोयर के दौरे के दौरान कई फ़िलिस्तीनी नागरिकों ने उस पर पथराव किया।

यह घटना ऐसे समय में हुई जब ज़ायोनी सुरक्षा बलों की हालिया कार्रवाइयों के कारण इलाके में पहले से ही भारी तनाव मौजूद था।

ज़ायोनी चैनल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही बेन ग्वीर गांव में दाख़िल हुआ, दर्जनों फ़िलिस्तीनी निवासी ज़ायोनी पुलिस के सामने आ गए और मंत्री की ओर पत्थर फेंके। रिपोर्ट में कहा गया कि हालात तेज़ी से बिगड़ गए, जिसके बाद पूरे इलाके को कड़ी सुरक्षा घेरे में ले लिया गया।

चैनल 14 के पत्रकार यिनोन मागाल ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (X) पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें देखा जा सकता है कि बेन ग्वीर भारी पुलिस सुरक्षा के बीच गांव में प्रवेश कर रहा है। हालांकि ज़ायोनी सूत्रों का कहना है कि बेन ग्वीर पर सीधे हमले के दृश्य इज़राइली मीडिया में सेंसर कर दिए गए हैं।

एक रिपोर्टों के अनुसार, फ़िलिस्तीनी नागरिकों के विरोध और पथराव के जवाब में ज़ायोनी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इस कार्रवाई में कई लोगों के प्रभावित होने की खबरें हैं, लेकिन ज़ायोनी अधिकारियों ने कोई विस्तृत जानकारी जारी नहीं की है।

गौरतलब है कि तराबीन गांव और दक्षिणी कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन के अन्य बद्दू इलाके पिछले कई वर्षों से फ़िलिस्तीनी निवासियों और ज़ायोनी बलों के बीच तनाव का केंद्र बने हुए हैं। इन झड़पों की मुख्य वजहों में ज़ायोनी सुरक्षा कार्रवाइयां, फ़िलिस्तीनी घरों को गिराना और ज़मीन व संपत्ति से जुड़े विवाद शामिल हैं।

बेन गेयर के ऐसे दौरे आमतौर पर फ़िलिस्तीनी जनता में ग़ुस्से और आक्रोश का कारण बनता हैं, क्योंकि उन्हें फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ कठोर और भड़काऊ नीतियों का समर्थक माना जाता है। विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह के कदम क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा रहे हैं।

तेहरान के प्रसिद्ध उस्ताद-ए-अख़लाक़ उस्ताद मुहम्मद बाक़िर तहरीरी ने माहे-रजब की रूहानी और मानवीय अहमियत पर रोशनी डालते हुए कहा कि माहे-रजब अल्लाह तआला का महीना है, जिसमें ख़ास तौर पर इलाही रहमत नाज़िल होती है। यह रहमत उन्हीं लोगों को नसीब होती है जो अल्लाह के रहेमाना अहकामात की अमली पैरवी करते हैं, और इसकी बुनियाद वाजिबात की पाबंदी और मुहर्रमात से परहेज़ है।

उस्ताद तहरीरी ने कहा कि माहे-रजब इस्तिग़फ़ार और दुआ का महीना है। इस्तिग़फ़ार का मक़सद अंदरूनी आलूदगियों को दूर करना है, लेकिन अगर इंसान जानबूझकर गुनाहों में मुब्तला रहे और सिर्फ़ ज़बानी इस्तिग़फ़ार पर इक्तिफ़ा करे, तो उसका असर कम हो जाता है। असल ज़रूरत यह है कि इंसान इताअत-ए-इलाही का पुख़्ता इरादा करे।

उस्ताद तहरीरी ने रसूल-ए-अकरम स.ल. की एक हदीस का हवाला देते हुए बताया कि माहे-रजब में अल्लाह तआला सातवें आसमान पर एक फ़रिश्ता मुक़र्रर फ़रमाता है, जो रात की शुरुआत से सुबह तक पुकारता रहता

طوبی للذاکرین، طوبی للطائعین

(ख़ुशख़बरि है अल्लाह को याद करने वालों के लिए, ख़ुशख़बरि है इताअत करने वालों के लिए)

उन्होंने वाज़ेह किया कि वास्तविक “तूबा” और सच्ची ख़ुशबख़्ती इसी में है कि इंसान अमीरुल-मोमिनीन अलीؑ की विलायत के दायरे में हो।

उन्होंने ज़िक्र की दो क़िस्में बयान कीं, ज़िक्र-ए-ज़बानी और ज़िक्र-ए-अमली। ज़िक्र-ए-अमली दरअसल इताअत है, और इसकी बुनियाद यह है कि इलाही वाजिबात को ज़िंदगी के तमाम पहलुओं में लागू किया जाए। अगर इसमें कोताही हो, तो उसके नकारात्मक असर ज़ाहिर होते हैं।

उस्ताद तहरीरी ने इस नुक्ते की ओर भी तवज्जोह दिलाई कि कभी-कभी इंसान एक वाजिब अदा करता है, लेकिन दूसरे वाजिब को छोड़ देता है; या नमाज़ पढ़ता है, मगर गुनाहों से परहेज़ नहीं करता। इस तरह आमाल एक-दूसरे के असर को कमज़ोर कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर नमाज़ अदा करना नेकी है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति बद-हिजाबी जैसे गुनाह में मुब्तला हो, तो उसकी इस्लाह नरमी और हिकमत के साथ ज़रूरी है।

