رضوی
ईरान पर हमला;पूरे क्षेत्र में युद्ध फैल जाएगा।जनरल मूसवी
ईरान के सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल मूसवी ने चेतावनी देते हुए कहा कि, ईरानी वायुसेना, सर्वोच्च स्तर की तैयारी में है और अन्य सशस्त्र बलों के साथ पूर्ण समन्वय में किसी भी प्रकार के खतरे, आक्रमण या दुश्मन की गलत गणना का निर्णायक, त्वरित और पछतावा कराने वाला जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है, और किसी भी आक्रमण का करारा जवाब दिया जाएगा।
ईरान के सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल मूसवी ने चेतावनी देते हुए कहा कि, ईरानी वायुसेना, सर्वोच्च स्तर की तैयारी में है और अन्य सशस्त्र बलों के साथ पूर्ण समन्वय में किसी भी प्रकार के खतरे, आक्रमण या दुश्मन की गलत गणना का निर्णायक, त्वरित और पछतावा कराने वाला जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है, और किसी भी आक्रमण का करारा जवाब दिया जाएगा।
ईरान आज पश्चिम एशिया की उन गिनी-चुनी ताक़तों में शामिल है जो केवल बयान नहीं देतीं, बल्कि अपनी सैन्य, रणनीतिक और राजनीतिक क्षमता से संतुलन बनाए रखती हैं। जनरल मूसवी ने जो बात कही, वह किसी भावनात्मक उछाल का नतीजा नहीं है, बल्कि वर्षों की तैयारी, अनुभव और आत्मनिर्भर रक्षा ढांचे पर आधारित आत्मविश्वास है।
ईरान की सबसे बड़ी ताक़त उसकी रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता है। उसकी वायुसेना, मिसाइल सिस्टम और संयुक्त सैन्य कमान इस स्तर पर हैं कि किसी भी बाहरी आक्रमण की कीमत केवल ईरान तक सीमित नहीं रह सकती। यही वजह है कि दुश्मन खुले युद्ध से पहले सौ बार सोचने को मजबूर होते हैं। ईरान जानता है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ़ हथियारों से नहीं, बल्कि समन्वय, गति और सही समय पर निर्णायक प्रतिक्रिया से जीता जाता है।
दूसरी अहम बात यह है कि ईरान युद्ध शुरू करने वाला देश नहीं रहा है। उसका रुख साफ़ है: आक्रमण नहीं, लेकिन आत्मरक्षा में कोई समझौता नहीं। यह संतुलित नीति उसे नैतिक बढ़त भी देती है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसका पक्ष मज़बूत बनाती है। जब कोई देश स्पष्ट रूप से कहता है कि वह शांति चाहता है लेकिन कमज़ोर नहीं है, तो वह केवल बयान नहीं दे रहा होता, वह लाल रेखा खींच रहा होता है।
इसके अलावा, ईरान की ताक़त उसकी क्षेत्रीय समझ में भी है। वह जानता है कि किसी भी बड़े टकराव का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा। यही चेतावनी उसकी सबसे प्रभावी ढाल है। युद्ध फैलने का डर ही उन ताक़तों को रोकता है जो अक्सर दूसरों की ज़मीन पर लड़ाइयाँ थोपने की आदत रखती हैं। ईरान आज ताक़त के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि ताक़त की संभावना से संतुलन बनाए हुए है। और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यही असली शक्ति होती है।
इंसान की शख़्सियत समाज की संस्कृति की बुनियाद पर घर के माहौल में बनती है
घर के माहौल में ही सबसे पहले एक शख़्स की पूरी शख़्सियत व हैसियत, उस समाज की सांस्कृतिक बुनियादों पर वजूद में आती है और यह माँ बाप ही हैं जो इस कर्तव्य को अच्छे से निभा सकते हैं।
हज़रत आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने फरमाया,अगर नस्लें अपने मानसिक व वैचारिक नतीजे, बाद की नस्लों के मन में बिठाना चाहती हैं और समाज अपने अतीत से फ़ायदा उठाना चाहता है तो यह सिर्फ़ घर और परिवार के ज़रिए मुमकिन है।
घर के माहौल में ही सबसे पहले एक शख़्स की पूरी शख़्सियत व हैसियत, उस समाज की सांस्कृतिक बुनियादों पर वजूद में आती है
और यह माँ बाप ही हैं जो सीधे तौर पर किसी भी क़िस्म के दिखावे से दूर,बिलकुल स्वाभाविक अंदाज़ में इंसान के मन, विचार और व्यवहार पर असर डालते हैं और अपनी मालूमात, आइडियालोजी और आस्था वग़ैरह को अपनी बाद की नस्लों के मन में बिठाते हैं।
