رضوی
इमाम ए ज़माना अ.ज. की मारेफत नहीं तो कोई क़द्र व क़ीमत नहीं।
अमीर ए क़लाम, अमीर-ए-बयान, मौला-ए-मुत्तक़ियान अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया,हर इंसान की क़द्र व क़ीमत उसकी मारेफत के हिसाब से है।
अमीर ए क़लाम, अमीर-ए-बयान, मौला-ए-मुत्तक़ियान अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया,हर इंसान की क़द्र व क़ीमत उसकी मारेफत के हिसाब से है।
यानि जिसके पास जितनी मारेफत है उसकी उतनी ही क़द्र व क़ीमत है। अब सवाल ये उठता है कि ये मारेफ़त (पहचान) है क्या? इसका जवाब भी अहलेबैत (अ.स.) की रवायतों में मौजूद है। जैसा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:"ऐ लोगो! अल्लाह ने बंदों को सिर्फ़ इस लिए पैदा किया है कि वो उसकी मारेफत हासिल करें। (उसे पहचान लें) जब वो उसे पहचान लें तो उसकी इबादत करें और जब उसकी इबादत करें तो ग़ैर (-ए-ख़ुदा) की इबादत से बेनियाज़ हो जाएं।
एक शख़्स ने पूछा:ऐ रसूल के बेटे! अल्लाह की मारेफत (पहचान) क्या है?तो इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया:हर दौर के लोगों के लिए उस दौर के इमाम की मारेफत (पहचान) है जिसकी इताअत (फ़रमांबरदारी) उन पर लाज़िम है।" (इललुश-शरायअ ज1, स9)
इन दोनों हदीसों से साफ़ होता है कि ग़ैबत-ए-कुबरा के ज़माने में इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) की मारेफत (पहचान) बेहद ज़रूरी है। क्योंकि जिसे इमाम-ए-वक़्त की मारेफत नहीं उसे अल्लाह की मारेफत नहीं, और जिसे अल्लाह की मारेफत नहीं वो अल्लाह की इबादत नहीं कर सकता। ऐसा इंसान ग़ैर-ख़ुदा से बेनियाज़ और बेज़ार भी नहीं हो सकता और ऐसे इंसान की न तो कोई क़द्र व क़ीमत है और न ही कोई अहमियत है।
चूंकि इमामत का अकीदा सिर्फ़ दुनिया में ही काम नहीं आता बल्कि आख़ेरत में भी काम आएगा। अगर किसी का अक़ीदा ए इमामत सही नहीं है, यानी उसे इमाम-ए-वक़्त की पहचान नहीं है तो वो दुनिया में भी घाटा उठाएगा और आख़ेरत में भी घाटा उठेगा।
इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया:
"लोगों पर तीन चीज़ें लाज़िम हैं: इमामों की पहचान, उनके सामने तस्लीम हो जाना (सर झुका देना) और जिस मसअले में इख़्तिलाफ़ हो उसे उन्हीं के हवाले करना।" (वसाइलुश-शिया, ज27, स67)
इसी तरह रवायत है कि:
"जिसने चार चीज़ों में शक किया उसने अल्लाह की सारी नाज़िल की हुई चीज़ों का इंकार किया। इनमें से एक है हर दौर के इमाम की पहचान है, कि ख़ुद इमाम को उनके सिफ़ात (गुण) के साथ पहचाने।" (बिहारुल-अनवार, ज69, स135)
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया:
"जिसने मेरे बेटे क़ायेम (अ.ज.) का उसकी ग़ैबत के वक़्त में इंकार किया तो वो जाहिलियत की मौत मरा।" (सदूक़, ज2, स412)
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से ही रवायत है:
"जो शख़्स ऐसी हालत में रात गुज़ारे कि अपने दौर के इमाम को न पहचानता हो तो उसकी मौत जाहिलियत की मौत है।" (नोमानी, स127)
यानि अगर किसी के पास इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) की मारेफत (पहचान) नहीं है तो उसकी मौत जाहिलियत की मौत है और ऐसे शख़्स का आख़ेरत में घाटा ही घाटा है। दुनिया में भी उसका नुक़सान होगा, क्योंकि इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) का इंकार सिर्फ़ उनका इंकार नहीं बल्कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.) का इंकार है। जैसा कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया: "जिसने मेरे बेटे क़ायेम (अ.ज.) का इंकार किया उसने मेरा इंकार किया।" (कमालुद्दीन, ज2, स412)
यानि इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) का मुंकिर रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.) का मुंकिर है। और जो रसूल का इंकार करे वो इस्लाम के दायरे में नहीं है। उस पर इस्लाम के अहकाम लागू नहीं होंगे! ऐसे इंसान का ज़ाहिर भी नापाक है और बातिन भी।
इसलिए ज़रूरी है कि इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) की मारेफत (पहचान) हासिल की जाए ताकि ईमान और इस्लाम बाक़ी रह सके।