उन्होंने कहा कि सकारात्मक पहलुओं की निशानदेही के साथ-साथ नकारात्मक बातों पर भी नरम लहजे में तंबीह होनी चाहिए। हम एक शिया समाज में रहते हैं, जहाँ दुश्मनियाँ और आज़माइशें हमेशा रही हैं और ज़ुहूर-ए-इमाम-ए-ज़मानाؑ तक रहेंगी, लेकिन हमें मैदान छोड़ने या अहले-बैतؑ से दूर होने की इजाज़त नहीं हैं।

माहे-रजब की दुआओं पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि इस महीने में गहरे मआनी वाली दुआएँ मौजूद हैं, ख़ास तौर पर नमाज़ों के बाद पढ़ी जाने वाली दुआएँ—जिनमें “या मन अर्जूहु लिकुल्ले ख़ैर” जैसी दुआ शामिल है। अगर रोज़ाना सब कुछ मुमकिन न हो, तो कम से कम इन्हें पूरी तरह छोड़ न दिया जाए।आख़िर में उस्ताद तहरीरी ने कहा कि माहे-रजब में बअसत-ए-रसूल-ए-अकरम स.ल. और विलादत-ए-अमीरुल-मोमिनीन अलीؑ जैसी अज़ीम मुनासबतें हैं, जिनसे ग़फ़लत नहीं बरतनी चाहिए।

उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला इस मुल्क पर अपनी ख़ास रहमत नाज़िल फ़रमाए, इमाम-ए-ज़मानाؑ की इनायतें इस उम्मत को नसीब हों, और इस्लामी इंक़ेलाब जो हज़रत इमाम ख़ुमैनीؒ और रहबर-ए-मुअज़्ज़म की बेमिसाल क़ियादत में तमाम साज़िशों के बावजूद महफ़ूज़ है को और मज़बूती अता फ़रमाए।

उन्होंने ताकीद की कि हम सबको अहले-बैतؑ और इमाम-ए-ज़मानाؑ के साथ दिली, अमली और दुआई ताल्लुक़ को हमेशा ज़िंदा रखना चाहिए।

 

अलवी समुदाय के नेता, इराकी धार्मिक और राजनीतिक नेता मुक्तदा सद्र और यूनाइटेड नेशंस ने सीरिया के हुम्स शहर में इमाम अली बिन अबी तालिब मस्जिद को निशाना बनाकर किए गए भयानक आतंकी धमाके पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ऐसी खबरें हैं कि हमले में बच्चों, बुजुर्गों और आम लोगों समेत कम से कम 12 लोग मारे गए और 30 से ज़्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

अलावी समुदाय के नेता, इराकी धार्मिक और राजनीतिक नेता मुक्तदा सद्र और यूनाइटेड नेशंस ने सीरिया के होम्स शहर में इमाम अली बिन अबी तालिब मस्जिद को निशाना बनाकर किए गए भयानक आतंकी धमाके पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ऐसी खबरें हैं कि हमले में बच्चों, बुजुर्गों और नागरिकों सहित कम से कम 12 लोग मारे गए और 30 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

सीरिया की अलावी इस्लामिक सुप्रीम काउंसिल ने अपने बयान में इस आतंकवाद की कड़ी निंदा की और वर्तमान शासक को इन घटनाओं के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। बयान में कहा गया है कि यह हमला किसी व्यक्तिगत या अस्थायी कार्रवाई का नतीजा नहीं है, बल्कि संगठित तकफ़ीरी आतंकवाद का सिलसिला है, जो अलावी समुदाय सहित अन्य सीरियाई समुदायों के खिलाफ बढ़ रहा है। काउंसिल के मुताबिक, इस तरह के हमले पहले भी देखे गए हैं, जिसमें दमिश्क में एक चर्च और अल-तन्फ़ में अमेरिकी सैनिकों पर हमले शामिल हैं, जो इसी मानसिकता और योजना का संकेत देते हैं। अलावी नेता ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, सुरक्षा परिषद और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से तत्काल और प्रभावी कार्रवाई करने के साथ-साथ सीरिया के तटीय क्षेत्रों को अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा प्रदान करने का आह्वान किया। अलावी समुदाय, मुक्तदा अल-सद्र और यूनाइटेड नेशंस ने कड़ी निंदा की

हुम्स में इमाम अली मस्जिद पर आतंकी हमला; अलवी समुदाय, मुक्तदा सद्र और यूनाइटेड नेशंस ने की कड़ी निंदा

दूसरी ओर, सैयद मुक्तदा सद्र ने भी इमाम अली मस्जिद में हुए धमाके की कड़ी निंदा की और सीरियाई सरकार से सांप्रदायिक कट्टरता पर तुरंत रोक लगाने की अपील की। ​​उन्होंने कहा कि पूजा की जगहों को निशाना बनाना अल्लाह का अपमान है, लेकिन किसी बेगुनाह का खून बहाना उससे भी बड़ा जुर्म है। उन्होंने इमाम अली (अ) के शब्दों को कोट किया और साफ किया कि इंसान या तो धार्मिक भाई हैं या दुनिया में बराबर हैं।

हुम्स में इमाम अली मस्जिद पर आतंकी हमला; अलवी समुदाय, मुक्तदा सद्र और यूनाइटेड नेशंस ने की कड़ी निंदा

दूसरी ओर, यूनाइटेड नेशंस  सेक्रेटरी-जनरल गुटेरेस ने भी इस खूनी हमले की कड़ी निंदा की और आम लोगों और पूजा की जगहों पर हमलों को नामंज़ूर बताया। उनके प्रवक्ता के अनुसार, ज़िम्मेदार लोगों की पहचान करना और उन्हें ज़िम्मेदार ठहराना ज़रूरी है, साथ ही शहीदों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई गई है और घायलों के जल्दी ठीक होने की प्रार्थना की गई है।