ईरान ने 8 भारतीय नाविकों को रिहा किया, ईंधन तस्करी के आरोप में यूएई टैंकर जब्त
ईरानी अधिकारियों ने संयुक्त अरब अमीरात से संबंधित एक टैंकर के 16 भारतीय चालक दल के आठ सदस्यों को रिहा कर दिया है, जो दिसंबर से हिरासत में थे। एक भारतीय सरकारी अधिकारी ने गुरुवार को इसकी पुष्टि की हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, 'एमटी वैलियंट रोर' टैंकर, जो एक यूएई स्थित कंपनी के स्वामित्व में है, को दिसंबर की शुरुआत में संयुक्त अरब अमीरात के दीबा बंदरगाह के पास अंतरराष्ट्रीय जल में ईरान की इस्लामिक क्रांतिकारी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) द्वारा जब्त कर लिया गया था। ईरानी अधिकारियों ने जहाज पर लगभग छह हजार टन ईंधन की तस्करी का आरोप लगाया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने बताया कि हिरासत में लिए गए चालक दल को वाणिज्य दूतावास की पहुंच प्रदान की गई है और भारतीय राजनयिकों ने बंदरगाह शहर बंदर अब्बास में उनसे मुलाकात की है।
उन्होंने कहा कि रिहा किए गए आठ नाविक प्रशासनिक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद भारत लौट आएंगे।उन्होंने कहा कि शेष आठ नाविकों की स्थिति का पता लगाने के लिए ईरानी अधिकारियों के साथ बातचीत जारी है।
वार्ता में दुश्मन की चालों से होशियार रहें!
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद हुसैन मोमनी ने शहीद सईद सामानलू की यादगार मजलिस में कहा कि दुश्मन दूसरे तमाम मंसूबों में नाकाम होने के बाद अब मोल-भाव की तरफ आया है, लेकिन हमें मोल-भाव के दौरान उनकी चालों से चौकन्ना रहना चाहिए, ताकि वे दोबारा मुल्क पर हमला न कर सकें।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद हुसैन मोमनी ने शहीद सईद सामानलू की यादगार मजलिस में कहा कि दुश्मन दूसरे तमाम मंसूबों में नाकाम होने के बाद अब मोल-भाव की तरफ आया है, लेकिन हमें मोल-भाव के दौरान उनकी चालों से चौकन्ना रहना चाहिए, ताकि वे दोबारा मुल्क पर हमला न कर सकें।
उन्होंने इलाही नेमतों को ज़ाहिर और पोशीदा हिस्सों में तक़सीम करते हुए कहा कि अल्लाह की ज़ाहिर नेमतों में से एक हमारे लिए इस्लामी निज़ाम और विलायत की नेमत है। हमारे शोहदा ने इस इलाही नेमत की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं, और हमें भी शोहदा की तरह पूरी जान-ओ-दिल से इस्लामी निज़ाम और विलायत की हिफ़ाज़त करनी चाहिए।
उन्होंने मुल्क में हालिया वाक़िआत और दहशतगर्दाना हमलों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अगर इन हादसों को ग़ौर से देखा जाए तो उनमें बेगानों, ख़ास तौर पर अमेरिका और इस्राईल का हाथ साफ़ नज़र आता है। खुद उन्होंने माना है कि उन्होंने लोगों को हथियार दिए ताकि ईरान के अंदर हिंसक कार्रवाइयाँ करें।
दुश्मन की सारी कोशिश इसी ज़ाहिर इलाही नेमत यानी इस्लामी निज़ाम और विलायत को ख़त्म करने की है, इसलिए हमें होशियार रहना होगा।
हौज़ा-ए-इल्मिया के उस्ताद ने कहा कि इंक़िलाब के खिलाफ़ दुश्मनी सिर्फ़ आज की नहीं है।
इंक़ेलाब के शुरू से अब तक दुश्मन जंग-ए-तहमीली, मआशी जंग और साक़ाफ़ती शुब्हात के ज़रिए अपने मंसूबों में नाकाम रहा है, और अब वह “जंग-ए-मुरक्कब” की तरफ आया है।
उन्होंने हालिया दहशतगर्दाना कार्रवाइयों का ज़िक्र करते हुए कहा कि हमने देखा कि किस तरह उपद्रवियों और दहशतगर्दों ने मस्जिदों, हुसैनियों, इमामज़ादगानों और क़ुरआन को आग लगाई। इन घटनाओं में दुश्मन ने अपना असली चेहरा दिखा दिया और खुलकर कहा कि उसे हमारे दीन से परेशानी है।
हुज्जतुल इस्लाम मोमनी ने सूरह बक़रा की आयत 120 का हवाला देते हुए कहा कि दुश्मन उस वक़्त तक राज़ी नहीं होगा जब तक लोग उसकी पैरवी न करें। उन्होंने सवाल किया,क्या कोई मुसलमान दुश्मन की तरह बनना पसंद करेगा? क्या कोई मुसलमान दुश्मन का रहन-सहन अपनाएगा?