मारेफ़त-ए-इमाम के बारे में रवायतें बहुत हैं जिनमें से एक यह है कि हिशाम बिन सालिम ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से रवायत की कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया: "क़ायम मेरी औलाद में से है। उसका नाम मेरा नाम होगा और उसकी कुन्नियत मेरी कुन्नियत होगी।
वो शक्ल व सूरत और रंग-रूप में मेरे जैसा होगा। महदी मेरी सुन्नत के साथ ज़हूर करेगा, लोगों को मेरी मिल्लत और शरीअत की तरफ़ बुलाएगा और उन्हें किताबुल्लाह (क़ुरआन) की तरफ़ दावत देगा। जिसने उसकी इताअत की उसने मेरी इताअत की और जिसने उसकी नाफ़रमानी की उसने मेरी नाफ़रमानी की।
जिसने उसकी ग़ैबत का इंकार किया उसने मेरा इंकार किया, जिसने उसे झुटलाया उसने मुझे झुटलाया और जिसने उसकी तस्दीक़ की उसने मेरी तस्दीक़ की। मैं अल्लाह के सामने उन लोगों की शिकायत करूंगा जो उसके बारे में मेरी कही बातों को झुटलाएँगे और मेरी उम्मत को उसके रास्ते से भटकाएँगे। और जल्द ही ज़ालिम अपने अंजाम को देख लेंगे।" (कमालुद्दीन, ज2, स411)
इस हदीस से साफ़ होता है कि जो भी इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) के बारे में कोताही करेगा, इंकार करेगा, उनके बारे में हदीस-ए-नबवी का इंकार करेगा, लोगों को उनके रास्ते से हटाएगा और गुमराही का रास्ता दिखाएगा, वो ज़ालिमों में शामिल होगा।
और कुरआन के मुताबिक़ ज़ालिम न तो लायक़-ए-हिदायत हैं और न ही क़ाबिल-ए-क़ियादत। उनका ठिकाना जहन्नम है। जहन्नमियों की न कोई क़द्र व क़ीमत हैं और न ही कोई अहमियत। इसलिए ये साबित होता है कि अगर इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) की मारेफत (पहचान) नहीं तो कोई क़द्र व क़ीमत नहीं।
हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.ल.कि शहदत के मौके पर पूरे ईरान में शोक का माहौल
ईरान और विशेष रूप से क़ुम अलमुकद्देसा में आठवें इमाम अली रज़ा अ.स. की बहन हज़रत फ़ातिमा मासूमा शहादत के मौके पर मोमनिन ने ग़म मानते हुए अजादारी की।
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. 10 रबीउस्सानी की बरसी का दिन था हज़रत मासूमा का स्वर्गवास क़ुम में हुआ था और इसी शहर में उनका रौज़ा स्थित है।
हज़रत मासूमा का रौज़ा शिया मुसलमानों के पवित्र स्थलों में से एक है और हर साल लाखों लोग उनके रौज़े की ज़ियारत करने क़ुम जाते हैं।
उनके स्वर्गवास की बरसी के अवसर पर भी पूरे ईरान और पूरी दुनिया से पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.व.) के चाहने वाले बड़ी संख्या में क़ुम पहुंचे हैं और अज़ादारी कर रहे हैं।
क़ुम में मातमी दस्ते मातम करते हुए और नौहा पढ़ते हुए हज़रत मासूमा के रौज़े में पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
क़ुम के उपनगरीय इलाक़े जमकरान में स्थित जमकरान मस्जिद में भी बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हैं और शोक सभाएं आयोजित कर रहे हैं।
ईरानी पार्लियामेंट के स्पीकर की मराजय ए कराम से मुलाकात विभिन्न मुद्दों पर चर्चा
इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की मजलिस-ए-शूरा-ए-इस्लामी के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर क़ालीबाफ ने अपनी यात्रा के दौरान पवित्र शहर क़ुम का दौरा किया और हज़रत फातिमा मासूमा स.ल. के हरम की ज़ियारत की तथा वरिष्ठ धार्मिक नेताओं मराजय ए इकराम से मुलाक़ातें कीं।
इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की मजलिस-ए-शूरा-ए-इस्लामी के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर क़ालीबाफ ने अपनी यात्रा के दौरान पवित्र शहर क़ुम का दौरा किया और हज़रत फातिमा मासूमा स.ल. के हरम की ज़ियारत की तथा वरिष्ठ धार्मिक नेताओं मराजय ए इकराम से मुलाक़ातें कीं।
क़ालीबाफ ने इस अवसर पर आयतुल्लाहिल उज़मा शुबैरी जंजानी, आयतुल्लाहिल उज़मा मकारिम शीराजी, आयतुल्लाहिल उज़मा जाफर सुभानी और आयतुल्लाहिल उज़मा जवादी आमोली से अलग-अलग मुलाकात की और देश एवं धर्म के मामलों पर विचार-विमर्श किया। वह आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली सिस्तानी की पत्नी के निधन पर आयोजित शोक सभा में भी शामिल हुए।
अपने दौरे के दौरान आयतुल्लाहिल उज़मा जवादी आमली से मुलाकात में महान व्यक्तित् ने इमाम हसन अलअस्करी (अलैहिस्सलाम) के जन्मदिन की बधाई देते हुए कहा कि ईरानी राष्ट्र की सबसे बड़ी नेमत अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से वाबस्तगी है।