अपने ख़िताब के दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि अफ़सोस की बात है कि कुछ लोग हालिया मारे जाने वालों के बहाने नीम-ए-शाबान की खुशियाँ मनाने से रुक गए हैं। उन्हें साफ़ करना चाहिए कि उनका इशारा किसकी तरफ है शोहदा की तरफ या दहशतगर्दों की तरफ?
उन्होंने कहा कि अगर उनका मतलब शोहदा हैं तो यह बड़ी नासमझी है, क्योंकि दुश्मन चाहता है कि हम दीन के शआइर से बेपरवाह हो जाएँ। और अगर उनका मतलब दहशतगर्द हैं, तो ये लोग दुश्मन की लाइन पर खेल रहे हैं। क्या इन्हें नहीं मालूम कि इस्लामी फ़िक़्ह में “मुहारिब” का हुक्म क्या है? क्या ये लोग दीन के साफ़ हुक्म की मुख़ालिफ़त करना चाहते हैं?
उन्होंने यह भी कहा कि अगर इन लोगों का पिछला रिकॉर्ड देखा जाए तो मालूम होगा कि इन्होंने इस्लामी निज़ाम के लिए कोई क़ुर्बानी नहीं दी ना जंग-ए-तहमीली में शरीक हुए और ना ही मुश्किल वक़्तों में निज़ाम की मदद की।
आख़िर में उन्होंने होशियारी पर ज़ोर देते हुए कहा कि दुश्मन मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से हमारे दीन को नुक़सान पहुँचाना चाहता है। जब वह मैदान-ए-जंग में हमें हरा नहीं सका, तो मोल-भाव की राह अपनाई हैं।
अमेरिका की नज़र में बातचीत का मतलब ईरान के सभी संसाधनों पर पूर्ण कब्ज़ा है
क़ुम हौज़ा ए इल्मिया के उप निदेशक ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका की युद्ध की धमकियों की ओर इशारा करते हुए कहा, अमेरिका अपने युद्धपोतों के ज़रिये ईरान की बहादुर और शहीद-परवर क़ौम को डराना चाहता है लेकिन वह इस हक़ीक़त से ग़ाफ़िल है कि यह क़ौम, क़ौम-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम है और ख़ुदा के दुश्मनों के मुक़ाबले में जिहाद के लिए तैयार है।
क़ुम हौज़ा ए इल्मिया के उप निदेशक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हमीद मलिकी ने इस्लामी जम्हूरी-ए-ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका के मीडिया शोर-शराबे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा,वैश्विक साम्राज्यवाद ख़ास तौर पर अमेरिका और इस्राइल के साथ ईरानी अवाम की 47 साल की जद्दोजहद के बाद हम एक बहुत ही निर्णायक मंज़िल में दाख़िल हो चुके हैं।
उन्होंने इंकिलाब-ए-इस्लामी की शुरुआत से दुश्मन की फ़ितना अंगेज़ियों की तारीख़ का जायज़ा लेते हुए कहा, इंकिलाब-ए-इस्लामी ईरान की कामयाबी के पहले ही दिन से अमेरिकियों ने कुर्दिस्तान, आज़रबाईजान, ख़ूज़िस्तान और तुर्कमन सहरा की तजवीज़ जैसे मसाइल को हवा दी और आशोब बरपा किए लेकिन यह सारे फ़ितने उल्मा के बा-बसीरत करदार और हज़रत इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की क़ियादत की बरकत से नाकाम हो गए।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मलिकी ने आठ साल की मुसल्लता जंग की तरफ़ इशारा करते हुए कहा: दुश्मनों को मजबूर होना पड़ा कि कई मुल्कों को इकट्ठा करें और बासि़ सद्दाम को आगे बढ़ाएं ताकि ख़ित्ते में एक आलमी जंग मुसल्लता करें। जंग के एक तरफ़ अकेला ईरान था और दूसरी तरफ़ सद्दाम था जिसे अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस, इंग्लैंड और जाली सियोनी हुकूमत की हिमायत हासिल थी और हक़ीक़त में उसे तीसरी आलमी जंग कहा जा सकता है।
उन्होंने जम्हूरी-ए-इस्लामी और इस्तकबारी मोहाज़े के दरमियान जंग को दो तहज़ीबों का तसादुम करार देते हुए कहा: इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने इंकिलाब-ए-इस्लामी के ज़रिये एक तहज़ीबी तहरीक का आग़ाज़ किया जो ज़वालपज़ीर मग़रिबी तहज़ीब के बालमुक़ाबिल है।
आलमी इस्तकबार यानी अमेरिका अपनी धौंस के साथ कहता है कि ईरान को मुज़ाकिरात करने चाहिए यानी उसे सिरतसलीम-ए-ख़म होना चाहिए हालांकि ईरानी क़ौम कभी ज़ोर-ओ-ज़ुल्म के सामने सिरतसलीम नहीं करती और किसी भी ज़िल्लत को क़बूल नहीं करती।
हुजतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मलिकी ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका की जंग और मुज़ाकिरात की खोखली धमकियों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, मुज़ाकिरात का मतलब यह है कि बाहमी गुफ़्तगू के ज़रिये एक दूसरे के मफ़ाद का ख़याल रखा जाए लेकिन अमेरिका मुज़ाकिरात के नक़ाब के पीछे ईरान के सारे मसादिर पर क़ब्ज़ा और हमारे मुल्क को हड़पना चाहता है।
वह कहते हैं कि तुम अपने साइंसदानों से फ़ायदा न उठाओ, तुम्हारे पास साइंसदान नहीं होने चाहिए, तुम्हारा जोहरी प्रोग्राम नहीं होना चाहिए, तुम्हारे पास मीज़ाइल नहीं होने चाहिए और जो कुछ हम कहें वही अन्जाम देना होगा। बिल्कुल उसी तरह जैसे वह वेनेज़ुएला के साथ कर रहे हैं जहाँ अब वह उस मुल्क के तेल के बारे में ख़ुद फ़ैसला करते हैं लेकिन यह अन्जाम नहीं है क्योंकि जब कोई मुल्क अमेरिका के सामने तस्लीम हो जाता है और अपनी सारी सलाहियतें क़ुरबान कर देता है और कमज़ोर हो जाता है तो फिर वही अमेरिका जैसे उसने शाम और लीबिया पर बमबारी की और उन्हें तबाही से दोचार किया वैसे ही उस मुल्क पर भी हमला कर देता है।
थार्गिक समस्याओं को हल करने में शिक्षक की भूमिका केंद्रीय है।आयतुल्लाह अराफी
हौज़ा ए इल्मिया के प्रबंधक ने फ़रहंगियान विश्वविद्यालय को संस्कृति, शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में देश के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संस्थानों में से एक बताते हुए शिक्षक प्रशिक्षण के हार्ड और सॉफ्ट पहलुओं में गहरे परिवर्तन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
हौज़ा ए इल्मिया के प्रबंधक आयतुल्लाह अली रज़ा अराफी ने फ़रहंगियान विश्वविद्यालय के अध्यक्ष डॉक्टर बरज़ोई से मुलाक़ात में इस संस्था की शैक्षिक कोशिशों और सेवाओं की सराहना करते हुए इसे संस्कृति, शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में देश के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संस्थानों में गिना।
उन्होंने रहबर-ए-मोअज़्ज़म इंक़ेलाब-ए-इस्लामी की तरफ से शिक्षक प्रशिक्षण के विषय पर विशेष ध्यान की ओर इशारा करते हुए कहा,जामिया फ़रहंगियान की सेवाएं ध्यान देने और प्रशंसा के काबिल हैं और इस जामिया का काम उन मामलों में शामिल है जिन पर रहबर-ए-मोअज़्ज़म इंक़िलाब की ख़ास ताकीद है।