उन्होंने कहा,हम अली अलैहिस्सलाम और औलाद-ए-अली अलैहिमुस्सलाम के पैरोकार हैं, जबकि दुनिया के दूसरे लोग इस नेमत से महरूम हैं। हालांकि, अगर समाज से फसाद (भ्रष्टाचार), इख्तिलास और बद-ए-इंतिज़ामी खत्म नहीं किया गया, तो दूसरे समाज हमसे आगे निकल जाएंगे।
उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की इस्लाह तभी संभव है जब सक्षम और सालेह (योग्य) लोगों को ज़िम्मेदारियाँ दी जाएँ। "देश की पाकीज़गी (पवित्रता) का राज़ हाकिमों (शासकों) और मुंतज़िमीन की तहारत (पवित्रता) में है।
आयतुल्लाहिल उज़मा जवादी आमोली ने ईरान के प्राकृतिक संसाधनों का ज़िक्र करते हुए कहा, हमारा देश खुदाई नेमतों से मालामाल है। उत्तरी ईरान के जंगलात, माज़ंदरान की सरसब्ज वादियाँ और दमावंद की बुलंद चोटियों को देखकर यह कहना कि बिजली और ऊर्जा के मसले हल नहीं हो सकते, दुरुस्त नहीं है।
बार-बार ज़िम्मेदारों से कहा गया है कि उत्तरी पानी को बर्बाद होने से रोकें और डैम बनाएँ। जब अवाम को यक़ीन होगा कि मंसूबों (परियोजनाओं) के फ़ायदे उन्हीं को मिलेंगे, तो वह उसी तरह मैदान में आएंगे जैसे आमोल के हज़ार सेंगर वाक़े में आए थे।
अमीरुल मोमनीन अ:स. के हरम में इराक़ में मरज ए आली क़द्र के वकीलों और ट्रस्टियों की ग्यारहवीं आम सभा
केंद्रीय कार्यालय नजफ़ अशरफ़ की देख़रेख़ में और हज़रत अमीरुल मोमनीन अ:स के हरम में,इराक़ में मरज ए आली क़द्र के वकीलों और ट्रस्टियों का ग्यारहवीं आम सभा आयोजित की गई।
केंद्रीय कार्यालय नजफ़ अशरफ़ की देख़रेख़ में, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ) के प्रांगण, हरम हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ:स) में मरज ए आली क़द्र (दाम ज़िल्लो हुल्-वारिफ़) के इराक़ में वकीलों और ट्रस्टियों का ग्यारहवीं सभा “समाज की तामीर हमारी इज्तेमाई ज़िम्मेदारी” के विषय पर आयोजित हुई।
केंद्रीय कार्यालय के निदेशक, हुज्जतुल इस्लाम शैख़ अली नजफ़ी (दाम ईज़्ज़हू) ने सभा को संबोधित किया। उन्होंने सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और सभा की शुरुआत पर शुभकामनाएँ दी।
उन्होंने कहा कि यह सभा हर साल होती है ताकि आपसी सलाह से ऐसे असरदार रास्ते तय किए जा सकें जो हमारे धार्मिक, राष्ट्रीय और प्रिय इराक़ी लोगों की ज़िम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभाने में मदद करें।
हुज्जतुल इस्लाम शैख़ अली नजफ़ी (दाम ईज़्ज़हू) ने कई अहम मसलों और साझा रुचि के मुद्दों पर चर्चा की, जिन्हें सही तरह से समझना बहुत ज़रूरी है, ताकि हर समस्या का उचित हल निकाला जा सके। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मौजूदा कठिन हालात से निकलने के लिए हमें एकजुट सोच अपनानी होगी, जो तुरंत कार्रवाई और स्पष्ट, व्यावहारिक योजना की मांग करती है।
उन्होंने कहा कि सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस योजना बनाना ज़रूरी है और ऐसे कदम उठाने चाहिए जो धर्म और देश की सुरक्षा के मूल सिद्धांतों को मज़बूत करें। उन्होंने कहा कि हमें अपने प्रचार और संदेश पहुँचाने के काम में पूरी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए और जो मेहनत हमने शुरू की है, उसे गंभीर, लगातार और ठीक तरीके से पूरा करना चाहिए।
इसका मक़सद यह है कि हमारी कोशिशें सभी मोमेनीन के साथ मिलकर हों, ताकि सब एकजुट होकर ऐसा नेक समाज तैयार करें जो अंबिया और औलिया की महान रिसालत के लायक हो।
हुज्जतुल इस्लाम शैख़ अली नजफ़ी (दाम ईज़्ज़हू) ने इस बात की आवश्यकता पर भी रोशनी डाली कि केंद्रीय कार्यालय के वकील और ट्रस्टी, जो विद्वान और योग्य हैं, ने हाल के समय में ख़ासकर अज़ीम-उल-शान मिल्युनि ज़ियारतों के मौके पर जो मेहनत की, वह बहुत काबिले-तारीफ़ है।
इसी तरह धर्म की प्रचार-प्रसार गतिविधियाँ, मोमिन नौजवानों का समर्थन, उन्हें मरजइयत-ए-रशीदा से जोड़ना, गर्मियों में ट्रेनिंग कोर्स और इल्मी व क़बाइली मजलिसों में उनकी मौजूदगी यह सभी प्रयास एकजुट संदेश फ़ैलाने के लिए हैं।