आयतुल्लाह अराफी ने देश की थार्गिक समस्याओं के समाधान में शिक्षक की केंद्रीय भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहा,देश की थार्गिक समस्याओं के समाधान में शिक्षक की भूमिका केंद्रीय है।
अगर एक सालेह आलिम और बा-सलाहियत शिक्षक तैयार किया जाए तो वह बेहद साधारण माहौल में भी परिवर्तन ला सकता है लेकिन अगर बेहतरीन सुविधाएं मुहैया करा दी जाएं लेकिन शाइस्ता शिक्षक तैयार न हो तो वांछित नतीजा हासिल नहीं होता।
उन्होंने छात्रों और शिक्षकों की बड़ी वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और इंक़िलाबी शख्सियतों से मुलाक़ात की अहमियत पर भी ज़ोर दिया और कहा: महान इंसानों के साथ यहाँ तक कि एक या दो गहरी और असली मुलाक़ातें भी लंबे समय तक प्रशिक्षण प्रभाव रखती हैं। यह एक ऐसा मामला है जिसका आज हासिल करना मुश्किल ज़रूर है लेकिन बहुत ज़रूरी है।
मस्जिदों और चिकित्सीय केंद्रों को आग के हवाले करने से शरपसंद अनासिर की हक़ीक़त बेनक़ाब
जामेआ मदर्रेसीन हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के सरबराह आयतुल्लाह सैयद हाशिम हुसैनी बुशहरी ने कहा है कि हालिया फ़सादात के दौरान मस्जिदों, क़ुरआन-ए-मजीद और चिकित्सीय मराक़िज़ को आग लगाए जाने के वाक़िआत ने शरपसंद अनासिर की असली हक़ीक़त अवाम के सामने वाज़ेह कर दी है ऐसे अफ़राद न तो किसी दीनी और अख़लाक़ी नज़रिया के हामी हैं और न ही ईरानी पहचान के एहतेराम के क़ायल।
मज्मा-ए-नुमाइंदगान-ए-तुल्लाब व फ़ुज़ला-ए-हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के वफ़्द ने जामेआ मदर्रेसीन हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के सरबराह ने आयतुल्लाह हुसैनी बुशहरी से मुलाक़ात की, जिसमें मुल्की हालात और हालिया वाक़िआत पर तफ़सीली गुफ़्तगू हुई।
आयतुल्लाह हुसैनी बुशहरी ने विलादत-ए-इमाम मेंहदी (अ.स.) की मुनासबत से मुबारकबाद पेश करते हुए कहा कि तमाम मोमिनीन, ख़ुसूसन शिया हज़रात, आप (अ.स.) के ज़ुहूर के मुंतज़िर हैं और आपके सच्चे नासिर व मददगार बनने की तमन्ना रखते हैं।
उन्होंने हालिया फ़सादात को रहबर ए मुअज़्ज़म-ए-इंक़िलाब के मुताबिक़ “बग़ावत जैसी सूरत” क़रार देते हुए कहा कि दुश्मनों ने अपनी तमाम इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी ताक़तों को बरू-ए-कार लाकर मुल्क में बदअमनी फैलाने की कोशिश की।
उनका कहना था कि इन फ़सादात में कुछ अनासिर ने ऐसे जुरूम अंजाम दिए जो कुछ मौक़ों पर दहशतगर्द तंज़ीम दाइश से भी ज़्यादा संगीन थे। उनके मुताबिक़, हालिया वाक़िआत में ग़ैर-मुल्की मुदाख़िलत पहले से कहीं ज़्यादा वाज़ेह हो चुकी है और कुछ बैरूनी ताक़तें पर्दा-ए-पोशीदा में इन कार्रवाइयों की क़ियादत कर रही थीं।
आयतुल्लाह हुसैनी बुशहरी ने कहा कि मस्जिदों, क़ुरआन और चिकित्सीय मराक़िज़ पर हमले इस बात का सुबूत हैं कि ये अनासिर मुल्क को टुकड़े-टुकड़े करने के दरपे हैं और इस्लामी व इंसानी अक़दार के दुश्मन हैं।
उन्होंने 22 रजब की अज़ीम-उश-शान अवामी रैली को अवामी बसीरत की अलामत क़रार देते हुए कहा कि क़ौम ने दुश्मन को वाज़ेह पैग़ाम दे दिया है कि वह मुल्क के ख़िलाफ़ किसी भी साज़िश को कामयाब नहीं होने देगी।
उन्होंने मज़ीद कहा कि फ़िरदौसी और ख़य्याम के मुजस्समों की तौहीन इस अम्र की निशानी है कि ये अनासिर ईरानी तहज़ीब और क़ौमी पहचान से भी दुश्मनी रखते हैं।
आख़िर में उन्होंने मज्मा-ए-नुमाइंदगान-ए-तुल्लाब की सरगर्मियों को सराहा और उम्मीद ज़ाहिर की कि आइंदा इंतिख़ाबात में उलमा व तुल्लाब भरपूर शिरकत करेंगे और दीनी व इंक़िलाबी ज़िम्मेदारियों को मज़ीद मज़बूत बनाएँगे।
इमाम ख़ुमैनीؒ के आफ़ताब-ए-इंक़िलाब ने ईरान को अबदी नूर, रश्द व हिदायत और बहार-ए-जावदाँ का पैग़ाम दियाः
22 बहमन वह रोशन दिन है जब उफ़्क़-ए-ईरान पर इंक़िलाब-ए-इस्लामी का सूरज नुज़ूदार हुआ, और कई दहाइयों की जुड़ोज़हद के बाद इमाम ख़ुमैनीؒ की बसीरत अफ़रोज़ क़ियादत में शाहंशाही नज़ाम का ख़ात्मा और इस्लामी जम्हूरीये का नया नज़ाम क़ायम हुआ। यह दिन ईरान की तारेख का एक संग-मी़ल है, जिसने 2500 साल की सल्तनत के तसल्लुत को ज़मीन बूस कर दिया।
22 बहमन वह रोशन दिन है जब उफ़्क़-ए-ईरान पर इंक़िलाब-ए-इस्लामी का सूरज नुज़ूदार हुआ, और कई दहाइयों की जुड़ोज़हद के बाद इमाम ख़ुमैनीؒ की बसीरत अफ़रोज़ क़ियादत में शाहंशाही नज़ाम का ख़ात्मा और इस्लामी जम्हूरीये का नया नज़ाम क़ायम हुआ। यह दिन ईरान की तारेख का एक संग-मी़ल है, जिसने 2500 साल की सल्तनत के तसल्लुत को ज़मीन बूस कर दिया।
ईरान के क़ौमी तक़विम में 22 बहमन को इंक़िलाब-ए-इस्लामी की फतह के दिन के तौर पर मनाया जाता है। यह दिन उन तारेखी वाक़ियात की याद दिलाता है जिनके नतीजे में शाहंशाही नज़ाम का ज़वाल और इस्लामी जम्हूरीये का क़ियाम हुआ।
इंक़िलाब से पहले ईरान, मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी की हुकूमत के ज़ेरे असर था। 1970 की दहाई में आवाम की बिदारी, वसीअ इंक़िलाबी एहतिज़ाज और इमाम ख़ुमैनीؒ की क़ियादत ने इस जुमूद ज़दा नज़ाम की बुनियादें हिला दीं। पहलवी हुकूमत की पालिसियां ईरानी कौम की दीनी, साक़ाफ़ती और सामाजी पहचान के खिलाफ थीं, जिसके नतीजे में मुल्क भर में आमवली रद्द-ए-अमल पैदा हुआ और आखिरकार शाह फरार हुआ।
22 बहमन ईरानी आवाम के लिए महज़ एक तारेखी दिन नहीं, बल्कि फिक्री, रूहानी और इंक़िलाबी तब्दीलियों की निशानी है। यह दिन आवाम की उस फतह की याद दिलाता है जो उन्होंने आमराना नज़ाम के खिलाफ हासिल की। इस दिन ने क़ौमी इत्तिहाद, आवामी हम-आहंगी और उन इक़द्वार की हिफ़ाज़त की अहमियत को उजागर किया, जिनमें आज़ादी, इस्तिक़लाल और अद्ल-ए-इज्तिमाई सर्फ़हस्त हैं।
22 बहमन 1357 (11 फ़रवरी 1979) को इमाम ख़ुमैनीؒ की तेहरान वापसी के साथ इंक़िलाब-ए-इस्लामी अपनी कामयाबी की आख़िरी मंज़िल पर पहुंचा और इस दिन को सरकारी तौर पर "यूम-ए-फ़तह" कहा गया। हर साल ईरानी आवाम इस दिन को महज़ सियासी फ़तह के तौर पर नहीं बल्कि एक azeem रूहानी अह्द के तौर पर भी मनाते हैं, और पूरे जोश-ओ-जज़्बे के साथ इंक़िलाब के उसूलों के साथ अपनी वफ़ादारी की तजदीद करते हैं।