उन्होंने कुछ अहम राष्ट्रीय मुद्दों का भी ज़िक्र किया, जिनमें नौजवानों और नई पीढ़ी से लगातार जुड़े रहने और अहलेबैत (अ:स) के ज्ञान को आम करने पर ज़ोर दिया, क्योंकि यह ज्ञान सोच-विचार और फिक्री विकास के लिए बहुत ज़रूरी है चाहे वह इल्मी और शोध मंच हों या हुसैनी मिम्बर। उन्होंने साफ़ कहा कि नौजवानों को करीब लाने और उनकी राह से बुराइयों को दूर करने के लिए एक उद्देश्यपूर्ण प्रोग्राम के विषय में काम करना चाहिए, ताकि पूरा समाज इसका लाभ उठा सके।
अहले इल्म व फ़ज़्ल ने कई तकरीरें की हैं, जिनमें उन्होंने समाजी मसाएल और इस्लाम-ए-मुहम्मदी के परचम को बुलंद करने के लिए जारी कोशिशों पर रोशनी डाली। ये सभी गतिविधियाँ अज़ीज़ इराक़ी लोगों की सेवा में की जा रही हैं, ख़ासकर प्रचार-प्रसार, धार्मिक, नैतिक, अक़ाएद और अन्य क्षेत्रों में।
उन्होंने हुज्जतुल इस्लाम शैख़ अली नजफ़ी (दाम ईज़्ज़हू) का शुक्रिया अदा किया जिन्होंने इस सभा की देख़रेख़ की और इसकी सफ़लता में गहरी रुचि और सक्रिय भागीदारी निभाई।
धार्मिक शिक्षाओं को बढ़ावा देने में हौज़ा ए इल्मिया की ज़िम्मेदारी आज पहले से कहीं ज़्यादा गंभीर
हुज्जतु इस्लाम वल मुस्लेमीन हामिद मलिकी ने अहले बैत (अ) की शिक्षाओं को बढ़ावा देने में मीडिया क्षमताओं के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया और कहा: धार्मिक शिक्षाओं को बढ़ावा देने में हौज़ा ए इल्मिया की ज़िम्मेदारी पहले से कहीं ज़्यादा गंभीर हो गई है।
हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के उप प्रबंधक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन हामिद मलिकी ने हौज़ा ए इल्मिया के पहले पॉडकास्ट उत्सव के समापन समारोह में धार्मिक प्रचार के क्षेत्र में आधुनिक साधनों के इस्तेमाल की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा: आज के युवा नए परिवेश से ज़्यादा जुड़े हुए और परिचित हैं, इसलिए धर्म का संदेश उन तक इसी माध्यम से पहुँचाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा: जब लाउडस्पीकर का आविष्कार हुआ था, उस समय के समय और स्थान से वाकिफ़ विद्वानों ने अपनी आवाज़ श्रोताओं तक पहुँचाने के लिए इसका इस्तेमाल किया था। बाद में, रेडियो के आविष्कार के साथ, यह प्रवृत्ति जारी रही और आज भी, संचार के नए-नए साधन प्रतिदिन सामने आ रहे हैं। इसलिए, धर्म प्रचारकों का भी यह कर्तव्य है कि वे इन माध्यमों को पहचानें और धर्म का संदेश पहुँचाने के लिए इनका लाभ उठाएँ।
हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के उप प्रबंधक ने कहा: पैगम्बरों का कार्य ईश्वर का संदेश लोगों तक पहुँचाना था। पवित्र क़ुरआन कहता है: 'निःसंदेह, तुम पर केवल स्पष्ट संचार है', अर्थात् पैगम्बर पर संदेश अनिवार्य है। आज भी, धर्म प्रचारकों को अपने श्रोताओं के समक्ष धर्म का संदेश अत्यंत सुंदर और आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करना चाहिए।
उन्होंने कहा: शैतान हर बुरे तरीके का लाभ उठाता है, इसलिए धर्म का संदेश विषयवस्तु की दृष्टि से सुंदर होना चाहिए और उसे सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि श्रोताओं के हृदय पर आवश्यक प्रभाव डाला जा सके। हम विद्वानों को, जो पैगम्बरों के मार्ग का विस्तार हैं, आधुनिक संचार माध्यमों से सुसज्जित होना चाहिए और उच्च स्वर्गीय वास्तविकताओं को एक नई भाषा में समाज तक पहुँचाना चाहिए।
उन्होंने धार्मिक शिक्षाओं के प्रचार में भाषा और समय को समझने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा: धर्म के क्षेत्र में प्रभावी होने के लिए, भाषा पर अधिकार, समय को समझना और संदेश पहुँचाने का तरीका जानना आवश्यक है।
उन्होंने नहजुल बलाग़ा का उल्लेख करते हुए कहा: अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) ने इस महान पुस्तक में इस्लाम के महान पैगम्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) का वर्णन इस प्रकार किया है कि किसी अन्य व्यक्ति में ऐसा करने की शक्ति नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस्लाम के पैगम्बर (स) ने लोगों को इस्लाम की ओर मार्गदर्शन करने में बुद्धिमतापूर्ण, सटीक और सुविचारित शब्दों और शैली का प्रयोग किया।
ग्लोबल स्मूद फ्लोटिला' पर इज़रायल के हमले ने उसका "बर्बर चेहरा" उजागर कर दिया है। तुर्की के राष्ट्रपति
तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने कहा है कि गाज़ा के लिए रवाना 'ग्लोबल स्मूद फ्लोटिला' पर इज़रायल का हमला इस शासन का बर्बर चेहरा दिखाता है।
तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने कहा है कि गाज़ा के लिए रवाना 'ग्लोबल स्मूद फ्लोटिला' पर इज़रायल का हमला इस शासन का बर्बर चेहरा दिखाता है।
तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने कहा है कि गाज़ा के लिए रवाना 'स्मड फ्लोटिला' पर इजरायल का हमला इस शासन का बर्बर चेहरा दिखाता है।
एर्दोआन ने यह भी कहा कि तुर्की सरकार काफिले में मौजूद तुर्की कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और किसी भी नुकसान से बचने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि इजरायल का यह हमला साफ करता है कि नेतन्याहू की कैबिनेट शांति की किसी भी संभावना को खत्म कर रही है।
ग्लोबल स्मूद फ्लोटिला के वैश्विक प्रबंधन ने घोषणा की कि इजरायल ने इस बेड़े के सभी जहाजों पर कब्जा कर लिया है, सिवाय एक के जो अभी भी गाज़ा की ओर बढ़ रहा है। इस कार्रवाई में 440 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जायोनी सेना के सैकड़ों अधिकारियों ने बुधवार को स्मड बेड़े के 41 जहाजों पर हमला किया, जिनमें 400 से अधिक लोग सवार थे। यह ऑपरेशन लगभग 12 घंटे तक चला।
गज्ज़ा पहुंचने से पहले 'समूद फ्लोटिला' के 450 सदस्यों को इजरायली जेल में कैद किया
इजरायली अधिकारियों ने गाजा के लिए रवाना दुनिया के सबसे बड़े बेड़े "समूद" के 450 स्वयंसेवकों को जबरन गिरफ्तार करके अपनी कुख्यात कत्ज़ियोट जेल में पहुंचा दिया है। यह जेल नेगेव रेगिस्तान में मिस्र की सीमा के पास स्थित है और सालों से वहां हिंसा, दुर्व्यवहार और अमानवीय परिस्थितियों की शिकायतें सामने आती रही हैं।
बुधवार रात अंतरराष्ट्रीय समुद्र में कार्रवाई के दौरान इजरायली सेना ने 532 लोगों वाले इस बेड़े से 450 स्वयंसेवकों को जबरदस्ती गिरफ्तार किया। पत्रकारों की रिपोर्टों के मुताबिक इन गिरफ्तार लोगों को कत्ज़ियोट जेल में पहुंचाने की योजना बनाई गई है, जहां फिलिस्तीनी कैदियों के साथ संगठित हिंसा और अमानवीय व्यवहार के सबूत पहले भी सामने आते रहे हैं।
सोशल मीडिया पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार इजरायली अधिकारियों ने यह शर्त रखी है कि जो स्वयंसेवक अपने देश वापस जाने के कागजात पर दस्तखत कर देंगे, उन्हें रिहा कर वापस भेजा जा सकता है। हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों को जेल में पहुंचाए जाने की खबरें भी मौजूद हैं।
इससे पहले इजरायली विदेश मंत्रालय ने घोषणा की थी कि बेड़े स्मड की कोई भी नाव गाजा के तट तक नहीं पहुंच सकी। मंत्रालय के मुताबिक इन नावों के सभी यात्रियों को फिलिस्तीन के कब्जे वाले इलाके में ले जाया जा रहा है और इसके बाद उन्हें यूरोपीय देशों को वापस भेज दिया जाएगा।
इजरायली स्रोतों ने यह भी बताया कि सैकड़ों स्वयंसेवकों को अशदोद बंदरगाह ले जाया गया ताकि उन्हें या तो सहमति से या अदालती आदेश के जरिए इजरायली इलाके से निकाला जा सके।
यह अभियान इसलिए असाधारण महत्व रखता है क्योंकि पहली बार 50 से अधिक नावों वाला एक बेड़ा, जिसमें दुनिया के 45 देशों के 532 नागरिक शामिल थे, गाजा की नाकाबंदी को तोड़ने के लिए रवाना हुआ था।
इसका मकसद अठारह साल से जारी नाकाबंदी का अंत और गाजा की जनता तक राहत सामग्री पहुंचाना था, लेकिन यह काफिला गाजा के तट तक नहीं पहुंच सका।
ईरान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों का टेलीफोनिक संपर्क / क्षेत्र की स्थिति पर विचार-विमर्श
ईरान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों ने राजनयिक सहयोग को और मजबूत करने और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए संयुक्त प्रयासों पर सहमति जताई।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची और पाकिस्तान के विदेश मंत्री सीनेटर मोहम्मद इस्हाक डार ने गुरुवार को टेलीफोन पर बातचीत की। इसमें द्विपक्षीय संबंधों, क्षेत्र की मौजूदा स्थिति और शांति व सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए जारी राजनयिक प्रयासों पर विचार-विमर्श किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार दोनों विदेश मंत्रियों ने आपसी भाईचारे और राजनीतिक आर्थिक व सांस्कृतिक सहयोग को और बढ़ावा देने पर सहमति जताई और क्षेत्रीय तनाव और अस्थिर स्थिति में सुधार लाने के लिए संयुक्त सहयोग को मजबूत करने के संकल्प का इज़हार किया।
विदेश मंत्रियों ने कहा,ईरान और पाकिस्तान दोनों मिलकर कई वैश्विक व क्षेत्रीय मंचों पर भी बेहतर सहयोग करेंगे ताकि शांति, सुरक्षा और समृद्धि के लक्ष्य हासिल किए जा सकें।
घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ हमेशा मिलना जुलना
इस्लाम ने जिन समाजी और सोशली अधिकारों की ताकीद की है और मुसलमानों को उनकी पाबंदी का हुक्म दिया है उनमें से एक यह है कि वह अपने घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ हमेशा अच्छे सम्पर्क बनाये रखें इसी को सिल-ए-रहेम अर्थात रिश्तेदारों से मिलना जुलना कहा जाता है।
इस्लाम ने जिन समाजी और सोशली अधिकारों की ताकीद की है और मुसलमानों को उनकी पाबंदी का हुक्म दिया है उनमें से एक यह है कि वह अपने घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ हमेशा अच्छे सम्पर्क बनाये रखें इसी को सिल-ए-रहेम अर्थात रिश्तेदारों से मिलना जुलना कहा जाता है।
इसलिये एक मुस्लमान के लिए ज़रूरी है कि अपने घर परिवार और रिश्तेदारों से मुलाक़ात करता रहे और उनके हाल चाल पूछा करे उनके साथ अच्छा व्यवहार रखे अगर ग़रीब हों तो उनकी सहायता करे, परेशान हाल हों तो उनकी मदद के लिए पहुँचे और उनके साथ घुल मिल कर रहे और नेक कामों तथा सदाचार और तक़वे में उन्हें सहयोग दे अगर कोई किसी मुसीबत में ग्रस्त हो जाए तो ख़ुद उनका शरीक हो जाए और अगर किसी को किसी मुश्किल का सामना हो हो तो उसे हल करने की कोशिश करे और अगर उनकी तरफ़ से ग़लत व्यवहार या कोई अनुचित काम देखे तो ख़ुबसूरत तरीक़े से उन्हें नसीहत करे। क्योंकि हर इंसान के घर परिवार और रिश्तेदारों ही उसके समर्थक होते हैं यानी अगर हालात के उलट फेर से उसके ऊपर कोई भी मुश्किल आ पड़ती है तो उसकी निगाहें उन्हीं की तरफ़ उठती हैं।
इसी लिए उनका इतना महान अधिकार है। हज़रत अली अ. फ़रमाते हैः
ایھا الناس انہ لا یستغنی الرجل و ان کان ذاعن عشیرتہ و دفاعھم عنہ بایدیھم والسنتھم وھم اعظم الناس حیطۃً من ورائہ والھم لشعثہ واعطفھم علیہ عند نازلۃ اذا نزلت بہ
ऐ लोगो ! कोई आदमी चाहे जितना मालदार हो वह आपने घर परिवार और रिश्तेदारों और क़बीले की ज़बानी या अमली और दूसरे प्रकार की सहायता से विमुक्त नहीं हो सकता है और जब उस पर कोई मुश्किल और मुसीबत पड़ती है तो उसमें सबसे ज़्यादा यही लोग उसका समर्थन करते हैं। (नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा न0 23) आप ने यह भी फ़रमायाः जान लो कि तुम में कोई आदमी भी अपने रिश्तेदारों को मोहताज देख कर उस माल से उसकी ज़रूरत पूरी करने से हाथ न ख़ींचे जो बाक़ी रह जाए तो बढ़ नहीं जाएगा और ख़र्च कर दिया जाए तो कम नहीं होगा इस लिए कि जो आदमी भी अपने क़ौम और क़बीले से अपना हाथ रोक लेता है तो उस क़बीले से एक हाथ रुक जाता है और ख़ुद उससे अनगिनत हाथ रुक जाते हैं और जिसके व्यवहार में नरमी होती है वह क़ौम की मुहब्बत को हमेशा के लिए हासिल कर लेता है। (नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा न0 23)
मौला ने इस स्थान पर परिवार वालों या रिश्तेदारों से सम्बंध तोड़ लेने से नुक़सान की बेहतरीन मिसाल दी है कि उसके अलग हो जाने की वजह से घर परिवार और रिश्तेदारों को केवल एक आदमी का नुक़सान होता है मगर वह ख़ुद अपने अनगिनत हमदर्दों को खो बैठता है इस तरह आपने इस बात की तरफ़ भी इशारा फ़रमाया किः अच्छे व्यवहार द्वारा घर परिवार और रिश्तेदारों की मोहब्बतें हासिल होती हैं जिस में अनगिनत भलाईयाँ पाई जाती हैं। निश्चित रूप से हर बड़े ख़ानदान या क़बीले और समाज में बहुत सारे लोग पाए जाते हैं जिन की क्षमताएं, सम्भावनाएं और योग्यताएं भी भिन्न होती हैं, आप को उनके अंदर आलिम, जाहिल, मालदार, ग़रीब, स्वस्थ, शक्तिशाली, कमज़ोर, या बिल्कुल पिछड़े हुए, हर प्रकार के लोग मिल जाएंगे। तो आख़िर वह ऐसी कौन सी चीज़ है जो उस समाज को एक ताक़तवर, विकसित और बिल्कुल मॉडरेट समाज बना सकती है?