यह इंक़िलाब महज़ इक्तेदार की तब्दीली नहीं था, बल्कि फिक्री, रूहानी और अख़लाक़ी बिदारी का वह लमह था जिसने एक कौम को उसकी असली पहचान लौटाई। इमाम ख़ुमैनीؒ की क़ियादत में उठने वाली तहरिक़, रश्द व हिदायत की ऐसी सदा बनकर उभरी जिसने इस्तिबाद और गुलामी के बुत पाश-पाश कर दिए। 2500 साल के शाहंशाही नज़ाम के ज़वाल के बाद आवामी इरादा, इस्लामी इक़द्वार और खुदमुख्तारी ने तारेख़ का रुख़ मोड़ दिया।
यही वजह है कि 22 बहमन हर साल अह्द-ए-वफ़ा की तजदीद और इंक़िलाब की अज़मत का दिन बनकर मनाया जाता है। आवाम सड़क़ों पर निकलकर उस बहार-ए-जावदाँ का जश्न मनाते हैं जो इमाम ख़ुमैनीؒ के अफ़कार से फूटी और जिसने ईरान को अबदी नूर अता किया। यह दिन इस हक़ीक़त का ऐलान है कि जब क़ियादत हक़ पर हो और कौम बिदार हो, तो इंक़िलाब ज़माना व मक़ान की क़ैद से आज़ाद होकर हमेशा ज़िंदा रहता है।
पूरे क़द से जो खड़ा हूँ तो यह तेरा है करम,
मुझको झुकने नहीं देता है सहारा तेरा।
22 बहमन, इंक़िलाब-ए-इस्लामी की कामयाबी की सालगिरह के मौके पर मैं इमाम ख़ुमैनीؒ, रहबर-ए-मुअज़्ज़म इंक़िलाब, शहीद-ए-इस्लाम और तमाम ख़ादिमीन-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी ईरान को ख़राज़-ए-एकी़दत पेश करता हूँ और उनके उसूलों के साथ तजदीद-ए-अह्द करता हूँ।
पाकिस्तान: इस्लामाबाद में आत्मघाती धमाके के आरोपी के करीबी रिश्तेदार गिरफ्तार
इस्लामाबाद के इमामबारगाह में हुए आत्मघाती हमले की जांच में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है।
स्थानीय पुलिस सूत्रों के मुताबिक, हमलावर के पेशावर स्थित घर पर छापा मारा गया। छापे के दौरान उसके दो भाइयों, एक बहनोई और एक महिला को गिरफ्तार किया गया है।
जांचकर्ताओं के मुताबिक, घटनास्थल से आत्मघाती बमबाज का पहचान पत्र भी मिला है। पहचान पत्र के आधार पर हमलावर की पहचान यासिर नाम से हुई है।
पहचान पत्र पर उसका स्थायी पता अब्बास कॉलोनी, शेरोजंगी, चारसदा रोड, पेशावर दर्ज है, जबकि वर्तमान पता गंज मोहल्ला कादियान, पेशावर बताया गया है।
जांच अधिकारियों ने बताया कि आत्मघाती हमलावर 5 महीने तक अफगानिस्तान में रहा, जहाँ उसने हथियार चलाने और आत्मघाती हमले की ट्रेनिंग ली।
पुलिस ने पेशावर और नौशहरा में हमलावर के संभावित नेटवर्क और उसके सहयोगियों की पहचान करने और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए छापेमारी शुरू कर दी है। इस घटना के सभी पहलुओं की जाँच जारी है, जिसमें हमलावर के संपर्कों और सहयोगियों की जाँच की जा रही है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, जांच के दौरान और महत्वपूर्ण सबूत मिलने की उम्मीद है, जो इस्लामाबाद में इस आतंकी घटना की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करेंगा।
दुनिया हिदायत और गुमराही के बीच निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी हैंः शेख इब्राहीम ज़कज़ाकी