निश्चित रूप से आपसी सम्बंध और सम्पर्क का स्थिरता या ज़िम्मेदारी के एहसास जो एक दूसरे की सहायता तरक़्की और सहयोग से पैदा होते हैं यही वह चीज़ें हैं जिन के द्वारा हम उस नेक मक़सद तक पहुँच सकते हैं और उसका तरीक़ा यह है कि हर मालदार अपनी क़ौम के ग़रीबों का दामन थाम ले, ताक़तवर अपनी क़ौम के कमज़ोर तबक़े के अधिकारों का समर्थन करे और दुश्मनों के मुक़ाबले में उनके अधिकारों के लिए उनके साथ उठ ख़ड़ा हो।
बेशक किसी भी क़ौम और समाज में रिश्तेदारों से मिलने जुलने की की बदौलत एक मज़बूत ताक़तवर और समामानित समाज वजूद में आता है। यही वजह है कि इस्लाम ने मुसलमानों को आपसी भाई चारा और बरादरी को मज़बूत से मज़बूत बनाने की ताकीद की है और किसी भी हाल में उन से सम्पर्क को तोड़ने या उन्हें कमज़ोर करने के ख़तरों से उन्हे बख़ूबी आगाह कर दिया है। और हदीसे शरीफ़ा में तो रिश्तेदारों से मिलने जुलने को इस क़दर अहमियत और बुलंद दर्जा दिया गया है कि उसे दीन और ईमान बताया गया है जैसा कि इमाम-ए-मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने अपने पाक पूर्वजों के माध्यम से हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम की यह रेवायत नक़्ल फ़रमाई है कि आपने फ़रमायाः अपनी उम्मत के मौजूदा और ग़ैर मौजूदा यहां तक कि मर्दों के सुल्बों और औरतों के रहमों में मौजूद और क़्यामत तक आने वाले हर आदमी से मेरी वसीयत यह है कि अपने घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ मिलना जुलना रखें, चाहे वह उससे एक साल की दूरी के फ़ासले पर क्यों न रहते हों क्योंकि यह दीन का हिस्सा है।
इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने भी हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की यह रेवायत नक़ल फ़रमाई है कि आप ने फ़रमायाः जिसे यह ख़वाहिश है कि अल्लाह तआला उसकी उम्र में इज़ाफ़ा फ़रमा दे और उसके खुराक को वसी कर दे तो वह रिश्तेदारों से मिलना जुलना करे क्योंकि क़्यामत के दिन रहम को ज़बाले मानो दि जाएगी और वह अल्लाह की बारगाह में अरज़ करे गी, बारे इलाहा जिस ने मुझे जोड़ा तू उससे सम्पर्क क़ायम रखना और जिस ने मुझे क़ता किया तू भी उससे सम्पर्क तोड़ लेना। इमाम-ए-रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपने पाक पूर्वजों के वास्ते से हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की यह हदीसे शरीफ़ नक़ल फ़रमायी है कि अपने फ़रमाया जो आदमी मुझसे एक बात का वादा कर ले मैं उसके लिए चार चीज़ों की ज़मानत लूँगाः अपने घर परिवार और रिश्तेदारों से मिलना जुलना रखे तो अल्लाह तआला उसे अपना चहेता रखेगा, उसके खुराक को उस पर ज़्यादा कर देगा, उस की उम्र को बढ़ा देगा और उसको उस जन्नत में दाख़िल करेगा जिसका उससे वादा किया है। इमाम-ए-मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं रिश्तेदारों से मिलना जुलना, काम को पाक़ीज़ा और संपत्ति को ज़्यादा कर देता है बलाओं को दूर करता है और मौत को टाल देता है।
आपने एक ख़ुत्बे में इरशाद फ़रमायाः इस में दीन व ईमान, लम्बी उम्र, खुराक में वृद्धि, अल्लाह की मोहब्बत व रेज़ा और जन्नत किया कुछ मौजूद नहीं हैं यह रिश्तेदारों से मिलना जुलना ही है जो दुनिया में इंसान की अमीरी और आख़ेरत में उसकी जन्नत की गारंटी देता है और अल्लाह की मरज़ी तो सबसे बड़ी है। जिसके मानी यह हैं कि वह दुनिया में पाक ज़िंदगी और आख़ेरत में रौशन और ताबनाक ज़िंदगी का मालिक है। रिश्तेदारों से मिलने जुलने की इतनी अहमियत और महानता को पहचानने के बाद क्या अब भी यह बहाना बनाना सही है कि घर परिवार और रिश्तेदारों से हम बहुत फ़ासले पर हैं या काम की ज़्यादती की आधार पर हम बहुत ज़्यादा बिज़ी हैं इसलिये उनसे सम्पर्क नहीं रख पाते हैं? और ख़ास तौर से अगर किसी का कोई सम्बंधी किसी के ज़ुल्म का शिकार हो तो क्या उसके लिए यह कार्य विधि वस्तुतः जाएज़ है? पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम और अइम्मा-ए-ताहेरीन ने हर मोमिन के लिए एक ऐसा रौशन और स्पष्ट रास्ता बना दिया है जिस पर चलने वाले हर आदमी से अल्लाह राज़ी रहेगा। रिवायात में है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से किसी ने यह शिकायत की कि मुझे मेरी क़ौम वाले यातना पहुंचाते हैं इसलिये मैं ने यही बेहतर समझा है कि