नाइजीरिया की इस्लामी आंदोलन के नेता शेख इब्राहीम ज़कज़ाकी की राजधानी अबुजा में नीमा-ए-शाबान और हज़रत इमाम महदी (अ) के जन्मदिन के मौके पर एक भव्य सभा का आयोजन किया गया, जिसमें आम लोगों के विभिन्न वर्गों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
नाइजीरिया की इस्लामी आंदोलन के नेता शेख़ इब्राहीम ज़कज़ाकी की अगुआई में राजधानी अबुजा में निमा-ए-शाबान और हज़रत इमाम महदी (अ) के जन्मदिन के मौके पर एक भव्य सभा का आयोजन किया गया, जिसमें आम लोगों के विभिन्न वर्गों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
इस मौके पर शेख इब्राहीम ज़कज़ाकी ने इमाम जमाना (अ) के जन्मदिन की बधाई देते हुए आप (अ) को "दुनिया के मज़लूमों का हामी" करार दिया और कहा कि हज़रत इमाम महदी (अ) आज भी उम्मत-ए-मुस्लिमा की रहनुमाई और मामलात की सरपरस्ती फरमा रहे हैं।
उन्होंने असली इंतज़ार के मायने को रौशन करते हुए कहा कि हम सिर्फ ज़ुहूर के बाद इमाम (अ) की पैरवी के मुंतज़िर नहीं, बल्कि हम इस वक़्त भी उनके ताबे हैं। इमाम महदी (अ) हमारे रहबर हैं और हमारी रहनुमाई फरमा रहे हैं।
शेख़ ज़कज़की ने कहा कि आज दुनिया साफ तौर पर दो विरोधाभासी रास्तों, हक़ और बातिल, में तक्सीम हो चुकी है। हालांकि यह तक्सीम हमेशा से मौजूद रही है, लेकिन मौजूदा दौर में यह पहले से कहीं ज़्यादा नुमायाँ हो चुकी है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब हक़ व बातिल की सफें मुकम्मल तौर पर अलग हो जाएंगी तो पाखंडी किस तरफ जाएंगे? और ख़ुद ही जवाब दिया कि वह बिला शक्क व शुबहा बातिल के कैंप का रुख करेंगे।
आंदोलन के नेता ने हिदायत और गुमराही की ताक़तों के दरमियान ना-गुज़ीर तसादुम की तरफ इशारा करते हुए कहा कि यह टकराव ज़रूर होगा और इससे बचने की कोई सूरत नहीं। उन्होंने मज़ीद कहा कि दुश्मन आज ख़ुद को ताक़तवर ज़ाहिर करता है, लेकिन अल्लाह के इज्न से उसे यह एहसास दिलाया जा चुका है कि इससे बढ़कर भी एक ताक़त मौजूद है, और यही अंजाम-ए-बद की अलामत है।
शेख ज़कज़की ने ख़ास तौर पर इस्लामी जम्हूरीयत-ए-ईरान में होने वाली साइंसी और टेक्नोलॉजी की तरक़्क़ी को, जो ख़ुदा के नाम और इलाही रास्ते में हासिल हो रही है, इमाम जमाना (अ) की तालीमात और हिदायत का मज़हर करार दिया।
उन्होंने इमामत और इलाही क़ियादत पर ज़ोर देते हुए कहा कि अल्लाह तआला कभी भी ज़मीन को अपने हुज्जत के बग़ैर नहीं छोड़ता।
उन्होंने एक बार फिर इस बात पर ताकीद की कि इमाम महदी (अ) उम्मत-ए-मुस्लिमा के असली इमाम हैं और उम्मीद ज़ाहिर की कि उनका ज़ुहूर जल्द वाक़े होगा।
शेख ज़कज़ाकी ने मौजूदा आलमी हालात को हिदायत और गुमराही की खुली कशमकश करार देते हुए कहा कि ज़ालिम हुक्मरां दीनी लोगों पर दबाव डाल रहे हैं और उन्हें धमकियां दे रहे हैं, लेकिन यह धमकियां बे-असर हैं, क्योंकि वअदा-ए-इलाही कभी खिलाफ-ए-वाके नहीं होता।
तकरीब के इख़तिताम पर उन्होंने ज़ुहूर-ए-इमाम अस्र (अ) में तअज्जील के लिए दुआ की और अल्लाह तआला से इल्तिजा की कि मोमिनीन को इमाम महदी (अ) के सच्चे यार व मददगारों में शामिल फरमाए।