उनसे सम्बंध तोड़ लूँ तो पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः अल्लाह तआला तुम से नाराज़ हो जाएगा। उसने पूछा या रसूल अल्लाह फिर मैं किया करूँ ? आपने फ़रमायाः जो तुम्हें महरूम करे उसे अता कर दो, जो तुम से सम्पर्क तोड़े उससे सम्पर्क क़ायम रखो जो तुम्होरे ऊपर ज़ुल्म करे उसे माफ़ कर दो, अगर तुम ऐसा करोगे तो उनके मुक़ाबले के लिए अल्लाह तआला तुम्हारा यारो मदद गार है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः अपने घर परिवार और रिश्तेदारों से मिलना जुलना रखो चाहे वह तुम से सम्बंध तोड़ लें। हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः रिश्तेदारों से मिलना जुलना और नेक व्यवहार हेसाब को आसान कर देता है, और गुनाहों से महफ़ूज़ रखता है, इसलिये अपने घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ मिलना जुलना रखो और अपने भाईयों के साथ नेक व्यवहार करो चाहे अच्छे अंदाज़ में सलाम करके या उसका जवाब देकर ही क्यों ना हो। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः अपने रिश्तेदारों से मिलना जुलना करो चाहे सलाम के द्वारा ही क्यों हो। आप ही से यह भी रिवायत हैः अपने घर वालों से, रिश्तेदारों से मिलना जुलना करो चाहे एक घूँट पानी के द्वारा हो और रिश्तेदारों से मिलने जुलने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा यह है कि अपने घर परिवार वालों को यातना न दी जाए। उल्लिखित हदीस से बख़ूबी समझा जा सकता है कि अच्छे सम्बंध और सम्पर्क के स्थिरता पर और उनके बनाये रखने में रिश्तेदारों से मिलने जुलने की किया भूमिका है बहुत सम्भव है कि आप किसी से दूर होने कि वजह पर उससे मुलाक़ात ना कर सकें लेकिन उसके नाम आप का एक ख़त ही आप की तरफ से मुहब्बत के इज़हार और रिश्तेदारों से मेल मिलाप के लिए काफ़ी हो यानी जिस तरह आप अपने आस पास मौजूद घर परिवार और रिश्तेदारों को चहेक कर सलाम करते हैं यह ख़त भी उसी तरह एक रिश्तेदारों से मिलना जुलना है यहां तक कि कि किसी के लिए किसी बर्तन में पानी पेश करना, यहां तक कि अगर उन्हें कोई यातना ना पहुँचाए तो यह भी एक प्रकार का रिश्तेदारों से मिलना जुलना है बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्मत्फ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने उस को रिश्तेदारों से मिलने जुलने का सबसे अच्छा तरीक़ा बताया है।
शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह हमेशा हमारे दिलों, दिमागों और ज़मीरो में जिंदा रहेंगें
लेबनान के शहर बअलाबक के दारुल हिक्मा अस्पताल में शहीद सैय्यद हसन नसरुल्लाह, सैय्यद हाशिम सफ़ीउद्दीन और उस अस्पताल के तीन कर्मचारियों की शहादत की बरसी मनाई गई।
लेबनान के शहर बअलाबक के दारुल हिक्मा अस्पताल में शहीद सैय्यद हसन नसरुल्लाह, सैय्यद हाशिम सफ़ीउद्दीन और उस अस्पताल के तीन कर्मचारियों की शहादत की बरसी मनाई गई।
रिपोर्ट के मुताबिक इस कार्यक्रम में "प्रतिरोध के प्रति निष्ठा" समूह और लेबनान की संसद के सदस्य अली मकदाद, अस्पताल के निदेशक और पूर्व प्रतिनिधि जमाल अलतकश तथा प्रशासनिक, चिकित्सा, नर्सिंग और तकनीकी कर्मचारियों और स्वास्थ्य व सामाजिक हस्तियों ने भाग लिया।
लेबनानी संसद के सदस्य ने अपने संबोधन में क्षेत्र की जनता को अस्पताल द्वारा प्रदान की जाने वाली महान सेवाओं की सराहना की और शहीद सैय्यद हसन नसरुल्लाह और सैय्यद हाशिम सफ़ीउद्दीन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, इन महान शहीदों ने अस्पताल का समर्थन करके इसे भौतिक और आध्यात्मिक सहायता प्रदान की ताकि यह संस्थान हमारी महान और वफादार जनता के ज़ख्मों पर मरहम बन सके।
उन्होंने कहा, शहीद सैय्यद नसरुल्लाह हमारे बीच से नहीं गए हैं बल्कि वह हमारे दिलों, दिमागों और अंतरात्मा में जिंदा हैं। वह असाधारण व्यक्तित्व न केवल हमारे लिए बल्कि पूरी दुनिया के स्वतंत्र लोगों के लिए एक प्रेरणादायक नेता थे और हैं।
आदरणीय अली मेकदाद ने आगे कहा, हम अल्लाह से वादा करते हैं, जैसा कि हमने सभी शहीदों से वादा किया है, कि इस प्रतिरोध को हमारी आत्मा, दिमाग और ज़मीन पर सुरक्षित, पाला-पोसा और फैलाया जाएगा। हम शहीदों के खून को भी सुरक्षित रखेंगे जिसे हम अपने ऊपर एक अमानत समझते हैं। यह एक नैतिक मानवीय और ईश्वरीय कर्तव्य भी है।













